डॉ. संजीदा खानम ‘शाहीन’ की दो कविताएं
मां मेरा संसार
आदाबो एहतराम ऐ मेरी मां तुझे,
झुक झुक करूं सलाम ऐ मेरी मां तुझे।।
बाहों के पालने में झुलाती रही मुझे,
लोरी हरेक रात सुनाती रही मुझे।।
अच्छे बुरे का पाठ पढ़ाती रही मुझे,
दुनिया की बदनज़र से बचाती रही मुझे।।
कंधे पे जग की सैर कराती रही मुझे,
गोदी में लेके लाड लड़ाती रही मुझे।।
लफ़्ज़ों के दम से दूर है तेरी महानता,
आदाबो एहतराम ऐ मेरी मां तुझे
में आज क्या दूं नाम ऐ मेरी मां तुझे।।
झुक झुक करूं सलाम ऐ मेरी मां तुझे।।
मेरी शरारतों का भी शिकवा नहीं किया,
थप्पड़ भी मेरे गाल पे चस्पा नहीं किया।।
गुस्से में आके बाग को सहरा नही किया,
दो पल भी अपने आप से तन्हा नहीं किया।।
सपना भला वो कौन सा पूरा नहीं किया,
देखो तो मेरे वास्ते क्या क्या नहीं किया।।
क्या दे कोई इनाम ऐ मेरी मां तुझे।।
झुक झुक करूं सलाम ऐ मेरी मां तुझे
माँ: दो अक्षर, पूरी दुनिया
“माँ” कहने में होंठ दो बार मिलते हैं कविता,
पहली बार “म” में ममता माँगने के लिए,
दूसरी बार “आ” में आशीर्वाद पाने के लिए।
वो “विश्व स्वच्छ दिवस” नहीं मनाती,
बस रोज़ हमारे बिखरे सपने समेटती है।
वो “deals” नहीं ढूंढती बाज़ार में,
बस हमारी भूख के लिए अपनी नींद बेच देती है।
“दर्पण में दरार” पड़ जाए तो,
माँ की आँख वो आईना है —
जिसमें हम हमेशा साबुत दिखते हैं।
“धोखा” खाकर जब लौटते हैं,
उसकी गोद में “अतीत की धूल” झड़ जाती है।
माँ वो “श्रेष्ठ शिक्षक” है
जो बिना डाँटे सिखा देती है,
“हाशिए” पर बैठे बच्चे को भी,
“शाहीन” की तरह उड़ना सिखा देती है।
“हवा भी होले से छूने लगी नदी का बदन”,
पर माँ का हाथ जब माथा छूता है ना…
बुखार भी शरमा कर उतर जाता है।
उसकी दुआ में वो ताकत है,
जो “tsunami” को भी मोड़ देती है।
मो आतिफ की अपनी मां डॉ. संजीदा खानम शाहीन के प्रति कविता
(ये नज़्म हर उस मां के लिए जो रात-रात भर जागती है, दर्द छुपाती है,और दिन भर काम की आड़ में मुस्कुराती है…)
छोटी सी जान की बड़ी सी दुनिया:
“माँ” अब सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं,
वो अलार्म है जो बिना बजे उठ
जाती है,
वो डॉक्टर है जो बिना डिग्री दर्द समझती है,
छोटे बच्चे को मां से बस इतना कहना
तू थकती है, टूटती है, रोती है छुपकर — पर हारती नहीं।
क्योंकि तेरी गोद में सोया हुआ बच्चा,
पूरी दुनिया से तेरी जीत है।
Happy Motherhood उस माँ को, सेल्यूट
जो मेरी दुनिया है ।
आई लव यू मम्मा


