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Thursday, July 30, 2026, 1:56 am

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Lifestyle

ऑन द स्पॉट एफ.एम. इंटरव्यू : पीत पत्रकार

आइडिया : के.बी. व्यास
वर्ड्स ऑफ इंटरव्यू : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस 
प्रजेंट : दिलीप कुमार पुरोहित. राइजिंग भास्कर

[FM JINGLE: “ऑन द स्पॉट एफ.एम. — सच की आवाज़!”]
[स्टूडियो में हल्का संगीत, कैमरों की क्लिक और न्यूज़ रूम जैसी हलचल]

परिचय: खबरों का कारोबारी

के. बी. व्यास :
नमस्कार श्रोताओ! आप सुन रहे हैं ऑन द स्पॉट एफ.एम.।
आज हमारे स्टूडियो में पधारे हैं पत्रकारिता की उस बिरादरी के प्रतिनिधि, जिनके लिए खबर का मूल्य उसकी सच्चाई से नहीं, उसकी सनसनी से तय होता है। जिनकी कलम स्याही से कम और मसाले से ज़्यादा चलती है।

स्वागत है… पीत पत्रकार!

[हल्की तालियाँ]

पीत पत्रकार
धन्यवाद! लेकिन कृपया मेरा स्वागत लाइव कीजिए। रिकॉर्डेड स्वागत में टीआरपी नहीं आती।

[स्टूडियो में ठहाका]

खबर या कारोबार?

के. बी. व्यास
सबसे पहले यही बताइए—आपको लोग “पीत पत्रकार” क्यों कहते हैं?

पीत पत्रकार
क्योंकि सफ़ेद कागज़ पर काली स्याही अब बिकती नहीं। थोड़ा पीला रंग चढ़ाना पड़ता है, तभी अख़बार और चैनल चमकते हैं।

के. बी. व्यास
यानी सच से ज़्यादा मसाला?

पीत पत्रकार
साहब! सूखी रोटी कौन खाता है? खबर में मिर्च-मसाला न हो तो दर्शक चैनल बदल देता है।

[हल्की हँसी]

टीआरपी का धर्म

के. बी. व्यास
आपके लिए सबसे बड़ा धर्म क्या है—सत्य या टीआरपी?

पीत पत्रकार
टीआरपी ही आज का सत्य है। जिसके पास दर्शक हैं, वही सत्य का ठेकेदार है।

के. बी. व्यास
अगर सच और टीआरपी आमने-सामने खड़े हों?

पीत पत्रकार
तो पहले ब्रेक लेंगे… फिर तय करेंगे किसे दिखाना है।

[जोरदार ठहाका]

सनसनी की प्रयोगशाला

के. बी. व्यास
एक छोटी-सी घटना को बड़ी खबर कैसे बना देते हैं?

पीत पत्रकार
बहुत आसान है।

“कुत्ता आदमी के पीछे दौड़ा”—यह खबर नहीं।

“शहर में दहशत! खूंखार जानवर का आतंक!”—यह खबर है।

“बारिश हुई”—यह सूचना है।

“आसमान का कहर! क्या यह प्रलय की शुरुआत है?”—यह प्राइम टाइम है।

[स्टूडियो में ठहाके और तालियाँ]

सवालों की बाज़ीगरी

के. बी. व्यास 
आप सवाल पूछते हैं या फैसला सुनाते हैं?

पीत पत्रकार
पहले फैसला सुनाता हूँ, फिर उसी के हिसाब से सवाल पूछता हूँ।

के. बी. व्यास
मतलब अदालत भी आप और जज भी आप?

पीत पत्रकार
जी हाँ। सोशल मीडिया के ज़माने में फैसला देर से देने वाला पिछड़ जाता है।

वायरल का विज्ञान

के. बी. व्यास
आपकी सबसे बड़ी योग्यता?

पीत पत्रकार
साधारण बात को असाधारण बनाना।

अगर बिल्ली पेड़ पर चढ़ जाए तो मैं लिखूँगा—

“रहस्यमयी घटना! क्या यह किसी बड़े संकट का संकेत है?”

[हँसी]

विज्ञापन और विचार

के. बी. व्यास 
क्या विज्ञापन खबरों को प्रभावित करते हैं?

पीत पत्रकार
नहीं… वे सिर्फ़ यह तय करते हैं कि कौन-सी खबर कितनी देर तक प्रभावित करेगी।

[तालियाँ]

के. बी. व्यास
और जिनके विज्ञापन नहीं?

पीत पत्रकार
उनकी खबरें भी कभी-कभी विज्ञापन ब्रेक में खो जाती हैं।

सत्ता से रिश्ता

के. बी. व्यास
सत्ता से आपकी दूरी कितनी रहती है?

पीत पत्रकार
इतनी कि सेल्फ़ी अच्छी आ जाए।

[स्टूडियो में ज़ोरदार हँसी]

के. बी. व्यास 
और विपक्ष?

पीत पत्रकार
उनसे भी बराबर दूरी। कैमरा दोनों ओर घूमता रहना चाहिए।

आईना या मेकअप?

के. बी. व्यास
पत्रकार समाज का आईना होता है। आप क्या कहते हैं?

पीत पत्रकार
आईना अब पुरानी चीज़ हो गया। हम तो फ़िल्टर लगे कैमरे हैं। चेहरा वही दिखाते हैं, जो लोग देखना चाहते हैं।

[हल्की खामोशी]

चरम बिंदु

के. बी. व्यास 
अगर किसी दिन जनता सनसनी छोड़कर सिर्फ़ तथ्य पढ़ने लगे तो?

पीत पत्रकार
फिर हमें भी पत्रकारिता करनी पड़ेगी।

[लंबा ठहाका, तालियाँ]

अंतिम संदेश

के. बी. व्यास
श्रोताओं के लिए कोई संदेश?

पीत पत्रकार
हर चमकती खबर सच नहीं होती, और हर शांत खबर महत्वहीन नहीं होती।
शीर्षक पढ़कर निर्णय मत लीजिए, तथ्य पढ़कर राय बनाइए।

समापन

के. बी. व्यास
आज की मुलाक़ात ने याद दिलाया कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, लेकिन जब उसकी नींव सत्य के बजाय सनसनी पर टिकने लगे, तो इमारत ऊँची ज़रूर दिखती है, मज़बूत नहीं रहती।

सवाल पूछना पत्रकारिता है,
सवालों से खेलना व्यापार।

इसी विचार के साथ आज का कार्यक्रम यहीं समाप्त होता है।

[FM JINGLE: “ऑन द स्पॉट एफ.एम. — सच की आवाज़!”]

के. बी. व्यास 
नमस्कार!

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor