राजीव गांधी नहीं रहे, बोफोर्स का आरोप लगाने वाले वीपी सिंह भी दुनिया छोड़ चुके; सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम लंबित चुनौती खारिज की, लेकिन सवाल अब भी कायम—न्याय इतना लंबा क्यों?
दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली
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भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनका जवाब केवल किसी एक फैसले से नहीं मिलता। बल्कि फैसला आने के बाद सवाल और बड़ा हो जाता है। बोफोर्स मामले में करीब चार दशक बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से अंतिम लंबित चुनौती का निपटारा ऐसा ही एक अवसर है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के साथ बोफोर्स से जुड़ी यह लंबी न्यायिक लड़ाई समाप्त हो गई।
लेकिन इस फैसले के साथ एक और सवाल सामने खड़ा है—क्या चार दशक बाद किसी मामले का न्यायिक निष्कर्ष समाज को वास्तविक न्याय का अनुभव करा सकता है? यह सवाल किसी एक व्यक्ति, पार्टी या सरकार के खिलाफ नहीं है। यह सवाल पूरी न्याय-व्यवस्था की गति को लेकर है।
आदमी की जिंदगी के 40 साल कोई छोटा समय नहीं
कानूनी फाइल के लिए 40 साल शायद एक लंबी अवधि हो सकती है, लेकिन इंसान की जिंदगी के लिए 40 साल बहुत बड़ा हिस्सा हैं। चार दशक में एक बच्चा जवान होता है, जवान व्यक्ति अधेड़ हो जाता है और एक पूरी पीढ़ी बदल जाती है। परिवारों की परिस्थितियां बदल जाती हैं। गवाह नहीं रहते। दस्तावेजों की प्रासंगिकता बदल सकती है। जांच से जुड़े अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं। वकील बदल जाते हैं और सबसे बड़ी बात—मामले से जुड़े कई प्रमुख लोग दुनिया से चले जाते हैं। बोफोर्स इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। जिस राजनीतिक दौर में यह विवाद राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आया था, उसके प्रमुख पात्र आज इस दुनिया में नहीं हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 1991 में हत्या हो चुकी है, जबकि बोफोर्स विवाद को राजनीतिक मुद्दा बनाने वाले प्रमुख नेताओं में रहे वीपी सिंह का 2008 में निधन हो गया।
ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है—जिस पीढ़ी ने इस विवाद को जन्म लेते, बढ़ते और अदालतों में जाते देखा, क्या उसी पीढ़ी के सामने इसका अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं आना चाहिए था?
न्याय सिर्फ फैसला नहीं, समय पर फैसला भी है
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से यह माना है कि speedy trial यानी शीघ्र न्याय न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। Hussainara Khatoon मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उचित और त्वरित सुनवाई Article 21 से जुड़ी संवैधानिक गारंटी का हिस्सा है। बाद के फैसलों में भी सुप्रीम कोर्ट ने speedy investigation, inquiry, trial, appeal और revision के महत्व को रेखांकित किया है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि हर मामले के लिए एक कठोर और समान समय-सीमा निर्धारित करना व्यावहारिक नहीं है। यही वह जगह है जहां व्यवस्था पर गंभीर बहस की जरूरत है। अगर किसी महत्वपूर्ण आपराधिक या सार्वजनिक महत्व के मामले को अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने में 30-40 साल लग जाते हैं, तो क्या केवल अंतिम फैसला आ जाना पर्याप्त है?
सवाल दोषी को सजा का नहीं, पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता का है
न्याय में देरी का असर केवल आरोपी पर नहीं पड़ता। अगर कोई व्यक्ति निर्दोष है और दशकों तक आरोप उसके साथ चलते हैं, तो उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा, मानसिक शांति और व्यक्तिगत जीवन पर इसका असर पड़ सकता है। अगर कोई व्यक्ति वास्तव में दोषी है, तो लंबे समय तक मुकदमा चलने से पीड़ित पक्ष को भी न्याय मिलने में देरी होती है। और अगर मामला राजनीतिक या सार्वजनिक महत्व का हो, तो उसका असर पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “किसे फायदा हुआ?”
सवाल यह होना चाहिए कि “न्याय प्रणाली इतनी धीमी क्यों रही?” बोफोर्स ने दिखाया—मामला खत्म होने तक इतिहास बदल जाता है। बोफोर्स विवाद जब सामने आया था, तब देश की राजनीति बिल्कुल अलग थी। उस समय के नेता आज इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं। सरकारें बदलीं, राजनीतिक समीकरण बदले, जांच एजेंसियों के अधिकारी बदले, न्यायालयों में पीढ़ियां बदलीं और तकनीक की दुनिया पूरी तरह बदल गई। लेकिन मामला चलता रहा। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम लंबित चुनौती खारिज की है, तो करीब चार दशक पुराने विवाद का यह अध्याय न्यायिक रूप से बंद हुआ है। यहीं से यह सवाल और गंभीर हो जाता है—अगर न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी चले कि विवाद से जुड़े प्रमुख लोग ही जीवित न रहें, तो क्या व्यवस्था को अपनी गति पर आत्ममंथन नहीं करना चाहिए?
कोयला मामला भी यही सवाल सामने लाता है
हाल के वर्षों में कोयला आवंटन से जुड़े मामलों ने भी भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने लंबी कानूनी प्रक्रिया का प्रश्न रखा है। कोयला आवंटन कोई एक मुकदमा नहीं था। अलग-अलग ब्लॉक और अलग-अलग आरोपों से जुड़े कई मामले रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में 1993 से 2010 के बीच किए गए अधिकांश कोयला ब्लॉक आवंटनों को रद्द कर दिया था। बाद में अलग-अलग मामलों में अलग-अलग न्यायिक प्रक्रियाएं चलती रहीं।इसलिए कोयला मामले को लेकर भी यह समझना जरूरी है कि किसी एक मामले का निपटारा पूरे “कोयला घोटाले” का अंतिम फैसला नहीं है। लेकिन यह पूरा घटनाक्रम फिर वही सवाल पूछता है—क्या महत्वपूर्ण मामलों के लिए ऐसी न्यायिक व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जिसमें अंतिम निर्णय अनावश्यक रूप से दशकों तक न खिंचे?
सुप्रीम कोर्ट क्या एक साल की सीमा तय कर सकता है?
यह मांग सुनने में सरल लगती है कि महत्वपूर्ण मामलों का अंतिम फैसला एक साल के भीतर अनिवार्य रूप से हो। लेकिन व्यवहार में यह आसान नहीं है। हर मुकदमे की प्रकृति अलग होती है। किसी मामले में सैकड़ों गवाह हो सकते हैं, हजारों दस्तावेज हो सकते हैं, कई आरोपी हो सकते हैं और जांच कई देशों तक फैली हो सकती है।सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसलों में माना है कि हर मामले के लिए एक समान अनिवार्य समय-सीमा तय करना हमेशा संभव नहीं है। फिर भी इसका अर्थ यह नहीं कि समयबद्ध न्याय की दिशा में कोई व्यवस्था बनाई ही नहीं जा सकती। एक साल का लक्ष्य हर मामले के लिए कठोर कानून न सही, लेकिन गंभीर और संवेदनशील मामलों के लिए case-management framework क्यों नहीं हो सकता?
एक नई व्यवस्था की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट और सरकार मिलकर ऐसी व्यवस्था पर विचार कर सकते हैं जिसमें अत्यंत महत्वपूर्ण मामलों को अलग श्रेणी में रखा जाए।
समयबद्ध न्याय के लिए संभावित व्यवस्था
1. संवेदनशील मामलों की पहचान
राष्ट्रीय महत्व, बड़े आर्थिक अपराध, संवैधानिक महत्व और अत्यधिक सार्वजनिक प्रभाव वाले मामलों की अलग श्रेणी बनाई जाए।
2. समयबद्ध सुनवाई
ऐसे मामलों में सुनवाई के लिए प्राथमिकता वाली समय-सारणी तय हो।
3. अनावश्यक स्थगन पर नियंत्रण
बार-बार तारीख लेने की प्रवृत्ति को सीमित किया जाए।
4. डिजिटल केस मैनेजमेंट
दस्तावेज, गवाह और सुनवाई की स्थिति डिजिटल रूप से व्यवस्थित की जाए।
5. अपील की समय-सीमा
फैसले के बाद अपील को भी वर्षों तक लंबित न रहने दिया जाए।
6. जवाबदेही और समीक्षा
अगर कोई संवेदनशील मामला असाधारण रूप से लंबा खिंच रहा है तो उच्च स्तर पर उसकी समीक्षा हो।
न्यायपालिका पर सवाल नहीं, व्यवस्था में सुधार की मांग
यह बहस न्यायपालिका की आलोचना करने के लिए नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली को मजबूत करने के लिए होनी चाहिए। भारत की न्यायपालिका लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए उसकी विश्वसनीयता केवल सही फैसलों से नहीं, बल्कि समय पर फैसलों से भी मजबूत होती है। किसी मामले में देर के पीछे कई कारण हो सकते हैं—जांच की कमजोरी, गवाहों की अनुपस्थिति, अदालतों में लंबित मामलों का बोझ, बार-बार स्थगन, अपीलों की लंबी प्रक्रिया और प्रशासनिक समस्याएं। इसलिए समाधान भी पूरे सिस्टम में तलाशना होगा।
40 साल बाद आया फैसला आने वाली पीढ़ी को क्या संदेश देगा?
बोफोर्स का मामला आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ एक राजनीतिक विवाद का इतिहास नहीं है। यह न्याय व्यवस्था के सामने एक आईना भी है। क्या ऐसा संभव है कि भविष्य में किसी बड़े मामले का अंतिम फैसला उसी पीढ़ी के सामने हो जिसने मामला शुरू होते देखा था? क्या कोई ऐसा तंत्र बनाया जा सकता है जिसमें महत्वपूर्ण मामलों की प्रत्येक अवस्था की समय-सीमा निर्धारित हो? क्या मुकदमे की शुरुआत से लेकर अंतिम अपील तक पूरा judicial timeline बनाया जा सकता है?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या “तारीख पर तारीख” की जगह “समय पर न्याय” भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल लक्ष्य बन सकता है? प्राकृतिक न्याय का अर्थ सिर्फ सही फैसला नहीं। प्राकृतिक न्याय का मूल विचार निष्पक्ष प्रक्रिया से जुड़ा है। किसी व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले, निष्पक्ष निर्णय हो और कानून के अनुसार प्रक्रिया चले। लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्याय की प्रभावशीलता का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—समय। दशकों तक चलने वाली प्रक्रिया में न्याय की उपयोगिता कम हो सकती है। जिस व्यक्ति को न्याय चाहिए, हो सकता है वह न्याय मिलने तक जीवित ही न रहे। जिस आरोपी को अदालत से अपना नाम साफ करवाना है, हो सकता है वह फैसला सुनने के लिए मौजूद न हो। जिस गवाह की गवाही मामले के लिए महत्वपूर्ण है, वह शायद दुनिया में न हो। और जिस समाज ने मामले को वर्षों तक देखा है, उसकी स्मृति में भी मामले का वास्तविक तथ्य राजनीतिक आरोपों और धारणाओं के पीछे दब सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट को आगे की राह दिखानी चाहिए
बोफोर्स के अंतिम न्यायिक अध्याय के बाद शायद सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि फैसला किसके पक्ष में गया। सबसे बड़ा सवाल यह है—अगला बोफोर्स 40 साल क्यों चले? सुप्रीम कोर्ट पहले ही speedy trial को Article 21 से जोड़ चुका है। अब जरूरत इस सिद्धांत को ऐसी प्रभावी केस-मैनेजमेंट व्यवस्था में बदलने की है, जिससे महत्वपूर्ण मामलों में असाधारण देरी को रोका जा सके। एक साल की कठोर सीमा हर मामले के लिए व्यावहारिक न हो, लेकिन एक साल में सुनवाई पूरी करने का लक्ष्य, सख्त निगरानी, सीमित स्थगन और समयबद्ध अपील व्यवस्था जैसे उपाय निश्चित रूप से न्याय की गति सुधार सकते हैं।
फैसला देर से नहीं, समय पर चाहिए
बोफोर्स का मामला लगभग चार दशक बाद अपने अंतिम न्यायिक पड़ाव तक पहुंचा। लेकिन इस कहानी से सबसे बड़ा सबक यही निकलता है कि न्याय की गुणवत्ता के साथ उसकी समयबद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। राजीव गांधी इस दुनिया में नहीं हैं। वीपी सिंह भी नहीं हैं। विवाद के दौर की पूरी राजनीतिक पीढ़ी लगभग इतिहास बन चुकी है। ऐसे में सवाल उठाना स्वाभाविक है—जिस विवाद का फैसला चार दशक बाद आया, उसका न्यायिक निष्कर्ष उन लोगों के जीवन में क्या अर्थ रखता है जो इस मामले से सीधे जुड़े थे? 40 साल किसी मुकदमे की फाइल के लिए केवल एक संख्या हो सकती है, लेकिन इंसान की जिंदगी के लिए यह एक पूरी पीढ़ी है। इसलिए अब जरूरत किसी एक पुराने मामले पर बहस करने से आगे बढ़ने की है। सुप्रीम कोर्ट को ऐसी न्यायिक व्यवस्था विकसित करने की दिशा में नेतृत्व करना चाहिए, जिसमें महत्वपूर्ण मामलों को अंतिम निर्णय तक पहुंचने में पीढ़ियां न गुजरें। क्योंकि न्याय केवल यह नहीं है कि अंत में फैसला आ जाए। न्याय यह भी है कि फैसला उस समय आए, जब उसका अर्थ और उसका असर दोनों जीवित हों।
