OPD पर्ची के लिए QR कोड और डिजिटल टोकन की पहल के बाद अब सवाल—क्या पारदर्शिता, प्रशासनिक सुधार और डिजिटल अस्पताल की पूरी व्यवस्था राजस्थानभर में लागू होगी?
विशेष रिपोर्ट : दिलीप कुमार पुरोहित
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सहयोग : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के लिए आने वाला मरीज पहले बीमारी से लड़ता है और फिर व्यवस्था से। पर्ची के लिए कतार, डॉक्टर के कमरे के बाहर इंतजार, जांच की प्रक्रिया, दवा लेने के लिए दूसरी कतार और कई बार यह पता ही नहीं कि किस काउंटर पर जाना है—सरकारी अस्पतालों की यह तस्वीर देशभर में आम है। ऐसे में यदि अस्पताल की व्यवस्था मरीज को केंद्र में रखकर बनाई जाए और तकनीक का इस्तेमाल केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि कतार कम करने, पारदर्शिता बढ़ाने, डॉक्टर की जवाबदेही तय करने और मरीज का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के लिए किया जाए तो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर बदल सकती है।
जैसलमेर के जागरूक नागरिक पंकज भाटिया ने इसी सोच के साथ राजस्थान सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख शासन सचिव सहित संबंधित अधिकारियों को 6 जुलाई 2026 को एक विस्तृत सुझाव भेजा था। सुझाव में उन्होंने सरकारी अस्पतालों में गुणवत्ता, पारदर्शिता और कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए तीन महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं की ओर ध्यान दिलाया था। अब जैसलमेर में सरकारी अस्पतालों में ऑनलाइन OPD पंजीयन और डिजिटल टोकन जैसी व्यवस्था का विस्तार शुरू होना इस दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
पंकज भाटिया के सुझावों का मूल भाव यही था कि मरीज को व्यवस्था के पीछे नहीं, व्यवस्था को मरीज के पीछे चलना चाहिए।
और यही वह बिंदु है जहां से Rising Bhaskar का सवाल भी शुरू होता है—अगर एक नागरिक का सुझाव व्यवस्था में बदलाव की दिशा दिखा सकता है तो उसे केवल जैसलमेर तक सीमित क्यों रखा जाए? इसे पूरे राजस्थान में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने पर विचार क्यों नहीं होना चाहिए?
पर्ची की कतार से डिजिटल टोकन तक पहुंचा बदलाव
जैसलमेर जिले में सरकारी अस्पतालों में OPD के लिए ऑनलाइन पंजीयन और डिजिटल टोकन की सुविधा विस्तार की दिशा में काम शुरू किया गया है। श्री जवाहिर चिकित्सालय जैसलमेर, पोकरण सहित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में अस्पताल परिसर में ABDM QR कोड उपलब्ध कराए जा रहे हैं। मरीज या उसका परिजन मोबाइल फोन से QR कोड स्कैन कर आवश्यक जानकारी दर्ज कर ऑनलाइन पंजीयन कर सकता है। पंजीयन पूरा होने के बाद डिजिटल टोकन प्राप्त किया जा सकता है और उसी के आधार पर OPD में चिकित्सकीय परामर्श की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। इस व्यवस्था का सबसे सीधा फायदा यह है कि मरीज को केवल OPD पर्ची बनवाने के लिए लंबी कतार में खड़ा रहने की जरूरत कम हो सकती है। यानी तकनीक का उपयोग यहां किसी बड़ी कॉर्पोरेट सुविधा की तरह नहीं, बल्कि एक आम मरीज की रोजमर्रा की परेशानी कम करने के लिए किया जा रहा है।
पंकज भाटिया ने एक महीने पहले उठाई थी आवाज
6 जुलाई को पंकज भाटिया ने राजस्थान सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख शासन सचिव को भेजे अपने सुझाव में सरकारी चिकित्सालयों की सेवाओं को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और आधुनिक बनाने के लिए तीन प्रमुख बिंदु रखे। उनका पहला सुझाव था कि चिकित्सकों के कार्य का डिजिटल प्रदर्शन किया जाए। अस्पताल के प्रवेश द्वार पर डिजिटल LED स्क्रीन लगाई जाए, जिसमें विभिन्न चिकित्सकों के नाम, उनके OPD समय और मरीजों के उपचार से संबंधित आवश्यक जानकारी प्रदर्शित हो। इसके साथ ही अधिक मरीजों का उपचार करने वाले चिकित्सक को ‘माह का उत्कृष्ट चिकित्सक’ जैसे सम्मान से प्रोत्साहित करने का विचार भी दिया गया। दूसरा सुझाव चिकित्सकीय और प्रशासनिक कार्यों के पृथक्करण से जुड़ा था। पंकज भाटिया ने सुझाव दिया कि सफाई, लिनेन, रिकॉर्ड, डेटा अपलोड, रिपोर्टिंग और अन्य गैर-चिकित्सकीय कार्यों के लिए प्रशिक्षित प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति की जाए, ताकि चिकित्सक अपना अधिकतम समय मरीजों के उपचार में दे सकें। तीसरा और सबसे व्यापक सुझाव था—एकीकृत डिजिटल अस्पताल प्रणाली। इसके तहत मरीज के पंजीयन काउंटर से लेकर संबंधित चिकित्सक और फिर दवा वितरण काउंटर तक डिजिटल व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया गया। चिकित्सक द्वारा डिजिटल प्रणाली में दर्ज किए गए प्रिस्क्रिप्शन को दवा वितरण केंद्र पर उपलब्ध कराया जाए और मरीज को उसकी स्पष्ट प्रिंट प्रति भी दी जाए। यह व्यवस्था लागू होने पर मरीज को बार-बार एक ही जानकारी देने, पर्ची लेकर अलग-अलग काउंटरों पर भटकने और हस्तलिखित पर्ची समझने जैसी परेशानियों से राहत मिल सकती है।
पंकज भाटिया के तीन प्रमुख सुझाव
1. डिजिटल डिस्प्ले
अस्पताल के प्रवेश द्वार पर LED स्क्रीन पर चिकित्सकों के नाम, OPD समय और जरूरी सूचनाएं प्रदर्शित हों।
2. प्रशासनिक कार्य अलग
रिकॉर्ड, डेटा, रिपोर्टिंग, सफाई, लिनेन जैसे गैर-चिकित्सकीय काम प्रशिक्षित प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से हों, ताकि डॉक्टर मरीजों को अधिक समय दे सकें।
3. एकीकृत डिजिटल अस्पताल
पंजीयन → डॉक्टर → डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन → दवा वितरण—पूरी प्रक्रिया एक डिजिटल सिस्टम से जुड़ी हो।
अब जिला स्तर पर दिखने लगा असर
पंकज भाटिया के सुझावों के बाद जैसलमेर में डिजिटल OPD पंजीयन और डिजिटल टोकन की सुविधा का विस्तार होना महत्वपूर्ण है। जिला प्रशासन की ओर से भी इस दिशा में कदम उठाए गए हैं। यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी नागरिक का सुझाव स्वीकार होना और उसका प्रशासनिक व्यवस्था में वास्तविक रूप से दिखाई देना दो अलग-अलग बातें हैं। लेकिन जब नागरिक द्वारा उठाया गया मुद्दा और प्रशासन की ओर से शुरू की गई व्यवस्था एक ही दिशा में जाती दिखाई दे, तो उसे सकारात्मक प्रशासनिक संवाद का उदाहरण माना जाना चाहिए। जैसलमेर में QR कोड आधारित OPD पंजीयन इसी परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। यह व्यवस्था अभी केवल पर्ची और टोकन तक सीमित दिखाई देती है, लेकिन इसके भीतर आगे एक बड़े डिजिटल अस्पताल मॉडल की संभावना छिपी है।
सिर्फ QR कोड से बात पूरी नहीं होगी
यहां Rising Bhaskar का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। QR कोड लगाना निश्चित रूप से अच्छी शुरुआत है। लेकिन डिजिटल अस्पताल का अर्थ केवल QR कोड नहीं है। अगर मरीज QR कोड से पंजीयन कर ले, लेकिन डॉक्टर के पास वही पुरानी कागजी प्रक्रिया हो, दवा काउंटर पर फिर वही लंबी कतार हो, डॉक्टर की उपलब्धता की जानकारी मरीज को न मिले और अस्पताल में मरीज के पुराने रिकॉर्ड का उपयोग ही न हो सके, तो डिजिटल व्यवस्था अधूरी रह जाएगी। इसलिए पंकज भाटिया के सुझावों को एक समग्र डिजिटल अस्पताल मॉडल के रूप में देखने की जरूरत है।
RISING BHASKAR का सुझाव: जैसलमेर बने पायलट प्रोजेक्ट
Rising Bhaskar की ओर से राजस्थान सरकार और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग से आग्रह है कि पंकज भाटिया के सुझावों को केवल एक शिकायत अथवा सुझाव के रूप में न देखा जाए। इसे ‘डिजिटल और पारदर्शी सरकारी अस्पताल मॉडल’ के रूप में विकसित करने पर विचार किया जाना चाहिए। शुरुआत जैसलमेर के उन सरकारी अस्पतालों से की जा सकती है जहां मरीजों का दबाव अधिक है। पहले तीन से छह महीने इसका पायलट प्रोजेक्ट चलाया जाए। इसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाए। मरीजों की प्रतिक्रिया ली जाए। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की राय ली जाए। OPD में लगने वाले समय, पंजीयन के समय, दवा वितरण के समय और मरीजों की शिकायतों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए। यदि परिणाम सकारात्मक हों तो यही मॉडल प्रदेश के अन्य जिला अस्पतालों और बड़े सरकारी अस्पतालों में लागू किया जा सकता है।
एक आदर्श डिजिटल सरकारी अस्पताल कैसा हो?
मरीज अस्पताल पहुंचा
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QR कोड/मोबाइल से OPD पंजीयन
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डिजिटल टोकन
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डॉक्टर की उपलब्धता और OPD समय की जानकारी
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डॉक्टर के पास डिजिटल मरीज रिकॉर्ड
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डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन
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दवा वितरण काउंटर पर प्रिस्क्रिप्शन स्वतः उपलब्ध
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मरीज को प्रिस्क्रिप्शन की प्रिंट/डिजिटल कॉपी
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मरीज का रिकॉर्ड सुरक्षित डिजिटल रूप में उपलब्ध
यह व्यवस्था केवल सुविधा नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही का सिस्टम भी बन सकती है।
‘माह का उत्कृष्ट चिकित्सक’—छोटा सुझाव, बड़ा असर
पंकज भाटिया का एक सुझाव विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है—‘माह का उत्कृष्ट चिकित्सक’। सरकारी व्यवस्था में प्रोत्साहन का तंत्र अक्सर सीमित दिखाई देता है। अगर अस्पताल में डॉक्टरों के कार्य को पारदर्शी और उचित मानकों के आधार पर देखा जाए तथा उत्कृष्ट कार्य करने वाले चिकित्सक को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाए तो इससे सकारात्मक प्रतिस्पर्धा पैदा हो सकती है। लेकिन यहां सावधानी जरूरी है। ‘उत्कृष्ट चिकित्सक’ का चयन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि किस डॉक्टर ने सबसे ज्यादा मरीज देखे। गुणवत्ता का मूल्यांकन कई मानकों पर होना चाहिए—
- मरीजों की संतुष्टि
- समय पर OPD
- आपातकालीन सेवा में योगदान
- जटिल मामलों का उपचार
- मरीजों के प्रति व्यवहार
- डिजिटल रिकॉर्ड का सही उपयोग
- शिकायतों की स्थिति
- अस्पताल की टीम के साथ समन्वय
इस तरह का पारदर्शी मॉडल बनाया जाए तो सम्मान डॉक्टरों के बीच सकारात्मक प्रतिस्पर्धा पैदा कर सकता है।
डॉक्टर का काम इलाज है, कागजी बोझ नहीं
पंकज भाटिया का दूसरा सुझाव सरकारी अस्पतालों की एक महत्वपूर्ण समस्या को छूता है। एक चिकित्सक ने मेडिकल शिक्षा और प्रशिक्षण मरीज का इलाज करने के लिए लिया है। लेकिन अस्पतालों में डॉक्टरों को अनेक प्रशासनिक और रिकॉर्ड संबंधी काम भी करने पड़ते हैं। रिकॉर्ड, डेटा, रिपोर्टिंग, विभिन्न पोर्टलों पर जानकारी अपडेट करना और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां डॉक्टर के समय का हिस्सा लेती हैं। यदि इन कार्यों के लिए प्रशिक्षित प्रशासनिक अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध हों तो चिकित्सक का अधिक समय मरीज के लिए बच सकता है। Rising Bhaskar का मानना है कि ‘डॉक्टर का समय मरीज का अधिकार है।’ इस सिद्धांत को सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन से दवा व्यवस्था में भी पारदर्शिता
पंकज भाटिया के तीसरे सुझाव की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह केवल OPD पंजीयन तक सीमित नहीं है।
कल्पना कीजिए—
मरीज ने अस्पताल में पंजीयन कराया।
टोकन मिला।
डॉक्टर के पास गया।
डॉक्टर ने कंप्यूटर सिस्टम में दवा लिखी।
वही प्रिस्क्रिप्शन दवा वितरण काउंटर पर पहुंच गया।
दवा वितरण की स्थिति सिस्टम में दर्ज हो गई।
मरीज को प्रिस्क्रिप्शन की स्पष्ट कॉपी भी मिल गई।
ऐसे सिस्टम से हस्तलिखित पर्ची पढ़ने की समस्या कम हो सकती है। मरीज को यह भी पता रहेगा कि डॉक्टर ने कौन-सी दवा लिखी है। आगे चलकर इस व्यवस्था में उपलब्ध दवाओं और वितरित दवाओं का डिजिटल रिकॉर्ड जोड़ा जा सकता है। इससे अस्पताल प्रबंधन के पास दवा की मांग और उपलब्धता का बेहतर डेटा भी हो सकता है।
मरीज के लिए सबसे बड़ा बदलाव क्या होगा?
आज
पर्ची के लिए कतार → डॉक्टर की तलाश → इंतजार → कागजी पर्ची → दवा काउंटर की कतार
भविष्य का मॉडल
मोबाइल पंजीयन → डिजिटल टोकन → डॉक्टर की जानकारी → डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन → दवा काउंटर पर सीधा रिकॉर्ड → डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड
अर्थात—कम कतार, कम कागज, कम भ्रम और ज्यादा पारदर्शिता।
ABHA ID से आगे बढ़ सकता है डिजिटल रिकॉर्ड
ऑनलाइन पंजीयन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू ABHA ID भी है। यदि मरीज का डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड उचित नियमों, सहमति और सुरक्षा प्रावधानों के साथ व्यवस्थित किया जाए तो भविष्य में चिकित्सक को मरीज के पूर्व उपचार, जांच और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने में सुविधा हो सकती है।इससे मरीज को हर बार पुराने दस्तावेजों का पूरा पुलिंदा लेकर अस्पताल आने की जरूरत कम हो सकती है।हालांकि डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड के साथ डेटा सुरक्षा और मरीज की निजता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। तकनीक सुविधा दे, लेकिन मरीज की निजी स्वास्थ्य जानकारी की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
RISING BHASKAR की ओर से राजस्थान सरकार से आग्रह
Rising Bhaskar के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित का मानना है कि जैसलमेर में शुरू हो रही डिजिटल OPD व्यवस्था को केवल स्थानीय सुविधा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक अवसर है। राज्य सरकार चाहे तो पंकज भाटिया द्वारा दिए गए सुझावों को आधार बनाकर राजस्थान के सरकारी अस्पतालों के लिए एक मानक डिजिटल अस्पताल मॉडल तैयार कर सकती है।
इसके लिए—
पहला चरण: अधिक मरीजों वाले जिला अस्पतालों में पायलट प्रोजेक्ट।
दूसरा चरण: पायलट के परिणामों का स्वतंत्र मूल्यांकन।
तीसरा चरण: सफल मॉडल को सभी जिला अस्पतालों में लागू करना।
चौथा चरण: सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को चरणबद्ध तरीके से जोड़ना।
पांचवां चरण: OPD, डॉक्टर, जांच, दवा और डिजिटल रिकॉर्ड को एकीकृत करना।
यह पहल राजस्थान को सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में एक नई दिशा दे सकती है।
एक नागरिक का सुझाव, पूरे राज्य का मॉडल क्यों नहीं?
लोकतंत्र में सरकार केवल आदेश जारी करने वाली संस्था नहीं है। नागरिक भी शासन व्यवस्था के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। जब कोई नागरिक व्यवस्था की समस्या को समझकर समाधान का सुझाव देता है और सरकार उस दिशा में कदम उठाती है तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर है। पंकज भाटिया ने अपने पत्र में किसी व्यक्तिगत लाभ की मांग नहीं की। उन्होंने सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था को मरीज-केंद्रित, पारदर्शी और आधुनिक बनाने की बात रखी। अब आवश्यकता है कि इस पहल को व्यक्ति विशेष के सुझाव तक सीमित न रखा जाए। सुझाव पंकज भाटिया का है, लेकिन लाभ पूरे राजस्थान के मरीजों का हो सकता है। यही इस पहल की सबसे बड़ी खूबसूरती होगी।
अब आगे क्या होना चाहिए?
1. जैसलमेर में पायलट प्रोजेक्ट का औपचारिक मूल्यांकन हो।
2. मरीजों से फीडबैक लिया जाए।
3. डॉक्टरों और कर्मचारियों की समस्याएं भी दर्ज की जाएं।
4. डिजिटल OPD को डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन से जोड़ा जाए।
5. दवा वितरण प्रणाली को भी डिजिटल बनाया जाए।
6. अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता डिजिटल डिस्प्ले पर दिखाई जाए।
7. उत्कृष्ट चिकित्सकों को पारदर्शी मानकों के आधार पर सम्मानित किया जाए।
8. प्रशासनिक कामों के लिए प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध कराया जाए।
9. मरीज के डिजिटल रिकॉर्ड की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
10. सफल मॉडल को पूरे राजस्थान में चरणबद्ध लागू करने पर विचार हो।
RISING BHASKAR का दृष्टिकोण: अस्पताल की व्यवस्था मरीज के लिए है
सरकारी अस्पताल में आने वाला व्यक्ति कोई ग्राहक नहीं है। वह नागरिक है और स्वास्थ्य सेवाओं तक सम्मानजनक पहुंच उसका अधिकार है। वह गरीब हो सकता है, बुजुर्ग हो सकता है, दूरदराज के गांव से आया हो सकता है, अनपढ़ हो सकता है या डिजिटल तकनीक से अनजान हो सकता है। इसलिए डिजिटल व्यवस्था बनाते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि मोबाइल से पंजीयन की सुविधा के साथ सहायता डेस्क भी मौजूद रहे। डिजिटल व्यवस्था कतार खत्म करने के लिए होनी चाहिए, गरीब और डिजिटल रूप से कमजोर मरीज को बाहर करने के लिए नहीं। यानी अस्पताल में दो रास्ते हों—
मोबाइल से स्वयं पंजीयन करने वालों के लिए डिजिटल सुविधा और जिन्हें सहायता चाहिए उनके लिए मानवीय सहायता काउंटर। यही वास्तव में समावेशी डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था होगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात—तकनीक से ज्यादा जरूरी नीयत
QR कोड, LED स्क्रीन, डिजिटल टोकन, कंप्यूटर, ऐप और डिजिटल रिकॉर्ड—ये सभी साधन हैं।
मंजिल है—
मरीज को सम्मान।
मंजिल है—
मरीज का समय बचाना।
मंजिल है—
डॉक्टर का समय मरीज को देना।
मंजिल है—
दवा और उपचार की प्रक्रिया में पारदर्शिता।
और मंजिल है—
सरकारी अस्पताल पर आम आदमी का भरोसा मजबूत करना।
अगर यह उद्देश्य सामने रखा जाए तो पंकज भाटिया के सुझावों से एक बड़ा प्रशासनिक सुधार मॉडल तैयार किया जा सकता है।
सौ बात की एक बात : जैसलमेर से राजस्थान तक उठे सुधार की आवाज
जैसलमेर में OPD पंजीयन के लिए QR कोड और डिजिटल टोकन की शुरुआत को एक छोटी प्रशासनिक सुविधा मानकर छोड़ देना ठीक नहीं होगा। यह उस बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है जिसमें सरकारी अस्पताल में मरीज की यात्रा कागज और कतार से डिजिटल और व्यवस्थित व्यवस्था की ओर बढ़े।
एक नागरिक ने सुझाव दिया। जिला प्रशासन ने उस दिशा में कदम बढ़ाया। अब राज्य सरकार के सामने अगला अवसर है। क्या जैसलमेर के इस प्रयोग को पूरे राजस्थान के लिए मॉडल बनाया जा सकता है?Rising Bhaskar की ओर से राजस्थान सरकार, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन से आग्रह है कि इस संभावना पर गंभीरता से विचार किया जाए। Rising Bhaskar के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित का स्पष्ट मत है कि पंकज भाटिया के सुझावों को व्यक्ति विशेष की पहल मानकर सीमित न रखा जाए, बल्कि इन्हें राज्य की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के लिए एक नागरिक-प्रेरित मॉडल के रूप में परखा जाए। यदि पायलट सफल होता है तो राजस्थान के हर बड़े सरकारी अस्पताल में डिजिटल OPD, डॉक्टर डिस्प्ले, डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन, दवा वितरण की डिजिटल कड़ी और मरीज-केंद्रित प्रशासनिक व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए। क्योंकि आखिरकार सरकारी अस्पताल की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं है कि वहां कितने कंप्यूटर लगे हैं या कितने QR कोड लगाए गए हैं। सबसे बड़ी सफलता तब होगी, जब अस्पताल में आने वाला मरीज यह कहे—
“आज मेरा समय बचा, मुझे सम्मान मिला और मुझे इलाज की व्यवस्था समझने के लिए किसी के पीछे नहीं भागना पड़ा।”
और अगर जैसलमेर से यह बदलाव शुरू होता है, तो इसे पूरे राजस्थान तक पहुंचाने में कोई देर नहीं होनी चाहिए। एक नागरिक ने सुझाव दिया है—अब सरकार उस सुझाव को व्यवस्था में बदल सकती है।यही सुशासन है। यही डिजिटल स्वास्थ्य का वास्तविक उद्देश्य है। और यही वह बदलाव है, जिसकी जरूरत राजस्थान के हर सरकारी अस्पताल को है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor


