ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4 पर चौथा इंटरव्यू छींक लाल जी का के बी व्यास के साथ
आइडिया एंड क्यूरेटर : केबी व्यास, दुबई
वर्ड्स ऑफ इंटरव्यू : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
प्रजेंट : दिलीप कुमार पुरोहित. राइजिंग भास्कर
ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4 पर चौथा इंटरव्यू — छींक लाल जी का
के बी व्यास के साथ
♪♪… छींऽऽक… टण… ढम… छींऽऽक… ♪♪
घोषक:
“आप सुन रहे हैं—ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4… जहाँ सवाल पूछने से पहले रूमाल और जवाब सुनने से पहले छाता साथ रखना आवश्यक है!”
(स्टूडियो में तालियाँ… और अचानक एक जोरदार छींक!)
आऽऽऽछींऽऽऽऽ!!!
के बी व्यास:
नमस्कार सा… राम-राम सा… खम्मा घणी सा!
आज हमारे स्टूडियो में पधारे हैं ऐसे विशिष्ट अतिथि, जिनका परिचय देने के लिए नाम की आवश्यकता नहीं पड़ती। दूर से यदि लगातार तीन छींकें सुनाई दें तो लोग स्वयं कह देते हैं—
“लगता है छींक लाल जी आ रहे हैं!”
स्वागत कीजिए—श्री छींक लाल जी का!
छींक लाल:
आऽऽऽछींऽऽऽ!
के बी व्यास:
धन्यवाद सा!
छींक लाल:
मैंने धन्यवाद नहीं कहा, मुझे छींक आई थी।
के बी व्यास:
कोई बात नहीं सा, हमारे यहाँ दोनों का समान सम्मान है।
के बी व्यास:
छींक लाल जी, सबसे पहले यह बताइए कि आपका वास्तविक नाम भी छींक लाल ही है?
छींक लाल:
नहीं सा। बचपन में मेरा नाम था—शांतिलाल।
के बी व्यास:
फिर छींक लाल कैसे हो गए?
छींक लाल:
पहली कक्षा में अध्यापक उपस्थिति लेते थे—
“शांतिलाल?”
मैं कहने ही वाला होता—“जी सर”—कि पहले छींक निकल जाती।
एक दिन मास्टरजी बोले, “तुम शांतिलाल कम और छींक लाल ज्यादा हो।”
बस, नाम ऐसा पड़ा कि असली नाम घर में पुरानी मार्कशीटों तक सीमित रह गया।
के बी व्यास:
तो आपको बचपन से ही इतनी छींकें आती थीं?
छींक लाल:
बचपन से? अरे सा, मेरा तो जन्म भी छींक के साथ हुआ था!
डॉक्टर ने कहा—“बधाई हो, बेटा हुआ है।”
मैंने कहा—
“आऽऽछीं!”
डॉक्टर बोले—“और लगता है अपना परिचय भी स्वयं दे रहा है!”
के बी व्यास:
आपकी छींकें सामान्य हैं या कुछ विशेष प्रकार की?
छींक लाल:
बहुत विशेष। मेरी छींकें परिस्थितियों के अनुसार बदलती हैं।
सुबह वाली छींक थोड़ी धार्मिक होती है—शांत, सात्त्विक।
ऑफिस वाली छींक सरकारी होती है—धीरे शुरू होती है, फिर फाइल की तरह लंबी चलती है।
और शादी-ब्याह में आने वाली छींक पूरी बैंड-बाजे वाली होती है।
के बी व्यास:
अरे वाह!
छींक लाल:
और कभी-कभी तो मैं देसी मोहम्मद रफ़ी के सुर में छींकता हूँ, मतलब राग मल्हार में छींकता हूँ और मेरा दावा है कि अगर हैंड पम्प के पास बैठ के राग मल्हार में छींकूँगा तो उसमें से पानी ख़ुद-ब-ख़ुद बाहर निकल कर आ जाएगा।
के बी व्यास:
ओय तेरी तो! ऐसा क्या?
छींक लाल:
अरे व्यास जी, नारियल फुड़वाने लोग मेरे पास आते हैं। कहते हैं—“ये एक नारियल फोड़ना है, जरा धीरे से छींक दीजिए।”
के बी व्यास:
धीरे से छींक दीजिए? ऐसा क्यों कहते हैं?
छींक लाल:
हाँ, अगर पूरा बोरा भरा हुआ हो तो कहते हैं कि जोर से छींकिए। तब मैं जोर से छींकता हूँ तो सारे नारियल फूट जाते हैं।
के बी व्यास:
वाह वाह, भाई कमाल है!
छींक लाल:
एक बार एक विवाह में गया तो पंडितजी बोले—
“यदि किसी को इस विवाह पर आपत्ति हो तो अभी कहे।”
उसी समय मुझे जोरदार छींक आई—
“आऽऽऽछींऽऽऽ!”
पूरा पंडाल मेरी तरफ देखने लगा।
दूल्हे के पिता बोले—“भाईसाहब, आपत्ति क्या है?”
मैं बोला—“मुझे विवाह से नहीं, फूलों से एलर्जी है!”
(स्टूडियो में ठहाका)
के बी व्यास:
आपकी छींक के कारण कभी कोई बड़ी गलतफहमी हुई?
छींक लाल:
कई बार।
एक बार रेल में टिकट चेकर आया। बोला—
“टिकट?”
मैं जेब से निकाल ही रहा था कि—
“आऽऽऽछीं!”
टिकट उड़कर सामने वाले यात्री की चाय में गिर गया।
टीटी बोला—“टिकट दिखाइए।”
मैंने कहा—“वो सामने चाय पी रहा है।”
के बी व्यास:
फिर?
छींक लाल:
चाय वाला नाराज़—
“ये टिकट है या टी-बैग?”
के बी व्यास:
सुना है आपकी छींक का समय भी बहुत सटीक है?
छींक लाल:
बिल्कुल। लोग घड़ी मिलाते हैं मेरी छींक से।
हमारे मोहल्ले में रोज सुबह छह बजे मैं पहली छींक मारता हूँ। बगल वाले शर्मा जी उसी से उठते हैं।
छह बजकर पाँच मिनट पर दूसरी आती है—उनकी पत्नी चाय चढ़ाती हैं।
तीसरी छींक पर उनका बेटा स्कूल की बस के लिए दौड़ता है।
एक दिन मुझे छींक नहीं आई।
पूरा परिवार देर से उठा।
शर्मा जी बोले—“छींक लाल जी, आपकी वजह से बच्चे की बस छूट गई!”
मैंने कहा—“अब क्या मैं अलार्म क्लॉक का वार्षिक शुल्क भी लूँ?”
के बी व्यास:
आप रूमाल कितना बड़ा रखते हैं?
छींक लाल:
मैं सामान्य रूमाल नहीं रखता।
मेरे पास तीन श्रेणियाँ हैं—
“घरेलू छींक” के लिए छोटा रूमाल।
“सार्वजनिक छींक” के लिए मध्यम।
और “विशेष अवसर” के लिए बड़ा तौलिया।
के बी व्यास:
तौलिया?
छींक लाल:
जी। अनुभव से सीखा है सा। जीवन में आदमी को तैयारी रखनी चाहिए।
के बी व्यास:
आपके परिवार वाले आपकी छींक से परेशान नहीं होते?
छींक लाल:
अब तो उन्होंने तकनीक विकसित कर ली है।
जैसे ही मेरा चेहरा बदलता है, पत्नी तुरंत कहती हैं—
“बच्चो! पोज़िशन ले लो!”
एक बच्चा चाय बचाता है, दूसरा अखबार पकड़ता है, पत्नी फूलदान हटाती हैं।
मैं छींकता हूँ—
“आऽऽऽछींऽऽऽ!”
फिर सब सामान्य।
के बी व्यास:
यानी परिवार में आपदा प्रबंधन बहुत अच्छा है।
छींक लाल:
हमारे घर को सरकार चाहे तो मॉडल घोषित कर दे।
के बी व्यास:
आपकी पत्नी आपकी छींक को कैसे देखती हैं?
छींक लाल:
विवाह से पहले उन्हें लगा था मेरी छींक बहुत प्यारी है।
कहती थीं—“अरे, कितनी क्यूट छींक है!”
शादी के पाँच साल बाद बोलीं—
“क्यूट तो पता नहीं, लेकिन लाउडस्पीकर जरूर है।”
अब बीस साल बाद कहती हैं—
“छींकनी है तो पहले बता देना, मैं बालकनी में चली जाऊँ।”
के बी व्यास:
आपको कभी किसी समारोह में भाषण देना पड़ा?
छींक लाल:
एक बार मुख्य अतिथि बनाया गया।
संचालक ने मेरा परिचय इतना लंबा दिया कि मुझे तीन छींकें आ गईं।
फिर मैं माइक पर आया और कहा—
“मित्रों…”
“आऽऽछीं!”
सामने वालों ने तालियाँ बजाईं।
मैंने कहा—
“आज…”
“आऽऽछीं!”
फिर तालियाँ।
तीसरी बार मैंने कुछ कहा ही नहीं, सीधे छींक दिया—तालियाँ पहले से ज्यादा!
तब समझ आया कि मेरे विचारों से ज्यादा लोकप्रिय मेरी छींक है।
के बी व्यास:
आप सोशल मीडिया पर भी प्रसिद्ध हैं?
छींक लाल:
बहुत।
मेरी एक वीडियो वायरल हुई थी—“सात सेकंड में पाँच छींकें।”
लोग कमेंट कर रहे थे—
“भाई, रीमिक्स बनाओ!”
एक डीजे ने मेरी छींक पर पूरा गाना बना दिया—
“छीं-छीं-छीं… बेबी छीं…” 
के बी व्यास:
आपने कॉपीराइट लिया?
छींक लाल:
अब सोच रहा हूँ। इतनी छींकें मुफ्त में बाँट दीं जीवन भर!
के बी व्यास:
आपको सबसे ज्यादा परेशानी कहाँ होती है?
छींक लाल:
पुस्तकालय में।
पूरी शांति होती है। हर कोई किताब पढ़ रहा होता है।
मैं दस मिनट छींक रोकता रहता हूँ। चेहरा लाल, आँखें बड़ी, नाक परेशान।
फिर अचानक—
आऽऽऽऽऽछींऽऽऽऽऽऽ!!!
और पचास लोग एक साथ ऐसे देखते हैं जैसे मैंने संविधान संशोधन कर दिया हो।
के बी व्यास:
मंदिर में?
छींक लाल:
वहाँ तो और समस्या है।
एक बार पंडितजी आरती कर रहे थे। मेरे सामने फूल थे।
जैसे ही मैंने छींक मारी, आरती की लौ हिल गई।
पंडितजी बोले—“भाईसाहब, भक्ति भाव ठीक है, पर पंखा बनने की आवश्यकता नहीं।”
के बी व्यास:
क्या लोग आपकी छींक पर “जीते रहो” कहते हैं?
छींक लाल:
पहली छींक पर कहते हैं।
दूसरी पर—“स्वस्थ रहो।”
तीसरी पर—“दवा ले लो।”
चौथी पर—“डॉक्टर को दिखाओ।”
पाँचवीं पर कोई कुछ नहीं कहता—सब दूरी बना लेते हैं।
के बी व्यास:
आपकी छींक का सबसे बड़ा फायदा क्या हुआ?
छींक लाल:
लाइन में जगह मिल जाती है।
बैंक में लंबी लाइन हो—बस नाक थोड़ा सिकोड़ो और बोलो—
“लगता है छींक आने वाली है…”
आगे वाला कहता है—“भाईसाहब, आप पहले चले जाइए।”
पीछे वाला—“हाँ-हाँ, बिल्कुल!”
इतना सम्मान मुझे किसी पुरस्कार से नहीं मिला जितना एक संभावित छींक से मिलता है।
के बी व्यास:
यह तो छींक-शक्ति का दुरुपयोग हुआ सा!
छींक लाल:
नहीं सा, इसे प्राकृतिक प्रतिभा का सामाजिक उपयोग कहते हैं।
के बी व्यास:
आपकी कोई महत्वाकांक्षा?
छींक लाल:
मैं “अंतरराष्ट्रीय छींक सम्मेलन” आयोजित करना चाहता हूँ।
दुनिया भर के लोग आएँ।
कोई छोटी छींक, कोई लंबी छींक, कोई साइलेंट छींक।
अंत में प्रतियोगिता हो—
“सबसे प्रभावशाली छींक।”
के बी व्यास:
और जज कौन होंगे?
छींक लाल:
जो अंतिम राउंड तक स्टूडियो में टिक जाएँ वही जज!
के बी व्यास:
अंत में श्रोताओं को कोई संदेश?
छींक लाल:
जी। छींक छोटी हो या बड़ी—उसे कभी व्यक्तित्व का आधार मत बनाइए।
के बी व्यास:
बहुत गंभीर बात कह दी आपने!
छींक लाल:
अभी पूरी नहीं हुई—
रूमाल हमेशा साथ रखिए, दूसरों से उचित दूरी रखिए और छींक आने से पहले माइक बंद करना मत भूलिए—
क्योंकि—
आऽऽऽऽऽऽछींऽऽऽऽ!!!
(माइक में जबरदस्त आवाज़…)
के बी व्यास:
अरे! हमारा साउंड इंजीनियर कहाँ गया?
साउंड इंजीनियर दूर से:
मैं सुरक्षित दूरी पर हूँ सा!
के बी व्यास:
छींक लाल जी, आज आपने सिद्ध कर दिया कि मनुष्य चाहे अपने शब्दों से दुनिया को न हिला पाए, लेकिन सही समय पर आई एक मजबूत छींक पूरा स्टूडियो अवश्य हिला सकती है!
छींक लाल:
और जाते-जाते एक अंतिम छींक श्रोताओं के लिए—
के बी व्यास:
नहीं-नहीं सा! कार्यक्रम का बजट केवल एक माइक तक का है!
♪♪… ढम… टण… छींऽऽक… टण… ♪♪
घोषक:
“आप सुन रहे थे—ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4—जहाँ आज के अतिथि छींक लाल जी ने हमें सिखाया कि जीवन में चाहे कितनी भी समस्याएँ आएँ, रूमाल, हास्य और थोड़ी-सी सावधानी हमेशा साथ रखनी चाहिए!”
के बी व्यास:
राम-राम सा… खम्मा घणी सा!
छींक लाल:
आऽऽछीं!
के बी व्यास:
जीते रहिए सा!
(समापन संगीत, तालियाँ और दूर से आती एक और छींक…)

