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Monday, August 17, 2026, 10:43 pm

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राइजिंग भास्कर की भीष्म प्रतिज्ञा : दो साल तक केवल सकारात्मक पत्रकारिता

18 अगस्त 2026 से 17 अगस्त 2028 तकक्राइम की सनसनी, न राजनीतिक गंदगी, न आरोप-प्रत्यारोप—हर दिन समाज, प्रकृति, स्वास्थ्य, रोजगार, सेवा और मानवता की अच्छी खबरों को मिलेगी प्राथमिकता

ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित का संकल्प : श्रीकृष्ण को साक्षी मानकर लेखनी को नकारात्मकता से मुक्त करने का प्रयास | ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना से पत्रकारिता का नया प्रयोग | सवाल यह भी—क्या अच्छाई को खबर बनाया जाए तो समाज की दिशा बदलेगी?

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

 

9783414079 diliprakhai@gmail.com

एक अखबार का असाधारण प्रयोग

पत्रकारिता का सामान्य चरित्र क्या है? सुबह अखबार खोलिए तो हत्या, दुर्घटना, अपराध, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, भ्रष्टाचार, विवाद, विरोध, बयानबाजी, तनाव, संघर्ष और समस्याओं की लंबी सूची सामने दिखाई देती है। टीवी चैनलों पर बहसें हैं, सोशल मीडिया पर आक्रोश है और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर क्लिक हासिल करने की दौड़। नकारात्मक खबर तेजी से फैलती है, क्योंकि मनुष्य का ध्यान संकट, भय और विवाद की ओर सहज रूप से आकर्षित होता है।

लेकिन क्या पत्रकारिता केवल वही दिखाए जो समाज में गलत हो रहा है? क्या मीडिया का काम केवल अंधेरे पर कैमरा डालना है या वह समाज में दीपक जलाने की जिम्मेदारी भी निभा सकता है? इन्हीं सवालों के बीच राइजिंग भास्कर ने एक ऐसा प्रयोग करने का निर्णय लिया है, जो संभवतः भारतीय मीडिया की परंपरागत कार्यशैली से बिल्कुल अलग है। राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित ने 18 अगस्त 2026 से 17 अगस्त 2028 तक दो वर्ष के लिए ‘पूर्ण सकारात्मक पत्रकारिता’ की भीष्म प्रतिज्ञा लेने का संकल्प किया है।

इस अवधि में राइजिंग भास्कर ऐसी सामग्री प्रकाशित करने से बचेगा, जिसका मूल प्रभाव समाज में भय, घृणा, हिंसा, तनाव, निराशा, वैमनस्य अथवा अनावश्यक नकारात्मकता फैलाना हो। यह केवल एक संपादकीय नीति नहीं, बल्कि एक प्रयोग है। एक आत्म-परीक्षण है। एक आध्यात्मिक संकल्प है। और सबसे बढ़कर यह सवाल समाज के सामने रखने की कोशिश है कि क्या मीडिया नकारात्मकता का जवाब सकारात्मकता से दे सकता है?

दैनिक भास्कर के ‘मंडे पॉजिटिव’ से आगे—हर दिन पॉजिटिव की कोशिश

समाचार जगत में सकारात्मक पत्रकारिता कोई नई अवधारणा नहीं है। अनेक समाचार संस्थानों ने समय-समय पर सकारात्मक खबरों को महत्व दिया है। दैनिक भास्कर की ‘मंडे पॉजिटिव’ जैसी पहल ने भी यह बताया कि पाठक केवल समस्याएं नहीं पढ़ना चाहता, वह समाधान और उम्मीद भी देखना चाहता है। लेकिन राइजिंग भास्कर का प्रस्ताव इससे आगे जाने का प्रयोग है। केवल सोमवार नहीं, सप्ताह के सातों दिन सकारात्मक। केवल एक पन्ना नहीं, बल्कि पूरी संपादकीय सोच सकारात्मक।केवल खबर नहीं, बल्कि खबर का चयन, शीर्षक, तस्वीर, वीडियो, विश्लेषण और आलेख—सबमें सकारात्मक दृष्टिकोण। राइजिंग भास्कर यह मानकर चलना चाहता है कि यदि समाज में हजार बुरी घटनाएं हो रही हैं तो उसी समाज में हजारों अच्छी घटनाएं भी हो रही हैं। कोई विद्यार्थी कठिन परिस्थितियों में सफलता प्राप्त कर रहा है, कोई चिकित्सक गरीब मरीज की मदद कर रहा है, कोई किसान नई तकनीक से खेती बदल रहा है, कोई युवा रोजगार पैदा कर रहा है, कोई महिला अपने पैरों पर खड़ी हो रही है, कोई संस्था पेड़ लगा रही है, कोई नागरिक घायल पशु को बचा रहा है और कोई शिक्षक अपना पूरा जीवन बच्चों के भविष्य के लिए समर्पित कर रहा है। सवाल केवल इतना है कि हम इनमें से किसे खबर बनाते हैं। राइजिंग भास्कर अगले दो वर्षों में इसी चुनाव को बदलने का प्रयास करेगा।

श्रीकृष्ण को साक्षी मानकर लेखनी का संकल्प

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म का मार्ग दिखाया। गीता का संदेश केवल युद्धभूमि का संदेश नहीं है; वह मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व, मोह, भय और निर्णय की भी व्याख्या है।

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

अर्थात मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। राइजिंग भास्कर का यह संकल्प भी इसी भावना से जुड़ा हुआ है। हम यह दावा नहीं कर रहे कि दो वर्षों में समाज बदल जाएगा। हम यह भी दावा नहीं कर रहे कि सकारात्मक पत्रकारिता से हर समस्या समाप्त हो जाएगी। हमारा अधिकार केवल अपनी लेखनी पर है। इसलिए संकल्प यह है कि हम अपनी ओर से अंधकार बढ़ाने वाली सामग्री नहीं देंगे।

श्रीकृष्ण को साक्षी मानकर प्रार्थना है—

हे प्रभु! हमारी बुद्धि को सही दिशा दें। हमारी लेखनी पर हमारा अहंकार हावी न हो। हमारी खबर किसी निर्दोष व्यक्ति को अनावश्यक रूप से आहत न करे। हमारी कलम किसी के प्रति घृणा पैदा करने का माध्यम न बने। हमें अंधकार को बढ़ाने के बजाय प्रकाश खोजने की शक्ति दें।

गीता के एक अन्य संदेश में कहा गया है—“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।”

मनुष्य को स्वयं अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं चाहिए। राइजिंग भास्कर इस विचार को पत्रकारिता पर लागू करने का प्रयास करेगा—मीडिया का काम समाज को गिराना नहीं, उठाना भी होना चाहिए।

श्री श्री रविशंकर के विचारों से मिली प्रेरणा

आध्यात्मिक गुरु और मानवतावादी श्री श्री रविशंकर लंबे समय से तनावमुक्त और हिंसामुक्त समाज की कल्पना को आगे बढ़ाते रहे हैं। आर्ट ऑफ लिविंग के आधिकारिक विवरण में उनकी दृष्टि को ‘stress-free, violence-free society’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है और सेवा, मानवीय मूल्यों, शांति तथा सामाजिक जिम्मेदारी को उनके कार्य का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। उनकी शिक्षाओं में सेवा और करुणा को विशेष स्थान मिलता है। उनके एक प्रकाशित संदेश में सेवा को बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के अपनी क्षमता के अनुसार किए जाने वाले कार्य से जोड़ा गया है। यही विचार राइजिंग भास्कर के इस प्रयोग की प्रेरणा का हिस्सा है। यदि एक पत्रकार अपनी लेखनी से समाज को लगातार तनाव, भय और विवाद की ओर ले जाए तो क्या वह केवल सूचना दे रहा है या समाज की सामूहिक मानसिकता को भी प्रभावित कर रहा है? और यदि वही पत्रकार समाज में सेवा, करुणा, सद्भाव, प्रकृति संरक्षण, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की कहानियां सामने लाए तो क्या वह भी पत्रकारिता नहीं है? श्री श्री रविशंकर के विचारों में सेवा और आंतरिक शांति के संबंध पर भी जोर मिलता है। उनके अनुसार सेवा से व्यक्ति का दृष्टिकोण ‘मैं क्या पा सकता हूं’ से आगे बढ़कर ‘मैं दुनिया के लिए क्या कर सकता हूं’ की ओर जाता है। राइजिंग भास्कर इसी प्रश्न को अपनी पत्रकारिता के केंद्र में रखना चाहता है—

“हम समाज से क्या ले सकते हैं?” के बजाय “हम समाज को क्या दे सकते हैं?”

दो साल तक क्या नहीं छपेगा?

यह संकल्प स्पष्ट होना चाहिए। राइजिंग भास्कर अगले दो वर्षों में जानबूझकर ऐसी सामग्री से दूरी बनाएगा जिसका मूल उद्देश्य सनसनी, भय, घृणा या राजनीतिक-व्यक्तिगत संघर्ष को बढ़ाना हो।

इसमें विशेष रूप से शामिल होंगे—

  • अपराध की सनसनीखेज और भय पैदा करने वाली खबरें।
  • राजनीतिक गंदगी, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और अनावश्यक बयानबाजी।
  • ऐसी समस्या प्रधान खबरें जिनमें समाधान की दिशा न हो और जिनका प्रमुख प्रभाव निराशा पैदा करना हो।
  • किसी व्यक्ति, संस्था या समुदाय को अनावश्यक रूप से बदनाम करने वाली सामग्री।
  • भड़काऊ वीडियो और तस्वीरें।
  • सोशल मीडिया से उठाई गई अपुष्ट और नकारात्मक सामग्री।
  • ऐसी सामग्री जिसका उद्देश्य केवल क्लिक, विवाद या सनसनी पैदा करना हो।

यदि कोई पाठक ऐसी सामग्री भेजता है तो उसे केवल इसलिए प्रकाशित नहीं किया जाएगा कि वह ‘वायरल’ हो सकती है। यदि कोई राजनीतिक व्यक्ति, दल या कार्यकर्ता किसी प्रकार के प्रलोभन, दबाव या भ्रम के माध्यम से नकारात्मक सामग्री प्रकाशित कराने का प्रयास करता है, तो संपादकीय टीम सजग रहेगी। राइजिंग भास्कर की प्राथमिकता अगले दो वर्षों में क्लिक नहीं, क्लीन कंटेंट होगी।

क्या अपराध और समस्याओं को छिपाया जाएगा?

यह सवाल स्वाभाविक है और इसका जवाब भी स्पष्ट होना चाहिए। इस संकल्प का अर्थ यह नहीं है कि राइजिंग भास्कर समाज की वास्तविकता से आंखें बंद करेगा। बल्कि दृष्टिकोण बदलने का प्रयास होगा।

यदि किसी समस्या की खबर आवश्यक है तो उसका केंद्र समस्या नहीं, समाधान होगा। यदि किसी क्षेत्र में पानी की समस्या है तो केवल यह नहीं लिखा जाएगा कि पानी नहीं है। यह खोजा जाएगा कि कौन-से गांव पानी बचा रहे हैं, किस संस्था ने जल संरक्षण किया, किस तकनीक ने समस्या कम की और प्रशासन या समाज क्या सकारात्मक कदम उठा सकता है। यदि स्वास्थ्य का संकट है तो भय फैलाने के बजाय बचाव, जागरूकता, विशेषज्ञ सलाह, उपलब्ध सुविधाएं और सफल प्रयासों को सामने लाया जाएगा। अर्थात—

समस्या को सनसनी नहीं, समाधान की दृष्टि से देखा जाएगा।

पिछली लेखनी का आत्ममंथन

दिलीप कुमार पुरोहित का कहना है कि पिछले वर्षों में राइजिंग भास्कर की लेखनी ने कई अवसरों पर तीखी और नकारात्मक खबरें भी लिखीं। उद्देश्य हमेशा सकारात्मक बदलाव लाना रहा, लेकिन आत्ममंथन के बाद यह अनुभव हुआ कि केवल आलोचना से वह बदलाव नहीं आया जिसकी अपेक्षा थी। कभी-कभी कठोर शब्दों से व्यवस्था हिलती है, लेकिन कभी वही कठोरता मनुष्य को रक्षात्मक भी बना देती है। कभी किसी भ्रष्टाचार को उजागर करना आवश्यक होता है, लेकिन हर दिन भ्रष्टाचार पढ़ने वाला समाज यह भी पूछ सकता है—क्या इस देश में अच्छा कुछ हो ही नहीं रहा? यहीं से सकारात्मक पत्रकारिता का विचार जन्म लेता है। अब राइजिंग भास्कर यह देखने की कोशिश करेगा कि यदि दो साल तक लगातार अच्छाई को प्राथमिकता दी जाए तो उसका सामाजिक प्रभाव क्या होता है।

सकारात्मक पत्रकारिता का अर्थ केवल ‘अच्छी खबर’ नहीं

सकारात्मक पत्रकारिता का अर्थ यह नहीं कि हर खबर में कृत्रिम मिठास भर दी जाए। सकारात्मक पत्रकारिता का अर्थ है—सत्य को सकारात्मक दृष्टि से देखना। एक किसान सफल हुआ—यह खबर है। एक बेरोजगार युवा ने रोजगार पैदा किया—यह खबर है। एक सरकारी अस्पताल में बेहतर सेवा शुरू हुई—यह खबर है। एक शिक्षक ने गरीब बच्चों को निशुल्क पढ़ाया—यह खबर है। किसी शहर ने लाखों पेड़ बचाए—यह खबर है। किसी चिकित्सक ने जीवन बचाया—यह खबर है। किसी पुलिसकर्मी ने संकट में फंसे नागरिक की मदद की—यह खबर है। किसी अधिकारी ने ईमानदारी से जनसेवा की—यह खबर है। किसी परिवार ने अंगदान का निर्णय लिया—यह खबर है। किसी गांव ने मिलकर जल संरक्षण किया—यह खबर है। किसी युवा ने स्टार्टअप शुरू कर दस लोगों को रोजगार दिया—यह खबर है। किसी महिला ने विपरीत परिस्थितियों को मात देकर अपनी पहचान बनाई—यह खबर है। इन खबरों की संख्या कम नहीं है। कमी केवल उन्हें खोजने की है।

राइजिंग भास्कर के सकारात्मक पत्रकारिता के 10 सूत्र

1. हर खबर में समाधान खोजेंगे।
2. सनसनी से ज्यादा संवेदना को महत्व देंगे।
3. भय से ज्यादा भरोसा पैदा करने वाली खबरें देंगे।
4. विवाद से ज्यादा संवाद को स्थान देंगे।
5. आलोचना से ज्यादा रचनात्मक सुझाव देंगे।
6. प्रकृति, पर्यावरण और जीव-जंतुओं के संरक्षण को प्राथमिकता देंगे।
7. स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की सकारात्मक कहानियां खोजेंगे।
8. युवाओं, महिलाओं, किसानों और आम नागरिकों की उपलब्धियां सामने लाएंगे।
9. मानवता, करुणा और सेवा की कहानियों को प्रमुखता देंगे।
10. लेखनी को किसी व्यक्ति, दल या विचारधारा की नफरत का हथियार नहीं बनने देंगे।

संपादकीय टीम भी होगी इस संकल्प की सहभागी

यह संकल्प केवल ग्रुप एडिटर का व्यक्तिगत संकल्प नहीं है। राइजिंग भास्कर की संपादकीय टीम भी इसकी सहभागी होगी। सीनियर सब एडिटर श्री सुमनेश व्यास और श्री आनंद प्रकाश कल्ला भी इस नीति के अनुरूप नकारात्मक सामग्री के प्रकाशन से बचेंगे। रिपोर्टर, संवाददाता, चीफ फोटो जर्नलिस्ट और वीडियो टीम भी इस दृष्टिकोण का हिस्सा होंगे। यदि किसी फोटोग्राफर के पास ऐसी तस्वीर है जो अनावश्यक हिंसा, भय या नकारात्मकता को बढ़ाती है तो केवल इसलिए उसे प्रकाशित नहीं किया जाएगा कि तस्वीर ‘एक्सक्लूसिव’ है। यदि कोई वीडियो समाज में तनाव या घृणा फैलाता है तो उसकी वायरल क्षमता हमारे लिए उसकी प्रकाशन-योग्यता का प्रमाण नहीं होगी। और यदि भूलवश ऐसी सामग्री प्रकाशित हो भी जाती है तो संज्ञान में आने के बाद संपादकीय स्तर पर तत्काल समीक्षा की जाएगी और आवश्यक होने पर उसे हटा दिया जाएगा।

क्या-क्या होगा राइजिंग भास्कर में?

स्वास्थ्य

सफल इलाज, जन-जागरूकता, रोगों से बचाव, स्वस्थ जीवनशैली और चिकित्सा क्षेत्र के प्रेरक प्रयास।

रोजगार

नौकरी के अवसर, स्वरोजगार, स्टार्टअप, कौशल विकास और युवाओं की सफलता।

शिक्षा

प्रतिभाशाली विद्यार्थियों, शिक्षकों और नई शिक्षा पहलों की कहानियां।

प्रकृति

पेड़, जल संरक्षण, वन्यजीव, पशु-पक्षी संरक्षण और पर्यावरण के सकारात्मक प्रयास।

समाज

सेवा, रक्तदान, अंगदान, गरीबों की सहायता, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक समरसता।

अर्थव्यवस्था

छोटे कारोबार, स्थानीय उद्योग, नवाचार और आर्थिक आत्मनिर्भरता।

आध्यात्मिकता

योग, ध्यान, भारतीय दर्शन, गीता, उपनिषदों और मानव मूल्यों से जुड़ी प्रेरक सामग्री।

क्या यह रास्ता आसान होगा? बिल्कुल नहीं

राइजिंग भास्कर जानता है कि यह रास्ता कठिन है। किसी पत्रकार के सामने रोजाना ऐसी खबरें आएंगी जिन्हें प्रकाशित करने का दबाव होगा। कोई कहेगा—“यह खबर नहीं छापोगे तो आपकी पत्रकारिता कैसी? कोई राजनीतिक कार्यकर्ता कहेगा—“यह सामग्री चलाइए।” कोई व्यक्ति व्यक्तिगत विवाद को खबर बनाना चाहेगा। कोई पाठक कहेगा—“आप असली समस्याएं क्यों नहीं दिखाते?” कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि नकारात्मक खबर प्रकाशित करने वाला कोई दूसरा माध्यम लाखों व्यू हासिल कर ले और सकारात्मक खबर को कम लोग देखें। ऐसे समय में सबसे बड़ा प्रश्न होगा—क्या राइजिंग भास्कर अपने संकल्प पर टिक पाएगा? यही इस प्रयोग की असली परीक्षा है।

अस्तित्व पर संकट आए तो भी?

यह भी संभव है कि सकारात्मक पत्रकारिता के कारण व्यावसायिक दबाव बढ़े। संभव है कुछ लोग कहें कि नकारात्मक खबर नहीं छापोगे तो पाठक नहीं आएंगे। संभव है कुछ राजनीतिक या प्रभावशाली लोग नाराज हों। संभव है किसी मुद्दे पर आलोचना हो। संभव है कुछ लोग इस प्रयोग का मजाक उड़ाएं। लेकिन यदि किसी संकल्प का कोई जोखिम ही नहीं है तो वह संकल्प कैसा? राइजिंग भास्कर यह प्रयोग किसी दूसरे संस्थान को चुनौती देने के लिए नहीं कर रहा। यह स्वयं को चुनौती दे रहा है। हम देखना चाहते हैं कि क्या एक छोटा-सा मीडिया संस्थान अपनी संपादकीय इच्छा से अपनी पत्रकारिता का स्वभाव बदल सकता है।

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ से ‘सर्वे सन्तु निरामयाः’ तक

भारतीय संस्कृति ने हजारों वर्ष पहले ही वह प्रार्थना दी—“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।”

अर्थात सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों, सभी का कल्याण हो और कोई दुख का भागी न बने। यदि पत्रकारिता इस भावना को अपना ले तो उसका स्वरूप कितना बदल सकता है? तब खबर केवल यह नहीं होगी कि कौन हार गया। खबर यह भी होगी कि कौन जीत गया। खबर केवल यह नहीं होगी कि किसके साथ अन्याय हुआ। खबर यह भी होगी कि किसने किसी के साथ न्याय किया। खबर केवल यह नहीं होगी कि किस शहर में पेड़ कटे। खबर यह भी होगी कि किस गांव ने हजारों पेड़ बचाए। खबर केवल यह नहीं होगी कि कितने लोग बेरोजगार हैं। खबर यह भी होगी कि कितने युवाओं ने रोजगार पैदा किया। यही सकारात्मक पत्रकारिता का मूल दर्शन है।

राइजिंग भास्कर की ‘दो साल की भीष्म प्रतिज्ञा’

अवधि : 18 अगस्त 2026 से 17 अगस्त 2028

संकल्प :
“हम ऐसी कोई सामग्री प्रकाशित नहीं करेंगे जिसका उद्देश्य समाज में भय, घृणा, हिंसा, तनाव या अनावश्यक नकारात्मकता बढ़ाना हो। हमारी पत्रकारिता लोकहित, मानवता, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, प्रकृति संरक्षण, सेवा, सद्भाव, आर्थिक विकास और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन को प्राथमिकता देगी।”

साक्षी : श्रीकृष्ण

प्रेरणा : भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, भगवद्गीता और श्री श्री रविशंकर की सेवा, शांति तथा मानवीय मूल्यों पर आधारित दृष्टि।

हम अच्छाई को खोजेंगे, बनाएंगे नहीं

सकारात्मक पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह भी होगा कि अच्छाई को बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया जाएगा। जो हुआ है, वही लिखा जाएगा। किसी व्यक्ति को महान बनाने के लिए काल्पनिक कहानी नहीं गढ़ी जाएगी। किसी संस्था की उपलब्धि को बिना तथ्य जांचे नहीं छापा जाएगा। किसी सरकारी योजना की प्रशंसा केवल इसलिए नहीं होगी कि वह सरकारी योजना है। किसी व्यक्ति की उपलब्धि को केवल इसलिए प्रमुखता नहीं मिलेगी कि वह प्रभावशाली है। सकारात्मकता का अर्थ सत्य से समझौता नहीं है। सत्य रहेगा, लेकिन दृष्टिकोण रचनात्मक रहेगा। यही इस प्रयोग की सबसे महत्वपूर्ण शर्त होगी।

पाठकों से भी एक अपील

राइजिंग भास्कर अपने पाठकों से भी सहयोग चाहता है। यदि आपके आसपास कोई अच्छी घटना हो रही है तो हमें बताइए। किसी शिक्षक ने कोई असाधारण काम किया है—बताइए। किसी डॉक्टर ने किसी गरीब की मदद की है—बताइए। किसी विद्यार्थी ने संघर्ष के बाद सफलता हासिल की है—बताइए। किसी किसान ने नई तकनीक अपनाई है—बताइए। किसी महिला ने नया व्यवसाय शुरू किया है—बताइए। किसी गांव ने जल संरक्षण किया है—बताइए। किसी व्यक्ति ने पशु-पक्षियों के लिए काम किया है—बताइए। किसी युवा ने किसी दूसरे युवा को रोजगार दिया है—बताइए। हम चाहते हैं कि पाठक केवल खबर भेजने वाला व्यक्ति न रहे, बल्कि सकारात्मक पत्रकारिता का सहभागी बने।

दो साल बाद क्या होगा?

17 अगस्त 2028 को यह प्रयोग समाप्त होगा। उस दिन राइजिंग भास्कर स्वयं से कुछ सवाल पूछेगा—क्या सकारात्मक खबरों की संख्या बढ़ी? क्या पाठकों की प्रतिक्रिया बदली? क्या सकारात्मक पत्रकारिता का कोई सामाजिक प्रभाव दिखाई दिया? क्या इससे पाठकों का विश्वास बढ़ा? क्या हमने नकारात्मकता से दूरी बनाकर कुछ खोया या कुछ पाया? क्या हमारा डिजिटल ट्रैफिक प्रभावित हुआ? क्या सकारात्मक सामग्री ने नए पाठकों को जोड़ा? क्या हमारे पत्रकारों की सोच बदली? और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या हमने समाज को बदलने में अपनी छोटी-सी भूमिका निभाई?

इन सवालों के जवाब ही आगे की पत्रकारिता की दिशा तय करेंगे। दो साल बहुत लंबा समय नहीं होता।18 अगस्त 2026 आएगा और 17 अगस्त 2028 भी आ जाएगा। लेकिन इन दो वर्षों में यदि हजारों लोगों तक एक भी सकारात्मक विचार पहुंचा, यदि किसी युवा को प्रेरणा मिली, यदि किसी किसान को नई राह मिली, यदि किसी मरीज को स्वास्थ्य संबंधी सही जानकारी मिली, यदि किसी व्यक्ति ने प्रकृति बचाने का निर्णय लिया, यदि किसी निराश व्यक्ति ने जीवन के प्रति आशा महसूस की—तो यह प्रयोग सार्थक माना जाएगा।

श्रीकृष्ण से राइजिंग भास्कर की प्रार्थना

हे श्रीकृष्ण! हमने वर्षों तक अपनी लेखनी को निर्भीक होकर चलाया। कभी सही के पक्ष में लिखा, कभी गलत के खिलाफ लिखा। कभी तीखे शब्द इस्तेमाल किए। कभी व्यवस्था पर सवाल उठाए। कभी बदलाव की उम्मीद में नकारात्मकता को सामने रखा। लेकिन आज हम स्वयं से पूछ रहे हैं—
क्या केवल अंधकार दिखाने से प्रकाश पैदा होता है? इसलिए आज से हम अपनी लेखनी को एक नया प्रयोग दे रहे हैं। हे कृष्ण! हमारे मन को शांत रखिए। हमारी बुद्धि को निर्मल रखिए। हमारे अहंकार को दूर रखिए। हमारी कलम को किसी के विरुद्ध घृणा का हथियार मत बनने दीजिए। हमें सत्य दिखाने की शक्ति दीजिए और सत्य में समाधान खोजने की दृष्टि दीजिए। हमारे सामने जब अंधकार आए तो हमें उसमें एक दीपक दिखाई दे। जब निराशा दिखाई दे तो आशा खोज सकें। जब समस्या दिखाई दे तो समाधान तलाश सकें। जब संघर्ष दिखाई दे तो संवाद की राह खोज सकें। जब मनुष्य की कमजोरी दिखाई दे तो उसके भीतर छिपी अच्छाई को भी देख सकें। और सबसे बढ़कर—

हर प्राणी में आपका अंश देखने की दृष्टि हमें दीजिए।

यह केवल राइजिंग भास्कर का संकल्प नहीं, एक सवाल है

राइजिंग भास्कर की यह भीष्म प्रतिज्ञा किसी को उपदेश देने के लिए नहीं है। यह मीडिया जगत से लड़ने का घोषणापत्र भी नहीं है। यह स्वयं से किया गया एक सवाल है। क्या पत्रकारिता केवल खबर दिखा सकती है या समाज की दिशा भी बदल सकती है? क्या नकारात्मक युग में सकारात्मक रहना संभव है? क्या क्लिक की दौड़ में करुणा को बचाया जा सकता है? क्या सनसनी से अधिक महत्वपूर्ण संवेदना हो सकती है? क्या एक मीडिया संस्थान दो वर्ष तक स्वयं पर संपादकीय अनुशासन लागू कर सकता है? राइजिंग भास्कर इन सवालों के जवाब शब्दों से नहीं, अपने अगले दो वर्षों के काम से देना चाहता है। श्री श्री रविशंकर की दृष्टि में शांति, सेवा, मानवीय मूल्यों और तनावमुक्त समाज की दिशा में काम करना एक व्यापक मानवीय जिम्मेदारी है। राइजिंग भास्कर इसी भावना को पत्रकारिता की अपनी छोटी-सी दुनिया में आजमाना चाहता है। 18 अगस्त 2026 से एक नई शुरुआत होगी। न कोई भय फैलाने की होड़। न किसी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाने की जल्दबाजी। न राजनीतिक गंदगी को खबर बनाने की मजबूरी। न अपराध को मनोरंजन बनाने की कोशिश। इसके बजाय—मनुष्य की जीत। मानवता की जीत। प्रकृति की जीत। स्वास्थ्य की जीत।
शिक्षा की जीत। रोजगार की जीत। सेवा की जीत। करुणा की जीत। सद्भाव की जीत। और अंततः अच्छाई की जीत।

राइजिंग भास्कर यह नहीं कहता कि अच्छाई जीत ही जाएगी। लेकिन इतना जरूर कहता है—

“एक बार अच्छाई को पूरी ईमानदारी से मौका देकर तो देखते हैं।”

दो साल के लिए। श्रीकृष्ण को साक्षी मानकर। समाज के कल्याण को लक्ष्य बनाकर। और अपनी लेखनी को सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनाने की भीष्म प्रतिज्ञा के साथ। 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor