राइजिंग भास्कर की सकारात्मक पत्रकारिता
18 अगस्त की CAT जयपुर बेंच की सुनवाई से जुड़े दावों की निष्पक्ष पड़ताल; सुरक्षा, न्यायिक स्वतंत्रता और आदेशों की समयबद्ध पालना पर जरूरी विमर्श
दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
न्यायपालिका लोकतंत्र का वह स्तंभ है, जहां नागरिक, कर्मचारी और अधिकारी यह विश्वास लेकर पहुंचते हैं कि उनके मामलों की सुनवाई निष्पक्ष वातावरण में होगी और न्यायिक प्रक्रिया पर किसी बाहरी दबाव का असर नहीं पड़ेगा। इसी विश्वास को मजबूत बनाए रखना केवल न्यायपालिका की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सरकार, प्रशासन, वकीलों, मीडिया और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है।
18 अगस्त 2026 को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), जयपुर बेंच में आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी से जुड़े एक कंटेम्प्ट मामले की सुनवाई के दौरान सामने आए घटनाक्रम ने इसी व्यापक सवाल को चर्चा में ला दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सुनवाई के दौरान न्यायिक सदस्य की सुरक्षा वापस लिए जाने का मुद्दा सामने आया और इसे लेकर न्यायिक सदस्य ने चिंता व्यक्त की।राइजिंग भास्कर ने दो वर्ष तक सकारात्मक पत्रकारिता करने और ऐसी पत्रकारिता से बचने का संकल्प लिया है, जिसका उद्देश्य केवल नकारात्मकता पैदा करना हो। इसलिए इस मामले को किसी व्यक्ति या विभाग के खिलाफ आरोप-पत्र की तरह प्रस्तुत करने के बजाय न्यायिक गरिमा, प्रशासनिक जवाबदेही और समाधान की दृष्टि से देखना अधिक उचित होगा।
महत्वपूर्ण संपादकीय स्पष्टता: 18 अगस्त की सुनवाई, सुरक्षा वापस लेने की परिस्थितियों, संबंधित अधिकारियों की भूमिका तथा पूर्व आदेशों की अनुपालना से जुड़े कई दावे इस समय हमारे सामने उपलब्ध पक्षकार की ओर से दी गई जानकारी/दावों पर आधारित हैं। इनके संबंध में आधिकारिक आदेश, सुरक्षा संबंधी सरकारी रिकॉर्ड और संबंधित विभागों का पक्ष सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। राइजिंग भास्कर किसी आरोप को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं कर रहा है।
मामला क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?
पंकज कुमार चौधरी राजस्थान कैडर के 2009 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। उनके सेवा संबंधी विवाद का न्यायिक इतिहास पुराना है। दिल्ली हाईकोर्ट के 19 मार्च 2021 के निर्णय में भी उनके मामले का उल्लेख मिलता है। उस निर्णय में कोर्ट ने 10 दिसंबर 2020 के CAT, प्रधान पीठ, नई दिल्ली के आदेश के खिलाफ राजस्थान सरकार की याचिका पर सुनवाई की थी। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी थी।
इससे इतना तथ्यात्मक रूप से स्पष्ट है कि चौधरी से संबंधित सेवा विवाद पहले भी न्यायिक मंचों तक पहुंच चुका है और CAT तथा हाईकोर्ट दोनों स्तरों पर इस मामले में न्यायिक कार्यवाही हुई है। कंटेम्प्ट कार्यवाही और 18 अगस्त 2026 की CAT जयपुर बेंच की सुनवाई का उल्लेख पक्षकार द्वारा किया गया है। इसलिए वर्तमान घटनाक्रम के प्रत्येक पहलू को सावधानीपूर्वक ‘बताया गया’, ‘न्यायालय में उठाया गया’ या ‘दावे के अनुसार’ के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल: न्यायिक सदस्य की सुरक्षा
18 अगस्त की सुनवाई के बारे में उपलब्ध जानकारी का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि एक महिला न्यायिक सदस्य की सुरक्षा वापस लिए जाने की बात सुनवाई के दौरान सामने आई। यदि किसी न्यायिक पदाधिकारी की सुरक्षा में बदलाव वास्तव में उसी अवधि में हुआ है जब उनके समक्ष किसी संवेदनशील मामले की सुनवाई चल रही हो, तो इसका उद्देश्य, प्रक्रिया और समय—तीनों स्पष्ट होना चाहिए।
लेकिन यहां दो बातें अलग-अलग रखना जरूरी है। पहली: सुरक्षा में बदलाव अपने आप में यह साबित नहीं करता कि न्यायपालिका पर दबाव बनाने का उद्देश्य था। दूसरी: यदि न्यायिक सदस्य ने स्वयं अदालत में सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की है, तो संबंधित प्रशासन के लिए इस चिंता को गंभीरता से लेना और तथ्य स्पष्ट करना उचित होगा। यही सकारात्मक पत्रकारिता का रास्ता है—आरोप को अंतिम सत्य मानने के बजाय सवाल उठाना और समाधान की मांग करना।
कंटेम्प्ट मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
किसी न्यायालय या अधिकरण के आदेश की अनुपालना को लेकर विवाद उत्पन्न होने पर कंटेम्प्ट कार्यवाही शुरू हो सकती है। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि न्यायिक आदेश का वास्तविक आशय क्या था, उसकी अनुपालना के लिए किस अधिकारी की क्या जिम्मेदारी थी और अनुपालना में देरी या कमी का कारण क्या रहा। इस मामले में दावा किया गया है कि 19 दिसंबर 2025 को CAT जयपुर बेंच ने राज्य सरकार को पंकज चौधरी को पदोन्नति एवं संबंधित सेवा लाभ देने के संबंध में अंतरिम निर्देश दिए थे तथा 10 मार्च 2026 को भी वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर हस्तक्षेप/मध्यस्थता से संबंधित निर्देश दिए गए।
इन दोनों आदेशों की प्रमाणित प्रतियां और उनकी वास्तविक भाषा सामने आना बेहद महत्वपूर्ण होगा। क्योंकि समाचार में किसी आदेश का सार प्रकाशित करते समय उसके शब्दों का सही अर्थ बनाए रखना जरूरी है।
सरकार के सामने भी एक अवसर
इस पूरे मामले को केवल सरकार बनाम न्यायपालिका के रूप में देखना उचित नहीं होगा। सरकार के पास भी इस अवसर को पारदर्शिता के उदाहरण में बदलने का मौका है। यदि सुरक्षा वापस लेने का निर्णय प्रशासनिक या सुरक्षा मूल्यांकन के आधार पर लिया गया था, तो संबंधित विभाग उपयुक्त सीमा तक यह स्पष्ट कर सकता है कि—
- सुरक्षा में बदलाव का कारण क्या था?
- निर्णय कब लिया गया?
- किस सक्षम प्राधिकारी ने लिया?
- क्या इसका न्यायिक कार्य से कोई संबंध था?
- क्या सुरक्षा व्यवस्था की वैकल्पिक व्यवस्था की गई?
- क्या संबंधित न्यायिक सदस्य की सुरक्षा संबंधी चिंता का परीक्षण किया गया?
इन सवालों के स्पष्ट उत्तर बहुत-सी आशंकाओं को स्वतः समाप्त कर सकते हैं।
राइजिंग भास्कर की पत्रकारिता का सिद्धांत
आरोप नहीं, प्रमाण
किसी अधिकारी या विभाग पर दबाव बनाने का आरोप तभी तथ्य के रूप में लिखा जाए जब उसके समर्थन में विश्वसनीय दस्तावेज या आधिकारिक रिकॉर्ड हो।
दोनों पक्ष जरूरी
जिस पर आरोप हो, उसका पक्ष लेना पत्रकारिता की अनिवार्य जिम्मेदारी है।
न्यायपालिका पर सवाल हो तो भाषा और संयम दोनों जरूरी
न्यायालय में कही गई बात और न्यायालय का अंतिम निर्णय अलग-अलग चीजें हैं। दोनों को मिलाना उचित नहीं।
समाधान को खबर का केंद्र बनाना
समस्या बताने के साथ यह भी बताया जाए कि उसे दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
20 करोड़ खर्च का दावा: दस्तावेज सामने आएं
पंकज चौधरी से जुड़े मामले में राज्य सरकार के कार्मिक एवं गृह विभाग ने विभिन्न न्यायालयों और विशेषज्ञों पर 20 करोड़ रुपए से अधिक सरकारी धन खर्च का सूत्रों ने दावा किया है। यह गंभीर वित्तीय दावा है। लेकिन राइजिंग भास्कर के पास फिलहाल इस आंकड़े का स्वतंत्र और आधिकारिक सत्यापन उपलब्ध नहीं है। यदि संबंधित व्यक्ति या कोई अन्य पक्ष इस संबंध में दस्तावेज, स्वीकृतियां, बिल, भुगतान विवरण या विधानसभा/सरकारी रिकॉर्ड उपलब्ध कराता है, तो इस पहलू की स्वतंत्र जांच की जा सकती है।
यही सकारात्मक पत्रकारिता है—बिना प्रमाण किसी पर आरोप नहीं, लेकिन सार्वजनिक धन से जुड़े सवालों को भी दबाया नहीं जाए।
सार्वजनिक धन पर पारदर्शिता क्यों जरूरी?
यदि किसी लंबे न्यायिक विवाद में सरकार की ओर से बड़ी राशि विधिक खर्च के रूप में खर्च हुई है, तो नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि—
कितना खर्च हुआ?
किस मद में हुआ?
किसकी स्वीकृति से हुआ?
कितने वकील/विशेषज्ञ नियुक्त किए गए?
और क्या सरकार को इससे संबंधित कोई वित्तीय समीक्षा प्राप्त हुई?
इन सवालों के जवाब किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि जनता के पैसे के प्रति जवाबदेही के लिए जरूरी हैं।
न्यायपालिका पर दबाव का सवाल: आरोप से अधिक जरूरी संस्थागत सुरक्षा
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा मुद्दा किसी एक अधिकारी, विभाग या मुकदमे से आगे जाता है। भारत में न्यायपालिका की स्वतंत्रता संवैधानिक शासन की बुनियादी आवश्यकता है। न्यायिक अधिकारी को अपना निर्णय कानून और रिकॉर्ड के आधार पर लेने के लिए स्वतंत्र वातावरण मिलना चाहिए। इसी तरह प्रशासन को भी अपने वैधानिक अधिकारों के भीतर निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इसलिए यदि किसी न्यायिक सदस्य को सुरक्षा में बदलाव से वास्तविक चिंता हुई है, तो उसे संस्थागत संवाद और तथ्यात्मक स्पष्टीकरण के माध्यम से दूर किया जाना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच अनावश्यक टकराव लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए उपयोगी नहीं है।
दिलीप कुमार पुरोहित की ओर से सकारात्मक समाधान के सुझाव
राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर/संपादकीय दृष्टिकोण से इस मामले में निम्न कदम सकारात्मक रास्ता खोल सकते हैं—
1. सुरक्षा व्यवस्था की तत्काल समीक्षा
संबंधित न्यायिक सदस्य की सुरक्षा को लेकर उत्पन्न चिंता का सक्षम स्तर पर स्वतंत्र समीक्षा की जाए और आवश्यकता के अनुरूप सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
2. सुरक्षा हटाने का कारण स्पष्ट हो
यदि सुरक्षा में बदलाव हुआ है तो उसका प्रशासनिक कारण लिखित रिकॉर्ड में स्पष्ट होना चाहिए। इससे किसी भी प्रकार की गलतफहमी समाप्त होगी।
3. CAT के आदेशों की अनुपालना की समयबद्ध समीक्षा
संबंधित विभाग एक अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाकर सभी न्यायिक आदेशों की अनुपालना की स्थिति की रिपोर्ट तैयार करे।
4. अनुपालना रिपोर्ट अदालत के समक्ष रखी जाए
किस आदेश की कब अनुपालना हुई और यदि नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई—इसकी स्पष्ट स्थिति न्यायालय के समक्ष रखी जाए।
5. व्यक्तिगत टकराव की जगह संस्थागत संवाद
यदि सरकार और अधिकारी के बीच किसी विषय पर मतभेद है तो उसे न्यायिक प्रक्रिया के भीतर ही सुलझाया जाए।
6. सार्वजनिक धन की समीक्षा
लंबे समय से चल रहे मुकदमों में सरकारी खर्च की आंतरिक समीक्षा हो और भविष्य में अनावश्यक मुकदमेबाजी कम करने की नीति बनाई जाए।
7. हर पक्ष को सुना जाए
पंकज चौधरी का पक्ष, राज्य सरकार का पक्ष और संबंधित विभागों का पक्ष—तीनों को समान अवसर मिलना चाहिए।
8. मीडिया भी जिम्मेदारी निभाए
मीडिया का काम अदालत बनने का नहीं, बल्कि दस्तावेजों और पक्षों को जनता के सामने तथ्यात्मक रूप से रखना है।
‘राइजिंग भास्कर’ की भीष्म प्रतिज्ञा का अर्थ
राइजिंग भास्कर का सकारात्मक पत्रकारिता का संकल्प समस्याओं को छिपाना नहीं है।
इसका अर्थ है—
नकारात्मकता नहीं, समाधान।
आरोप नहीं, प्रमाण।
टकराव नहीं, संवाद।
सनसनी नहीं, तथ्य।
निराशा नहीं, सुधार की संभावना।
इसी दृष्टिकोण से न्यायपालिका से जुड़ा कोई गंभीर विषय सामने आता है तो उसे दबाना भी जनता के हित में नहीं होगा। लेकिन उसे इस प्रकार प्रस्तुत करना चाहिए कि संस्थाओं के प्रति अनावश्यक अविश्वास पैदा होने के बजाय व्यवस्था को बेहतर बनाने का रास्ता दिखाई दे।
आईपीएस पंकज चौधरी प्रकरण का पुराना न्यायिक संदर्भ
उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड से यह प्रमाणित है कि पंकज कुमार चौधरी, 2009 बैच के राजस्थान कैडर के IPS अधिकारी, से संबंधित सेवा विवाद पहले CAT और दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचा था। 10 दिसंबर 2020 के CAT आदेश को चुनौती देने वाली राजस्थान सरकार की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने 19 मार्च 2021 को फैसला सुनाया और याचिका खारिज कर दी। बाद के वर्षों में भी चौधरी से जुड़े सेवा मामलों और पदोन्नति संबंधी विवाद सार्वजनिक चर्चा में रहे हैं। 2023 में मीडिया रिपोर्टों में उनके लंबित प्रमोशन और सेवा संबंधी मामलों का उल्लेख किया गया था। 2025 की एक रिपोर्ट में भी उनके सेवा विवाद और पदोन्नति से जुड़े घटनाक्रमों का उल्लेख मिलता है।
अब सबसे जरूरी है—तथ्य सामने आएं
18 अगस्त की सुनवाई के बाद सबसे महत्वपूर्ण कदम यह होना चाहिए कि संबंधित न्यायिक आदेश/रोजनामा, सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव से संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड और अनुपालना से जुड़े दस्तावेज सामने आएं। यदि न्यायालय ने वास्तव में किसी विभाग या अधिकारी के रवैये पर गंभीर टिप्पणी की है, तो उसका सही संदर्भ न्यायालय के आदेश से ही स्पष्ट होगा। यदि सुरक्षा वापस लेने का निर्णय पूरी तरह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा था, तो सरकार के स्पष्टीकरण से यह भी साफ हो जाएगा। और यदि किसी स्तर पर प्रक्रिया में कमी पाई जाती है, तो उसे सुधारने का अवसर मिलेगा। यही इस खबर का सकारात्मक उद्देश्य है।
राइजिंग भास्कर का संपादकीय आग्रह
न्यायपालिका और प्रशासन लोकतंत्र के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक संस्थान हैं। न्यायपालिका आदेश देती है, प्रशासन उन्हें लागू करता है और जनता दोनों संस्थाओं से निष्पक्षता की अपेक्षा करती है।इसलिए किसी भी विवाद को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई बनने से रोकना जरूरी है। यदि 18 अगस्त की घटना में कोई गलतफहमी है तो उसे संवाद से दूर किया जाए। यदि प्रशासनिक चूक है तो उसे सुधारा जाए। यदि न्यायिक आदेश की अनुपालना लंबित है तो समयबद्ध तरीके से पूरी की जाए। और यदि किसी आरोप का आधार नहीं है तो तथ्य सार्वजनिक कर उसे समाप्त किया जाए। राइजिंग भास्कर का मानना है कि सकारात्मक पत्रकारिता का सबसे मजबूत रूप वही है जिसमें व्यवस्था की कमजोरी को छिपाया नहीं जाता, बल्कि उसे सुधारने का रास्ता भी दिखाया जाता है। इस मामले में भी हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति, अधिकारी या सरकार को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि एक सरल सवाल सामने रखना है—
“क्या हम ऐसी न्यायिक व्यवस्था बना सकते हैं, जहां हर न्यायिक सदस्य बिना किसी आशंका के स्वतंत्र होकर काम करे और हर प्रशासनिक विभाग न्यायालय के आदेशों की समयबद्ध एवं पारदर्शी अनुपालना को अपनी सर्वोच्च संस्थागत जिम्मेदारी माने?”
राइजिंग भास्कर का जवाब है—हां, और इसकी शुरुआत आरोपों से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, संवाद और प्रमाणित तथ्यों से होनी चाहिए।


