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Friday, September 11, 2026, 5:48 pm

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विज्ञान : आस्तिक चिंतन, जिसमें सृष्टि और सृष्टि का रचयिता है…जबकि… साइंस : नास्तिक चिंतन, जिसमें आत्मा, परमात्मा जैसे विषयों को मेटा फिजिक्स बता कर अवैज्ञानिक और अंधविश्वास घोषित किया गया

डॉ. अरविन्द कुमार पुरोहित

साइंस बनाम विज्ञान…। दरअसल यह शीर्षक ही गलत है। साइंस और विज्ञान एक ही हैं। साइंस अंग्रेज़ी शब्द है और विज्ञान उसका हिंदी अनुवाद। साइंस बनाम विज्ञान का सवाल ही कहाँ पैदा होता है ? जी, सही कहा। इस सवाल को पैदा करना ही इस लेख का उद्देश्य है। और इस विचार को  सामने लाना है कि भारतीय सन्दर्भ में साइंस और विज्ञान एक नहीं, बल्कि अलग अर्थ रखते हैं। 

अब सबसे पहले यह कहना अति आवश्यक है कि यह लेख आधुनिक साइंस और टेक्नोलॉजी का विरोध करने के लिए नहीं लिखा जा रहा है। इसके विपरीत, आज के भारत के लिए आधुनिक विज्ञान और टेक्नोलॉजी  का विकास अत्यंत आवश्यक है। जिस आधुनिक विज्ञान ने बिजली, संचार, चिकित्सा, परिवहन, अंतरिक्ष-विज्ञान, कंप्यूटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी असंख्य सुविधाएँ मनुष्य को दी हैं, उसके महत्व से इनकार करना न तो संभव है और न ही उचित। 

फिर बेकार में ये सवाल क्यों ? शायद वो पुराना राग अलापना होगा कि आधुनिक साइंस और टेक्नोलॉजी हमारे प्राचीन ग्रंथों में पहले से ही मौजूद है। नहीं, ये उद्देश्य तो बिलकुल भी नहीं है। भारत में जो शोध और अनुसंधान की समृद्ध परंपरा रही है उसकी मेथोडोलॉजी बिलकुल अलग है और जो भी साम्य आधुनिक पश्चिमी साइंस के साथ मिलते दिखाई देते हैं, वे संयोगवश हैं। 

दरअसल सबसे पहले जब मैंने गीता पढ़ी और उसके आधार पर हिंदी और अंग्रेजी में दो किताबें लिखी (सन्दर्भ 1 , 2 ) तो इस विचार की भूमिका बनी। ये दोनों पुस्तकें सम्बल के माध्यम  से प्रकाशित हैं। गीता का सातवां अध्याय पूरी तरह से ज्ञान और विज्ञान को समर्पित है। उसमें से एक उद्दरण – “एक बार फिर समझ लें। गीता के अनुसार ज्ञान और विज्ञान के बिल्कुल अलग अर्थ हैं। ज्ञान मतलब अपरा, सांख्य या सृष्टि, और विज्ञान मतलब परा या सृष्टिकर्ता को समझना।” इसके साथ ही कुछ बातें और जुड़ती है , जैसे, जो सृष्टि या भौतिक जगत के विकास में योगदान दे उसे ज्ञान कहेंगें , जो सृष्टि और सृष्टिकर्ता के बीच सम्बन्ध की बात करे, उसे विज्ञान कहेंगें (गीता के अनुसार ). यानी विज्ञान मूल रूप से एक आस्तिक चिंतन है, जिसमे एक सृष्टि है, और एक सृष्टि का रचेता है। जबकि साइंस मूल रूप से नास्तिक चिंतन है जिसमे, आत्मा, परमात्मा जैसे विषयों को मेटा फिजिक्स बता कर अवैज्ञानिक और अंधविश्वास घोषित किया गया। वामपंथी विचारधारा ने नास्तिकवाद को पोषित किया। जब प्रगतिशील चिंतन ने धर्म को मानव जीवन का अफीम बता कर  शोषण का प्रमुख औजार घोषित किया तो नास्तिक विचारधारा स्वतः ही एक संस्थागत रूप लेती चली गयी और प्रगतिशील साहित्य और पश्चिमी विज्ञान  जाने अनजाने नास्तिक दर्शन का समर्थक बनते चले गए। ज़रूरी नहीं कि साहित्यकार या वैज्ञानिक नास्तिक रहे हों, लेकिन विचारधारा का गोमुख नास्तिक दर्शन रहा। इस दिशा में बात आगे बढ़ाने से मूल प्रश्न से भटक सकते हैं। इसलिए, सार रूप  में – साइंस बनाम विज्ञान का विचार गीता से मिला।  

फिर बात आगे नहीं बढ़ पायी, क्योंकि साइंस और टेक्नोलॉजी सही मायनों में निरपेक्ष होते हैं। टीवी पे आप जो मर्जी  देखो , चाहे भजन सुनो, प्रेमानंद जी महाराज के प्रवचन सुनो, सद्गुरु के वीडियो देखो या जावेद अख्तर के नास्तिकवाद पर इंटरव्यू देखो। इसी तरह इंटरनेट है, जो और भी ज़्यादा निरपेक्ष है। मैं अपने फ्लो में किताबें लिखता रहा , बैच फ्लावर (3 ,4 ), जिन शिन कला (5 ,6 ), स्विच वर्ड्स (7 ,8 ) और सम्बल वेबसाइट (9 ) पर अपलोड करता रहा।  प्रमुख स्वर एक ही था – जीवन की समस्याओं के सरल समाधान से सम्बंधित उपलब्ध पद्दतियों के साहित्य को और अधिक सरल बना कर हिंदी और अंग्रेजी में प्रस्तुत करना। इसी सिलसिले में दो किताबें सामने आयी, डॉ. गौरव शुक्ल और डॉ. आरती शुक्ल की , बीज मन्त्र पर (10 ,11 ) . देखते देखते शुक्ल दंपत्ति यूट्यूब पर छा से गए क्योंकि इन्होने भारत के प्राचीन ग्रंथों से आयुर्वेद की एक लुप्त शाखा – देवापश्रय चिकित्सा के आधार पर बीज मन्त्र उपचार की ऐसी पद्दति बना डाली जिसमें लाइलाज रोगो के उपचार की बात थी वो भी एक से तीन मिनट में दूरस्थ माध्यम से। डॉ. गौरव शुक्ल ने किसी चमत्कारी  सिद्द पुरुष के बजाय एक वैज्ञानिक की तरह बात की और अपने दावों को आधुनिक मेडिकल साइंस के उपकरणों द्वारा परीक्षण और मापन करवाया। आज उनकी स्थिति यह है कि डॉ. आरती शुक्ल ज़ूम पर उपचार के  सत्र  लेती हैं और डॉ. गौरव शुक्ल बीज मन्त्र पद्दति को व्यापक रूप से सीखने के लिए कोर्सेज़  चला रहे हैं। अच्छी खासी फीस के बावजूद लोग इलाज भी ले रहे हैं और कोर्स भी कर रहे हैं। साइंस  बनाम विज्ञान विषय में उनका उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि मेरी जानकारी में वे पहले ऐसे लोग हैं जो कह रहे है – उपचार आत्मा करती है जो परमात्मा का अंश है। यानी एक ऐसा विज्ञान और टेक्नोलॉजी जो आस्तिक  दर्शन पर आधारित है। उनके बहुत सारे कथन हैं और एक पूरा नौ चक्रों, तत्वों, ग्रहों, दिशाओं और अक्षरों पर आधारित एक पूरा सिस्टम है जो आधुनिक साइंस के उपकरणों द्वारा परीक्षण के लिए तैयार है। दूसरे शब्दों में चिकित्सा की एक  ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित हो सकती है जो विज्ञान की उस परिभाषा पर आधारित होगी जिसका उल्लेख गीता में है। डॉ. गौरव शुक्ल ने कई वीडिओज़ में कहा है कि वे अपने अनुसन्धान को एक संस्थागत स्वरुप  देना चाहते हैं, लेकिन देश में ऐसा कोई प्लेटफॉर्म ही नहीं है न कोई राजनितिक इच्छाशक्ति जो उनकी बात सुने और जिस तरह वे अपने काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं , उन्हें राज्याश्रय मिले। इसलिए सबसे पहला काम जो ज़रूरी है वह ये समझना कि आज देश के स्कूलों , कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जो विज्ञान पढ़ाया जाता है, वो मूल रूप से पश्चिमी साइंस है और वामपंथी विचारधारा के प्रभाव से, जाने अनजाने, चाहे अनचाहे, नास्तिक दर्शन पर आधारित है। 

अब सवाल यह नहीं है कि साइंस सही है या विज्ञान। सवाल यह है कि क्या मनुष्य के पास ज्ञान प्राप्त करने का केवल एक ही रास्ता हो सकता है?

आधुनिक साइंस ने प्रकृति को समझने की जो पद्धति विकसित की, वह असाधारण रूप से सफल रही है। आधुनिक चिकित्सा से लेकर अंतरिक्ष-विज्ञान तक, कंप्यूटर से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, उसके परिणाम हमारे सामने हैं। इसलिए उसे नकारने का प्रश्न ही नहीं उठता।

लेकिन एक दूसरी सच्चाई भी है।

आज हम जिन विषयों को साइंस के नाम से पढ़ाते हैं, उनकी आधुनिक संस्थागत संरचना और उनकी विशिष्ट शाखाएँ मूलतः पश्चिम में विकसित हुईं। बॉटनी इसका एक सीधा उदाहरण है। भारत में वनस्पतियों का ज्ञान हजारों वर्षों से रहा है—औषधीय पौधों का ज्ञान, कृषि का ज्ञान, वृक्षों और उनके उपयोग का ज्ञान। लेकिन आधुनिक अर्थ में बॉटनी एक अलग विषय है, जिसकी अपनी वर्गीकरण-पद्धति, पौधों की बनावट और संरचना का अध्ययन, शरीर-क्रियाओं का अध्ययन, आनुवंशिकी, पर्यावरण-विज्ञान और प्रयोगात्मक पद्धति है। विषय और शोध का मॉडल पश्चिम है। 

इसी तरह प्लांट फिजियोलॉजी को हम हिंदी में “पादप क्रिया-विज्ञान” कह दें, तो नाम भारतीय हो जाता है; विषय की उत्पत्ति और उसकी अध्ययन-पद्धति नहीं बदलती। वह आधुनिक जीव-विज्ञान की उसी धारा का हिस्सा है जिसमें पौधों में प्रकाश-संश्लेषण, जल और खनिजों का परिवहन, चयापचय, हार्मोन, वृद्धि और कोशिकीय प्रक्रियाओं का प्रयोगात्मक अध्ययन किया जाता है।विषय और शोध का मॉडल पश्चिम है। यही स्थिति कृषि एवं अन्य विषयों की है। 

यह फर्क छोटा नहीं है।

किसी आधुनिक साइंस का हिंदी नाम रख देने से वह भारतीय विज्ञान नहीं बन जाता। और किसी प्राचीन भारतीय ज्ञान को इसलिए साइंस कहना भी जरूरी नहीं कि आज उसकी कोई बात आधुनिक साइंस से मिलती-जुलती दिखाई दे रही है।

दोनों के अपने इतिहास को सम्मान देना ही ईमानदार रास्ता है।

लेकिन यहीं से एक बहुत बड़ा अवसर पैदा होता है।

हमें पश्चिमी साइंस को हटाना नहीं है।
हमें वर्तमान वैज्ञानिक व्यवस्था को रोकना नहीं है।
हमें यह भी नहीं कहना है कि आज की हर वैज्ञानिक उपलब्धि हमारे ग्रंथों में पहले से मौजूद थी।

जो चल रहा है, उसे चलने देना चाहिए। बल्कि और तेज चलाना चाहिए।

लेकिन उसके साथ-साथ भारत में एक दूसरी धारा क्यों नहीं शुरू हो सकती?

एक ऐसी धारा जिसमें भारतीय ज्ञान-परंपरा के उन प्रश्नों को भी गंभीर शोध का विषय बनाया जाए, जिन्हें आधुनिक साइंस ने अपनी वर्तमान अध्ययन-पद्धति के बाहर रखा है—चेतना, अनुभूति, मनुष्य और प्रकृति का संबंध, जीवन का अर्थ, आत्मानुभूति, और सृष्टि तथा सृष्टिकर्ता के संबंध जैसे प्रश्न। अगर मन जैसी एब्स्ट्रेक्ट चीज पर एक पूरी मेडिकल साइंस विकसित हो सकती है तो आत्मा पर क्यों नहीं ?

इसका अर्थ यह नहीं कि हर आध्यात्मिक दावे को सत्य मान लिया जाए।

बल्कि ठीक उलटा।

जो दावा परीक्षण योग्य है, उसका परीक्षण हो।
जो मापने योग्य है, उसे मापा जाए।
जो प्रयोग से जाँचा जा सकता है, उस पर प्रयोग हो।
जो सिद्ध हो, उसे स्वीकार किया जाए।
जो असिद्ध हो, उसे असिद्ध ही कहा जाए।

यानी भारतीय ज्ञान-परंपरा को अंधविश्वास के संरक्षण की जरूरत नहीं है। उसे अनुसंधान के अवसर की जरूरत है।

और आधुनिक साइंस को भी इससे कोई खतरा नहीं है।

क्योंकि यदि कोई भारतीय अवधारणा परीक्षण में गलत सिद्ध होती है, तो वह ज्ञान में जुड़ती नहीं।
और यदि कोई अवधारणा परीक्षण में सही सिद्ध होती है, तो वह केवल इसलिए गलत नहीं हो जाती कि उसका स्रोत भारत की किसी प्राचीन परंपरा में था।

सत्य का पासपोर्ट नहीं होता।

यहीं “साइंस बनाम विज्ञान” का वास्तविक अर्थ सामने आता है।

हमारा उद्देश्य साइंस के सामने विज्ञान खड़ा करके एक को दूसरे से हराना नहीं है। उद्देश्य यह है कि दो अलग ज्ञान-परंपराओं के बीच एक नया शोध-क्षेत्र बनाया जाए।

एक धारा आज की साइंस की अपनी गति से आगे बढ़ती रहे।

दूसरी समानांतर धारा भारतीय ज्ञान-परंपरा में उपलब्ध अवधारणाओं, अनुभवों, पद्धतियों और प्रश्नों को आधुनिक परीक्षण, मापन और अनुसंधान-पद्धति के सामने रखे।

और जहाँ दोनों धाराएँ मिल सकें, वहाँ उन्हें मिलाया जाए।

न भारतीय ज्ञान को साइंस बनने की मजबूरी हो, न साइंस को भारतीय साबित करने की।

दोनों अपनी-अपनी पहचान के साथ चलें और जहाँ सत्य मिले, वहाँ एक-दूसरे से जुड़ें, एक-दूसरे में समाहित हों।

शायद आने वाले समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है—
साइंस को भारतीय बनाने की नहीं, और भारतीय ज्ञान को पश्चिमी साइंस की नकल बनाने की भी नहीं; बल्कि भारत और विश्व की ज्ञान-परंपराओं को एक ऐसे नए अनुसंधान-ढाँचे में लाने की, जहाँ दोनों एक-दूसरे से सीख सकें।

आज भारत के सामने अवसर केवल यह नहीं है कि वह दुनिया की मौजूदा वैज्ञानिक दौड़ में आगे निकले।

अवसर इससे बड़ा है।

भारत एक ऐसी समानांतर ज्ञान-धारा शुरू कर सकता है जिसमें आधुनिक साइंस की कठोर परीक्षण-पद्धति और भारतीय ज्ञान-परंपरा के गहरे प्रश्न पहली बार बराबरी की मेज पर बैठें।

विरोध नहीं।
वर्चस्व नहीं।
अतीत का महिमामंडन नहीं।
वर्तमान का निषेध नहीं।

एक नई शुरुआत।

जहाँ साइंस प्रकृति को समझने की अपनी यात्रा जारी रखे—और विज्ञान उस यात्रा से यह पूछने का साहस करे कि ज्ञान की अंतिम सीमा कहाँ है, ज्ञाता कौन है, और ज्ञात जगत के पार अभी क्या-क्या जानना बाकी है।

शायद असली सवाल “साइंस बनाम विज्ञान” नहीं है।

असली सवाल है—क्या मानव ज्ञान की अगली छलाँग इन दोनों के मिलने से पैदा हो सकती है?

1. गीता- आइये साथ पढ़ें , अरविन्द कुमार पुरोहित , 2025 , सम्बल

2  Geeta: Let us read together, Arvind Kumar Purohit ,  2025 , Sambal 

3 .बैच फ्लॉवर रेमेडी प्रणाली के मूल तत्व, अरविन्द कुमार पुरोहित , 2025 , सम्बल

4 .Fundamentals of Bach Flower Remedy System, Arvind Kumar Purohit ,  2025 , Sambal

5 .जिन शिन कला के मूल तत्व    , अरविन्द कुमार पुरोहित , 2025 , सम्बल
6 .Fundamentals of Jin Shin Kala, Arvind Kumar Purohit ,  2025 , Sambal

7 .स्विच वर्ड: सिद्दांत और प्रयोग , अरविन्द कुमार पुरोहित , 2025 , सम्बल
8 . Switch Words: Theory and Practice, Arvind Kumar Purohit ,  2025 , Sambal

9. www.sambalglobal.com 

10. एक मिनट हीलर दो मिनट हीलिंग , डॉ आरती शुक्ल , डॉ गौरव शुक्ल , 2026 , नोशन प्रेस (अमेज़ॉन पर उपलब्ध ) 

11. श्रीं मायाजाल , डॉ गौरव शुक्ल , डॉ आरती शुक्ल , चिन्मयी सतपथी, 2026 , नोशन प्रेस (अमेज़ॉन पर उपलब्ध )

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor