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Friday, October 2, 2026, 9:33 am

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क्या कांग्रेस ने 60 साल शासन वोट चोरी करते हुए किया था?…वोट चोरी के नाम पर विपक्ष की बेचैनी? EVM के इतिहास से आज के सवालों तक पड़ताल…

जिस EVM को कांग्रेस के शासनकाल में चुनावी व्यवस्था में लाया गया, उसी पर आज सवाल; क्या समस्या मशीन में है या चुनावी हार की राजनीतिक व्याख्या में? ईवीएम पर आरोप लगाने के साथ-साथ राहुल गांधी SIR और मतदाता सूचियों में हेरा-फेरी और नाम हटाने-जोड़ने जैसे आरोप भी लगा रहे हैं, लेकिन क्या यह उनकी राजनीतिक हताशा नहीं हैं…। कांग्रेस ने करीब 60 साल देश पर शासन किया, क्या एक पार्टी इतने सालों तक शासन बिना वोट चोरी कर सकती है? अगर इसका जवाब हां है तो भाजपा शासन क्यों नहीं कर सकती? राहुल गांधी लगातार हार से कुंठित हो गए हैं।

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली

9783414079 diliprakhai@gmail.com

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की सबसे बड़ी कसौटी हैं। इसलिए चुनाव प्रक्रिया पर उठने वाला प्रत्येक सवाल गंभीरता से सुना जाना चाहिए। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि किसी चुनावी व्यवस्था पर आरोप लगाने से पहले उसके इतिहास, तकनीकी संरचना, कानूनी प्रावधानों और उपलब्ध प्रमाणों को सामने रखा जाए।

आज “वोट चोरी” का मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 24 सितंबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और “वोट चोरी” के आरोप लगाए। उन्होंने हरियाणा, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के चुनावी आंकड़ों और मतदाता सूची से जुड़े सवाल उठाए। ये उनके राजनीतिक आरोप हैं; इनके समर्थन में निर्णायक न्यायिक निष्कर्ष अलग विषय है। ऐसे समय में सबसे स्वाभाविक सवाल यह है—यदि EVM में बड़े पैमाने पर वोट चोरी करना इतना आसान है, तो भारत में EVM आई कैसे और किसके शासनकाल में आई?

EVM भाजपा ने नहीं, कांग्रेस के शासनकाल में शुरू की थी

भारत में EVM के इस्तेमाल का इतिहास भाजपा सरकार से शुरू नहीं होता। चुनाव आयोग के अनुसार पहली बार EVM का इस्तेमाल 1982 में केरल की परूर विधानसभा सीट के उपचुनाव में किया गया था। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। इसके बाद EVM को लेकर कानूनी प्रश्न उठा और 1984 में सुप्रीम कोर्ट ने उस समय के कानून के संदर्भ में महत्वपूर्ण निर्णय दिया। इसके बाद संसद ने जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करके EVM के इस्तेमाल को वैधानिक आधार दिया। 1990 के दशक में इसका प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ा और 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार पूरे देश में आम चुनाव EVM से कराया गया। अर्थात EVM किसी एक दल की चुनावी खोज या केवल भाजपा की व्यवस्था नहीं है। यह चुनाव आयोग, संसद और विभिन्न सरकारों के दौर से गुजरती हुई वर्तमान चुनाव प्रणाली का हिस्सा बनी। दिलचस्प बात यह भी है कि EVM से हुए चुनावों में केवल भाजपा ही नहीं, कांग्रेस और अनेक क्षेत्रीय दल भी सत्ता में आए हैं। चुनाव आयोग के अपने दस्तावेजों में विभिन्न राज्यों के चुनाव परिणामों का इतिहास दर्ज है, जिसमें EVM के दौर में अलग-अलग दलों की जीत स्पष्ट दिखाई देती है।

फिर कांग्रेस ने EVM के फायदे-नुकसान क्यों नहीं देखे?

यह सवाल राजनीतिक बहस में बार-बार उठता है, लेकिन इसका उत्तर थोड़ा व्यापक है। जब EVM लाई गई, तब उसके पीछे प्रमुख उद्देश्य थे—कागजी मतपत्रों में अमान्य वोटों की समस्या कम करना, मतदान और मतगणना को सरल बनाना तथा बूथ कैप्चरिंग जैसी पुरानी चुनावी गड़बड़ियों पर अंकुश लगाना। चुनाव आयोग के अनुसार EVM में प्रति मिनट अधिकतम चार वोट दर्ज किए जा सकते हैं। आयोग का तर्क है कि इस व्यवस्था से बूथ कैप्चर करके बहुत बड़ी संख्या में फर्जी मतदान करना पहले की तुलना में कठिन हो जाता है। इसलिए यह कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा कि EVM केवल किसी एक पार्टी को चुनाव जिताने के लिए लाई गई थी। इसकी मूल अवधारणा चुनाव प्रक्रिया में तकनीकी सुधार के रूप में सामने आई थी। हां, समय के साथ तकनीक पर सवाल उठना भी असामान्य नहीं है। कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक दलों ने अलग-अलग समय पर EVM की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। 2018 में कांग्रेस ने भी बैलेट पेपर की वापसी अथवा EVM के परिणामों के अधिक व्यापक VVPAT सत्यापन की मांग की थी।

क्या EVM में वोट चोरी संभव है?

यहीं से बहस तकनीकी हो जाती है। भारत की ECI-EVM सामान्य इंटरनेट से जुड़ी कोई ऑनलाइन मशीन नहीं है। चुनाव आयोग के अनुसार इसमें मुख्य रूप से Control Unit और Ballot Unit होते हैं। मतदान कक्ष में मतदाता Ballot Unit पर अपना विकल्प दबाता है, जबकि नियंत्रण इकाई मतदान अधिकारी के नियंत्रण में रहती है। VVPAT के माध्यम से मतदाता लगभग सात सेकंड तक अपनी पसंद के उम्मीदवार की पर्ची देख सकता है। चुनाव आयोग के अनुसार चुनाव से पहले EVM और VVPAT की First Level Checking की जाती है तथा राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में मशीनों की जांच और प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं। मशीनों की मूवमेंट, रैंडमाइजेशन और सीलिंग जैसी प्रक्रियाएं भी निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत होती हैं। इसलिए “EVM में किसी भी तरह की छेड़छाड़ बिल्कुल असंभव है” और “EVM में आसानी से वोट चोरी की जा सकती है”—दोनों को बिना प्रमाण के पूर्ण सत्य मानना उचित नहीं है। तकनीकी प्रणाली के साथ सुरक्षा प्रक्रियाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं। किसी बड़े पैमाने की चुनावी धांधली के आरोप के लिए केवल यह दिखाना पर्याप्त नहीं है कि मशीन एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है; यह भी प्रमाणित करना होगा कि चुनाव की वास्तविक प्रक्रिया में किस स्तर पर, किस मशीन में और किस तरीके से परिणाम प्रभावित किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने EVM पर क्या कहा?

EVM पर सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत पड़ावों में से एक 26 अप्रैल 2024 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। अदालत ने 100 प्रतिशत EVM-VVPAT मिलान की मांग तथा पूरी तरह बैलेट पेपर प्रणाली पर लौटने की मांग को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने चुनाव आयोग की मौजूदा सुरक्षा प्रक्रियाओं और तकनीकी व्यवस्था पर विचार किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यायपालिका ने यह घोषित कर दिया कि चुनाव प्रक्रिया में कभी कोई गलती हो ही नहीं सकती। इसका अर्थ यह है कि उपलब्ध सामग्री और लागू सुरक्षा व्यवस्था के आधार पर अदालत ने उस समय EVM को हटाकर बैलेट पेपर पर लौटने का आदेश नहीं दिया। यह अंतर समझना बेहद जरूरी है।

प्रधानमंत्री मोदी का तर्क क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से EVM के पक्ष में यह तर्क रखते रहे हैं कि पुराने बैलेट पेपर के दौर में बूथ कैप्चरिंग, मतपत्रों की लूट और चुनावी हिंसा जैसी समस्याएं सामने आती थीं। 2019 में राज्यसभा में अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा था कि पुराने दौर में बूथ कैप्चरिंग और मतपेटियों से जुड़ी घटनाएं चुनावी खबरों का हिस्सा हुआ करती थीं और EVM के आने से इस तरह की घटनाओं में बदलाव आया। उन्होंने यह भी याद दिलाया था कि EVM की शुरुआत उस समय हुई जब भाजपा केंद्र की सत्ता में नहीं थी। 2024 में भी प्रधानमंत्री ने बैलेट पेपर के दौर में बूथ कैप्चरिंग को लेकर इसी प्रकार का तर्क दिया और कहा कि EVM ने आम मतदाता को मतदान प्रक्रिया में अधिक सुरक्षा दी है। यह प्रधानमंत्री का राजनीतिक तर्क है। इसका मूल्यांकन जनता और राजनीतिक दल अपने-अपने दृष्टिकोण से कर सकते हैं।

लेकिन क्या इससे यह साबित हो जाता है कि भाजपा EVM से चुनाव नहीं हार सकती?

नहीं। यहां एक महत्वपूर्ण तार्किक अंतर समझना होगा। यदि EVM में छेड़छाड़ की कोई संभावना सिद्ध नहीं हुई है, तो केवल भाजपा की लगातार चुनावी सफलताओं से “भाजपा EVM में वोट चोरी करती है” निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लोकतंत्र में चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए ठोस चुनावी डेटा, दस्तावेज, मशीन-स्तरीय प्रमाण, प्रक्रिया में विशिष्ट अनियमितता या न्यायिक रूप से परीक्षण योग्य साक्ष्य अधिक महत्वपूर्ण हैं।

राहुल गांधी का CEC से इस्तीफा मांगना

24 सितंबर 2026 को राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उनके आरोपों का वर्तमान केंद्र केवल EVM नहीं, बल्कि मतदाता सूची और Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़े प्रश्न भी हैं। विपक्ष को यह समझ लेना चाहिए कि ईवीएम की वजह से वोट चोरी नहीं हो रही है। साथ ही विपक्ष का तर्क है कि मतदाता सूची में नामों का जुड़ना या हटना चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है और चुनाव आयोग को अधिक पारदर्शिता दिखानी चाहिए। चुनाव आयोग की ओर से चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची की व्यवस्थाओं का बचाव किया गया है। इस विवाद का अंतिम राजनीतिक निष्कर्ष निकालने के बजाय संबंधित दावों और उपलब्ध दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच अधिक महत्वपूर्ण है।

CJP का जंतर-मंतर आंदोलन : सवाल और जवाब दोनों जरूरी

इसी विवाद के बीच CJP ने 24 सितंबर को CEC के इस्तीफे की मांग करते हुए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया और मांग पूरी न होने पर देशव्यापी आंदोलन तथा दिल्ली में अनिश्चितकालीन धरने की चेतावनी दी। संगठन ने “Election Commission Thik Karo” अभियान की घोषणा भी की है। किसी संगठन को शांतिपूर्ण विरोध, धरना या आंदोलन का लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन किसी भी आंदोलन की लोकतांत्रिक उपयोगिता इस बात से जुड़ी होती है कि उसके आरोपों के समर्थन में प्रमाण कितने ठोस हैं और उसका विरोध संवैधानिक एवं शांतिपूर्ण दायरे में रहता है।

असली सवाल : हार का कारण EVM या राजनीतिक रणनीति?

भारतीय राजनीति में यह नया नहीं है कि हार के बाद चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठें और जीतने वाला पक्ष अपनी रणनीति को सफलता का कारण बताए। लेकिन लोकतंत्र के लिए स्वस्थ रास्ता यह है कि हार का विश्लेषण कई स्तरों पर किया जाए—उम्मीदवार, संगठन, स्थानीय समीकरण, मतदाता व्यवहार, प्रचार रणनीति, गठबंधन, सरकार के कामकाज और चुनावी प्रक्रिया—सभी का। EVM को हर हार का कारण मान लेना उतना ही अधूरा विश्लेषण है जितना हर जीत को केवल EVM का परिणाम मान लेना। कांग्रेस EVM की शुरुआत के समय सत्ता में थी। भाजपा भी बाद के दशकों में EVM के माध्यम से कई चुनाव हारी है और जीती है। कांग्रेस भी EVM के दौर में केंद्र में सरकार बना चुकी है। अनेक क्षेत्रीय दल भी इसी व्यवस्था में सत्ता तक पहुंचे हैं। यह इतिहास अपने आप में यह बताता है कि EVM का चुनावी परिणाम एक ही राजनीतिक दल के पक्ष में स्थायी रूप से नहीं गया है।

कांग्रेस ने 50-60 साल शासन क्या वोट चोरी करते हुए किया था? राहुल गांधी जवाब दीजिए…

राहुल गांधी का इसारा केवल ईवीएम के माध्यम से वोट चोरी होना ही नहीं है, बल्कि वे मतदाता सूची और Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़े प्रश्न भी हैं। राहुल गांधी को यह समझ लेना चाहिए कि ईवीएम की वजह से वोट चोरी नहीं हो रही है। साथ ही उनका का तर्क है कि मतदाता सूची में नामों का जुड़ना या हटना चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है और चुनाव आयोग को अधिक पारदर्शिता दिखानी चाहिए। लेकिन यह समस्या आज की नहीं है। खुद कांग्रेस ही इस समस्या की जनक है। देखा जाए तो कांग्रेस ने देश में लगभग 50-60 साल राज किया है। तो राहुल गांधी बता सकते हैं कि क्या आधी शताब्दी तक शासन किसी पार्टी का ईमानदारी से हो सकता है? अगर हां तो भाजपा का शासन क्यों नहीं हो सकता? वोट चोरी की खान तो खुद कांग्रेस ही रही है। आजादी के बाद से ही देश में कांग्रेस के कर्मकांड पूरे देश के सामने हैं। अब कांग्रेस के राहुल गांधी के पेट में दर्द क्यों हो रहा है?

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor