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Sunday, August 23, 2026, 6:32 pm

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Lifestyle

वरिष्ठ शाइर कासिम बीकानेरी की ताजा गजल

हवाओं का रुख मोड़ सकता हूं…

मैं रुख़ हवाओं का पल भर में मोड़ सकता हूं
ग़ुरूर इक आन में तूफ़ां का तोड़ सकता हूं

ख़ुदा ने मेरी मुहब्बत को दी है वो तासीर
दिलों के टूटे हुए शीशे जोड़ सकता हूं

अजीब नींद में गफ़लत की लोग हैं सोए
उन्हें जगाने की ख़ातिर झिंझोड़ सकता हूं

लहू बदन का मिरे काम आए दुनिया के
तो जिस्म का मैं लहू भी निचोड़ सकता हूं

किया है वक़्त को मुट्ठी में अपनी मैंने बंद
मैं रस्सी वक़्त की अब तो मरोड़ सकता हूं

मैं अपने इल्म से करके उजाला दुनिया में
‘शबे-सियाह की ज़ंजीर तोड़ सकता हूं’

थका नहीं हूं मैं ‘क़ासिम’ है मेरा अज़्म जवां
रहे-हयात पे मैं अब भी दौड़ सकता हूं

क़ासिम बीकानेरी

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor