आजादी के आंदोलन के महानायक कौन? यहां जो महानायक बता रहे हैं वो राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित को व्यक्तिगत रूप से प्रिय हैं। कुछ पाठक इससे असहमत हो सकते हैं। वैसे भी हर व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपना रियल हीरो किसे मानता है? इसलिए इस आलेख को पढ़ें और आनंद लीजिए, हम किसी प्रकार के विवाद को जन्म नहीं देना चाहते। आप चाहें तो अपना हीरो जिसे मानना चाहें मान सकते हैं। (संपादक)
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
200 साल तक अंग्रेजों की गुलामी सहने के बाद 15 अगस्त 1947 की सुबह भारत के इतिहास में सुनहरी किरण बनकर उभरी। वह सुबह सिर्फ सूरज की रोशनी नहीं थी, बल्कि उन लाखों बलिदानों की गवाही थी जो इस मिट्टी में समा गए।
आज हम खुले आसमान के नीचे, स्वतंत्र हवा में सांस ले रहे हैं। हमें न कालापानी की यातनाओं का अनुभव है, न जलियांवाला बाग़ की गोलियों की चुभन, न अंग्रेजों के कोड़ों की जलन। लेकिन यह सब किसी और के हिस्से में आया — उनके, जिन्होंने अपने तन, मन, धन और प्राण भारत माता के चरणों में अर्पित कर दिए।
हमने उनके नाम सुने हैं — महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आज़ाद… लेकिन हकीकत यह है कि आजादी की असली पटकथा तो बहुत पहले लिख दी गई थी — 1857 की क्रांति में।
1857 — वह पहली चिंगारी
1857 का साल भारतीय इतिहास का मोड़ था। यह वह समय था जब पूरे भारत में एक साथ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा।
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मंगल पांडे — 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में एक सिपाही ने ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती दे दी। यह सिर्फ एक गोली नहीं थी, यह आग का पहला शोला था।
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झांसी की रानी लक्ष्मीबाई — “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी” का संकल्प लेकर अंग्रेजी सेना से लड़ीं और अपने प्राण मातृभूमि के लिए न्यौछावर कर दिए।
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बेगम हज़रत महल — अवध की शेरनी, जिन्होंने लखनऊ में अंग्रेजी सत्ता को हिला दिया।
यह क्रांति भले ही अनियोजित थी, लेकिन इसने भारतवासियों को एक बात सिखा दी — कि अंग्रेज़ अजेय नहीं हैं। यह बीज था, जिसने आने वाले 90 वर्षों तक स्वतंत्रता संग्राम की जड़ों को पोषित किया।
20वीं सदी का उबाल — रियल हीरो की कहानियां
भारत की आज़ादी का इतिहास इन रियल हीरो के बिना अधूरा है।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु
इन तीनों नौजवानों ने यह साबित कर दिया कि देशभक्ति उम्र नहीं देखती। “इंक़लाब ज़िंदाबाद” उनका नारा नहीं, उनकी सांस थी।
सुभाषचंद्र बोस
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।” नेताजी ने आज़ाद हिंद फौज के जरिए अंग्रेजों को यह एहसास दिला दिया कि आज़ादी की लड़ाई सिर्फ अहिंसा से नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष से ही लड़ी जाएगी।
चंद्रशेखर आज़ाद
अल्फ्रेड पार्क में surrounded होने पर भी खुद को गोली मारकर अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार नहीं हुए। उनका नाम ही आज़ाद था और उन्होंने अपनी जिंदगी को इसी नाम के साथ विदा किया।
उधम सिंह
जलियांवाला बाग़ हत्याकांड का बदला लेने के लिए लंदन में जनरल डायर के उत्तराधिकारी माइकल ओ’डायर को गोली मार दी।
वीर सावरकर
अंडमान के सेलुलर जेल में कालापानी की यातनाएं झेलते हुए भी उन्होंने आज़ादी का सपना जीवित रखा।
अल्लूरी सीताराम राजू
दक्षिण भारत में आदिवासियों का नेतृत्व करते हुए ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी।
आजादी के बाद — नए खतरे, नई चुनौतियां
15 अगस्त 1947 को आज़ादी मिल गई, लेकिन असली सवाल यह था — अब इस आज़ादी की रक्षा कौन करेगा?
आजादी के बाद भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां थीं —
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सीमाओं की सुरक्षा — पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसियों की महत्वाकांक्षी निगाहें।
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आंतरिक स्थिरता — आतंकवाद, नक्सलवाद और सांप्रदायिक विभाजन।
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आर्थिक विकास और आत्मनिर्भरता — गरीबी, बेरोजगारी और औद्योगिक पिछड़ापन।
बीते 7 दशकों में भारत ने कई नेता देखे, कई सरकारें आईं और गईं। लेकिन 21वीं सदी में, एक समय ऐसा आया जब दुनिया तेजी से बदल रही थी और भारत को एक ऐसे नेतृत्व की जरूरत थी, जो सिर्फ सत्ता संभालने वाला नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता हो।
नए भारत का महानायक — नरेंद्र मोदी
2014 में नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यह सिर्फ एक राजनीतिक बदलाव नहीं था, बल्कि भारत की दिशा और दशा बदलने की शुरुआत थी।
सीमा की सुरक्षा
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सर्जिकल स्ट्राइक (2016) और एयर स्ट्राइक (2019) — यह संदेश देने के लिए कि भारत अब चुपचाप वार सहने वाला देश नहीं है।
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सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर — सड़कों, पुलों, टनल का निर्माण ताकि सेना तेजी से तैनात हो सके।
आर्थिक आत्मनिर्भरता
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मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया — भारत को वैश्विक विनिर्माण और नवाचार केंद्र बनाने की दिशा में कदम।
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आत्मनिर्भर भारत अभियान — कोविड काल में भारत को अपनी दवाओं, वैक्सीन और उपकरणों का निर्माता बना दिया।
सामाजिक सुधार
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स्वच्छ भारत मिशन — स्वच्छता को जन आंदोलन बना दिया।
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उज्ज्वला योजना — गरीब घरों में धुएं से मुक्ति।
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जन धन योजना — करोड़ों गरीबों के बैंक खाते खोले।
वैश्विक मंच पर भारत
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जी20 की अध्यक्षता और सफल आयोजन, जिससे दुनिया ने भारत को नेतृत्वकर्ता के रूप में देखा।
मोदी के हाथों में सुरक्षित भारत
आज जब हम चारों ओर देखते हैं — सीमा पर तनाव, विश्व राजनीति में अस्थिरता, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, और आंतरिक चुनौतियां — तो यह कहने में संकोच नहीं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत न सिर्फ सुरक्षित है, बल्कि आत्मविश्वास से भरा है।
जैसे 1857 में मंगल पांडे ने चिंगारी जलाई थी, भगत सिंह और नेताजी ने उसे आग में बदला था, वैसे ही आज मोदी ने उस आग को राष्ट्र निर्माण की लौ में बदल दिया है।
एक हीरो से दूसरे हीरो तक की यात्रा
भारत की आज़ादी की पटकथा 1857 में लिखी गई थी, जिसे भगत सिंह, सुभाष, आज़ाद, रानी लक्ष्मीबाई, उधम सिंह जैसे वीरों ने अपने खून से रंगा। और आज, आज़ादी के 78 साल बाद, एक नया अध्याय नरेंद्र मोदी लिख रहे हैं — जो आज़ादी के बाद के भारत के महानायक के रूप में उभरे हैं।
अब हमारे हाथ में सिर्फ एक जिम्मेदारी है — इस आज़ादी को खोने न देना।









