Explore

Search

Sunday, March 15, 2026, 2:28 pm

Sunday, March 15, 2026, 2:28 pm

LATEST NEWS
Lifestyle

श्रीकृष्ण कह रहे हैं… पहले कठिन कार्य पूरे कीजिए, आसान कार्य स्वयं पूरे हो जाएंगे

(भगवान श्रीकृष्ण की गीता से प्रेरित आध्यात्मिक आलेख)

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

मानव जीवन एक यात्रा है जिसमें चुनौतियां और अवसर दोनों ही साथ-साथ चलते हैं। कभी-कभी हमें लगता है कि जीवन की राह बहुत कठिन है और हमारी ऊर्जा केवल सरल कार्यों में ही खर्च हो रही है। लेकिन यदि हम गहराई से देखें तो कठिनाइयों का सामना करने से ही हमारे भीतर शक्ति, धैर्य और विवेक का विकास होता है। यही संदेश हमें भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में दिया है।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युद्धभूमि में कहा था कि कठिन से कठिन कर्म भी यदि कर्तव्य के भाव से किया जाए तो वह साधारण हो जाता है। और जब हम सबसे कठिन कार्यों को पूरा कर लेते हैं, तो शेष कार्य स्वतः ही सरल हो जाते हैं। यही जीवन का शाश्वत सत्य है—जो भी ऊंचाई पहले प्राप्त कर ली जाती है, उसके बाद की सीढ़ियां अपने-आप हल्की लगती हैं।

कठिनाई ही अवसर है

हम अक्सर जीवन में कठिन कार्यों से बचना चाहते हैं। लेकिन गीता हमें यह सिखाती है कि कठिनाई ही अवसर है। अर्जुन जब युद्धभूमि में खड़ा था, तो उसके सामने सबसे बड़ा कठिन कार्य था—अपने ही गुरु, दादा और बंधु-बांधवों से युद्ध करना। अर्जुन विचलित हुआ और उसने अपने धनुष को नीचे रख दिया। लेकिन श्रीकृष्ण ने उससे कहा—

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
(अर्थात: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं।)

यह संदेश स्पष्ट करता है कि कठिनाइयों से भागना नहीं है, बल्कि उन्हें अपने कर्तव्य की तरह स्वीकार कर पूरा करना है। जब हम सबसे कठिन कर्म को कर लेते हैं, तो उसके बाद का मार्ग सुगम हो जाता है।

मन और माया की लड़ाई

जीवन का सबसे बड़ा कठिन कार्य है—मन को साधना।
गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है:

“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।”
(अर्थात: मनुष्य को अपने द्वारा ही अपना उद्धार करना चाहिए, और स्वयं को गिराना नहीं चाहिए।)

मन को नियंत्रित करना सबसे कठिन है, लेकिन यदि यही साध लिया जाए तो फिर कोई भी कार्य असंभव नहीं रहता। जो साधक कठिन कार्य—मन पर विजय—में सफल हो जाता है, उसके लिए शेष सभी कार्य सहज हो जाते हैं।

कठिन कार्य क्यों पहले करने चाहिए?

1. ऊर्जा और संकल्प का सही उपयोग

जीवन की शुरुआत या किसी भी दिन की शुरुआत में हमारी ऊर्जा और एकाग्रता सबसे प्रखर होती है। यदि उस समय हम कठिन कार्यों पर ध्यान केंद्रित करें, तो वे पूर्ण हो जाते हैं और उसके बाद के सरल कार्य स्वतः पूर्ण होते चले जाते हैं।

श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन से कहा था कि जब तू युद्ध करेगा तो प्रारंभ में ही अपने सबसे बड़े शत्रुओं पर ध्यान केंद्रित करना, क्योंकि उनके परास्त होते ही अन्य योद्धा स्वतः ही हिम्मत हार जाएंगे।

2. भय का नाश

कठिन कार्यों से भय उत्पन्न होता है। लेकिन जब हम उनका सामना करते हैं, तो भय समाप्त हो जाता है। गीता में श्रीकृष्ण ने अभय (निर्भयता) को दिव्य गुणों में गिना है। कठिन कार्य का सीधा सामना करना हमें निर्भीक बना देता है।

3. आत्मविश्वास का विकास

जब कोई साधक कठिन कार्य को पूरा करता है, तो उसके भीतर यह विश्वास जाग्रत होता है कि अब वह किसी भी कार्य को कर सकता है। यह आत्मविश्वास ही साधक को आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले जाता है।

उदाहरण: अर्जुन और गीता

अर्जुन के सामने आसान रास्ता यह था कि वह युद्ध छोड़कर वन में चला जाए। लेकिन कठिन रास्ता यह था कि वह युद्ध करे, धर्म की रक्षा करे और अपने कर्तव्य का पालन करे। श्रीकृष्ण ने उसे यही समझाया कि यदि तू अभी कठिन कार्य करेगा तो शेष कार्य अपने-आप सरल हो जाएंगे।

यदि अर्जुन युद्ध छोड़ देता, तो जीवनभर उसे ग्लानि और अपराधबोध का बोझ ढोना पड़ता। लेकिन उसने कठिन कार्य चुना और धर्म की स्थापना कर दी।

आध्यात्मिक दृष्टि से कठिन कार्य

1. इंद्रियों पर नियंत्रण

इंद्रियों को साधना सबसे कठिन कार्य है। श्रीकृष्ण ने कहा:

“इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।”

जो साधक अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर लेता है, उसके लिए संसार के सभी प्रलोभन नगण्य हो जाते हैं।

2. कर्तव्यपालन

कभी-कभी परिवार, समाज या राष्ट्र के लिए अपने व्यक्तिगत सुखों का त्याग करना पड़ता है। यह कठिन है, लेकिन गीता कहती है कि यही सच्चा योग है।

3. फल की आसक्ति छोड़ना

मनुष्य स्वभावतः फल की ओर आकर्षित होता है। लेकिन गीता हमें सिखाती है कि कर्म करो, फल की चिंता मत करो। यह भी बहुत कठिन है, किंतु यही साधना है।

व्यावहारिक जीवन में संदेश

1. छात्र के लिए

परीक्षा की तैयारी में कठिन विषय पहले पढ़ो। एक बार वे आ जाएँ तो शेष विषय आसानी से समझ में आ जाते हैं।

2. गृहस्थ के लिए

जीवन की बड़ी जिम्मेदारियाँ—जैसे परिवार का पालन-पोषण, नैतिकता का पालन—पहले निभाओ। छोटे सुख, आराम और मनोरंजन अपने-आप पूरे हो जाएंगे।

3. साधक के लिए

ध्यान, साधना, जप और तप—ये कठिन कार्य हैं। इन्हें पहले प्राथमिकता दो, फिर सांसारिक कार्य सहज हो जाएंगे।

श्रीकृष्ण का सार्वभौमिक संदेश

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को केवल युद्ध की शिक्षा नहीं दी, बल्कि यह भी बताया कि जीवन में हर कठिन कार्य ही आत्मा की प्रगति का माध्यम है।

जब हम कठिन कार्य पहले करते हैं, तो हम अपने भीतर छिपी दिव्यता को जाग्रत करते हैं।
जब हम सरल कार्यों में उलझे रहते हैं, तो आत्मा की क्षमता सुप्त रह जाती है।

इसलिए गीता हमें प्रेरणा देती है कि—
  • कठिन कार्य से मत डरो,

  • उसे टालो मत,

  • बल्कि सबसे पहले उसका सामना करो।

कठिप कार्य पहले करके भयमुक्त हो सकते हैं

“पहले आप अपने कठिन काम पूरे कीजिए, आसान काम खुद-ब-खुद पूरे हो जाएंगे”—यह केवल जीवन का व्यावहारिक सूत्र नहीं है, बल्कि गीता का गूढ़ आध्यात्मिक संदेश भी है।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही सिखाया कि जब सबसे बड़ा और कठिन कार्य—धर्मयुद्ध—संपन्न हो जाएगा, तो शेष सब कार्य सहज ही हो जाएंगे। यही सिद्धांत हर जीवन, हर साधक और हर कर्मयोगी पर लागू होता है।

कठिन कार्य पहले करके हम भयमुक्त होते हैं, आत्मविश्वास प्राप्त करते हैं और आध्यात्मिक प्रगति की ओर अग्रसर होते हैं। और जब आत्मा प्रगति करती है, तो जीवन का हर कार्य सहज और आनंदमय हो जाता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor