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Thursday, April 16, 2026, 7:25 am

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सवाईराम ने मां के जन्मदिवस और नववर्ष पर दिया अनूठा प्रेरक उदाहरण

गौसेवा का संकल्प और संस्कृति की रक्षा का दिया संदेश

पंकज जांगिड़. जोधपुर 

नववर्ष का स्वागत हर कोई अपने-अपने ढंग से करता है—कहीं रोशनी से, कहीं जश्न से, तो कहीं संकल्पों से। लेकिन जोधपुर के निवासियों के बीच इन दिनों चर्चा का विषय बने हैं गौसेवक व सेवाभावी सवाईराम चौधरी, जिन्होंने नववर्ष के आगमन पर एक ऐसा संदेश समाज के समक्ष रखा जिसकी जरूरत आज हर शहर व गांव को है। उन्होंने अपनी माताजी के जन्मदिवस के अवसर पर उनके चरण धोकर आशीर्वाद प्राप्त किया और इसके साथ ही समाज को प्रेरित करते हुए अपील की कि गौमाता को पॉलीथिन में खाद्य सामग्री न दी जाए। यह पहल केवल एक संदेश नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों से जुड़ी एक सतत सेवा-पद्धति का उदाहरण है।

सवाईराम बताते हैं कि अक्सर लोग सड़क पर घूमती गौमाताओं को दया अथवा पुण्य समझकर रोटी-सब्जी तो दे देते हैं, परंतु पॉलिथिन में लपेटकर। अनजाने में वे यह भूल जाते हैं कि गाय भोजन के साथ पॉलीथिन भी निगल लेती है, जो पेट में रहकर जानलेवा बन जाती है। पॉलीथिन जमीन में एक हजार साल तक नष्ट नहीं होती, ऐसे में वही पॉलीथिन जब गौमाता के पेट में जाती है तो सोचिए उसकी स्थिति कितनी भयावह हो सकती है। वह बेचारीे मूक प्राणी दर्द सहते हुए बीमारी की शिकार होती है। कई बार तो ऑपरेशन तक की नौबत आ जाती है, और कई गौमाताएं तो इस कारण काल के गाल में समा जाती हैं। इसी समस्या को समझते हुए सवाईराम चौधरी ने अपनी दुकान पर एक जूट की बोरी रखी है, जिसमें क्षेत्रवासी प्रेम से रोटी डालते हैं। सुबह से शाम तक जितनी भी रोटियां एकत्रित होती हैं, सवाईराम उन्हें स्वयं निकटस्थ गौशाला में पहुंचाकर गौमाताओं को समर्पित करते हैं। यह उनका दैनिक नियम बन चुका है। न कोई दिखावा, न कोई प्रचार—केवल सेवा की भावना।

वे कहते हैं—”माता-पिता की सेवा, गौसेवा और गौरक्षा हमारा परम कर्तव्य है। यदि हम यह नहीं कर पाए तो फिर जीवन का क्या अर्थ।” गांव कुपंलिया निवासी सवाईराम वर्तमान में रातानाडा कृष्ण मंदिर के पास रहते हैं और सवाई फ्लोर मिल्स का संचालन करते हैं। रोजी-रोटी की जिम्मेदारी के बीच सेवा का इतना समर्पण अपने आप में अनोखा है। धार्मिक प्रवृत्ति वाले सवाईराम भजन संध्याओं और धार्मिक कथाओं में भी उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। उनका पसंदीदा भजन “अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो…” पर सुदामा का पात्र निभाते हुए वे अनेक कार्यक्रमों में दर्शकों को भावविभोर कर चुके हैं। उनकी प्रस्तुति में प्रेम, भक्ति और मित्रता की सच्ची अनुभूति होती है।

सवाईराम कहते हैं—”गौमाता सनातन संस्कृति की आधार है। गौमाता बचेगी तो हम बचेंगे।” उनका यह कथन केवल भावनात्मक नहीं बल्कि सामाजिक यथार्थ से भरा संदेश है। भारत में गाय केवल पशु नहीं, माता का स्थान रखती है। घर-घर में रोटी का पहला टुकड़ा उसी के नाम का होता है। उसका दूध, गोबर, गोमूत्र केवल वैद्यकीय नहीं, बल्कि कृषि से लेकर ऊर्जा तक अनेक रूपों में उपयोगी है। भारतीय जीवन में गाय संस्कृति, संस्कार, और जीवनधारा की प्रतीक है। परंतु दुखद यह है कि आज वही गौमाता नालों के पास कूड़ा और पॉलीथिन खाती नजर आती है।
सवाईराम इस स्थिति को बदलने की दिशा में छोटे-छोटे कदमों से बड़ा परिवर्तन लाने की कोशिश कर रहे हैं। हर व्यक्ति यदिे बचे-खुचे भोजन को साफ प्लेट या डिब्बे में निकालकर दे, तो न केवल गौमाता स्वस्थ रहेगी बल्कि शहर का पर्यावरण भी प्लास्टिक मुक्त होगा। यह पहल केवल सामाजिक नहीं, पर्यावरणीय सुधार का मार्ग भी खोलती है।

सवाईराम मानते हैं कि सेवा दिखावे के लिए नहीं, आत्मा की शुद्धि के लिए होती है। वे कहते हैं—”यदि हर घर में प्रतिदिन एक रोटी गौमाता के लिए निकलने लगे, और वह भी बिना पॉलीथिन के, तो हमारी संस्कृति सुरक्षित रहेगी।” यही नहीं, वे युवाओं को भी जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। कई युवा अब उनके साथ मिलकर गौशाला में भोजन ले जाने, साफ-सफाई रखने तथा बीमार गायों के उपचार में योगदान देते हैं। उनके इस प्रयास ने एक सकारात्मक सामाजिक सोच पैदा की है।

सवाईराम की यह पहल सामाजिक जिम्मेदारी के साथ-साथ मातृभक्ति का सुंदर उदाहरण है। मां के जन्मदिन को उन्होंने आध्यात्मिक और सेवा के रंग में रंग दिया—चरण पूजन कर आशीर्वाद लिया और उसी दिन संकल्प किया कि गौमाता की सेवा निरंतर जारी रहेगी। नववर्ष पर की गई यह अपील एक शुभारंभ का प्रतीक है—जिम्मेदारी, संवेदना और संस्कारों से भरे भारत का। आज समय है कि हम तेज़ी से बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण पर विचार करें। लोग मंदिरों और सड़कों पर पैकेट में प्रसाद या भोजन दूर से लेकर आते हैं, परंतु यह सुविधा गौमाता के लिए घातक है। यदि जागरूकता, अनुशासन और सेवा की भावना के साथ समाज आगे आए तो हर शहर में प्राकृतिक जूट बैग व्यवस्था शुरू हो सकती है। दुकानों पर, मोहल्लों में और मकानों के बाहर ऐसे बैग रखे जाएं, जहां लोग भोजन डाल सकें और स्वयंसेवक इसे नियमित रूप से गौशालाओं तक पहुंचा सकें। सवाईराम चौधरी का उदाहरण बताता है कि बड़े परिवर्तन बड़े आयोजनों से नहीं, बल्कि छोटे कदमों से शुरू होते हैं। जब एक व्यक्ति आगे आता है, तो धीरे-धीरे समाज भी उसके साथ जुड़ता है। यही सेवा और संस्कार का विस्तार है।

आइए संकल्प लें- गौमाता को भोजन दें, पर पॉलीथिन में नहीं। गौसेवक सवाईराम की यह पहल केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य का जीवंत उदाहरण है। मां के जन्मदिन पर लिया संकल्प और नववर्ष पर दिया संदेश स्पष्ट है—गौमाता हमारी धरोहर है, हमारी संस्कृति है, हमारी जिम्मेदारी है। यदि हम उसे स्वस्थ रखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी इस संस्कृति को गर्व से कह सकेंगी—”हम वही हैं जिन्होंने गौमाता की सेवा को धर्म नहीं, बल्कि कर्तव्य समझा।”

सवाईराम जैसे लोग समाज के लिए प्रेरणा हैं। इस नववर्ष पर उनका संदेश हर घर-आंगन तक पहुंचे—”आइए, हम भी संकल्प लें—गौमाता को भोजन दें, पर पॉलीथिन में नहीं। सेवा करें, संरक्षण करें, संस्कृति बचाएं।”

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor