74 वर्ष की आयु में भी सक्रिय प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. पीयूष पंड्या से विशेष बातचीत
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में जब अधिकांश लोग छोटी-छोटी बीमारियों से परेशान हैं और दवाइयों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, वहीं कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी हैं जो प्राकृतिक जीवनशैली के माध्यम से स्वस्थ और सक्रिय जीवन का प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। ऐसे ही व्यक्तित्व हैं डॉ. पीयूष पंड्या जो जोधपुर स्थित स्वास्थ्य साधना केंद्र में मुख्य चिकित्सक के रूप में 12 वर्षों तक सेवाएं दे चुके हैं और जिन्होंने हजारों लोगों को प्राकृतिक चिकित्सा और योग के माध्यम से स्वास्थ्य लाभ पहुंचाया है।
मूलतः वडोदरा (गुजरात) के निवासी डॉ. पंड्या पिछले 45 वर्षों से प्राकृतिक चिकित्सक और योग विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर रहे हैं। आज 74 वर्ष की आयु में भी वे पूर्णतः स्वस्थ, ऊर्जावान और सक्रिय हैं। उनका स्पष्ट कहना है—“जब तक जीवन है, लोगों की स्वास्थ्य सेवा जारी रखूंगा।”
डॉ. पंड्या का मानना है कि प्रकृति के नियमों को समझकर और उनके अनुरूप जीवन जीकर ही मनुष्य सच्चे अर्थों में स्वस्थ रह सकता है। प्रस्तुत है उनसे हुई विस्तृत बातचीत—
प्रश्न: आपकी लंबी सेवा यात्रा का मूल उद्देश्य क्या रहा?
डॉ. पीयूष पंड्या: मेरे जीवन का उद्देश्य हमेशा यही रहा कि लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनें और यह समझें कि स्वास्थ्य दवाइयों से नहीं बल्कि सही जीवनशैली से प्राप्त होता है। पिछले 45 वर्षों में मैंने देखा है कि अधिकांश रोग जीवनशैली से उत्पन्न होते हैं और प्राकृतिक जीवनशैली अपनाकर उन्हें आसानी से रोका जा सकता है।
मैं हमेशा लोगों से कहता हूं कि शरीर को ठीक करने की शक्ति प्रकृति ने स्वयं शरीर को ही दी है, हमें केवल उसकी सहायता करनी है, उसके कार्यों में बाधा नहीं डालनी है।
प्रश्न: आप प्रकृति के नियमों को स्वास्थ्य से कैसे जोड़कर देखते हैं?
डॉ. पीयूष पंड्या: कुदरत का खेल बहुत अनोखा है। प्रकृति के सभी कार्य स्वतः संचालित होते हैं और इनमें किसी प्रकार का कृत्रिम हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होता। जैसे—एक बीज जब धरती में बोया जाता है तो वह प्रकृति के नियमों के अनुसार धीरे-धीरे अंकुरित होता है, पौधा बनता है और समय आने पर फल देता है।
अगर हम यह अपेक्षा करें कि बीज बोते ही अगले दिन फल मिल जाए तो यह संभव नहीं है। क्योंकि वृक्ष प्रकृति के पांच तत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—को स्वीकार करके ही विकसित होता है। उसी प्रकार मानव शरीर भी इन्हीं तत्वों से बना है और जब तक वह इनके नियमों के अनुसार चलता है, तब तक स्वस्थ रहता है।
प्रश्न: आधुनिक जीवनशैली में मनुष्य की सबसे बड़ी भूल क्या है?
डॉ. पीयूष पंड्या: आज मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अधिक बुद्धिमान समझने लगा है। हम चाहते हैं कि संसार और सृष्टि हमारे विचारों के अनुसार चलें, लेकिन ऐसा संभव नहीं है। जब हम प्रकृति के नियमों को नजरअंदाज करते हैं, तब दुःख और रोग उत्पन्न होते हैं।
परिवर्तन संसार का नियम है, लेकिन पांच तत्वों की मूल शक्ति और उनका अस्तित्व स्थायी है। हमें इन्हें समझना और स्वीकार करना ही होगा। स्वास्थ्य का पहला सिद्धांत यही है कि हम प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करें।
प्रश्न: आप शरीर को “स्वयं संचालित प्रणाली” क्यों कहते हैं?
डॉ. पीयूष पंड्या: मानव शरीर प्रकृति की सबसे अद्भुत रचना है। यह स्वयं अपना निर्माण करता है, स्वयं अपना विकास करता है और अंततः स्वयं प्रकृति में विलीन हो जाता है।
हमारे शरीर के किसी भी अंग का प्रत्यक्ष नियंत्रण हमारे हाथ में नहीं है—हम दिल की धड़कन को नियंत्रित नहीं कर सकते, फेफड़ों की कार्यप्रणाली को नहीं चला सकते, न ही पाचन क्रिया को अपने आदेश से चला सकते हैं। फिर भी हम जीवनशैली के माध्यम से शरीर को अपने हिसाब से चलाने का प्रयास करते हैं—अनियमित भोजन, देर रात जागना, तनाव, प्रदूषण—और परिणामस्वरूप रोग उत्पन्न होते हैं।
शरीर के छह स्वचालित कार्य: स्वास्थ्य का आधार
डॉ. पंड्या बताते हैं कि शरीर के छह प्रमुख स्वचालित कार्य हैं, जिनका संतुलन ही स्वास्थ्य को निर्धारित करता है।
1. श्राव (Secretion)
नलिका-विहीन ग्रंथियां हार्मोन बनाकर सीधे रक्त में छोड़ती हैं, जो शरीर के विभिन्न कार्यों को संतुलित रखते हैं। हार्मोन का असंतुलन अनेक रोगों का कारण बनता है, इसलिए जीवनशैली संतुलित होना आवश्यक है।
2. विसर्जन (Excretion)
शरीर में हर क्षण विकार बनते रहते हैं, जो पसीना, मल, मूत्र और श्वास के माध्यम से बाहर निकलते हैं। इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं को रोकना या दबाना गंभीर रोगों को जन्म देता है। उदाहरण के लिए, लंबे समय तक पसीना न निकलना या कब्ज की समस्या शरीर में विषैले तत्वों को बढ़ा देती है।
3. पाचन (Digestion)
हम जो भी भोजन करते हैं, उसका पाचन शरीर स्वयं करता है। अत्यधिक भोजन, अनियमित भोजन या असंतुलित आहार पाचन क्रिया में बाधा उत्पन्न करता है और रोगों की शुरुआत यहीं से होती है।
4. चयापचय (Metabolism)
शरीर अरबों कोशिकाओं से बना है। प्रत्येक कोशिका शुद्ध रक्त लेकर पोषण प्राप्त करती है और विकारों को बाहर निकालती है। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है और इसका संतुलन ही शरीर की ऊर्जा और शक्ति को निर्धारित करता है।
5. रक्त परिसंचरण (Blood Circulation)
फेफड़े रक्त को शुद्ध करते हैं और हृदय इस रक्त को पूरे शरीर में पहुंचाता है। रक्त परिसंचरण की सही गति स्वास्थ्य का आधार है। निष्क्रिय जीवनशैली से यह प्रक्रिया प्रभावित होती है।
6. चेतना तंत्र (Innervation)
तंत्रिका तंत्र शरीर के सभी कार्यों को नियंत्रित करता है। मानसिक तनाव, चिंता और नकारात्मक भावनाएं इस प्रणाली को कमजोर करती हैं, जिससे अनेक शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं।
प्रश्न: रोग उत्पन्न होने की प्रक्रिया को आप कैसे समझाते हैं?
डॉ. पीयूष पंड्या: जब इन स्वचालित प्रक्रियाओं में हम किसी प्रकार की बाधा डालते हैं, तो शरीर की कार्यप्रणाली कमजोर हो जाती है और यही स्थिति “रोग” कहलाती है। रोग अचानक नहीं होता; उसकी भी एक प्रक्रिया होती है।
पहले शरीर में इरीटेशन (जलन या असंतुलन) पैदा होता है, फिर सूजन आती है, उसके बाद अल्सर बनता है और लंबे समय तक उपेक्षा करने पर वही स्थिति गांठ या गंभीर रोग का रूप ले सकती है। इसलिए प्रारंभिक संकेतों को समझना और जीवनशैली सुधारना अत्यंत आवश्यक है।
प्रश्न: प्राकृतिक चिकित्सा को आप आज के समय में कितना प्रासंगिक मानते हैं?
डॉ. पीयूष पंड्या: आज प्राकृतिक चिकित्सा पहले से अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक जीवनशैली ने मनुष्य को प्रकृति से दूर कर दिया है। प्राकृतिक चिकित्सा हमें फिर से प्रकृति के करीब लाती है—संतुलित आहार, योग, प्राणायाम, सूर्य स्नान, जल चिकित्सा और मानसिक शांति—ये सभी मिलकर शरीर की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं।
मैं हमेशा कहता हूं कि प्राकृतिक चिकित्सा का उद्देश्य रोग को दबाना नहीं, बल्कि शरीर की उपचार शक्ति को जगाना है।
प्रश्न: 74 वर्ष की आयु में भी आपका स्वास्थ्य और ऊर्जा लोगों को प्रेरित करती है। इसका रहस्य क्या है?
डॉ. पीयूष पंड्या: इसका कोई विशेष रहस्य नहीं है। मैं केवल तीन बातों का पालन करता हूं—
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संतुलित और प्राकृतिक भोजन
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नियमित योग और प्राणायाम
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सकारात्मक मानसिकता और तनाव से दूरी
जब हम शरीर को उसकी आवश्यकता के अनुसार भोजन, व्यायाम और विश्राम देते हैं, तो वह स्वाभाविक रूप से स्वस्थ रहता है।
प्रश्न: युवाओं और आम लोगों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
डॉ. पीयूष पंड्या: सबसे पहले यह समझें कि स्वास्थ्य खरीदा नहीं जा सकता, इसे कमाया जाता है। आज की युवा पीढ़ी सुविधा-प्रधान जीवनशैली में फंसती जा रही है—जंक फूड, देर रात तक जागना, मोबाइल-कंप्यूटर का अत्यधिक उपयोग—ये सब धीरे-धीरे शरीर की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को कमजोर कर देते हैं।
अगर युवा समय रहते अपनी जीवनशैली सुधार लें, तो भविष्य में अधिकांश रोगों से बचा जा सकता है। मैं सभी से यही कहना चाहता हूं कि प्रकृति के नियमों के साथ चलिए, शरीर स्वयं स्वस्थ रहेगा।
स्वास्थ्य सेवा का संकल्प
डॉ. पंड्या का कहना है कि उनका जीवन सेवा के लिए समर्पित है और जब तक शरीर साथ देगा, वे लोगों को प्राकृतिक चिकित्सा और योग के माध्यम से स्वस्थ जीवन का मार्ग दिखाते रहेंगे।
उनका विश्वास है कि आने वाला समय प्राकृतिक चिकित्सा का होगा, क्योंकि लोग अब धीरे-धीरे यह समझने लगे हैं कि स्थायी स्वास्थ्य केवल दवाइयों से नहीं बल्कि प्रकृति-अनुकूल जीवनशैली से प्राप्त होता है।
सौ बातों की एक बात : प्रकृति के साथ सामंजस्य ही सच्चा स्वास्थ्य
डॉ. पीयूष पंड्या का जीवन और अनुभव हमें यह सिखाता है कि स्वास्थ्य का वास्तविक आधार प्रकृति के नियमों को स्वीकार करना है। शरीर स्वयं संचालित एक अद्भुत प्रणाली है, जिसे केवल सही आहार, सही विचार और सही जीवनशैली की आवश्यकता होती है।यदि हम शरीर के स्वचालित कार्यों में बाधा न डालें और पांच तत्वों के संतुलन को बनाए रखें, तो लंबा, स्वस्थ और संतुलित जीवन जीना कठिन नहीं है।
डॉ. पंड्या की 45 वर्षों की सेवा और 74 वर्ष की सक्रिय आयु इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही स्वस्थ जीवन का सबसे बड़ा मंत्र है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









