जहां एक ओर पर्यटक इतिहास, स्थापत्य और संस्कृति का दीदार करने आते हैं, वहीं दूसरी ओर किले के मुख्य मार्ग पर गाय-बैल के झुंड उनका “स्वागत” करते नजर आते हैं।
-संकीर्ण रास्तों में अचानक पशु के सामने आ जाने से भगदड़ जैसी स्थिति बन सकती है। यदि किसी दिन कोई बड़ा हादसा हो जाए तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
कैलाश बिस्सा, जैसलमेर
स्वर्णनगरी जैसलमेर में जब सुबह की पहली किरण पीत पाषाण से निर्मित इमारतों पर पड़ती है, तो पूरा शहर मानो सोने सा दमक उठता है। लेकिन इसी सुनहरी आभा के बीच एक कड़वी सच्चाई भी सामने आती है—विश्व प्रसिद्ध सोनार किला के प्रवेश द्वार पर आवारा और खुले घूम रहे दुधारू पशुओं का जमघट। जहां एक ओर पर्यटक इतिहास, स्थापत्य और संस्कृति का दीदार करने आते हैं, वहीं दूसरी ओर किले के मुख्य मार्ग पर गाय-बैल के झुंड उनका “स्वागत” करते नजर आते हैं।
किले के प्रवेश द्वार पर खतरे की दस्तक
सुबह-सुबह किले के प्रवेश मार्ग पर 10–15 गाय-बैल का एक साथ खड़ा होना अब सामान्य दृश्य बन चुका है। ये पशु आपस में भिड़ते रहते हैं, जिससे वहां खड़े सैलानियों और स्थानीय लोगों में भय का माहौल बना रहता है। कई बार ये अचानक दौड़ पड़ते हैं या सींग मारने की स्थिति में आ जाते हैं, जिससे किसी भी समय गंभीर दुर्घटना हो सकती है।
स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि कई पर्यटक इन पशुओं से बचते-बचाते गिर चुके हैं। विदेशी सैलानियों के लिए यह दृश्य आश्चर्य और असुविधा दोनों का कारण बनता है।
किले के भीतर भी हालात चिंताजनक
समस्या केवल किले के प्रवेश द्वार तक सीमित नहीं है। किले के भीतर की संकरी गलियों में भी आवारा पशु घूमते दिखाई देते हैं। चूंकि किला एक जीवंत धरोहर है, जहां सैकड़ों परिवार निवास करते हैं और हजारों पर्यटक प्रतिदिन भ्रमण के लिए आते हैं, ऐसे में इन पशुओं की उपस्थिति गंभीर खतरा बन सकती है।
संकीर्ण रास्तों में अचानक पशु के सामने आ जाने से भगदड़ जैसी स्थिति बन सकती है। यदि किसी दिन कोई बड़ा हादसा हो जाए तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
शहर की सड़कों पर बढ़ता संकट
जैसलमेर में पर्यटन सीजन के दौरान सड़कों पर वाहनों और पैदल यात्रियों की भारी भीड़ रहती है। ऐसे में खुले घूम रहे दुधारू और आवारा पशु यातायात व्यवस्था को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर देते हैं। कई बार मुख्य मार्गों पर पशु बीच सड़क में बैठ जाते हैं, जिससे जाम की स्थिति बन जाती है।
दुपहिया वाहन चालक इन पशुओं से बचने के प्रयास में फिसल जाते हैं। पूर्व में भी कई लोग चोटिल हो चुके हैं, परंतु प्रशासनिक स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
जिम्मेदारी किसकी?
शहरवासियों की भी इस समस्या में बड़ी भूमिका है। कई लोग अपने गाय-बैल को घरों के बाड़ों में रखने के बजाय खुले में छोड़ देते हैं। दिन भर पशु सड़कों और पर्यटन स्थलों पर घूमते रहते हैं और शाम को वापस घर लौट आते हैं। इस लापरवाही का खामियाजा पूरा शहर भुगत रहा है।
नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल
नगर परिषद जैसलमेर की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। शहर में आवारा पशुओं की समस्या कोई नई नहीं है, फिर भी न तो नियमित पकड़धकड़ अभियान चलाया जा रहा है और न ही गौशाला प्रबंधन को मजबूत किया जा रहा है।
कई बार अभियान चलाने की घोषणाएं की गईं, लेकिन वे केवल कागजों तक सीमित रह गईं। यदि नगर परिषद समय-समय पर सख्ती दिखाए, पशु मालिकों पर जुर्माना लगाए और स्थायी समाधान की दिशा में कदम बढ़ाए, तो स्थिति सुधर सकती है।
जिला प्रशासन की चुप्पी
जिला प्रशासन, जिसकी कमान जिला कलेक्टर कार्यालय जैसलमेर के हाथ में है, इस गंभीर मुद्दे पर मौन साधे हुए प्रतीत होता है। जब शहर की पहचान और सुरक्षा दांव पर हो, तब प्रशासन की निष्क्रियता चिंता का विषय बन जाती है।
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे की प्रतीक्षा कर रहा है? क्या पर्यटन नगरी की साख से अधिक महत्वपूर्ण अन्य मुद्दे हैं?
पर्यटन पर पड़ता असर
जैसलमेर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यहां हर वर्ष लाखों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। यदि उन्हें असुरक्षा और अव्यवस्था का अनुभव होगा, तो इसका सीधा असर पर्यटन उद्योग पर पड़ेगा।
पर्यटक सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा करते हैं। यदि वहां आवारा पशुओं के कारण अव्यवस्था और दुर्घटना की आशंका दिखेगी, तो शहर की छवि को नुकसान पहुंचेगा।
पूर्व की घटनाएं, फिर भी सबक नहीं
पिछले वर्षों में कई बार आवारा पशुओं की वजह से लोग घायल हुए हैं। कुछ मामलों में गंभीर चोटें भी आईं। इसके बावजूद प्रशासन और नगर परिषद ने स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस और दीर्घकालिक योजना लागू नहीं की।
समाधान क्या हो?
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नियमित पकड़धकड़ अभियान चलाया जाए।
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पशु मालिकों पर सख्त जुर्माना लगाया जाए।
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शहर से बाहर सुव्यवस्थित गौशाला का विस्तार किया जाए।
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किले और मुख्य पर्यटन स्थलों के आसपास पशु मुक्त क्षेत्र घोषित किया जाए।
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सीसीटीवी और निगरानी तंत्र मजबूत किया जाए।
आवारा पशुओं का जमघट, पर्यटक बुरा अनुभव लेकर लौटेंगे तो पर्यटन को नुकसान
स्वर्णनगरी की पहचान उसकी स्वच्छता, सुरक्षा और ऐतिहासिक धरोहर से है। यदि किले के प्रवेश द्वार पर आवारा पशुओं का जमघट ही पर्यटकों का पहला अनुभव बने, तो यह गौरव की नहीं, चिंता की बात है।
अब समय आ गया है कि नगर परिषद और जिला प्रशासन जिम्मेदारी निभाएं। केवल बैठकों और घोषणाओं से समस्या हल नहीं होगी। ठोस कार्रवाई, सख्त नियम और जनभागीदारी से ही जैसलमेर को इस संकट से मुक्त किया जा सकता है। अन्यथा, विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी की सुनहरी छवि पर आवारा पशुओं की छाया और गहरी होती जाएगी।








