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Thursday, April 16, 2026, 8:53 am

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जल संकट का स्थायी समाधान: रिवर वाटर रिचार्ज वेल्स से बदलेगा भारत का भूजल भविष्य

मानसून के अतिरिक्त जल को भूमिगत संग्रहित कर सालभर पानी उपलब्ध कराने की वैज्ञानिक पहल

अनिल के. जैन. लेखक :  रिवर वाटर रिचार्ज वेल्स 

दुनिया भर में जल संकट अब भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान की कठोर सच्चाई बन चुका है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, अनियमित मानसून, और जलवायु परिवर्तन के तीव्र प्रभावों ने मीठे पानी के संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव डाल दिया है। भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, जिससे कृषि, उद्योग और पेयजल आपूर्ति सभी प्रभावित हो रहे हैं। जो समस्या कभी केवल गर्मियों तक सीमित मानी जाती थी, वह अब पूरे वर्ष की चुनौती बन चुकी है।

ऐसे समय में एक व्यावहारिक, वैज्ञानिक और बड़े पैमाने पर लागू की जा सकने वाली तकनीक आशा की किरण बनकर सामने आई है—नदियों के अतिरिक्त जल को रिचार्ज कुओं के माध्यम से भूमिगत संग्रहित करना।

क्या है रिवर वाटर रिचार्ज वेल्स की अवधारणा?

रिवर वाटर रिचार्ज वेल्स, विशेषज्ञों द्वारा “मैनेज्ड एक्वीफर रिचार्ज” (MAR) कहलाने वाली वैज्ञानिक प्रणाली का हिस्सा हैं। इस पद्धति में नदियों के अतिरिक्त जल—विशेषकर बाढ़ के समय समुद्र में बह जाने वाले पानी—को संरक्षित कर भूमिगत जलभंडारों (एक्वीफर्स) में संग्रहित किया जाता है, ताकि भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके।

यह अवधारणा वर्षा जल संचयन (रेनवॉटर हार्वेस्टिंग) से मिलती-जुलती है, जिसमें बारिश के पानी को जमीन में उतारकर भूजल स्तर बढ़ाया जाता है। अंतर यह है कि वर्षा जल सीमित दिनों तक उपलब्ध रहता है, जबकि नदियों में मानसून के महीनों में और कई बार उससे आगे भी पर्याप्त प्रवाह बना रहता है। इस कारण नदी जल रिचार्ज अधिक विश्वसनीय और टिकाऊ विकल्प माना जाता है।

कैसे काम करती है यह प्रणाली?

इस प्रणाली में नदी के जल को पहले वैज्ञानिक तरीके से फिल्टर किया जाता है। इसके बाद विशेष रूप से डिजाइन किए गए रिचार्ज कुओं के माध्यम से उसे भूमिगत एक्वीफर्स में प्रवाहित किया जाता है।

भूमिगत जलभंडार आपस में जुड़े होते हैं और प्राकृतिक जल मार्गों के जरिए पानी धीरे-धीरे विस्तृत क्षेत्रों में फैलता है। इस तरह संग्रहित जल का उपयोग किसान, घर-परिवार और उद्योग आवश्यकता पड़ने पर कर सकते हैं।

जब भूजल निकाला जाता है और उसकी जगह नया जल पुनर्भरित होता रहता है, तो जल स्तर स्थिर और संतुलित बना रहता है। यह प्रणाली जल दोहन और पुनर्भरण के बीच संतुलन स्थापित करती है।

रिवर-टू-वेल रिचार्ज के प्रमुख लाभ

1. प्राकृतिक और विशाल भंडारण क्षमता

भूमिगत एक्वीफर्स प्राकृतिक जलाशयों की तरह काम करते हैं। सतही जलाशयों की तुलना में इनमें वाष्पीकरण से जल हानि बहुत कम होती है।

2. भूजल स्तर की बहाली

अत्यधिक दोहन से प्रभावित क्षेत्रों में रिचार्ज वेल्स भूजल स्तर को पुनर्स्थापित करने में सहायक होते हैं।

3. जल गुणवत्ता में सुधार

प्राकृतिक मिट्टी की परतों से गुजरते समय जल का प्राकृतिक शोधन होता है, जिससे उसकी गुणवत्ता बेहतर होती है। निरंतर ताजे नदी जल के प्रवाह से लवणीयता (सैलिनिटी) भी धीरे-धीरे कम हो सकती है।

4. आर्थिक दृष्टि से लाभकारी

दीर्घकालिक दृष्टि से यह प्रणाली बड़े बांधों के निर्माण और रखरखाव की तुलना में अधिक किफायती साबित हो सकती है। साथ ही बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय क्षति से भी बचा जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव: दुनिया में सफल मॉडल

दुनिया के कई देशों ने नदी आधारित रिचार्ज प्रणालियों को सफलतापूर्वक अपनाया है, जो इस तकनीक की व्यवहार्यता और अनुकूलन क्षमता को प्रमाणित करते हैं।

ऑस्ट्रेलिया

Australia में पर्थ ग्राउंडवॉटर रिप्लेनिशमेंट स्कीम और मरे–डार्लिंग बेसिन में MAR परियोजनाएं सूखा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका

United States में कैलिफोर्निया, टेक्सास और इडाहो जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर बाढ़ जल को भूमिगत संग्रहित करने की योजनाएं संचालित हैं।

इज़राइल

Israel ने 1960 के दशक में ही कृत्रिम रिचार्ज को राष्ट्रीय जल प्रणाली में शामिल कर लिया था। शुष्क जलवायु के बावजूद इज़राइल ने इस तकनीक से जल सुरक्षा सुनिश्चित की।

दक्षिण अफ्रीका

South Africa के अटलांटिस मॉडल में शहरी जल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा मैनेज्ड रिचार्ज से प्राप्त होता है।

इराक, चीन और सऊदी अरब जैसे देशों में भी उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि यह तकनीक विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में सफलतापूर्वक लागू की जा सकती है।

भारत में संभावनाएं और चुनौतियां

भारत में उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में पायलट परियोजनाएं शुरू की गई हैं। हालांकि कुछ परियोजनाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।

इनमें गलत स्थान चयन, अपर्याप्त फिल्ट्रेशन सिस्टम, गाद जमने से कुओं का बंद होना, और समय के साथ जल समावेशन दर में कमी जैसी समस्याएं शामिल हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि ये चुनौतियां अवधारणा की विफलता नहीं, बल्कि योजना और रखरखाव की कमियों के कारण उत्पन्न हुईं।

क्या होना चाहिए आगे?

  1. विस्तृत हाइड्रोजियोलॉजिकल सर्वे

  2. वैज्ञानिक डिजाइन और इंजीनियरिंग

  3. नियमित निगरानी और गाद निकासी तंत्र

  4. सामुदायिक भागीदारी

  5. पारदर्शी प्रशासनिक ढांचा

भारत को हर वर्ष मानसून के दौरान विशाल मात्रा में जल प्राप्त होता है, जिसका बड़ा हिस्सा समुद्र में चला जाता है। यदि इस अतिरिक्त जल का एक अंश भी भूमिगत संग्रहित कर लिया जाए, तो देश की भूजल स्थिति में क्रांतिकारी सुधार संभव है।

केवल संरचना नहीं, लचीलापन का साधन

रिवर वाटर रिचार्ज वेल्स केवल इंजीनियरिंग संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि जल सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के सशक्त उपकरण हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुभव दर्शाता है कि जब वैज्ञानिक योजना, प्रभावी शासन और सतत रखरखाव साथ मिलते हैं, तो भूजल प्रणालियों को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

“रिवर वाटर रिचार्ज वेल्स” पुस्तक का शोध

मैंने अपनी शोध पुस्तक River Water Recharge Wells में इस विषय पर विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है। पुस्तक में तकनीकी पहलुओं, वैश्विक उदाहरणों और भारत में लागू किए जा सकने वाले मॉडल पर गहन विश्लेषण किया गया है।

निष्कर्ष: 365 दिन, 24 घंटे जल उपलब्धता की दिशा में कदम

यदि दृढ़ इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ इस प्रणाली को लागू किया जाए, तो भारत वर्षभर विश्वसनीय जल उपलब्धता सुनिश्चित कर सकता है।

जल संकट का समाधान केवल नए स्रोत खोजने में नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों के बुद्धिमत्तापूर्ण प्रबंधन में है। नदी के अतिरिक्त जल को भूमिगत संग्रहित करना एक ऐसा कदम है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा की ठोस नींव रख सकता है।

यह समय है जब नीति-निर्माता, वैज्ञानिक और समाज मिलकर इस दिशा में संगठित प्रयास करें—ताकि “हर घर जल” केवल नारा न रहे, बल्कि 365 दिन और 24 घंटे उपलब्ध वास्तविकता बन सके।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor