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Thursday, April 16, 2026, 1:19 am

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हरियाली के अर्थशास्त्री: संजय भंडारी की ‘ग्रीन गैलरी’ में प्रकृति, इनोवेशन और अध्यात्म की अनोखी संगति

—प्रकृति, इनोवेशन, अध्यात्म और दर्शन का समवेत स्वर

जोधपुर की पुलिस लाइन के बाहर पड़ी डंपिंग ज़मीन पर उगा ‘जीवित संग्रहालय’—कबाड़ से नवाचार, 250+ प्रजातियाँ, 20,000 वर्ग फीट में फैला हरा-भरा जंगल, और एक व्यक्ति का संकल्प जो शहर की सांसें बदल रहा है

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

कभी-कभी जीवन के कठिन गणित में एक ऐसी रेखा खिंच जाती है जो संख्याओं से आगे निकल कर संवेदना बन जाती है। सीए संजय भंडारी—आर्थिक विशेषज्ञ, आंकड़ों के ज्ञाता—ने जोधपुर की धरती पर वही रेखा खींच दी। उनके लिए प्रकृति केवल पर्यावरणीय विमर्श नहीं, बल्कि जीवन का धर्म, व्यवहार का दर्शन और कर्म का योग है। वे कहते हैं, “जीवन जब जीवन से मिलता है, फल भी जीवन ही होता है,” और इसी विश्वास पर उन्होंने पुलिस लाइन परिसर के बाहर डंपिंग-ज़ोन में पड़ी निष्प्राण ज़मीन को ‘ग्रीन गैलरी’ नाम की जीवंत पाठशाला में बदल दिया।

यह कथा एक उद्यम की भी है और एक उपासना की भी—जहां बूंद-बूंद सिंचाई से विचारों की फसल पनपी, जहां गिरते पत्ते खाद बने और खाद ने पेड़ों को जीवन दिया। जहां फूल, फल, औषधियां और घने पेड़ों की छाँव तो है ही, साथ में कबाड़ से रची गई सृजनात्मक दुनिया भी है—कार्डबोर्ड से बने ताजमहल और इंडिया गेट, बोतलों से बनी कलात्मक संरचनाएँ, पुराने टायरों से सजावट, और रोजमर्रा की अनुपयोगी चीज़ों से बनती नई-नई आकृतियाँ। भंडारी जी का यह कार्य एक साथ इनोवेशन का प्रयोगशाला है, अध्यात्म का साधना-स्थल है, और बच्चों के लिए खेल-सीख का खुला पुस्तकालय है।

यहां प्रस्तुत है राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित से संजय भंडारी की विस्तृत बातचीत के संपादित प्रमुख अंश—एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने दिखा दिया कि एक अकेली ज्योति भी पूरे वन को रोशन कर सकती है।

प्रश्न : संजय जी, आप एक चार्टर्ड एकाउंटेंट और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं। प्रकृति की इस अनोखी यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?

संजय भंडारी: सच कहूं तो यह शुरुआत एक ‘झटके’ से हुई—डंपिंग-ज़ोन की दुर्दशा देखकर। पुलिस लाइन परिसर के बाहर पड़ी खाली ज़मीन पर जब बिखरा कचरा देखा, लगा कि यह शहर की सांसें रोक रहा है। 2017 में एक दिन मन में विचार आया—क्यों न इसे प्रकृति के अनुरूप विकसित किया जाए? उसी दिन सफाई का काम शुरू करवा दिया। कचरा हटाया, ज़मीन समतल की, और फिर बूंद-बूंद सिंचाई यानी ड्रिप इरिगेशन अपनाकर पौधे लगाने शुरू किए। धीरे-धीरे पौधे पनपे, और पेड़ बनते गए। जो लोग कहते थे कि जोधपुर की भूमि में कुछ प्रजातियाँ पनपना असंभव है, मैंने सोचा—क्यों न असंभव को चुनौती दी जाए?

प्रश्न: ‘असंभव’ को आपने कैसे संभव बनाया?

संजय भंडारी: प्रकृति के नियमों को समझकर और उनका सम्मान करके। हर पौधे की अपनी आवश्यकता है—पानी, मिट्टी, धूप, पोषण—इनके संतुलन को ठीक करना पड़ता है। हमने मल्चिंग की, पत्तों से कम्पोस्ट बनाया, और पानी का विवेकपूर्ण उपयोग किया। 11 पानी के कनेक्शन लेने पड़े, ताकि किसी ब्लॉक में पानी की कमी न रहे। टीम छोटी थी—मैं, दो स्वयंसेवक, और दो पेड कर्मचारी—पर जुनून बड़ा था। नौ वर्षों में 3500 से अधिक पेड़-पौधे लगा दिए, और आज 250 से अधिक प्रजातियाँ यहां स्वस्थ पनप रही हैं।

प्रश्न: कौन-कौन सी प्रजातियों ने आपको सबसे अधिक चकित किया?

संजय भंडारी: कई। जैसे—एपल, सिंदूर, इलायची, नारियल, सीताफल, अर्जुन, नीम-गिलोय, चाइनीज संतरा, हरसिंगार, चेरी, तेजपत्ता, सफेद और लाल चंदन, अंजीर, केला, आम, ब्लैकबेरी, फलसा, बादाम, खजूर, कल्पवृक्ष, बांस, कटहल, नींबू, खेजड़ी, गूंदा, अनार, चीकू, शीशम, बेलपत्र, हड़जोड़, अश्वगंधा, मरुआ, हिबिस्कस, पपीता, आंवला, शहजल की फली, केरूंदा, रबर प्लांट, जामुन, अमरूद, रात की रानी, दिन का राजा—और भी बहुत कुछ। जोधपुर की जलवायु में इनका पनपना अपने आप में एक सजीव प्रमाण है कि सही देखभाल से प्रकृति असंभव को भी संभव बना देती है।

प्रश्न: ग्रीन गैलरी की रचना-योजना कैसी है? लोग इसे कैसे अनुभव करें?

संजय भंडारी: ग्रीन गैलरी चार ब्लॉक्स में फैली है—कुल मिलाकर लगभग 20,000 वर्ग फीट। ब्लॉक-2 से ब्लॉक-4 तक हमनें लगभग ‘जंगल’ खड़ा कर दिया है—घना, बहु-स्तरीय, जैव-विविधता से भरपूर। ब्लॉक-1 बच्चों के लिए समर्पित है—यहां झूले हैं, दौड़ने-खेलने की खुली जगह है, और उनके लिए एक तरह की ‘नेचर क्लास’ भी। जो लोग यहां सुबह-शाम वॉक करने आते हैं, वे अक्सर कहते हैं—जोधपुर में ऐसा जंगल देखकर मन हैरान रह जाता है। और यह सुनना हमें आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है।

प्रश्न: आपने कबाड़ से भी एक अद्भुत दुनिया बना दी है। इस ‘जुड़ाव’ का विचार कहां से आया?

संजय भंडारी: कचरा हमारे समय का सबसे बड़ा सवाल है—इसे बोझ समझेंगे तो बोझ रहेगा, उसे साधन बना दें तो सृजन होगा। ब्लॉक-1 में हमने ‘कबाड़ से जुगाड़’ की स्थायी प्रदर्शनी बनाई है—1000 से अधिक आइटम। बेकार गत्तों से इंडिया गेट, राम मंदिर, लाल किला, ताजमहल, एफिल टॉवर जैसी संरचनाएँ; कांच की बोतलें, टायर, मटकियां, पुराने पेन- ब्रश, और यहां तक कि बेकार तौलियों पर सीमेंट-पानी चढ़ाकर बनीं ‘आर्ट-पीसेज़’। पुराना टीवी भी रखा है—हमारा स्मृतिचिह्न। कबाड़ से एक रोबोट भी बनाया गया है। मेरे लिए यह केवल कला नहीं, बल्कि शहरी कचरे के साथ ‘क्रिएटिव डायलॉग’ है—कि फेंकी हुई चीज़ें भी मूल्यवान बन सकती हैं।

प्रश्न: इस कार्य को सामाजिक सहयोग कैसे मिला?

संजय भंडारी: शुरुआत में लोग संदेह से देखते थे—“यहां जंगल? जोधपुर में?” फिर जैसे-जैसे हरियाली दिखने लगी, लोग जुड़ते गए। मेरे साथी नेमीचंद जैसे लोग प्रेरणा के वाहक बने। वे पौधों को पानी-खाद देते हैं, राहगीरों के लिए वाटर कूलर भरते हैं, और गर्मियों में 15-20 मटकियाँ भरकर रखते हैं ताकि किसी राहगीर को प्यासा न रहना पड़े। यह सेवा ग्रीन गैलरी का ‘समुदाय-धर्म’ है—प्रकृति से मिला जल, समाज को समर्पित।

प्रश्न: आपने पौधों को पास-पास लगाने की रणनीति अपनाई। इसका विज्ञान और अनुभव क्या कहता है?

संजय भंडारी: रेगिस्तानी जलवायु में हवा और धूप दोनों प्रबल हैं। जब पौधे पास-पास होते हैं, तो वे आपसी ‘माइक्रो-क्लाइमेट’ बनाते हैं—मिट्टी की नमी बनी रहती है, धूप के लिए प्रतिस्पर्धा उन्हें ऊँचाई की ओर प्रेरित करती है, और हवा का वेग जमीन तक कम आता है। नतीजा—लंबे, तगड़े, स्वस्थ पौधे। मुझे लगता है उनकी जड़ें आपस में संवाद करती हैं—रसायनों और फफूंद-जाल के जरिए—खतरा हो तो चेतावनी, कमी हो तो साझा पोषण। मैं इसे ‘हरित संवाद’ कहता हूं। रोज उनसे बात करता हूं—यह आस्था भी है और संवेदना भी।

प्रश्न: यह ‘संवाद’—क्या यह केवल प्रतीक है या कुछ ठोस अनुभव भी?

संजय भंडारी: ठोस अनुभव हैं। सुबह घूमते हुए पेड़ों का रंग-रूप, पत्तियों की चमक, मिट्टी की नमी, टहनियों की मुद्रा—सब कुछ संकेत देते हैं। समय के साथ समझ आने लगी कि किसे पानी चाहिए, किसे छंटाई, किसे जैव-खाद। एक लय बन जाती है—जैसे कोई रियाज। पेड़-पौधे भी संवेदनशील होते हैं—जैसे मनुष्य। और जब हम सतत ध्यान देते हैं, वे अपनी ‘ज़रूरत’ जताने लगते हैं—आप उसे महसूस कर पाते हैं। यही भाव हमें अनुशासित रखता है।

प्रश्न: आपने पत्तों से खाद बनाने का जिक्र किया। कचरा प्रबंधन का यह चक्र कैसे चलता है?

संजय भंडारी: यह हमारा ‘ग्रीन चक्र’ है। पतझड़ में या रुटीन में जो पत्ते गिरते हैं, हम उन्हें गड्ढों में जमा करते हैं—लेयरिंग करके, नमी देकर, समय-समय पर पलटते हैं। कुछ महीनों में बेहतरीन कम्पोस्ट बन जाती है, जिसे हम पौधों को देते हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों की निर्भरता घटती है और मिट्टी का जीव-जगत समृद्ध होता है। इसी तरह मल्चिंग से वाष्पीकरण कम होता है, जड़ों को तापमान-संतुलन मिलता है, और खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है। यह एक आत्मनिर्भर प्रणाली है—जितना लेते हैं, उतना लौटा देते हैं।

प्रश्न: कोविड के दौरान और डेंगू जैसी स्थितियों में ग्रीन गैलरी ने लोगों की कैसे मदद की?

संजय भंडारी: कोविड के समय आयुर्वेदिक पौधों की माँग बहुत बढ़ी—काढ़े में काम आने वाली पत्तियाँ-छालें लोगों को दीं। डेंगू के दौरान लोग पपीते की पत्तियाँ लेने आने लगे। हमने जो उपलब्ध था, बांटा। मेरा मानना है—प्रकृति के उपकारों का निष्काम वितरण ही सच्चा धर्म है। ग्रीन गैलरी केवल हरियाली नहीं, एक ‘समुदाय सेतु’ भी है।

प्रश्न: 2023 में ‘हार्वर्ड वर्ल्ड रिकॉर्ड’ का जिक्र आता है। यह उपलब्धि आपके लिए क्या मायने रखती है?

संजय भंडारी: यह सम्मान व्यक्तिगत नहीं—समुदाय और प्रकृति का संयुक्त मान है। रिकॉर्ड हमें याद दिलाता है कि मेहनत और नवाचार का असर दूर तक जाता है। पर सच कहूं, असली पुरस्कार तो तब मिलता है जब कोई बच्चा आकर पूछता है—“अंकल, ये पेड़ कितने बड़े होंगे?” या कोई राहगीर छाँव में बैठकर कहता है—“धन्यवाद, यहां ठंडक मिलती है।”

प्रश्न: ‘कबाड़ से जुगाड़’ की प्रदर्शनी में बच्चों और युवाओं की क्या प्रतिक्रिया रहती है?

संजय भंडारी: बच्चों की आँखें चमक उठती हैं—जब वे देखते हैं कि गत्ते से ताजमहल बन सकता है, पुरानी बोतलों से लाइटिंग हो सकती है, टायरों से बैठने की सीटें बन सकती हैं। हम उन्हें सिखाते हैं—वेस्ट इज़ रिसोर्स, अगर आपकी नज़र सृजनशील है। युवा स्वयंसेवक बनकर आते हैं—इंस्टॉलेशन बनाते हैं, रंग भरते हैं, पौधारोपण में हाथ बँटाते हैं। यह स्पर्श-अनुभव शिक्षा है—किताब से आगे की कक्षा।

प्रश्न: इतने बड़े क्षेत्र—लगभग 20,000 वर्ग फीट—का जल-प्रबंधन कैसे होता है?

संजय भंडारी: बुनियाद है ड्रिप इरिगेशन और अनुशासित शेड्यूल। 11 पानी के कनेक्शन इसलिए लिए कि लाइन-लॉस और प्रेशर की समस्या न बने। समयानुसार ब्लॉक्स को पानी मिलता है, मौसम के हिसाब से खुराक बदलती है। वर्षा-जल के संग्रहण पर भी काम कर रहे हैं ताकि बाहरी जल-निर्भरता धीरे-धीरे घटे। लक्ष्य है—हर बूंद का सदुपयोग।

प्रश्न: आपके लिए ‘प्रकृति-धर्म’ और ‘इनोवेशन’ का आपसी रिश्ता क्या है?

संजय भंडारी: धर्म अगर कर्तव्य है, तो इनोवेशन उसका साधन। प्रकृति-धर्म कहता है—जीवन को जीवन से जोड़ो, संतुलन रखो, वापसी करो। इनोवेशन सिखाता है—उसी लक्ष्य को बुद्धिमानी और सृजनशीलता से कैसे प्राप्त करें। ग्रीन गैलरी में दोनों का समन्वय है—मिट्टी में जड़ें भी हैं, और विचारों में पंख भी।

प्रश्न: इस परियोजना में सबसे कठिन घड़ी कौन सी रही? और आपने उसे कैसे पार किया?

संजय भंडारी: शुरुआती साल सबसे कठिन थे—धूप तेज, पानी सीमित, मिट्टी थकी हुई। पौधे मर जाते तो दिल टूटता। पर वहीं से सीख मिली—कौन सी प्रजाति कहाँ पनपेगी, छाया-पौधारोपण कैसे करें, किस समय रोपें। मैंने हार नहीं मानी। हर असफल पौधा हमारे लिए एक अध्यापक बना।

प्रश्न: आज ग्रीन गैलरी में आए व्यक्ति को आप क्या ‘अनुभव-मार्ग’ सुझाते हैं?

संजय भंडारी: पहले ब्लॉक-1 से शुरुआत करें—जहां बच्चे खेलते हैं और ‘कबाड़ से जुगाड़’ की प्रदर्शनी जीवंत दिखती है। फिर ब्लॉक-2 से 4 में धीमे-धीमे चलें—कहीं रुकें, मिट्टी को छुएं, पत्तों की खुशबू महसूस करें, हवा की भाषा सुनें। यदि समय हो तो कम्पोस्ट पिट देखें—यहाँ का हर पौधा उस खाद का आभारी है। अंत में, छाँव में बैठकर पानी की एक घूंट लें—यही इस जगह का संस्कार है।

प्रश्न: इस पहल में समुदाय के लिए कोई ‘ओपन इन्वॉल्वमेंट’ मॉडल है?

संजय भंडारी: हाँ। जो भी जुड़े—अमूल्य। —सबका स्वागत है। यह हमारी सबसे बड़ी कमाई है।

प्रश्न: आगे की क्या योजनाएँ हैं?
संजय भंडारी: तीन आयाम—संरक्षण, शिक्षा, और नवाचार। संरक्षण में—वर्षा-जल संचयन और स्थानीय प्रजातियों का और विस्तार। शिक्षा में—स्कूलों के लिए क्यूरेटेड नेचर-वॉक्स और ‘वेस्ट-टू-आर्ट’ वर्कशॉप्स। नवाचार में—सौर ऊर्जा का एकीकरण और स्मार्ट सिंचाई। साथ ही, औषधीय पौधों का एक समर्पित ‘हीलिंग ट्रेल’—जहाँ लोग हर पौधे की कहानी और उपयोग समझ सकें।
प्रश्न: आप बार-बार कहते हैं—पेड़-पौधे संवाद करते हैं। यह दर्शन व्यक्तिगत जीवन में क्या बदल देता है?

संजय भंडारी: बहुत कुछ। हम धीमे होते हैं, सुनना सीखते हैं, कम में संतोष करना सीखते हैं। पेड़ आपको अनुशासन सिखाते हैं—समय पर पानी, धैर्य से बढ़ना, गिरकर मिट्टी को समृद्ध करना। यह सब जीवन का व्याकरण है। जब मैं कहता हूं कि मैं उनकी भाषा समझता हूं, तो इसका अर्थ यही है—मैं उनकी ज़रूरतें महसूस करना सीख गया हूं। यही अध्यात्म है—संबंध की सूक्ष्मता।

प्रश्न: जोधपुर के नागरिकों के नाम कोई संदेश?

संजय भंडारी: एक पौधा लगाइए, पर उससे पहले एक रिश्ता बनाइए। पानी की हर बूंद को आदर दीजिए। अपने बच्चों को ‘हरियाली की सैर’ कराइए—उन्हें बताइए कि पेड़ केवल ऑक्सीजन मशीनें नहीं, बल्कि जीवित सहचर हैं। और जब भी ग्रीन गैलरी आएं—एक मुस्कान और थोड़ा सा समय साथ लाएं—यही हमारी पूंजी है।

एक आदमी, एक संकल्प, एक हरित क्रांति

संजय भंडारी ने जोधपुर में यह सिद्ध कर दिया है कि संख्या और संवेदना साथ चल सकती हैं। 20,000 वर्ग फीट में फैली ग्रीन गैलरी केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि एक विचार का वन है—जहाँ 3500+ पौधों की हर पत्ती एक कहानी कहती है, 250+ प्रजातियों की हर शाखा एक नई संभावना जगाती है। जहां गिरते पत्तों से खाद बनती है, और खाद से जीवन—यह चक्र केवल बागवानी नहीं, मानवता का पाठ है। कबाड़ से बने 1000+ आर्ट-पीसेज़ बताती हैं कि कचरा नहीं, नज़र बदलने की ज़रूरत है। नेमीचंद जैसे साथियों की सेवा और राहगीरों के लिए रखे जल-घड़ों की शीतलता यह जताती है कि हरियाली केवल पेड़ों में नहीं, व्यवहार में भी होती है।

हरियाली के इस अर्थशास्त्री ने हमें सिखाया है—प्रकृति के साथ चलना ही सच्चा नवाचार है, और नवाचार का लक्ष्य अंततः सह-अस्तित्व। जोधपुर का यह ‘जीवित संग्रहालय’ आने वाली पीढ़ियों के लिए एक निमंत्रण है—आइए, पेड़ों की भाषा सीखें, मिट्टी से दोस्ती करें, और उस हरित भविष्य को साथ मिलकर बोएँ जो आज हमारे हाथों में है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor