Explore

Search

Thursday, April 16, 2026, 12:41 pm

Thursday, April 16, 2026, 12:41 pm

LATEST NEWS
Lifestyle

महिला दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष… संघर्ष से सेवा तक की प्रेरक यात्रा: नेत्रहीन और मूक-बधिर बच्चों की आशा बनीं श्रीमती सुशीला बोहरा

“मैं न थकी, न हारी…”—अडिग संकल्प, सेवा भावना और आत्मविश्वास से हजारों जीवन रोशन करने वाली एक असाधारण महिला की कहानी

सेवा, साहस और संकल्प की मिसाल

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

(लाइब्रेरी।)

(शारीरिक व्यायाम।)

(हथकरघा)

(पाठ्यक्रम की पुस्तकें।)

(डॉ. दीपक माथुर)

(प्रिंसिपल सलमा अरोड़ा।)

(उन्नत कंप्यूटर लैब)

(स्पेशल टीचर रंजू विश्नोई ने ब्रेल शतरंज की जानकारी दी।)

(इट्स म्यूजिक टाइम।)

(आधुनिक सुविधायुक्त कैंटीन)

(सीखेंगे तो बढ़ेंगे-कंप्यूटर क्लास।)

(हस्तशिल्प की ट्रेनिंग)

(इनोवेशन ने जापान-सिंगापुर तक पहुंच बनाई। )

कभी-कभी जीवन किसी व्यक्ति को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ सामान्य इंसान टूट जाता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो उन्हीं कठिन परिस्थितियों को अपनी शक्ति बना लेते हैं। सुशीला बोहरा ऐसी ही एक प्रेरक शख्सियत हैं। उनका जीवन संघर्षों की लंबी यात्रा रहा है, लेकिन उन्होंने हर कठिनाई को चुनौती की तरह स्वीकार किया और उसे समाजसेवा की दिशा में बदल दिया।

पति की असामयिक मृत्यु, सात महीने के शिशु की जिम्मेदारी और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। इसके बजाय उन्होंने समाज के उन बच्चों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया जिन्हें अक्सर समाज नजरअंदाज कर देता है—नेत्रहीन, मूक-बधिर और मानसिक रूप से विशेष बच्चों के लिए।

आज नेत्रहीन विकास संस्थान हजारों बच्चों के जीवन में उजाला फैला रहे हैं। इन संस्थानों की स्थापना और विकास के पीछे जिस महिला का अटूट संकल्प है, वह हैं सुशीला बोहरा। उनकी जीवनी का शीर्षक है—“मैं न थकी, न हारी…” और सचमुच यह वाक्य उनके पूरे जीवन को सार्थक रूप से अभिव्यक्त करता है। इसी प्रेरक यात्रा को जानने के लिए हमने सुशीला बोहरा से विशेष बातचीत की।

प्रश्न: सबसे पहले अपने बचपन और प्रारंभिक जीवन के बारे में बताइए।

सुशीला बोहरा: मेरा जन्म 1940 में जोधपुर के माणक चौक में हुआ। मेरे पिता मूलराज धारीवाल आरएएस अधिकारी थे और बहुत ही आदर्शवादी व्यक्ति थे। उन्होंने हमें हमेशा “सादा जीवन, उच्च विचार” का पाठ पढ़ाया। मेरी प्रारंभिक शिक्षा त्रिपोलिया स्कूल में हुई, फिर हायर सेकंडरी तक मंडी स्कूल में पढ़ाई की। आगे की पढ़ाई राजमहल गर्ल्स कॉलेज से स्नातक और जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय से एमए किया। बाद में बीएड महेश शिक्षण संस्थान से किया। बचपन से ही घर में अनुशासन, ईमानदारी और सेवा भावना का माहौल था। यही संस्कार मेरे जीवन की दिशा बने।

प्रश्न: आपके जीवन में सबसे बड़ा मोड़ कौन-सा रहा?

सुशीला बोहरा: मेरे जीवन का सबसे बड़ा और कठिन मोड़ 1962 में आया। मेरे पति पारसमल बोहरा का एक हादसे के बाद निधन हो गया। इससे पहले उसी हादसे में उनकी आंखों की रोशनी भी चली गई थी। उस समय मेरा बेटा सिर्फ सात महीने का था। यह समय मेरे लिए बहुत कठिन था। लेकिन मैंने तय किया कि मैं टूटूंगी नहीं। उसी समय मेरे मन में यह विचार आया कि जिन लोगों की आंखों की रोशनी चली जाती है, उनके लिए समाज में बहुत कम सुविधाएं हैं। मैंने सोचा कि अगर भगवान ने मुझे यह दुख दिया है तो शायद किसी बड़े उद्देश्य के लिए दिया है।

प्रश्न : आपने किन-किन स्थानों पर कार्य किया? 

सुशीला बोहरा : 1966-67 में वनस्थली विद्यापीठ जयपुर में व्याख्याता रही। 1967-84 तक महेश शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय में व्याख्याता रहीं। 1984-98 तक जिला महिला विकास अभिकरण जोधपुर की परियोजना निदेशक रहीं।

प्रश्न: नेत्रहीन बच्चों के लिए काम शुरू करने की प्रेरणा कैसे मिली?

सुशीला बोहरा: जब मैंने अपने पति को आंखों की रोशनी खोने की पीड़ा झेलते देखा तो मुझे एहसास हुआ कि नेत्रहीन व्यक्ति के लिए जीवन कितना कठिन हो जाता है। उस समय समाज में उनके लिए शिक्षा और आवास की सुविधाएं बहुत कम थीं। इसी सोच के साथ मैंने 1997 में मात्र दो नेत्रहीन बच्चों के साथ घंटाघर के पास एक मंदिर में विद्यालय शुरू किया। एक शिक्षक और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के साथ यह छोटा सा प्रयास शुरू हुआ। उसी का नाम हमने मरुधर अंध विद्यालय रखा।

प्रश्न: शुरुआती दिनों में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

सुशीला बोहरा: शुरुआत में बहुत कठिनाइयां आईं। संसाधन नहीं थे, धन नहीं था और लोगों को विश्वास दिलाना भी मुश्किल था कि यह कार्य सफल हो सकता है। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे लोगों का सहयोग मिलने लगा। 1983 तक हमारे विद्यालय में 20 बच्चे हो गए थे। राजस्थान में यह पहला आवासीय विद्यालय था जहाँ नेत्रहीन बालिकाओं को भी शिक्षा और रहने की सुविधा दी गई।

प्रश्न: विद्यालय के विकास की कहानी क्या रही?

सुशीला बोहरा: जब बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तो हमें बड़े स्थान की आवश्यकता महसूस हुई। उस समय समाजसेवी मान सिंह देवड़ा से बात करके कमला नेहरू नगर में ढाई बीघा जमीन मिली। यह जमीन हमें बिना शुल्क के दी गई और लीज भी माफ कर दी गई। जन सहयोग से 8 हजार रुपए प्रति कमरा के हिसाब से भवन का निर्माण शुरू हुआ। कई दानदाताओं ने सहयोग दिया। 1983 में विद्यालय के नए भवन का शिलान्यास हुआ और 1985 में भवन तैयार हो गया।

प्रश्न: इस संस्थान के प्रमुख कार्य क्या हैं?

सुशीला बोहरा: हमारे संस्थान का उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं है बल्कि बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना भी है। यहाँ नेत्रहीन बच्चों के लिए कंप्यूटर शिक्षा, संगीत प्रशिक्षण और व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था है।

आज हमारे संस्थान से जुड़े कई घटक हैं—

  • आचार्य हस्ती विशिष्ट (मूक-बधिर) आवासीय विद्यालय

  • प्रज्ञाचक्षु उच्च प्राथमिक विद्यालय फलोदी

  • महावीर मूक-बधिर विद्यालय सिरायारी

  • गुरुकृपा मानसिक विमंदित गृह

  • अजय लीला विशिष्ट शिक्षण प्रशिक्षण महाविद्यालय

  • श्री पारसमल बोहरा नेत्रहीन महाविद्यालय

इन संस्थानों के माध्यम से हजारों बच्चों को शिक्षा और प्रशिक्षण मिल रहा है।

प्रश्न :  विकासाधीन भावी परियोजनाएं कौन-कौनसी है?

सुशीला बोहरा : 1 टॉरेंट ग्रुप अहमदाबाद ने नया आवासीय भवन बनाने के लिए 2 करोड़ की सहायता राशि दी है। इस भवन में श्रवण बाधित बच्चों के लिए कौशल विकास और कार्यशाला के लिए एक हॉल बनेगा। 2- श्री पारसमल बोहरा नेत्रहीन महाविद्यालय का भवन 3.46 करोड़ रुपए की कुल लागत पर और बालिकाओं हेतु छात्रावास भवन 5.40 करोड़ रुपए की कुल लागत पर प्रस्तावित है। मोतीलाल ओसवाल फाउंडेशन द्वारा सीएसआर के तहत यह राशि स्वीकृत की गई है। 3- एचजी फाउंडेशन द्वारा सीएसआर के तहत 5.40 करोड़ करोड़ की लागत पर प्रस्तावित लड़कों के लिए एक छात्रावास भवन स्वीकृत किया गया है। हमारा प्रयास नेत्रहीन और मूक-बधिर विद्यार्थियों के लिए यूनिवर्सिटी खोलने का भी रहेगा। पिछले दिनों हमारे कॉलेज का शिलान्यास केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कर चुके हैं।

प्रश्न: विद्यार्थियों की उपलब्धियों के बारे में बताइए।

सुशीला बोहरा: हमारे बच्चों ने खेल, संगीत और शिक्षा के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। कई विद्यार्थी देश-विदेश में प्रतियोगिताओं में मेडल जीत चुके हैं। मुझे सबसे ज्यादा खुशी तब होती है जब कोई बच्चा पढ़-लिखकर शिक्षक, अधिकारी या आत्मनिर्भर नागरिक बनता है।

प्रश्न: आपको कई सम्मान भी मिले हैं। इस बारे में क्या कहेंगी?

सुशीला बोहरा: मुझे कई बार जिला प्रशासन और विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया। पूर्व उपराष्ट्रपति के. आर. नारायणन से भी सम्मान प्राप्त हुआ। लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान तब होता है जब कोई विद्यार्थी सफल होकर समाज में सम्मान के साथ जीवन जीता है।

प्रश्न: आपने विदेश यात्राएं भी की हैं। क्या इनका आपके कार्य पर प्रभाव पड़ा?

सुशीला बोहरा: हाँ, मुझे इंग्लैंड में माइक्रो एंटरप्राइजेस पर प्रशिक्षण लेने का अवसर मिला। इसके अलावा मैंने यूरोप और एशिया के कई देशों की यात्रा की। वहाँ के संस्थानों को देखकर मुझे नई प्रेरणा और नए विचार मिले। मैंने कोशिश की कि उन अच्छे अनुभवों को अपने संस्थानों में लागू कर सकूँ।

प्रश्न : आप प्रमुख रूप से किन संस्थाओं से जुड़ी रहीं?

सुशीला बोहरा : मैं समय-समय पर जयनारायण व्यास विवि की सीनेट सदस्य, जोधपुर नागरिक सोसायटी, बाल शोभागृह, महिला शिक्षण विहार, पारसमल सुशीला बोहरा चेरिटेबल ट्रस्ट, कार्यशील महिला छात्रावास, भारतीय जीवन बीमा निगम, श्री ओसवाल सिंह सभा, रतनपुरा बोहरा समाज, करुणा इंटरनेशनल, संबल आदि कई संस्थाओं व संगठनों से जुड़ी रही हैं।

प्रश्न: आज के युवाओं और समाज के लिए आपका संदेश क्या है?

सुशीला बोहरा: मेरी यही सलाह है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, हार नहीं माननी चाहिए। यदि आपके पास दृढ़ संकल्प है तो कोई भी बाधा आपको रोक नहीं सकती। समाज में बहुत लोग ऐसे हैं जिन्हें हमारी मदद की जरूरत है। यदि हर व्यक्ति थोड़ा-सा समय और संसाधन समाज सेवा में लगाए तो देश बहुत तेजी से आगे बढ़ सकता है।

प्रश्न : कुछ और अपने बारे में बताइए? 

सुशीला बोहरा: मेरे बेटे का नाम अनिल बोहरा है। वह पेशे से सीए है और उसकी परफेक्शन इंवेंट कंपनी प्राइवेट लि. है। एक पोता है जिसका नाम आशीष बोहरा है और एमबीए और इंजीनियरिंग किए हुए हैं। दो पोतियां हैं। एक पोती राजुल भंडारी टीएसए कंपनी की हैड है और दूसरी पोती पूर्वा मेहता शांति लॉज की मैनेजर हैं। मेरा बेटे अनिल बाेहरा का मुझे खूब सहयोग मिलता है।

परिवर्तन की वाहक : प्रेरणा की जीवंत प्रतिमूर्ति

सुशीला बोहरा ने कई जरूरतमंद महिलाओं का विवाह करवाया और पीड़ित महिलाओं की मदद भी की। सुशीला बोहरा का जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि व्यक्ति में दृढ़ इच्छाशक्ति और सेवा भावना हो तो वह अकेले भी समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। उन्होंने अपने व्यक्तिगत दुख को समाज के लिए सेवा का माध्यम बना दिया। आज हजारों नेत्रहीन, मूक-बधिर और विशेष बच्चों के जीवन में जो उजाला है, उसके पीछे सुशीला बोहरा का संघर्ष, त्याग और समर्पण है। वाकई, उनकी जीवनी का शीर्षक “मैं न थकी, न हारी…” उनके जीवन का सच्चा प्रतिबिंब है। ऐसी प्रेरक महिला को समाज हमेशा सम्मान और कृतज्ञता के साथ याद करता रहेगा। हम भी उनके जज्बे को सलाम करते हैं और उनके स्वस्थ, दीर्घ और सक्रिय जीवन की कामना करते हैं।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor