नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्थापित हुआ नया राजनीतिक संतुलन, जबकि अटल बिहारी वाजपेयी नहीं तोड़ पाए थे अपने खिलाफ नैरेटिव, तब हावी रहा राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक ईको सिस्टम, —‘धुरंधर’ फिल्म ने खोली परतें
दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली
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भारत की राजनीति केवल चुनावी आंकड़ों और सरकारों के गठन तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसके पीछे विचारों, विमर्शों और प्रभावशाली वर्गों का एक व्यापक तंत्र काम करता रहा है। इसे अक्सर “राजनीतिक ईको सिस्टम” कहा जाता है—एक ऐसा नेटवर्क जिसमें मीडिया, बुद्धिजीवी, सांस्कृतिक क्षेत्र, एनजीओ और प्रभावशाली समूह शामिल होते हैं। 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने, तब यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि दशकों से स्थापित इस ईको सिस्टम को चुनौती देने का एक निर्णायक क्षण भी था। वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी की रिपोर्ट के अनुसार, यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक भी रहा है।
2014: सत्ता परिवर्तन या वैचारिक क्रांति?
2014 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला। यह परिणाम कई मायनों में ऐतिहासिक था क्योंकि लगभग तीन दशकों बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। लेकिन इस जीत के साथ ही एक नए प्रकार का विमर्श शुरू हुआ। देश के एक वर्ग ने इस जनादेश को सहज रूप से स्वीकार नहीं किया और लगातार यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की गई कि यह जनादेश “पूर्ण प्रतिनिधित्व” नहीं करता। चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठाना, ईवीएम पर संदेह करना और यह दावा करना कि देश का बड़ा वर्ग सरकार से असंतुष्ट है—ये सभी बातें उस दौर में बार-बार सामने आईं।
‘नैरेटिव’ की लड़ाई: मीडिया, पुरस्कार और विरोध
मोदी सरकार के शुरुआती वर्षों में कई घटनाएं ऐसी हुईं जिन्हें इस नैरेटिव की लड़ाई के उदाहरण के रूप में देखा गया।
- अवार्ड वापसी आंदोलन: साहित्य, कला और सिनेमा से जुड़े कई लोगों ने अपने पुरस्कार लौटाए।
- एनजीओ और एक्टिविज्म: कई संगठनों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ अभियान चलाए।
- मीडिया का एक वर्ग: लगातार आलोचनात्मक रिपोर्टिंग और बहसों के माध्यम से सरकार को घेरने की कोशिश करता रहा।इन सब प्रयासों का उद्देश्य यह स्थापित करना था कि सरकार की लोकप्रियता सीमित है और देश का बड़ा वर्ग उसके खिलाफ है।
जनता का जवाब: चुनाव दर चुनाव
हालांकि, इन सभी प्रयासों के बीच जनता ने हर चुनाव में अपना रुख स्पष्ट किया। 2019 में नरेंद्र मोदी और अधिक बहुमत के साथ सत्ता में लौटे। इसके बाद भी विभिन्न राज्यों के चुनावों में भाजपा की सफलता ने यह संकेत दिया कि जनमत और नैरेटिव के बीच स्पष्ट अंतर है। तीसरी बार प्रधानमंत्री बनना इस बात का संकेत है कि जनता ने बार-बार अपने निर्णय को दोहराया।
‘धुरंधर’ फिल्म: सांस्कृतिक ईको सिस्टम पर प्रहार
हाल के समय में आई फिल्म ‘धुरंधर’ को इस पूरे विमर्श का सांस्कृतिक प्रतिबिंब माना जा रहा है। यह फिल्म केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उस सामाजिक और सांस्कृतिक तंत्र को उजागर करने का प्रयास करती है, जो वर्षों से एक विशेष विचारधारा को बढ़ावा देता रहा।
फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे—
- विचारों को प्रभावित किया जाता है
- जनमत को दिशा दी जाती है
- और किस प्रकार सत्ता परिवर्तन के बाद भी सांस्कृतिक प्रभाव बना रहता है
‘धुरंधर’ की सफलता इस बात का संकेत मानी जा रही है कि अब दर्शक भी इस ईको सिस्टम को समझने लगे हैं।
वाजपेयी युग: जब नैरेटिव हावी था
अटल बिहारी वाजपेयी का कार्यकाल भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। वाजपेयी जी एक लोकप्रिय और सर्वमान्य नेता थे, लेकिन उनके कार्यकाल में भी यह देखा गया कि एक प्रभावशाली वर्ग ने लगातार उनके खिलाफ नैरेटिव बनाने की कोशिश की।
पहला कार्यकाल (13 दिन)
1996 में वाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने, लेकिन बहुमत न होने के कारण केवल 13 दिनों में ही सरकार गिर गई।
दूसरा कार्यकाल (13 महीने)
1998 में फिर से सरकार बनी, लेकिन यह भी स्थिर नहीं रह सकी और 13 महीनों में गिर गई। इन दोनों घटनाओं को केवल राजनीतिक समीकरणों से नहीं, बल्कि उस समय के व्यापक नैरेटिव और गठबंधन राजनीति के दबावों से भी जोड़कर देखा जाता है।
वाजपेयी बनाम मोदी: क्या बदला?
वाजपेयी और मोदी के नेतृत्व में सबसे बड़ा अंतर यही माना जाता है कि—
- वाजपेयी युग में:
- गठबंधन की मजबूरी
- नैरेटिव का दबाव
- सीमित वैचारिक हस्तक्षेप
- मोदी युग में:
- स्पष्ट बहुमत
- आक्रामक राजनीतिक रणनीति
- वैचारिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर हस्तक्षेप
नरेंद्र मोदी को कई विश्लेषक “राजनीति का चाणक्य” इसलिए कहते हैं क्योंकि उन्होंने केवल चुनाव नहीं जीते, बल्कि उस पूरे तंत्र को चुनौती दी जो दशकों से प्रभावी था।
राजनीतिक ईको सिस्टम का विघटन
2014 के बाद जो सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिला, वह था इस ईको सिस्टम का धीरे-धीरे कमजोर होना।
राजनीतिक स्तर पर
- विपक्ष का बिखराव
- मजबूत केंद्रीय नेतृत्व
सामाजिक स्तर पर
- नए विचारों का उदय
- सोशल मीडिया के माध्यम से वैकल्पिक विमर्श
सांस्कृतिक स्तर पर
- फिल्मों, साहित्य और कला में नए दृष्टिकोण
‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों को इसी बदलाव का हिस्सा माना जा रहा है।
आलोचना और समर्थन: दो ध्रुव
यह भी सच है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को लेकर देश में दो स्पष्ट ध्रुव बने हुए हैं—
- एक वर्ग उन्हें परिवर्तन का प्रतीक मानता है
- दूसरा वर्ग उनकी नीतियों की आलोचना करता है
लेकिन लोकतंत्र में यही विविधता उसकी ताकत भी होती है।
क्या वास्तव में बदला है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वास्तव में ईको सिस्टम पूरी तरह खत्म हो गया है?
विशेषज्ञों का मानना है कि—
- यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, बल्कि इसका स्वरूप बदला है
- अब एक नया ईको सिस्टम उभर रहा है
- और यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा
विचारों के पुनर्गठन का दौर
भारत की राजनीति में नरेंद्र मोदी का दौर केवल सत्ता का नहीं, बल्कि विचारों के पुनर्गठन का दौर है। जहां अटल बिहारी वाजपेयी के समय नैरेटिव का दबाव अधिक प्रभावी था, वहीं मोदी युग में उस नैरेटिव को चुनौती देने और उसे बदलने का प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। ‘धुरंधर’ जैसी फिल्में इस परिवर्तन की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति हैं, जो यह बताती हैं कि राजनीति अब केवल संसद तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में उसका प्रभाव है। अंततः, लोकतंत्र में सबसे बड़ा निर्णायक जनता ही होती है—और भारत की जनता ने बार-बार अपने निर्णय के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि वह किस दिशा में देश को आगे बढ़ते देखना चाहती है।










