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Sunday, October 18, 2026, 10:26 am

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Lifestyle

विश्व कविता दिवस पर प्रमोद वैष्णव की सामयिक कविता

कमाल हो रहा है

ये तो कमाल ही
हो रहा है।
गायब हो रही है
संवेदनाएं,,,।
मुहब्बत भी
अब तो शरीर से
आगे नहीं बढ़
पा रही है।

फिर अचानक
इतने कवि
कहां से आ गये,,,
जो लिखते है
बात भावनाओं की,,,
करते है बात
मुहब्बत की,,।

कैसे दिख जाते है
उनको किसी
लाचार के आंसू,,,।
बिठाते है जो
अपने मां-बाप को
काग़ज़ पर कुछ
इस तरह,कि होता है
गुमां,की थोड़ी देर में
पूजा भी शुरु कर देगें।

पर हक़ीक़त में तो
ऎसा कुछ होता ही
नहीं हैं, फिर ये सब
कहां से आ रहा है,,,।

किसी को पता चले
तो बताना ज़रुर,,,
मैं तो थक चुका हूं‌
ढूंढते-ढूंढते,,,,।

प्रमोद वैष्णव
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor