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Thursday, April 16, 2026, 5:04 am

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आत्मा के धनुष पर तना है…मेरा हर जन्म! : अमेरिका से रविदत्त मोहता की विश्व कविता दिवस पर आध्यात्मिक कविता

(कवि परिचय : रविदत्त मोहता : हाल अमेरिका निवास- आकाशवाणी जोधपुर से रिटायर्ड स्टेशन डायरेक्टर, कहानीकार, कवि और आध्यात्मिक चिंतक व दार्शनिक। युगप्रवर्तक विचारक। श्री मोहता की रचनाएं श्री मां व श्री अरविंद के पदचिह्नों पर चलती हुई दुनिया को ब्रह्मांडीय रहस्यों से रूबरू करवाती हैं। कहीं कहीं कवि अज्ञेय की श्रेणी से कहीं ऊपर उठकर खुद अज्ञेय हो जाते हैं, जिसे स्थूल दृष्टि से समझना संभव नहीं हैं। श्री मोहता की रचनाएं कालखंड से परे हैं और इसे कालजयी व्यक्ति ही समझ सकता है।-संपादक)   

आत्मा के धनुष पर तना है…मेरा हर जन्म!

आत्मदीप की लौ में देखता
अंधकार से ढके उस पार खड़े
प्रभु के मुख को मैं.!

प्राचीन पाषाण में से
जिसका करता उत्खनन
वेद का ऋषि आलेखन
और नहीं कर सका
नर जिसे
अपने अंदर से उत्खनन
उसका ईश का करता
खनन..
नर की देह से मैं.!

धरता पग उल्कापिंडों पर और
करता आत्म-धनुष के बाण से
अतिमानवी जन्मों का आलेखन
मानस की अधूरी स्लेट पर
लिखकर
उच्चमन से मैं..!

काली धूल भरी मृत्यु की आंधी से
अटे ब्रह्मांड से करता युद्ध
अपने अनन्त जन्मों में
और विसृजन मन का करता
अनन्त के शून्य में धरता
पांव मैं.!
श्रीहरि -तूलिका पकड़े
मेरा अधिमानस रखता पांव
धरा पर और..
एक नूतन दिन पर चढ़कर
अधिमानस की छत पर खड़ा हुआ
मेरे अतिमानस का अश्व रखता
धरा के धैर्य पर खुर अपने…!

सूर्य की नूतन अंगुली पकड़े
अग्नि के वर्तुलों को करते हुए पार
धरा पर उतरते जाते
मेरे अनन्त मानव जन्म और
मैं बनता जाता
धरा का सामूहिक मैं..!

देवों के लोकों को करता पार
आर-पार को प्रणाम करते हुए
निहारता तारों में मनुष्य के
कच्चे मानस को, और
उतरता अपने अधिमानस के रथ से
किसी भागवत मुहूर्त पर
पृथ्वी पर रखता हुआ पांव मैं..!

चूमता बच्चों के नूतन मुख को
और उतरता जाता
पृथ्वी के उर में
देता माता के गर्भ को
पहली दस्तक मेरी
मेरे भविष्य की मां को मैं …!

अंधकार की रेत से सने पांव मेरे लेट जाते
लिपटकर ..
मां के उदर में
अपने नए जन्म से
और देता मानव-देह को
एक नव- निर्माण मैं..!

मानव जन्मों के अनन्त आकाश में
जन्म लेती मेरी अधिमानसिक उड़ान
प्रकाश की अंगूठी पहने
चित्त की अग्नि से सना हुआ
इस तरह करता
अपना ही अतिक्रमण
मेरे ही जन्म का
हर जन्म में मैं.!

मैँ जन्म लेता रहता
और तप मेरा इस तरह
तपता रहता मेरे
तन के धनुष पर
अविचल तनकर रहता
लड़ता अपनी ही मृत्यु से मैं..!

लेता बार-बार जन्म
मेरा अरूप मैं
मेरे नए रूप को गढ़कर
रूप के घर में..!

मुझे विदित है कि मैं अजन्मा हूँ
आकाश की रुई में लिपटा हूं..!
पर बुनता रहता नयी-नयी देहों को
पृथ्वी की देह को उन्नत करने के लिए
मेरे ही मैं में से मैं..!

मैं खुद न होता कभी पैदा
न मरता मुझमें यह अमर जुलाहा
जो बुनता जीवन पृथ्वी के अरण्य में
मेरा ही जन्म से मुझमें ..!

इस तरह.चला आता हूं
पृथ्वी पर शक्ल बदलकर
मेरे मैं की सबमें
जबकि वो होता हूँ मैं ही
तुम्हारे मैं में शामिल होकर मैं..!

तुम दूर नहीं हो मेरे मैं से तुममें..!
यही बात कहने बनकर हमशक्ल
बना रहता हूं
युगों तक तुम्हारे साथ
तुम्हारे मानव तन में
तुम्हारी मैं का हमशक्ल बनकर
भाई, दोस्त,लोग,देश और विश्व मैं..!

इसलिए हे नर श्रेष्ठ
खनन करो मेरा ही
अपने मानस के उर में..!

हे महान मनुज
करो मुझमें ही
अपने जीवन का पर्यटन
क्योंकि मेरे पर्यटन में ही
तुम मेरे होकर
मेरे जैसे बन जाते हो..!

इस तरह मैं ही तना हूं
तुम्हारी देह के भीतर
तुम्हारी आत्मा के धनुष पर
तुम्हारे जन्मों के मरण में भी
सदा मैं..!

मैं ही मिलूंगा
हे दिगम्बर मनुज
दिगन्तर तेरे तन के
अंत को करने अनन्त
तुझे
हर जन्म में मैं..!

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor