अस्थमा से जूझते बचपन से लेकर 1 करोड़ लोगों की वेलनेस कम्युनिटी तक—एक इंजीनियर का अनुशासन, तकनीक और योग के संगम से खड़ा हुआ अनोखा मॉडल
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में फिटनेस अक्सर “समय मिलने पर” की चीज़ बनकर रह जाती है। लोग जिम की मेंबरशिप लेते हैं, संकल्प करते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में सब छूट जाता है। ऐसे दौर में एक ऐसा प्लेटफॉर्म सामने आया, जिसने फिटनेस को लक्ष्य नहीं बल्कि आदत बना दिया। यह कहानी है सौरभ बोथरा की —एक ऐसे युवा की, जिसने आईआईटी जैसी प्रतिष्ठित शिक्षा हासिल करने के बाद कॉर्पोरेट दुनिया का रास्ता छोड़कर योग और वेलनेस को अपना जीवन मिशन बना लिया। उनका प्लेटफॉर्म हाबिल्ड आज एक करोड़ से अधिक लोगों को जोड़ चुका है और “नियमितता” को स्वास्थ्य का सबसे बड़ा मंत्र बना चुका है।
संघर्ष से शुरुआत: बीमारी ने दिखाई दिशा
सौरभ बोथरा की कहानी किसी स्टार्टअप फाउंडर की सामान्य सफलता गाथा नहीं है। इसकी शुरुआत एक ऐसी समस्या से होती है, जिससे लाखों लोग जूझते हैं—कमजोर स्वास्थ्य। बचपन में अस्थमा जैसी बीमारी ने उन्हें शारीरिक रूप से सीमित कर दिया था। बार-बार बीमार पड़ना, खेलकूद से दूरी और एलर्जी की समस्याएं उनके जीवन का हिस्सा थीं। लेकिन इसी कमजोरी ने उन्हें शरीर को समझने और उसे बेहतर बनाने की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया। घर का माहौल भी इस सोच को मजबूती देने वाला था। उनके परिवार में चिकित्सा और प्राकृतिक उपचार के प्रति रुचि पहले से थी। ऐसे में जब उन्होंने युवावस्था में योग से जुड़ाव महसूस किया, तो यह केवल एक अभ्यास नहीं बल्कि जीवनशैली में बदलाव की शुरुआत बन गया।
आईआईटी से योग तक: परंपरा और तकनीक का संगम
आईआईटी जैसे संस्थान से पढ़ाई करना आमतौर पर एक सुरक्षित और प्रतिष्ठित करियर की गारंटी माना जाता है। लेकिन सौरभ ने इस परंपरागत सोच से अलग रास्ता चुना। इंजीनियरिंग की पढ़ाई ने उन्हें समस्या को समझने और समाधान ढूंढने की वैज्ञानिक दृष्टि दी, वहीं योग ने उन्हें शरीर और मन के संतुलन की समझ दी। यही कारण है कि उनका काम केवल योग सिखाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने इसे एक व्यवस्थित, तकनीक-आधारित मॉडल में बदला। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए लाखों लोगों को एक साथ जोड़ना, उनकी उपस्थिति को ट्रैक करना और उन्हें नियमित बनाए रखना—यह सब बिना तकनीकी समझ के संभव नहीं था। इस तरह, सौरभ का सफर परंपरा और आधुनिकता के एक अनोखे संगम के रूप में सामने आया।
‘हाबिल्ड’ की शुरुआत: एक व्यक्तिगत मिशन से वैश्विक आंदोलन तक
हाबिल्ड की शुरुआत किसी बड़े निवेश या बिजनेस प्लान से नहीं हुई थी। इसकी जड़ें एक बेहद व्यक्तिगत अनुभव में छिपी हैं। कोरोना महामारी के दौरान जब उनकी मां घुटनों के दर्द से परेशान थीं, तब सौरभ ने उन्हें योग के सरल अभ्यास कराना शुरू किया। धीरे-धीरे यह अनुभव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा। आसपास की महिलाओं को भी इससे राहत मिलने लगी। यहीं से एक विचार ने आकार लिया—अगर ये छोटे-छोटे अभ्यास इतने प्रभावी हैं, तो क्यों न इसे अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए?
इस सोच के साथ उन्होंने लोगों को योग सिखाना शुरू किया, वह भी बिना किसी शुल्क के। धीरे-धीरे यह प्रयास एक समुदाय में बदल गया, और आज यह एक करोड़ से अधिक लोगों का नेटवर्क बन चुका है।
फिटनेस नहीं, ‘आदत’ है असली कुंजी
सौरभ बोथरा के काम की सबसे खास बात यह है कि उन्होंने फिटनेस को “लक्ष्य” की बजाय “आदत” के रूप में स्थापित किया।
अधिकांश लोग फिटनेस को एक प्रोजेक्ट की तरह देखते हैं—कुछ दिनों तक मेहनत, फिर ब्रेक, और फिर वही पुरानी दिनचर्या।सौरभ ने इस चक्र को तोड़ने के लिए एक अलग दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने समझा कि समस्या लोगों की इच्छाशक्ति में नहीं, बल्कि आदत बनाने की प्रक्रिया में है। इसलिए उनके प्लेटफॉर्म पर सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया जाता है कि व्यक्ति रोज़ उपस्थित रहे, चाहे वह 5 मिनट ही क्यों न हो। यही छोटा कदम धीरे-धीरे बड़ी आदत में बदल जाता है।
मनोविज्ञान और तकनीक का अनोखा प्रयोग
‘हाबिल्ड’ की सफलता के पीछे केवल योग नहीं, बल्कि व्यवहारिक मनोविज्ञान (Behavioral Psychology) की गहरी समझ भी है।लोगों को नियमित बनाए रखने के लिए प्लेटफॉर्म पर उपस्थिति को मापा जाता है। जब व्यक्ति को यह महसूस होता है कि वह लगातार कुछ कर रहा है, तो उसे एक तरह की मानसिक संतुष्टि मिलती है। इसके अलावा, सत्रों में विविधता बनाए रखना भी एक अहम रणनीति है। जब व्यक्ति को हर दिन कुछ नया अनुभव होता है, तो उसकी रुचि बनी रहती है और वह जल्दी बोर नहीं होता।इस तरह, तकनीक और मनोविज्ञान का यह मेल ‘हाबिल्ड’ को एक साधारण योग प्लेटफॉर्म से अलग बनाता है।
छोटी शुरुआत, बड़ा प्रभाव
सौरभ का मॉडल इस बात को साबित करता है कि बदलाव के लिए बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। उन्होंने एक छोटे से कमरे से शुरुआत की, लेकिन उनका दृष्टिकोण व्यापक था। आज उनके प्लेटफॉर्म से जुड़े लोग केवल योग नहीं सीख रहे, बल्कि एक स्वस्थ जीवनशैली को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसमें खास बात यह है कि बड़ी संख्या में महिलाएं, विशेषकर गृहिणियां, इस अभियान से जुड़ी हैं। जब एक मां अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती है, तो उसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है।
यही कारण है कि ‘हाबिल्ड’ का प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी दिखाई देता है।
पारंपरिक योग का आधुनिक रूप
भारत में योग सदियों पुरानी परंपरा है, लेकिन समय के साथ यह कई बार केवल एक औपचारिक अभ्यास बनकर रह गया था।
सौरभ ने इसे फिर से आम लोगों के जीवन का हिस्सा बनाने की कोशिश की है। उन्होंने योग को जटिल आसनों और लंबे सत्रों से बाहर निकालकर सरल, सहज और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया। उनका मानना है कि अगर कोई चीज़ वास्तव में लाभकारी है, तो उसे अधिक सजाने-संवारने की जरूरत नहीं होती। यही कारण है कि उनके प्लेटफॉर्म पर दिखावा कम और वास्तविक अभ्यास ज्यादा है।
तनाव भरी जिंदगी में संतुलन का मंत्र
आज के दौर में तनाव हर व्यक्ति की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। कॉर्पोरेट जॉब हो या स्टार्टअप, हर जगह दबाव और प्रतिस्पर्धा है। सौरभ का दृष्टिकोण इस मामले में बेहद सरल है—शरीर और मन को संतुलित रखना जरूरी है। इसके लिए वे कुछ बुनियादी आदतों पर जोर देते हैं, जैसे पर्याप्त पानी पीना, समय-समय पर चलना, गहरी सांस लेना और समय पर सोना। ये छोटे-छोटे कदम लंबे समय में बड़े बदलाव ला सकते हैं।
चुनौतियां और आत्मसंघर्ष
हर सफल व्यक्ति की तरह सौरभ के जीवन में भी चुनौतियां रही हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि कुछ आदतें बनाना उनके लिए भी आसान नहीं रहा। उदाहरण के लिए, पढ़ने की आदत विकसित करना उनके लिए हमेशा कठिन रहा। लेकिन उन्होंने इसके लिए भी एक व्यावहारिक समाधान निकाला—छोटे लेख पढ़ना, सारांश पढ़ना और धीरे-धीरे खुद को बेहतर बनाना। यह दिखाता है कि आदतें बनाना एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें हर व्यक्ति को अपने तरीके खोजने पड़ते हैं।
युवा पीढ़ी और योग का नया रिश्ता
आज की युवा पीढ़ी, जिसे अक्सर डिजिटल दुनिया में खोया हुआ माना जाता है, वह भी धीरे-धीरे योग और वेलनेस की ओर आकर्षित हो रही है। इस बदलाव में ‘हाबिल्ड’ जैसे प्लेटफॉर्म की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह प्लेटफॉर्म लोगों को खुद को स्वीकार करने और अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देने का अवसर देता है। यहां परफेक्शन का दबाव नहीं है, बल्कि निरंतर प्रयास को महत्व दिया जाता है। यही दृष्टिकोण इसे Gen-Z के बीच भी लोकप्रिय बना रहा है।
एक नई सोच की शुरुआत
सौरभ बोथरा की कहानी केवल एक व्यक्ति या एक प्लेटफॉर्म की सफलता नहीं है। यह एक नई सोच की शुरुआत है—जहां स्वास्थ्य को लक्ष्य नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा माना जाता है। उन्होंने यह साबित किया है कि अगर सही दिशा, निरंतरता और तकनीक का सही उपयोग किया जाए, तो छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, ऐसे में ‘हाबिल्ड’ जैसे प्रयास यह याद दिलाते हैं कि असली प्रगति वही है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है और जीवन को संतुलित बनाती है। आईआईटी से योग कोच बनने का सौरभ बोथरा का सफर यह दिखाता है कि करियर केवल डिग्री से तय नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य से तय होता है, जिसे हम अपने जीवन में अपनाते हैं। एक करोड़ लोगों का समुदाय केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक है, जो उन्होंने लोगों के भीतर जगाया है—कि स्वास्थ्य कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि एक रोज़ की आदत है।









