क्या सनसनी के लिए रिपोर्टर की जान दांव पर लगाई जा सकती है?
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को सत्य से अवगत कराना, सत्ता और व्यवस्था की जवाबदेही तय करना तथा जनहित के मुद्दों को सामने लाना है। खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) और स्टिंग ऑपरेशन इसी उद्देश्य की पूर्ति के महत्वपूर्ण माध्यम माने जाते हैं। अनेक बार ऐसे स्टिंग ऑपरेशनों ने भ्रष्टाचार, अपराध और प्रशासनिक लापरवाही का पर्दाफाश किया है। लेकिन जब किसी स्टिंग का विषय विस्फोटक, हथियार, मादक पदार्थ या अन्य अत्यधिक जोखिमपूर्ण सामग्री हो, तब प्रश्न केवल पत्रकारिता का नहीं, बल्कि कानून, नैतिकता, सुरक्षा और मानवीय जिम्मेदारी का भी बन जाता है।
नवंबर 2022 में उदयपुर-अहमदाबाद रेल ट्रैक विस्फोट और उसके बाद डूंगरपुर से बड़ी मात्रा में जिलेटिन तथा डेटोनेटर बरामद होने की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया। इन्हीं घटनाओं के बाद एक प्रमुख समाचार पत्र ने यह दावा करते हुए स्टिंग प्रकाशित किया कि डेटोनेटर या विस्फोटक सामग्री खरीदना अपेक्षाकृत आसान है। यदि ऐसा स्टिंग वास्तव में किया गया, तो इसके साथ कई गंभीर प्रश्न भी खड़े होते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक समाचार पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी मीडिया इंडस्ट्री, कानून व्यवस्था और पत्रकारिता के भविष्य से जुड़ा हुआ है।
पहला सवाल: क्या कोई रिपोर्टर बड़ी मात्रा में विस्फोटक खरीद सकता है?
भारत में विस्फोटकों का निर्माण, भंडारण, परिवहन, बिक्री और उपयोग Explosives Act, 1884, Explosive Substances Act, 1908 तथा Explosives Rules, 2008 सहित अन्य लागू कानूनों के अधीन नियंत्रित होता है।
व्यवहारिक रूप से:
- लाइसेंसधारी विक्रेता केवल पात्र और अधिकृत व्यक्तियों को ही विस्फोटक सामग्री बेच सकते हैं।
- खरीद, स्टॉक और उपयोग का रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए।
- कई प्रकार के विस्फोटकों के लिए पहचान, लाइसेंस और प्रयोजन का सत्यापन आवश्यक होता है।
यदि कोई पत्रकार झूठी पहचान, भ्रामक उद्देश्य या अन्य तरीके से ऐसी सामग्री खरीदता है, तो परिस्थितियों के आधार पर उसके सामने कानूनी प्रश्न खड़े हो सकते हैं। दूसरी ओर, यदि विक्रेता बिना आवश्यक सत्यापन के विस्फोटक बेचता है, तो उसकी जिम्मेदारी भी बन सकती है। प्रत्येक मामले के तथ्य अलग होते हैं और अंतिम निर्णय जांच एजेंसियों तथा न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।
दूसरा सवाल: क्या स्टिंग के नाम पर कानून से छूट मिल जाती है?
इसका उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
भारत में ऐसा कोई सामान्य कानूनी सिद्धांत नहीं है कि केवल पत्रकार होने या स्टिंग करने के कारण किसी व्यक्ति को लागू कानूनों से स्वतः छूट मिल जाए। यदि कोई कार्रवाई अन्यथा अवैध होती, तो उसका मूल्यांकन भी कानून के अनुसार ही होगा। हां, किसी मामले में पत्रकार का उद्देश्य, जनहित, परिस्थिति और तथ्य न्यायिक मूल्यांकन का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन वे स्वतः प्रतिरक्षा (immunity) नहीं देते।
तीसरा सवाल: सबसे बड़ा खतरा किसे होता है?
जब कोई रिपोर्टर विस्फोटक सामग्री तक पहुंचता है, तब खतरा केवल कानूनी नहीं होता।
संभावित जोखिमों में शामिल हैं:
- आकस्मिक विस्फोट।
- परिवहन के दौरान दुर्घटना।
- अपराधियों द्वारा हमला।
- पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई के दौरान गलतफहमी।
- मानसिक दबाव और आघात।
पत्रकार का कार्य सूचना जुटाना है; वह विस्फोटक विशेषज्ञ, बम निरोधक दस्ता या प्रशिक्षित सुरक्षा अधिकारी नहीं होता। ऐसे में जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
चौथा सवाल: यदि हादसा हो जाता तो जिम्मेदार कौन होता?
यह सबसे कठिन प्रश्न है। यदि किसी मीडिया संस्थान के निर्देश, स्वीकृति या योजना के अंतर्गत रिपोर्टर अत्यधिक जोखिम वाला कार्य करता है और उसके दौरान दुर्घटना होती है, तो जिम्मेदारी का निर्धारण अनेक तथ्यों पर निर्भर करेगा, जैसे:
- क्या संस्थान ने लिखित अनुमति दी थी?
- क्या जोखिम का पूर्व आकलन किया गया?
- क्या सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाए गए?
- क्या रिपोर्टर को पर्याप्त प्रशिक्षण दिया गया?
- क्या स्थानीय प्रशासन या संबंधित एजेंसियों को किसी स्तर पर सूचित किया गया था?
- क्या कार्य पूरी तरह व्यक्तिगत स्तर पर किया गया या संस्थागत निर्णय था?
इन प्रश्नों के उत्तर के आधार पर नागरिक, श्रम, बीमा अथवा अन्य कानूनी पहलुओं पर अलग-अलग निष्कर्ष निकल सकते हैं। किसी विशिष्ट घटना में जिम्मेदारी का निर्धारण केवल सक्षम जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही संभव है।
पांचवां सवाल: क्या मीडिया संस्थानों के पास जोखिम प्रबंधन नीति होनी चाहिए?
उत्तर है—निश्चित रूप से।
दुनिया के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में उच्च जोखिम वाली रिपोर्टिंग के लिए विशेष प्रोटोकॉल होते हैं।
इनमें शामिल हो सकते हैं:
- जोखिम का लिखित मूल्यांकन।
- वरिष्ठ संपादकीय स्वीकृति।
- सुरक्षा विशेषज्ञों से सलाह।
- आपातकालीन संपर्क व्यवस्था।
- सुरक्षा उपकरण।
- स्वास्थ्य और जीवन बीमा।
- कानूनी परामर्श।
- मनोवैज्ञानिक सहायता।
यह व्यवस्था केवल युद्ध क्षेत्रों के लिए नहीं, बल्कि विस्फोटक, संगठित अपराध और आतंकवाद जैसे विषयों की रिपोर्टिंग में भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
बीमा का प्रश्न: क्या रिपोर्टर की सुरक्षा का आर्थिक मूल्य भी होना चाहिए?
यदि किसी मीडिया संस्थान का कर्मचारी अत्यधिक जोखिम वाले असाइनमेंट पर भेजा जाता है, तो उसके लिए पर्याप्त बीमा, चिकित्सा सुरक्षा और आकस्मिक सहायता की व्यवस्था होना जिम्मेदार संस्थागत व्यवहार का हिस्सा माना जाता है। लेकिन मीडिया संस्थान आमतौर पर ऐसा नहीं करते। राइजिंग भास्कर का मानना है कि ऐसे रिपोर्टर्स का उस मीडिया संस्थान को कम से कम 100 करोड़ का बीमा करवाना चाहिए। ताकि रिपोर्टर की मौत पर उसके परिजनों को 100 करोड़ रुपए मिले। इतनी राशि का बीमा कराना या न कराना पूरी तरह संस्थान की नीति, बीमा बाजार और अनुबंध पर निर्भर करता है। भारत में ऐसा कोई सामान्य कानूनी प्रावधान नहीं है जो प्रत्येक मीडिया संस्थान को 100 करोड़ रुपये का बीमा करवाने के लिए बाध्य करता हो। लेकिन कानून किसी भी मीडिया संस्थान को रिपोर्टर की जान से खिलवाड़ की इजाजत भी नहीं देता। इसलिए माननीय सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए और मीडिया के लिए गाइड लाइन जारी करना चाहिए।
क्या बेहतर विकल्प संभव थे?
यदि उद्देश्य यह दिखाना था कि विस्फोटक आसानी से उपलब्ध हैं, तो क्या इसके लिए वास्तविक खरीद ही एकमात्र रास्ता था?
संभव विकल्प हो सकते थे:
- लाइसेंसिंग व्यवस्था की जांच।
- प्रशासनिक रिकॉर्ड का विश्लेषण।
- सुरक्षा विशेषज्ञों से बातचीत।
- पुलिस और नियामक अधिकारियों के इंटरव्यू।
- न्यायालयीन दस्तावेजों का अध्ययन।
- सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से तथ्य जुटाना।
- नियंत्रित परिस्थितियों में संबंधित एजेंसियों के सहयोग से परीक्षण।
इन विकल्पों से भी जनहित का मुद्दा सामने लाया जा सकता था और जोखिम अपेक्षाकृत कम रखा जा सकता था।
जनहित बनाम सनसनी
पत्रकारिता में जनहित सर्वोच्च माना जाता है। यदि कोई स्टिंग वास्तव में सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर कमजोरी उजागर करता है, तो उसका सार्वजनिक महत्व हो सकता है। लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि:
- स्वयं पत्रकार की सुरक्षा खतरे में न पड़े।
- कानून का अनावश्यक उल्लंघन न हो।
- अपराध की पुनरावृत्ति या नकल को बढ़ावा न मिले।
- संवेदनशील जानकारी इस प्रकार प्रकाशित न हो कि उसका दुरुपयोग हो सके।
जनहित और सनसनी के बीच यही महीन रेखा पत्रकारिता की विश्वसनीयता तय करती है।
संपादकीय जिम्मेदारी सबसे बड़ी कसौटी
हर खोजी रिपोर्ट के पीछे केवल रिपोर्टर नहीं होता। संपादक, प्रबंधन, कानूनी सलाहकार और संस्थान की नीतियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं।
एक जिम्मेदार संपादकीय नेतृत्व को यह तय करना होता है कि:
- क्या स्टोरी का सार्वजनिक महत्व पर्याप्त है?
- क्या कम जोखिम वाले विकल्प उपलब्ध हैं?
- क्या रिपोर्टर की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है?
- क्या संभावित कानूनी परिणामों का आकलन किया गया है?
यदि इन प्रश्नों की अनदेखी होती है, तो खोजी पत्रकारिता साहस से अधिक लापरवाही का रूप भी ले सकती है।
समाज के सामने खड़े कुछ जरूरी प्रश्न
यह विषय केवल एक स्टिंग तक सीमित नहीं है। व्यापक स्तर पर समाज, मीडिया और सरकार के सामने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं:
- क्या खोजी पत्रकारिता के लिए राष्ट्रीय स्तर की सुरक्षा गाइडलाइन बननी चाहिए?
- क्या उच्च जोखिम वाले असाइनमेंट के लिए अनिवार्य सुरक्षा प्रशिक्षण होना चाहिए?
- क्या मीडिया संस्थानों को जोखिम मूल्यांकन सार्वजनिक करना चाहिए?
- क्या पत्रकारों के लिए पर्याप्त बीमा और आपातकालीन सहायता अनिवार्य की जानी चाहिए?
- क्या संवेदनशील विषयों पर स्टिंग से पहले स्वतंत्र कानूनी समीक्षा आवश्यक होनी चाहिए?
सुप्रीम कोर्ट मीडिया संस्थानों के लिए गाइडलाइन तय करे
पत्रकारिता का इतिहास साहसिक उदाहरणों से भरा पड़ा है। लेकिन साहस और लापरवाही में एक बहुत महीन अंतर होता है। यदि किसी स्टिंग का उद्देश्य समाज को सुरक्षित बनाना है, तो सबसे पहले उस स्टिंग में शामिल पत्रकार की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए। इस संबंध में माननीय सुप्रीम कोर्ट को मीडिया संस्थानों के लिए गाइडलाइन तय करनी चाहिए। किसी भी मीडिया संस्थान की सबसे बड़ी पूंजी उसकी मशीनें, इमारतें या ब्रांड नहीं, बल्कि उसके पत्रकार होते हैं। इसलिए यदि कभी किसी रिपोर्टर को विस्फोटक, हथियार या अन्य अत्यधिक जोखिम वाले विषय पर काम करने के लिए भेजा जाता है, तो उससे पहले संस्थान का पहला कर्तव्य यह होना चाहिए कि वह उसकी सुरक्षा, प्रशिक्षण, कानूनी संरक्षण और पर्याप्त बीमा की व्यवस्था करे।
खोजी पत्रकारिता लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन उसका आधार विवेक, जिम्मेदारी और मानव जीवन के प्रति सम्मान होना चाहिए। कोई भी समाचार इतना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता कि उसके लिए एक पत्रकार का जीवन अनावश्यक जोखिम में डाल दिया जाए। यही संतुलन पत्रकारिता को विश्वसनीय भी बनाता है और समाज के प्रति उत्तरदायी भी।


