खुला पत्र :माननीय भारत के मुख्य न्यायाधीश महोदय के नाम
प्रेषक:
दिलीप कुमार पुरोहित
ग्रुप एडिटर, राइजिंग भास्कर
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
सादर प्रणाम।
भारत का लोकतंत्र चार प्रमुख स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया—पर आधारित माना जाता है। इनमें मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसका दायित्व जनता तक सत्य, निष्पक्ष और निर्भीक सूचना पहुंचाना है। मीडिया की विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। यदि जनता का विश्वास कमजोर होता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था भी प्रभावित होती है।
इसी विश्वास को और अधिक मजबूत बनाने के उद्देश्य से मैं, एक पत्रकार और मीडिया संस्थान का संपादक होने के नाते, आपके समक्ष एक महत्वपूर्ण नीति-संबंधी सुझाव रखना चाहता हूं।
मीडिया और अन्य व्यवसायों के बीच स्पष्ट दूरी आवश्यक
पिछले कुछ दशकों में देश में ऐसे अनेक मीडिया समूह विकसित हुए हैं जिनकी गतिविधियां समाचार प्रकाशन और प्रसारण तक सीमित नहीं रहीं। अनेक समूह शिक्षा, रियल एस्टेट, ऊर्जा, खनन, वित्त, स्वास्थ्य, मनोरंजन, डिजिटल सेवाओं, आयोजन व्यवसाय और अन्य अनेक क्षेत्रों में भी सक्रिय हैं। यह स्थिति अपने आप में अवैध नहीं है। भारत का कानून व्यवसाय करने की स्वतंत्रता देता है।
किन्तु जब समाचार माध्यम और अन्य व्यावसायिक हित एक ही स्वामित्व संरचना में संचालित होते हैं, तब हितों के टकराव (Conflict of Interest) की आशंका स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। ऐसे मामलों में जनता के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या संपादकीय निर्णय पूर्णतः निष्पक्ष हैं अथवा उन पर व्यावसायिक हितों का प्रभाव पड़ सकता है। लोकतंत्र में केवल निष्पक्षता ही पर्याप्त नहीं होती; निष्पक्षता दिखाई भी देनी चाहिए।
जनता के मन में उठने वाले स्वाभाविक प्रश्न
जब कोई मीडिया समूह अनेक क्षेत्रों में व्यावसायिक हित रखता है, तब सामान्य नागरिक के मन में कुछ प्रश्न उठना स्वाभाविक है—
- क्या संबंधित विषयों पर समाचार पूरी तरह निष्पक्ष होंगे?
- क्या प्रतिस्पर्धी कंपनियों के संबंध में रिपोर्टिंग समान मानकों पर होगी?
- क्या संपादकीय निर्णयों पर व्यावसायिक हितों का प्रभाव पड़ सकता है?
- क्या विज्ञापनदाता और समाचार के बीच स्पष्ट दीवार बनी हुई है?
- क्या जनता को संभावित हितों के टकराव की जानकारी दी जाती है?
इन प्रश्नों का उद्देश्य किसी संस्था पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता को मजबूत करना है।
दुनिया के कई देशों से सीख
विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में मीडिया स्वामित्व, प्रतिस्पर्धा, संपादकीय स्वतंत्रता और हितों के टकराव से जुड़े विषयों पर विशेष नियम बनाए गए हैं। कहीं स्वामित्व का खुलासा अनिवार्य है, कहीं क्रॉस-मीडिया ओनरशिप पर सीमाएं हैं और कहीं संपादकीय स्वतंत्रता के लिए संस्थागत व्यवस्थाएं विकसित की गई हैं। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में भी इस विषय पर व्यापक राष्ट्रीय चर्चा की आवश्यकता है।
मेरा विनम्र सुझाव
मैं निवेदन करता हूं कि भारत सरकार इस विषय पर एक व्यापक कानून बनाने पर विचार करे, जिसमें निम्नलिखित प्रावधानों पर विमर्श हो—
- समाचार मीडिया का व्यवसाय अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से संस्थागत रूप से पृथक हो।
- यदि कोई समूह अन्य क्षेत्रों में भी कार्य करना चाहता है, तो प्रत्येक व्यवसाय अलग-अलग कंपनी के माध्यम से संचालित किया जाए।
- प्रत्येक कंपनी का स्वतंत्र बोर्ड और स्पष्ट प्रशासनिक ढांचा हो।
- संपादकीय निर्णय लेने वाली इकाई पूरी तरह स्वतंत्र हो।
- मीडिया संस्थानों के लिए संभावित हितों के टकराव की सार्वजनिक घोषणा (Disclosure) की व्यवस्था हो।
- मीडिया स्वामित्व और नियंत्रण की पारदर्शी जानकारी नागरिकों के लिए उपलब्ध हो।
- संपादकीय स्वतंत्रता की रक्षा हेतु आंतरिक आचार संहिता और स्वतंत्र निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।
इसका उद्देश्य किसी व्यवसाय को रोकना नहीं
मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि मेरा उद्देश्य किसी उद्योगपति, मीडिया समूह या उद्यमी के व्यवसाय करने के अधिकार पर प्रश्न उठाना नहीं है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को वैध व्यवसाय करने की स्वतंत्रता देता है। मेरा आग्रह केवल इतना है कि समाचार माध्यम की विश्वसनीयता और अन्य व्यावसायिक हितों के बीच स्पष्ट संस्थागत दूरी स्थापित की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के हितों के टकराव की आशंका न्यूनतम हो।
लोकतंत्र के लिए क्यों आवश्यक है यह सुधार?
यदि मीडिया पर जनता का विश्वास मजबूत रहेगा तो—
- लोकतंत्र और अधिक सुदृढ़ होगा।
- पत्रकारों की स्वतंत्रता बढ़ेगी।
- संपादकीय निर्णयों की विश्वसनीयता मजबूत होगी।
- निवेशकों और पाठकों का विश्वास बढ़ेगा।
- मीडिया पर लगने वाले पक्षपात के आरोप कम होंगे।
- शासन और जनता के बीच संवाद अधिक पारदर्शी बनेगा।
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय से विनम्र प्रार्थना
आप संविधान के सर्वोच्च संरक्षक हैं। न्यायपालिका ने समय-समय पर लोकतांत्रिक मूल्यों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत पारदर्शिता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मैं आपसे विनम्र निवेदन करता हूं कि यदि न्यायपालिका के समक्ष इस प्रकृति का कोई उपयुक्त संवैधानिक या नीतिगत प्रश्न आए, अथवा यदि किसी उपयुक्त मंच पर अवसर उपलब्ध हो, तो मीडिया स्वामित्व, हितों के टकराव और संपादकीय स्वतंत्रता के विषय पर व्यापक विमर्श को प्रोत्साहित करने तथा सरकार और संबंधित संस्थाओं को आवश्यक विधायी सुधारों पर विचार करने के लिए प्रेरित करने की कृपा करें। यह केवल मीडिया सुधार का विषय नहीं है; यह लोकतंत्र में जनता के विश्वास को और मजबूत करने का प्रश्न है।
एक स्वतंत्र, निस्पक्ष और पारदर्शी मीडिया ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति, राइजिंग भास्कर का विनम्र सुझाव
एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी मीडिया ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। यदि मीडिया की संरचना भी उतनी ही पारदर्शी होगी जितनी पारदर्शिता वह दूसरों से अपेक्षा करता है, तो जनता का विश्वास और अधिक दृढ़ होगा।
इसी जनहित की भावना के साथ मैं यह विनम्र निवेदन आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।
सादर,
दिलीप कुमार पुरोहित
ग्रुप एडिटर
राइजिंग भास्कर


