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UNESCO के ताज पर अतिक्रमण का दाग! सोनार किले की सुनहरी दीवारों के साए में खड़ा हो रहा ‘कंक्रीट का साम्राज्य’

UNESCO की चेतावनियां वर्षों से फाइलों में, हाईकोर्ट भी दे चुका है किले के आसपास के अतिक्रमण हटाने का आदेश

राइजिंग भास्कर की पड़ताल | जैसलमेर से दिलीप कुमार पुरोहित
9783414079 diliprakhai@gmail.com
रिपोर्ट में सहयोग : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

जैसलमेर का सोनार किला केवल पीले पत्थरों से बना कोई पुराना दुर्ग नहीं है। यह स्थापत्य, शौर्य, व्यापारिक संस्कृति और मरुस्थलीय जीवन का जीवंत दस्तावेज है, जिसे दुनिया ने 2013 में UNESCO की विश्व धरोहर सूची में जगह देकर अंतरराष्ट्रीय पहचान दी। UNESCO के अनुसार जैसलमेर का किला रेगिस्तानी भू-दृश्य में स्थित ऐसा विशिष्ट दुर्ग है, जिसके भीतर शुरू से विकसित हुआ शहरी क्षेत्र आज भी आबाद है और जिसके जैन मंदिर तथा ऐतिहासिक नगरीय संरचना इसे विशिष्ट बनाते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि जिस धरोहर को दुनिया ने बचाने के लिए चुना, उसे हम किसके भरोसे छोड़ चुके हैं? किले की ऐतिहासिक दीवारों के आसपास अतिक्रमण, अनियंत्रित निर्माण, होटल और व्यावसायिक गतिविधियों का दबाव और बदलता हुआ दृश्य-परिदृश्य अब केवल जैसलमेर की स्थानीय समस्या नहीं रह गया है। यह उस अंतरराष्ट्रीय विरासत के संरक्षण का सवाल है, जिसकी जिम्मेदारी भारत सरकार, राजस्थान सरकार, स्थानीय प्रशासन, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और UNESCO—सभी के कंधों पर है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि UNESCO को इस खतरे का अंदेशा आज नहीं हुआ। 2015 में ही UNESCO World Heritage Committee ने जैसलमेर किले के भीतर अवैध निर्माण को लेकर बेहद गंभीर टिप्पणी की थी। समिति ने दर्ज किया कि किले के भीतर illegal building व्यापक स्तर पर है और इससे उसकी authenticity यानी प्रामाणिकता तथा integrity यानी अखंडता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। यानी दुनिया की सबसे बड़ी सांस्कृतिक विरासत संस्था ने वर्षों पहले खतरे की घंटी बजा दी थी। सवाल अब यह है—हमने उस घंटी की आवाज कितनी गंभीरता से सुनी?

UNESCO ने 2015 में ही कह दिया था—अवैध निर्माण ‘व्यापक’ है

किसी विश्व धरोहर के बारे में UNESCO द्वारा “illegal building is rampant” जैसी टिप्पणी सामान्य टिप्पणी नहीं है। 2015 के अपने निर्णय में UNESCO World Heritage Committee ने जैसलमेर किले के भीतर अवैध निर्माण को लेकर चिंता जताई और कहा कि इससे साइट की authenticity और integrity प्रभावित हो सकती है। साथ ही समिति ने किले में पानी के रिसाव और संरक्षण कार्यों की धीमी प्रगति को लेकर भी चिंता दर्ज की।

यहां से कहानी और गंभीर हो जाती है। 2018 में UNESCO ने भारत से जैसलमेर किले की संरक्षण एवं आधारभूत संरचना संबंधी प्रगति की जानकारी मांगी और विशेष रूप से unauthorised constructions के बारे में जानकारी देने तथा यह बताने को कहा कि उनसे कैसे निपटा जा रहा है। अर्थात मामला केवल “कुछ लोगों ने अवैध निर्माण कर दिया” तक सीमित नहीं है। UNESCO वर्षों से पूछ रहा है कि इन अवैध निर्माणों से निपटने के लिए किया क्या गया?

हाईकोर्ट भी कह चुका है—किले और आसपास के अतिक्रमण हटाओ

इस मामले का एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी पक्ष राजस्थान हाईकोर्ट के आदेशों में मिलता है। राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष जैसलमेर फोर्ट और उसके आसपास अतिक्रमण से जुड़ा मामला पहुंचा। 2021 में Shri Girdhar Memorial Charitable Trust बनाम Union of India मामले में अदालत ने किले और आसपास के क्षेत्र में किए गए अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। अदालत के आदेश में जैसलमेर फोर्ट और उसके आसपास तथा walled city के आसपास किए गए encroachments हटाने की बात कही गई। जिला प्रशासन को अवैध निर्माणों को पानी और बिजली के कनेक्शन नहीं देने तथा संबंधित कानून के तहत कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए। यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि किले के संरक्षण की समस्या केवल किसी सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार या स्थानीय नागरिक की चिंता नहीं है।

न्यायपालिका के सामने भी यह समस्या गंभीर रूप में रखी जा चुकी है। अब सवाल यह है कि यदि अदालत को अतिक्रमण हटाने के निर्देश देने पड़े, UNESCO को वर्षों तक अनधिकृत निर्माण पर चिंता जतानी पड़ी और फिर भी निर्माण का दबाव खत्म नहीं हुआ, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी है?

किले की खूबसूरती पर नहीं, उसकी पहचान पर हमला

सोनार किले की खूबसूरती केवल उसकी दीवारों में नहीं है। किले की पहचान उसके आसपास के दृश्य, त्रिकूट पहाड़ी का प्राकृतिक स्वरूप, पीले पत्थर की वास्तुकला, गलियों की पारंपरिक बनावट, जैन मंदिरों, हवेलियों और ऐतिहासिक नगरीय संरचना के सामंजस्य से बनती है। किसी विश्व धरोहर को केवल उसके मुख्य स्मारक तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। UNESCO की अपनी वेबसाइट पर जैसलमेर के संबंध में स्पष्ट उल्लेख है कि किले के आसपास का wider setting और किले से दिखाई देने वाले तथा किले की ओर दिखाई देने वाले दृश्य कुछ प्रकार के शहरी विकास से प्रभावित हो सकते हैं। UNESCO ने यह भी दर्ज किया है कि किलों के भीतर लगातार encroachment और आवासीय समुदायों के विस्तार से development pressure पैदा हो रहा है। यानी यदि किले के आसपास ऐसे भवन खड़े होते हैं जो उसकी ऐतिहासिक skyline को ढकते हैं, पारंपरिक वास्तुशिल्पीय दृश्य को बिगाड़ते हैं या पर्यटक को उस ऐतिहासिक वातावरण का अनुभव नहीं करने देते जिसके कारण यह स्थान विश्व धरोहर बना—तो यह केवल “सौंदर्य खराब होने” का मामला नहीं है। यह विश्व धरोहर के Outstanding Universal Value से जुड़ा प्रश्न बन सकता है।

होटल पर्यटन की जरूरत हैं, लेकिन धरोहर की कीमत पर नहीं

जैसलमेर पर्यटन का शहर है। होटल चाहिए, रेस्तरां चाहिए, पर्यटकों के लिए सुविधाएं चाहिएं। इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्यटन विकास का अर्थ यह है कि ऐतिहासिक किले के आसपास हर खाली जगह को व्यावसायिक निर्माण के लिए खोल दिया जाए? क्या विश्व धरोहर के नाम पर आने वाले लाखों पर्यटकों के लिए बनाए जाने वाले होटल ही उस धरोहर की पहचान मिटाने लगें? क्या किले की ऐतिहासिक छवि को चमकाने के बजाय उसके आसपास कंक्रीट की ऐसी इमारतें खड़ी की जाएं जिनके सामने सोनार किले का स्थापत्य पीछे छूटता दिखाई दे? यदि ऐसा हो रहा है तो यह पर्यटन विकास नहीं, धरोहर पर व्यावसायिक अतिक्रमण है। और यदि कोई निर्माण वास्तव में अवैध है तो उसके पीछे किसी व्यक्ति, संस्था, होटल कारोबारी या प्रभावशाली समूह का नाम होने से कानून की धार कुंद नहीं होनी चाहिए। धरोहर के मामले में कानून सबके लिए एक होना चाहिए।

UNESCO ने 2021 में फिर चेताया—अतिक्रमण रोकने के नियम लागू करो

यह मामला इसलिए और गंभीर है क्योंकि UNESCO ने 2021 में भी जैसलमेर किले के लिए स्पष्ट प्राथमिकताएं तय कीं। World Heritage Committee ने Site Management Plan के क्रियान्वयन की समीक्षा करते हुए भारत से unauthorised constructions और encroachments को रोकने के लिए बनाए गए नियमों और उपायों की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने को कहा। साथ ही UNESCO ने कहा कि किले की property boundaries अथवा buffer zone में नई सुविधाओं के लिए Heritage Impact Assessment किया जाना चाहिए। इसका सीधा अर्थ है—नई इमारत खड़ी करने से पहले यह देखना जरूरी है कि उससे विश्व धरोहर पर क्या असर पड़ेगा। लेकिन यदि नियम मौजूद हों और उनका पालन न हो, तो नियम कागज पर सुंदर दिख सकते हैं—किला सुंदर नहीं बचता।

89 हेक्टेयर का Buffer Zone—सिर्फ किले की चारदीवारी नहीं है कहानी

जैसलमेर फोर्ट की UNESCO nomination documentation के अनुसार किले की inscribed property लगभग 8 हेक्टेयर है और इसके साथ लगभग 89 हेक्टेयर का buffer zone है। किला त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है और आसपास का क्षेत्र उसकी व्यापक ऐतिहासिक एवं दृश्य पहचान का हिस्सा है। इसलिए सोनार किले की सुरक्षा का सवाल केवल उसकी पत्थर की दीवारों तक सीमित नहीं है। किले की ओर आने वाला रास्ता, आसपास का दृश्य, भवनों की ऊंचाई, निर्माण की प्रकृति, पारंपरिक स्थापत्य से उनका मेल और पूरे क्षेत्र का urban development—सब महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसीलिए UNESCO ने 2025 में भी जैसलमेर किले और उसके buffer zone के संदर्भ में development pressure की समस्या को रेखांकित किया। World Heritage Committee ने कहा कि किले और उसके buffer zone में भवनों तथा भूखंडों का पूरा ownership register उपलब्ध न होना विकास के दबाव को नियंत्रित करने में बाधा बना हुआ है। समिति ने ownership register तैयार करने का कार्यक्रम लागू करने को कहा।

2025 में भी UNESCO की चिंता खत्म नहीं हुई

यह बात उन लोगों के लिए सबसे बड़ा आईना है जो यह मानकर बैठे हैं कि UNESCO का प्रमाणपत्र मिल गया और अब किले की जिम्मेदारी पूरी हो गई। नहीं। UNESCO World Heritage Committee के 2025 के निर्णय में जैसलमेर फोर्ट के लिए कई लंबित मुद्दे गिनाए गए। इनमें—Jaisalmer Fort Management Authority की स्थापना,

  • Site Management Plan का प्रभावी क्रियान्वयन,
  • visitor management,
  • risk preparedness,
  • स्थानीय आबादी के लिए livelihood planning,
  • comprehensive conservation plan,
  • ownership records,
  • heritage by-laws और
  • World Heritage property की स्थिति की निगरानी

जैसे विषय शामिल हैं। UNESCO ने यह भी दर्ज किया कि Jaisalmer Fort Management Authority अभी तक स्थापित नहीं हुई थी और भारत से इन मामलों में प्रगति की रिपोर्ट मांगी। भारत को 1 दिसंबर 2026 तक updated state-of-conservation report देने को कहा गया है, जिसे World Heritage Committee के 49वें सत्र में देखा जाना है। यह तारीख जैसलमेर के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अब सवाल यह है कि दिसंबर 2026 में भारत UNESCO को जैसलमेर के बारे में क्या रिपोर्ट देगा? क्या हम कहेंगे कि अतिक्रमण और अनधिकृत निर्माण पूरी तरह नियंत्रित हो चुके हैं? या फिर वही पुरानी फाइल UNESCO के सामने रखी जाएगी?

2013 से 2026 तक—UNESCO की चेतावनियों की टाइमलाइन

2013: Hill Forts of Rajasthan को UNESCO World Heritage List में शामिल किया गया। इसमें जैसलमेर किला भी शामिल है।

2015: UNESCO ने जैसलमेर किले के भीतर अवैध निर्माण को “rampant” बताते हुए चिंता जताई। कहा—इससे authenticity और integrity प्रभावित हो सकती है।

2018: UNESCO ने अनधिकृत निर्माणों और उनसे निपटने की कार्रवाई की जानकारी मांगी।

2021: UNESCO ने unauthorized construction और encroachment रोकने वाले नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने तथा नई सुविधाओं के लिए Heritage Impact Assessment की जरूरत बताई।

2025: UNESCO ने फिर development pressure, ownership records और Jaisalmer Fort Management Authority जैसे मुद्दों पर चिंता जताई।

1 दिसंबर 2026: भारत को जैसलमेर सहित Hill Forts of Rajasthan की स्थिति पर updated report UNESCO को देनी है।

क्या सोनार किला UNESCO की Danger List में जा सकता है?

यह सवाल अब काल्पनिक नहीं है। हालांकि वर्तमान में यह कहना गलत होगा कि जैसलमेर किला UNESCO की Danger List में डाल दिया गया है। ऐसा नहीं हुआ है। लेकिन UNESCO की प्रक्रिया में गंभीर खतरे की स्थिति में किसी विश्व धरोहर को World Heritage in Danger सूची में रखा जा सकता है। और यदि किसी स्थल की Outstanding Universal Value, integrity या authenticity पर गंभीर खतरा साबित होता है तथा संरक्षण व्यवस्था प्रभावी नहीं रहती, तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर कार्रवाई का विषय बन सकता है। यहां तक कि अंतिम स्थिति में किसी संपत्ति को World Heritage List से हटाया जाना भी UNESCO की व्यवस्था में संभव है। इसलिए यह डर फैलाने का मामला नहीं है। यह चेतावनी को समझने का मामला है।

लेकिन असली सवाल UNESCO से पहले जैसलमेर से है

हम UNESCO से यह उम्मीद क्यों करें कि वह हमारी धरोहर बचाए? क्या UNESCO की टीम आकर हर अवैध निर्माण रोकेगी? क्या पेरिस में बैठी विश्व धरोहर समिति जैसलमेर की गलियों में जाकर निर्माण रोक सकती है? नहीं। पहली जिम्मेदारी हमारी है। जिस शहर ने सोनार किले से अपनी पहचान बनाई, वहां के प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, पुरातत्व विभाग और नागरिक समाज को सबसे पहले तय करना होगा कि किला पर्यटन की कमाई का साधन है या आने वाली पीढ़ियों की विरासत। अगर विरासत है तो उसकी कीमत तय नहीं की जा सकती। अगर विरासत है तो उसके आसपास की जमीन केवल commercial opportunity नहीं हो सकती।अगर विरासत है तो किसी होटल की ऊंची दीवार सोनार किले की ऐतिहासिक छवि से ऊंची नहीं होनी चाहिए।

कुछ लोगों का स्वार्थ, पूरी दुनिया की धरोहर पर भारी क्यों?

जैसलमेर के लोगों को पर्यटन से रोजगार मिलता है। हजारों परिवार होटल, गाइड, हस्तशिल्प, टैक्सी, रेस्तरां और पर्यटन उद्योग से जुड़े हैं। इसलिए यह रिपोर्ट पर्यटन विरोधी नहीं है। बल्कि सवाल अव्यवस्थित और नियमविहीन पर्यटन विकास पर है। जो होटल नियमों के अनुसार बने हैं, जो heritage guidelines का पालन करते हैं और जो शहर की ऐतिहासिक पहचान का सम्मान करते हैं, वे जैसलमेर की अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। लेकिन यदि कोई व्यक्ति नियमों को ताक पर रखकर निर्माण करता है, फिर किसी प्रभावशाली नेटवर्क के सहारे उसे बचाने की कोशिश होती है और प्रशासन आंखें बंद कर लेता है, तो उसका नुकसान केवल एक सरकारी जमीन या एक सड़क को नहीं होता। उसका नुकसान जैसलमेर की सामूहिक विरासत को होता है। और यही वह बिंदु है जहां प्रशासन को कठोर होना पड़ेगा।

300 मीटर की बात में सावधानी जरूरी

जैसलमेर में किले के आसपास “300 मीटर” की चर्चा अक्सर होती है। यहां कानूनी स्थिति को सही समझना जरूरी है। AMASR कानून के तहत राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों के लिए 100 मीटर prohibited area और उसके आगे 200 मीटर regulated area का प्रावधान है। लेकिन इसे सीधे “UNESCO का 300 मीटर नियम” कहना सही नहीं होगा। UNESCO का buffer zone और भारतीय कानून के prohibited/regulated areas अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। जैसलमेर फोर्ट की UNESCO nomination documentation में लगभग 8 हेक्टेयर property के साथ 89 हेक्टेयर buffer zone का उल्लेख है। इसलिए किसी भी कथित अवैध होटल या निर्माण की वैधानिकता तय करने के लिए उसके स्थान, जमीन की स्थिति, स्वीकृति, निर्माण अनुमति, AMASR के प्रावधान, स्थानीय भवन नियम और UNESCO buffer-zone requirements—सभी को अलग-अलग जांचना जरूरी है।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी सवाल जिंदा है

राजस्थान हाईकोर्ट ने 2021 में किले और आसपास के अतिक्रमण हटाने तथा अवैध निर्माणों पर कार्रवाई के संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए थे। इसके बावजूद यदि आज भी किसी क्षेत्र में कथित अतिक्रमण मौजूद हैं तो पहला सवाल प्रशासन से होना चाहिए—अदालत के आदेश का कितना पालन हुआ?

दूसरा सवाल—

कितने अवैध निर्माण चिन्हित किए गए?

तीसरा—

कितने हटाए गए?

चौथा—

कितने मामलों में पानी और बिजली के कनेक्शन काटे गए?

पांचवां—

कितने मामलों में AMASR कानून के तहत कार्रवाई हुई?

और छठा सबसे बड़ा सवाल—

किसकी राजनीतिक या प्रशासनिक छत्रछाया में ऐसे निर्माण लंबे समय तक टिके रहे? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।

किले को बचाना है तो ‘अतिक्रमण हटाओ’ अभियान कागज से जमीन पर उतरे

अब समय केवल सर्वे कराने का नहीं है। जैसलमेर के लिए एक सार्वजनिक Heritage Protection Dashboard बनाया जा सकता है, जिसमें—किले और buffer zone का डिजिटल नक्शा,

  1. हर भवन की वैधानिक स्थिति,
  2. स्वीकृत निर्माण की जानकारी,
  3. कथित अतिक्रमणों की सूची,
  4. होटल/गेस्टहाउस की अनुमति स्थिति,
  5. निर्माण की ऊंचाई,
  6. भवन की heritage compliance,
  7. अदालतों में लंबित मामलों,
  8. हटाए गए अतिक्रमण और
  9. भविष्य के निर्माण की अनुमति

सार्वजनिक की जाए। जब सब कुछ पारदर्शी होगा तो संरक्षण केवल भाषण नहीं रहेगा।

अब जरूरत ‘किला बचाओ’ की राजनीतिक घोषणा नहीं, कठोर कार्रवाई की है

जैसलमेर का सोनार किला किसी एक परिवार, एक होटल कारोबारी, एक राजनीतिक दल या किसी सरकारी विभाग की संपत्ति नहीं है। यह दुनिया की साझा सांस्कृतिक विरासत है। UNESCO ने इसे इसलिए नहीं चुना था कि इसके आसपास आधुनिक कंक्रीट का जंगल खड़ा किया जाए। इसे इसलिए चुना गया क्योंकि यह रेगिस्तान में राजपूत स्थापत्य, इतिहास, संस्कृति और जीवंत नगरीय परंपरा का असाधारण उदाहरण है। अगर इसी पहचान को धीरे-धीरे व्यावसायिक निर्माण निगलता गया तो एक दिन हमारे पास UNESCO का बोर्ड तो रह जाएगा, लेकिन वह जैसलमेर नहीं रहेगा जिसके लिए UNESCO ने दरवाजा खोला था। सबसे खतरनाक अतिक्रमण वह नहीं होता जो एक दिन में पूरी जमीन घेर ले। सबसे खतरनाक अतिक्रमण वह होता है जो रोज थोड़ा-थोड़ा बढ़ता है और एक दिन पता चलता है कि मूल स्वरूप ही गायब हो गया। सोनार किले के साथ यही खतरा है।

अब सरकार को इन 10 सवालों के जवाब देने चाहिए

1. किले और UNESCO buffer zone में कुल कितने अतिक्रमण चिन्हित हैं?

2. इनमें से कितने निर्माणों को प्रशासन/ASI ने अवैध माना है?

3. कितने होटल/गेस्टहाउस के पास सभी वैधानिक अनुमतियां हैं?

4. कितने निर्माणों पर Heritage Impact Assessment हुआ?

5. हाईकोर्ट के 2021 के निर्देशों के बाद कितने अतिक्रमण हटाए गए?

6. कितने अवैध निर्माणों को पानी-बिजली कनेक्शन मिले और किस अनुमति के आधार पर?

7. क्या Jaisalmer Fort Management Authority अब तक पूरी तरह स्थापित और कार्यशील है?

8. किले और buffer zone के सभी भवनों का ownership register कब तक तैयार होगा?

9. दिसंबर 2026 में UNESCO को भेजी जाने वाली रिपोर्ट में जैसलमेर की वास्तविक स्थिति क्या बताई जाएगी?

10. यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति का निर्माण नियमों के विरुद्ध पाया जाता है तो क्या प्रशासन उसी कठोरता से कार्रवाई करेगा, जिस कठोरता से सामान्य नागरिक के खिलाफ करता है?

सबसे बड़ा सवाल—UNESCO का ताज बचेगा या केवल बोर्ड?

जैसलमेर के सामने आज विकल्प साफ है। एक तरफ है—विश्व धरोहर का दर्जा, ऐतिहासिक स्थापत्य, पर्यटन की दीर्घकालिक संभावनाएं और आने वाली पीढ़ियों की विरासत। दूसरी तरफ है—तात्कालिक व्यावसायिक लाभ, अतिक्रमण, अनियंत्रित निर्माण और नियमों को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति। यदि दूसरा रास्ता चुना गया तो नुकसान केवल आज की पीढ़ी का नहीं होगा। कल जब दुनिया का कोई पर्यटक सोनार किले की तस्वीर देखेगा तो उसे वह ऐतिहासिक जैसलमेर नहीं मिलेगा जिसे UNESCO ने विश्व धरोहर माना था। और तब शायद सवाल यह नहीं होगा कि—“UNESCO जैसलमेर किले को अपनी सूची से निकाल सकता है या नहीं?”

सवाल यह होगा—“हमने UNESCO को ऐसी स्थिति आने ही क्यों दी?” UNESCO ने चेताया है। हाईकोर्ट आदेश दे चुका है। दस्तावेज सामने हैं। कानून मौजूद है। अब केवल एक चीज की जरूरत है—ईमानदार इच्छाशक्ति की। क्योंकि सोनार किला किसी की निजी जागीर नहीं। यह जैसलमेर की आत्मा है। और आत्मा पर अतिक्रमण को विकास का नाम देना इतिहास के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा।

रिपोर्ट का तथ्यात्मक आधार:

UNESCO के 2015, 2018, 2021 और 2025 के आधिकारिक निर्णयों तथा राजस्थान हाईकोर्ट के उपलब्ध आदेशों को इसमें आधार बनाया गया है। विशेष रूप से 2025 का UNESCO निर्णय महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसमें 1 दिसंबर 2026 तक भारत से जैसलमेर की स्थिति पर अपडेट मांगा गया है।

दिलीप कुमार पुरोहित

ग्रुप एडिटर, राइजिंग भास्कर
जैसलमेर

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor