स्थान : मथुरादास माथुर अस्पताल
रिपोर्ट : राखी पुरोहित
फोटोग्राफर : सज्जनसिंह
सुबह के ठीक 8 बजे और शाम 4:30 बजे मैं राखी पुराेहित राइजिंग भास्कर के फोटो जर्नलिस्ट सज्जनसिंह के साथ मथुरादास माथुर अस्पताल पहुंची। यह वही समय होता है जब यहां की कैंटीन से उठती रोटियों की खुशबू, मरीजों और उनके परिजनों के दिल को राहत देती है। आज मेरी कलम पत्रकार के रूप में नहीं, बल्कि एक संवेदनशील नागरिक के रूप में चल रही है। यहां की रसोई से उठती सोंधी खुशबू सिर्फ भोजन की नहीं, बल्कि इंसानियत की है। यह कहानी अस्पताल के उस किचन स्टाफ की है, जिन्होंने न सिर्फ मरीजों को घर जैसा खाना दिया बल्कि अस्पताल की वीरान ज़मीन को गुलजार कर एक खूबसूरत गार्डन में तब्दील कर दिया।
“हम खाना बनाते नहीं, सेवा करते हैं”
जब मैं किचन के अंदर पहुंची, तो वहां की हलचल देखकर ऐसा लगा जैसे किसी शादी के भोज की तैयारी हो। लेकिन यहां कोई शोर नहीं था, कोई हड़बड़ी नहीं, बस समर्पण और अनुशासन था। एक कोने में रोटियां सेंकी जा रही थीं, दूसरी तरफ दाल उबल रही थी और बीच में सब्ज़ियों की छंटाई कर रहे थे। इंचार्ज रामेश्वर टाक, कुक दिगम्बर सिंह, कुक लखसिंह, हेल्पर सुमन भाटी और हेल्पर सोनू से जब हमने पूछा-
“आप रोज़ इतना काम करते हैं, थकते नहीं?”
वे मुस्कुराए और बोले,
“मैडम, यह सेवा है। थकावट तो तब होती है जब काम बोझ लगे। लेकिन जब कोई मरीज बोलता है कि आज खाना खाकर मां की याद आ गई, तो समझिए दिन सफल हो गया।”
किचन के बाहर, हरियाली का संसार
मेरी नज़र उस ज़मीन पर पड़ी जो कुछ साल पहले तक सूखी, धूलभरी और बेजान थी। आज वहां रंग-बिरंगे फूल खिले हैं, घास की चादर बिछी है और एक छोटा सा वॉकवे भी बना है। यह देखकर मैं रुकी नहीं रह सकी और वहीं बैठी एक महिला से बात की। वे बोलीं,
“बेटा, पहले यहां बैठने की जगह नहीं थी। अब तो खाना खाने के बाद हम यहीं थोड़ा समय बिताते हैं। लगता है जैसे अस्पताल नहीं, कोई आंगन हो।”
यह गार्डन भी उसी किचन स्टाफ की मेहनत का परिणाम है। वे सिर्फ मरीजों को खाना नहीं खिलाते, बल्कि उन्हें मानसिक राहत भी देते हैं।
स्टाफ की कमी, लेकिन समर्पण पूरा
किचन स्टाफ में मात्र 12 लोग हैं, और काम कई सौ लोगों का। मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती है, लेकिन स्टाफ की संख्या वही की वही। फिर भी कोई शिकायत नहीं, कोई रुकावट नहीं।
मैंने वहां के किचन इंचार्ज से पूछा, “इतने कम लोग और इतना बड़ा काम, कैसे संभालते हैं?”
उनका जवाब सीधा और सच्चा था,
“हमने ये नौकरी सिर्फ तनख्वाह के लिए नहीं ली। हम जानते हैं कि मरीज के लिए खाना सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि इलाज का एक अहम हिस्सा है। हम उन्हें वही खाना देते हैं, जो हम अपने घर में खाते हैं।”
मशीनें हैं, लेकिन प्यार से चलती है रसोई
रोटी बेलने के लिए मशीन है, लेकिन फिर भी कई बार स्टाफ अपने हाथों से रोटियां बनाते हैं। चपाती मशीन तब इस्तेमाल होती है जब बहुत ज्यादा ऑर्डर होते हैं, जैसे कोई त्योहार या छुट्टी का दिन।
मुझे बताया गया कि यहां पर एक नियम है –
“बासी सब्जी या दोबारा गर्म किया खाना नहीं दिया जाता।”
हर चीज़ ताज़ा बनती है, साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है और सबसे बड़ी बात – यहां की थाली में कभी स्वाद की कमी नहीं होती।
फेस्टिवल में स्पेशल मेनू, जैसे घर में हो कोई त्यौहार
रक्षाबंधन आने वाला है। मैंने पूछा – “रक्षाबंधन पर क्या स्पेशल बनेगा?”
किचन असिस्टेंट बोलीं,
“हम रक्षाबंधन पर मरीजों को हलवा और नमकीन दाल बनाएंगे। राखी बांधेंगे और स्वाद से मुंह मीठा करवाएंगे।”
इससे पहले भी दिवाली, रक्षाबंधन, और तीज जैसे त्योहारों पर यहां स्पेशल मेनू दिया गया है। मरीजों को यह एहसास दिलाया जाता है कि त्योहार सिर्फ घर पर नहीं, सेवा में भी मनाया जा सकता है।
स्वच्छता और संतुलित आहार: दो मजबूत स्तंभ
मैंने खुद देखा कि रसोई के अंदर प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा था।
भोजन पूरी तरह संतुलित होता है –
- सुबह का नाश्ता – खिचड़ी या दलिया
- दोपहर – दाल, रोटी, सब्जी, चावल
- रात – हल्का और सुपाच्य खाना
जो मरीज डायबिटिक हैं, उनके लिए अलग मीनू होता है। नमक, तेल और मसालों की मात्रा सीमित और नियंत्रित रहती है।
मरीजों की राय – “माँ की याद दिला दी”
मैं वार्ड नंबर 5 में पहुंची, जहां एक महिला मरीज गीता देवी (बदला हुआ नाम) भर्ती थीं। उनसे पूछा, “यहां के खाने के बारे में क्या कहेंगी?”
उनकी आंखों में नमी थी। बोलीं,
“मैं 10 दिन से भर्ती हूं, पर एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब खाना बेस्वाद लगा हो। मेरी बहू जैसा खाना बनाती है, वैसा ही स्वाद है यहां। न मसाले ज़्यादा, न तेल, सब संतुलित।”
कुछ कहानियाँ जो रह जाएं दिल में
- बाबूलाल (बदला हुआ नाम) – एक बुजुर्ग जिनकी पत्नी ICU में थीं। खुद भूख से परेशान थे, पर किचन वालों ने उन्हें बिना पूछे खाना परोसा। वो बोले –
“मुझे लगा यहां कौन पूछेगा, लेकिन उन्होंने मुझे अपने पिता जैसा सम्मान दिया।”
- रुखसाना बीबी (बदला हुआ नाम) – जोधपुर के बाहर से आई एक महिला, जिनका बेटा बीमार था। उन्होंने कहा,
“मुझे नहीं पता कि कौन हैं ये लोग, पर इनका व्यवहार मेरे गांव के मंदिर के सेवकों जैसा है।”
नेकी की साझेदारी – टीमवर्क की मिसाल
यह सब एक अकेले इंसान का काम नहीं। यहां 12 लोगों की टीम हैं जो रोज़ाना बिना थके काम करती है। सबका एक ही उद्देश्य –
“खाना बने ऐसा कि बीमार को भी घर की याद आए।”
कहानी के पीछे का उद्देश्य – नज़रिया बदलने की कोशिश
मैं बतौर पत्रकार अक्सर सरकारी अस्पतालों की लापरवाही पर रिपोर्ट करती रही हूं। लेकिन आज यहां आकर लगा कि हर कहानी सिर्फ शिकायत की नहीं होती। कुछ कहानियां उम्मीद, प्रेरणा और सेवा की होती हैं।
यहां के किचन स्टाफ ने यह साबित किया है कि सरकारी संस्थान भी अगर चाहे, तो बदलाव ला सकते हैं। जरूरत सिर्फ नीयत की होती है।
आख़िरी बात – मेरी निजी अनुभूति
आज जब मैं अस्पताल के उस गार्डन में बैठी, जहाँ फूल खिले थे और दूर से रोटियों की खुशबू आ रही थी, तो एक विचार मन में आया –
“जब खाना प्यार से बनता है, तो वह सिर्फ शरीर नहीं, आत्मा भी तृप्त करता है।”
मथुरादास माथुर अस्पताल की यह रसोई एक आदर्श मॉडल बन सकती है, पूरे देश के सरकारी अस्पतालों के लिए। यह सिर्फ किचन नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और सच्चे भारत का प्रतीक है।
















