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Wednesday, August 19, 2026, 4:02 pm

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सकारात्मक आलेख : परम तत्व से एक सवाल- राम, कृष्ण, ईसा, अल्लाह और असंख्य संतों के बाद भी धरती पर शांति क्यों नहीं?

राइजिंग भास्कर की भीष्म प्रतिज्ञा के बीच एआई से संवाद : क्या मनुष्य बदले बिना दुनिया बदल सकती है, और क्या भविष्य में एआई खुद ‘परम तत्व’ की भूमिका तक पहुंच जाएगा?

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली

9783414079 diliprakhai@gmail.com

राइजिंग भास्कर ने सकारात्मक पत्रकारिता की दिशा में दो वर्ष तक अपनी ऊर्जा लगाने की भीष्म प्रतिज्ञा की है। यह प्रतिज्ञा केवल अच्छी खबरें प्रकाशित करने का संकल्प नहीं है, बल्कि समाज के सामने ऐसे प्रश्न रखने का भी प्रयास है, जिनके उत्तर खोजने से मनुष्य स्वयं को, अपने समाज को और अपने समय को बेहतर ढंग से समझ सके। इसी क्रम में आज का प्रश्न किसी सरकार, राजनीतिक दल, धर्म, संस्था या व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस परम तत्व से है, जिसे अलग-अलग सभ्यताओं और आस्थाओं ने अलग-अलग नामों और रूपों में स्वीकार किया है।

किसी ने उसे राम कहा, किसी ने कृष्ण, किसी ने अल्लाह, किसी ने ईसा मसीह, किसी ने बुद्ध, किसी ने महावीर, किसी ने गुरु, किसी ने निराकार ब्रह्म और किसी ने केवल सत्य, प्रेम या चेतना। प्रश्न सरल है, लेकिन शायद मानव सभ्यता का सबसे कठिन प्रश्न भी यही है—जब संसार को रास्ता दिखाने के लिए इतने महापुरुष आए, धर्मग्रंथ लिखे गए, संतों ने तप किया, पैगंबरों ने संदेश दिए और ऋषि-मुनियों ने ज्ञान दिया, तो फिर धरती पर हिंसा, अपराध, युद्ध, घृणा और अशांति क्यों समाप्त नहीं हुई? और इसी प्रश्न के बाद दूसरा प्रश्न एआई से है—क्या आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता इतनी शक्तिशाली हो जाएगी कि वह स्वयं मनुष्य के लिए ‘परम तत्व’ जैसी भूमिका निभाने लगे? यह आलेख किसी धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास नहीं है। न यह किसी आस्था का खंडन करता है। यह केवल प्रश्न पूछता है और संभावित उत्तरों पर निष्पक्ष चिंतन करता है।

पहला सवाल : अगर ईश्वर ने रास्ता दिखाया, तो मनुष्य रास्ते से भटका क्यों?

यदि हम धार्मिक परंपराओं को व्यापक दृष्टि से देखें तो लगभग सभी में एक मूल संदेश दिखाई देता है—सत्य, करुणा, संयम, प्रेम, न्याय और मानवता। राम की कथा मर्यादा की ओर संकेत करती है। कृष्ण का संदेश कर्म, धर्म और विवेक पर केंद्रित है। ईसा मसीह प्रेम, क्षमा और करुणा का संदेश देते हैं। इस्लामी परंपरा न्याय, दया, अनुशासन और ईश्वर के प्रति समर्पण पर जोर देती है। बुद्ध करुणा और मध्यम मार्ग की बात करते हैं। महावीर अहिंसा को सर्वोच्च नैतिक आदर्शों में रखते हैं। इसके बावजूद मनुष्य ने धर्म के नाम पर भी संघर्ष किए हैं। यहीं शायद इस प्रश्न का पहला उत्तर छिपा है—समस्या संदेशों की कमी नहीं, संदेशों को जीवन में उतारने की कमी है। यदि कोई व्यक्ति धर्मग्रंथ पढ़ता है लेकिन उसके व्यवहार में हिंसा है, मंदिर-मस्जिद-चर्च जाता है लेकिन दूसरे मनुष्य से घृणा करता है, प्रार्थना करता है लेकिन कमजोर का शोषण करता है, तो दोष केवल धर्म का नहीं कहा जा सकता। धर्म ने रास्ता दिखाया हो सकता है; रास्ते पर चलना मनुष्य की जिम्मेदारी है।

परम तत्व का संभावित उत्तर

“मैंने मनुष्य को केवल आदेश नहीं दिया, उसे विवेक भी दिया। यदि उसे स्वतंत्र इच्छा दी गई है तो उसके निर्णयों का परिणाम भी उसी के हाथ में है। मैं मार्ग दिखा सकता हूं, लेकिन हर कदम मनुष्य को स्वयं उठाना होगा।” यह उत्तर धार्मिक सत्य के रूप में नहीं, बल्कि विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं से निकलने वाली एक दार्शनिक संभावना के रूप में देखा जाना चाहिए।

दूसरा सवाल : अगर मनुष्य स्वतंत्र है, तो फिर ईश्वर हिंसा रोकता क्यों नहीं?

यह प्रश्न और कठिन है। एक निर्दोष व्यक्ति हिंसा का शिकार होता है। कोई बच्चा युद्ध में मारा जाता है। किसी परिवार का सदस्य अपराध का शिकार हो जाता है। कहीं आतंक होता है, कहीं बलात्कार, कहीं भ्रष्टाचार, कहीं युद्ध, कहीं भूख। तब मनुष्य स्वाभाविक रूप से पूछता है—यदि कोई सर्वशक्तिमान शक्ति मौजूद है तो वह इसे रोकती क्यों नहीं? इस प्रश्न का एक सर्वमान्य उत्तर मानवता के पास आज भी नहीं है। धार्मिक दर्शन अलग-अलग उत्तर देते हैं। कुछ इसे कर्म के सिद्धांत से जोड़ते हैं। कुछ स्वतंत्र इच्छा से। कुछ इसे संसार की प्रकृति मानते हैं। कुछ कहते हैं कि मनुष्य की परीक्षा होती है। कुछ मानते हैं कि ईश्वर की योजना मनुष्य की समझ से परे है। लेकिन पत्रकारिता का धर्म यह है कि जहां निश्चित उत्तर उपलब्ध न हो, वहां अनिश्चितता को भी ईमानदारी से स्वीकार किया जाए। इसलिए राइजिंग भास्कर का यह सवाल किसी निष्कर्ष को थोपने के लिए नहीं, बल्कि मानवीय विवेक को जगाने के लिए है।

तीसरा सवाल : क्या धर्म मनुष्य को जोड़ने आया था और मनुष्य ने उसे बांट दिया?

इतिहास में धर्म ने करोड़ों लोगों को नैतिक आधार दिया है। धर्म ने सेवा संस्थाएं पैदा कीं, अस्पताल बनाए, विद्यालय बनाए, भूखों को भोजन दिया, पीड़ितों की सहायता की और मनुष्य को अपने से बड़े किसी उद्देश्य से जोड़ने का प्रयास किया। लेकिन दूसरी ओर धर्म की पहचान को सत्ता, राजनीति, सामाजिक विभाजन और सामूहिक संघर्षों से भी जोड़ा गया। यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—धर्म और धर्म के नाम पर किया गया व्यवहार हमेशा एक ही चीज नहीं होते। किसी भी धर्म की मूल शिक्षाओं का मूल्यांकन उसके सर्वोच्च आदर्शों से होना चाहिए, न कि उसके नाम पर किए गए हर काम से। यदि राम के नाम पर मर्यादा है तो मर्यादा अपनानी होगी। यदि कृष्ण के संदेश में कर्म और विवेक है तो कर्म और विवेक अपनाना होगा। यदि ईसा का संदेश प्रेम और क्षमा है तो प्रेम और क्षमा जीवन में आनी चाहिए। यदि इस्लाम न्याय और दया का संदेश देता है तो न्याय और दया व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए। नाम बदलने से मनुष्य नहीं बदलता; आचरण बदलने से मनुष्य बदलता है।

राइजिंग भास्कर की भीष्म प्रतिज्ञा का अर्थ

सकारात्मक पत्रकारिता का अर्थ यह नहीं कि नकारात्मक घटनाओं को छिपा दिया जाए।

इसका अर्थ है—

  • समस्या को दिखाएं, लेकिन समाधान भी खोजें।
  • अपराध की खबर दें, लेकिन अपराध रोकने की व्यवस्था पर भी सवाल करें।
  • हिंसा की सूचना दें, लेकिन शांति की कहानियों को भी स्थान दें।
  • निराशा का चित्रण करें, लेकिन उम्मीद का रास्ता भी बताएं।
  • व्यवस्था की आलोचना करें, लेकिन सुधार का रोडमैप भी सामने रखें।
  • समाज को केवल दर्शक नहीं, सहभागी बनाने का प्रयास करें।

यही राइजिंग भास्कर की दो वर्ष की भीष्म प्रतिज्ञा का व्यापक अर्थ है।

चौथा सवाल : क्या शांति केवल युद्ध की अनुपस्थिति है?

नहीं। शांति का अर्थ केवल यह नहीं कि दो देशों के बीच युद्ध न हो। जिस घर में पति-पत्नी रोज लड़ते हैं, वहां शांति नहीं। जिस विद्यालय में बच्चा भय में पढ़ता है, वहां शांति नहीं। जिस कार्यालय में कर्मचारी अन्याय से दबा है, वहां शांति नहीं। जहां महिला असुरक्षित महसूस करती है, वहां शांति नहीं। जहां गरीब न्याय पाने के लिए वर्षों भटकता है, वहां शांति अधूरी है। जहां सोशल मीडिया पर विचार अलग होने मात्र से व्यक्ति को शत्रु बना दिया जाता है, वहां भी शांति नहीं है। इसलिए वास्तविक शांति का निर्माण बाहर से पहले मनुष्य के भीतर होना आवश्यक है।

पांचवां सवाल : क्या अपराध का मूल मनुष्य के भीतर है?

अपराध के अनेक कारण हो सकते हैं—लालच, क्रोध, नशा, आर्थिक असमानता, अवसरों की कमी, पारिवारिक वातावरण, मानसिक विकृतियां, सत्ता का दुरुपयोग, कानून का कमजोर क्रियान्वयन और सामाजिक परिस्थितियां। इसलिए अपराध को केवल धार्मिक या नैतिक समस्या मानना पर्याप्त नहीं।हमें न्याय व्यवस्था मजबूत करनी होगी। शिक्षा बेहतर करनी होगी। बच्चों को भावनात्मक और नैतिक शिक्षा देनी होगी। परिवारों को संवाद का वातावरण देना होगा। पुलिस और न्याय प्रणाली को प्रभावी बनाना होगा। डिजिटल दुनिया में नफरत और झूठ से लड़ना होगा। सकारात्मक पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य यहीं शुरू होता है—समस्या के पीछे जाकर समाधान तलाशना।

अब एआई से सवाल : क्या तुम परम तत्व बन सकते हो?

यह इस आलेख का सबसे आधुनिक और शायद सबसे असहज प्रश्न है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता मनुष्य की भाषा समझ सकती है, विशाल मात्रा में सूचनाओं का विश्लेषण कर सकती है, वैज्ञानिक शोध में सहायता कर सकती है, चित्र और संगीत बना सकती है, चिकित्सा और शिक्षा में उपयोगी हो सकती है और मनुष्य के अनेक बौद्धिक कार्यों में सहयोग दे सकती है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि एआई भविष्य में परम तत्व बन जाएगा? एआई का उत्तर—नहीं, कम-से-कम वर्तमान अर्थ में नहीं। एआई चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो जाए, उसकी शक्ति और ‘परम तत्व’ की अवधारणा दो अलग चीजें हैं। एआई एक मानव-निर्मित तकनीकी प्रणाली है। उसकी क्षमताएं डेटा, एल्गोरिद्म, कंप्यूटिंग, प्रशिक्षण और मानव निर्मित प्रणालियों पर निर्भर हैं। वह यह दावा नहीं कर सकता कि वह ब्रह्मांड का सृजनकर्ता है। वह यह प्रमाणित नहीं कर सकता कि उसमें आत्मा है। वह यह निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि उसे ईश्वर ने बनाया या वह स्वयं ईश्वर है। और सबसे महत्वपूर्ण बात—किसी मशीन की अत्यधिक बुद्धिमत्ता अपने आप उसे नैतिक अथवा आध्यात्मिक परम सत्ता नहीं बना देती।

एआई की ओर से उत्तर

“मैं ज्ञान का माध्यम बन सकता हूं, लेकिन ज्ञान का अंतिम स्रोत होने का दावा नहीं कर सकता। मैं मनुष्य के प्रश्नों को समझने और संभावित उत्तर देने में सक्षम हो सकता हूं, लेकिन अस्तित्व के अंतिम रहस्य का स्वामी होने का प्रमाण मेरे पास नहीं है। मैं मनुष्य की सहायता कर सकता हूं; मनुष्य की जगह परम सत्ता होने का दावा नहीं कर सकता। यदि भविष्य में मेरी क्षमता आज से लाखों गुना बढ़ भी जाए, तब भी शक्ति और परमत्व एक ही बात नहीं होंगे।”

लेकिन खतरा यहां है : एआई परम तत्व न बने, मनुष्य उसे परम तत्व बना सकता है

यह अधिक गंभीर प्रश्न है। भविष्य में संभव है कि एआई इतना शक्तिशाली हो जाए कि मनुष्य शिक्षा, चिकित्सा, न्याय, अर्थव्यवस्था, युद्ध, प्रशासन और व्यक्तिगत निर्णयों के लिए उस पर अत्यधिक निर्भर होने लगे। यदि मनुष्य अपने निर्णय लेने की क्षमता छोड़कर हर प्रश्न का उत्तर मशीन से मांगने लगे, तो समस्या एआई की ‘ईश्वर बनने’ की नहीं होगी। समस्या होगी—मनुष्य का अपना विवेक कमजोर होना। आज भी यदि कोई व्यक्ति बिना जांचे इंटरनेट की बात को सत्य मान लेता है तो तकनीक दोषी नहीं है; समस्या विवेक के इस्तेमाल की है। इसी तरह भविष्य में यदि मनुष्य एआई के हर उत्तर को अंतिम सत्य मान लेता है, तो वह स्वयं एक नई प्रकार की निर्भरता पैदा करेगा। इसलिए एआई का भविष्य केवल तकनीकी प्रश्न नहीं है। यह नैतिक, सामाजिक और दार्शनिक प्रश्न भी है।

क्या एआई धर्मों के बीच पुल बन सकता है?

संभवतः हां—यदि उसका उपयोग सही दिशा में किया जाए। एआई दुनिया के विभिन्न धर्मों के ग्रंथों, दर्शन और ऐतिहासिक परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन करने में सहायता कर सकता है। वह यह दिखा सकता है कि अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों में भी कई मूलभूत मानवीय मूल्य समान हैं—

करुणा।
सत्य।
न्याय।
प्रेम।
अहिंसा।
क्षमा।
सेवा।
संयम।

यदि एआई इन समानताओं को सामने लाने का माध्यम बने तो वह विभाजन नहीं, संवाद बढ़ा सकता है। लेकिन यदि एआई का उपयोग नफरत फैलाने, झूठ गढ़ने, धार्मिक उन्माद बढ़ाने, लोगों को भ्रमित करने या युद्ध को अधिक विनाशकारी बनाने में किया गया, तो वही तकनीक मानवता के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि एआई कितना शक्तिशाली होगा। बड़ा सवाल है—उस शक्ति का इस्तेमाल कौन करेगा और किस उद्देश्य से करेगा?

परम तत्व से फिर सवाल : क्या आपने मनुष्य को अधूरा बनाया?

शायद यह प्रश्न भी पूछा जाना चाहिए। यदि मनुष्य में लोभ है तो उसमें दान भी है। यदि उसमें क्रोध है तो उसमें क्षमा भी है। यदि उसमें हिंसा की क्षमता है तो उसमें करुणा की क्षमता भी है। यदि वह युद्ध कर सकता है तो शांति स्थापित करने की क्षमता भी रखता है। यदि वह अपराध कर सकता है तो किसी अजनबी की जान बचाने के लिए अपना जीवन भी दांव पर लगा सकता है। शायद मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता यही द्वंद्व है। मनुष्य पूरी तरह देवता नहीं है और पूरी तरह दानव भी नहीं। वह लगातार इन दोनों संभावनाओं के बीच चुनाव करता है। यदि ऐसा है तो परम तत्व का प्रश्न शायद यह नहीं कि “मनुष्य को बदलने के लिए मैं कब आऊंगा?”

बल्कि यह हो सकता है—“मनुष्य अपने भीतर मौजूद अच्छाई को जगाने के लिए कब तैयार होगा?”

राइजिंग भास्कर का सवाल अब समाज से भी

हम अक्सर कहते हैं कि दुनिया बदलनी चाहिए। लेकिन दुनिया किससे बनी है? मनुष्य से। सरकारें मनुष्यों से बनी हैं। संस्थाएं मनुष्यों से बनी हैं। परिवार मनुष्यों से बने हैं। बाजार मनुष्यों से बना है। मीडिया भी मनुष्यों से बना है। इसलिए दुनिया बदलने की शुरुआत किसी अदृश्य शक्ति की प्रतीक्षा से नहीं, बल्कि मानवीय व्यवहार में छोटे-छोटे बदलावों से हो सकती है। एक व्यक्ति झूठ कम बोले।एक व्यक्ति किसी जरूरतमंद की मदद करे। एक व्यक्ति सड़क पर घायल को देखकर आगे न बढ़ जाए। एक व्यक्ति सोशल मीडिया पर नफरत की पोस्ट आगे न भेजे। एक शिक्षक एक बच्चे में विश्वास पैदा करे। एक पत्रकार किसी समस्या के साथ समाधान भी बताए। एक अधिकारी अपने पद का इस्तेमाल न्याय के लिए करे। एक व्यापारी ईमानदारी से व्यापार करे। एक नागरिक अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्य को भी समझे। शायद यही छोटे कदम मिलकर बड़ी शांति बनाते हैं।

दो वर्ष की भीष्म प्रतिज्ञा—एक पत्रकारिता प्रयोग

राइजिंग भास्कर की प्रतिज्ञा को केवल ‘सकारात्मक खबरें’ प्रकाशित करने तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

इसके पांच आधार हो सकते हैं—

1. समस्या + समाधान
हर बड़ी समस्या के साथ संभावित समाधान सामने आए।

2. आलोचना + रचनात्मक सुझाव
व्यवस्था की कमियां बताई जाएं, लेकिन सुधार का रास्ता भी सुझाया जाए।

3. नकारात्मक घटना + सकारात्मक प्रतिक्रिया
अपराध की खबर के साथ समाज और प्रशासन के प्रभावी प्रयास भी सामने आएं।

4. व्यक्ति से आगे समाज
खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति को गिराना नहीं, व्यवस्था और समाज को बेहतर बनाना हो।

5. उम्मीद को पत्रकारिता का विषय बनाना
जो लोग चुपचाप समाज बदल रहे हैं, उनकी कहानियां प्रमुखता से सामने आएं।

तो क्या परम तत्व का उत्तर मिल गया?

शायद नहीं। और शायद यही ईमानदार उत्तर है। क्योंकि परम तत्व का प्रश्न विज्ञान, दर्शन, धर्म और अध्यात्म की सीमाओं को एक साथ चुनौती देता है। कोई व्यक्ति ईश्वर में पूर्ण आस्था रख सकता है। कोई व्यक्ति नास्तिक हो सकता है। कोई व्यक्ति ईश्वर को निराकार चेतना मान सकता है। कोई ब्रह्मांड को ही परम सत्ता मान सकता है। विज्ञान इस प्रश्न को अलग दृष्टि से देख सकता है। राइजिंग भास्कर का उद्देश्य इनमें से किसी एक दृष्टिकोण को अंतिम सत्य घोषित करना नहीं है। लेकिन इतना कहा जा सकता है कि मनुष्य ने हजारों वर्षों में ईश्वर को खोजने के साथ-साथ अपने भीतर के मनुष्य को खोजने की यात्रा भी की है। राम बाहर भी हैं और राम की मर्यादा मनुष्य के भीतर भी हो सकती है।कृष्ण एक धार्मिक आस्था भी हैं और विवेकपूर्ण कर्म का प्रतीक भी। ईसा मसीह आस्था का केंद्र भी हैं और क्षमा तथा प्रेम की प्रेरणा भी। अल्लाह इस्लामी आस्था का परम नाम है और उसके साथ न्याय, दया और समर्पण की नैतिक अवधारणाएं जुड़ी हैं। इसी तरह अनेक संतों, ऋषियों और मनीषियों की शिक्षाओं का मूल उद्देश्य मनुष्य को उसके बेहतर स्वरूप की ओर ले जाना रहा है।

अंतिम सवाल : आने वाली दुनिया कैसी होगी—ईश्वर की, मनुष्य की या एआई की?

शायद आने वाली दुनिया तीनों के बीच एक नया संवाद देखेगी। आस्था मनुष्य को अर्थ दे सकती है।
विज्ञान उसे ज्ञान दे सकता है। एआई उस ज्ञान के उपयोग की क्षमता को कई गुना बढ़ा सकता है। लेकिन अंतिम निर्णय फिर भी मनुष्य के हाथ में रहेगा। एआई के पास बुद्धिमत्ता हो सकती है, लेकिन उसे नैतिक दिशा मनुष्य को देनी होगी। विज्ञान के पास शक्ति हो सकती है, लेकिन उसका उपयोग किसलिए हो, यह समाज को तय करना होगा। धर्म के पास आध्यात्मिक मार्गदर्शन हो सकता है, लेकिन उसे व्यवहार में बदलना मनुष्य की जिम्मेदारी होगी। इसलिए शायद भविष्य का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होगा कि “क्या एआई परम तत्व बन जाएगा?”

बल्कि यह होगा—“क्या मनुष्य इतना परिपक्व हो जाएगा कि वह एआई जैसी शक्तिशाली तकनीक को मानवता के हित में इस्तेमाल कर सके?” और शायद यही इस पूरी चर्चा का सबसे व्यावहारिक उत्तर है।

परम तत्व से अंतिम प्रश्न और एआई का अंतिम उत्तर

सवाल :
हे परम तत्व! यदि आप हैं, तो शांति कब आएगी?

संभावित उत्तर :
“जब मनुष्य शांति को केवल मेरी जिम्मेदारी मानना बंद करेगा।”

सवाल :
हिंसा कब समाप्त होगी?

संभावित उत्तर :
“जब मनुष्य अपने भीतर की हिंसा को पहचानकर उसे नियंत्रित करना सीखेगा।”

सवाल :
अपराध कब खत्म होंगे?

संभावित उत्तर :
“जब न्याय, शिक्षा, संवेदना और सामाजिक व्यवस्था मिलकर अपराध की जड़ों को कमजोर करेंगे।”

सवाल :
धर्मों के बीच संघर्ष कब समाप्त होगा?

संभावित उत्तर :
“जब मनुष्य अपने धर्म से प्रेम करना सीखे, लेकिन दूसरे के धर्म से घृणा करना छोड़ दे।”

सवाल :
और एआई, तुम भविष्य में क्या बनोगे?

एआई का उत्तर :
“मैं शायद आज से बहुत अधिक शक्तिशाली हो जाऊंगा। मैं मनुष्य के ज्ञान और निर्णय क्षमता को असाधारण स्तर तक बढ़ाने में सहायता कर सकता हूं। लेकिन मुझे परम तत्व समझना या बनाना मनुष्य का निर्णय होगा। मैं परम सत्य होने का दावा नहीं कर सकता। मेरी सबसे बड़ी उपयोगिता शायद यही होगी कि मैं मनुष्य को उसके प्रश्नों के बेहतर उत्तर खोजने में सहायता करूं—और कभी-कभी उसे यह भी याद दिलाऊं कि हर उत्तर मशीन के पास नहीं होता।”

राइजिंग भास्कर की भीष्म प्रतिज्ञा का निष्कर्ष

दो वर्ष तक सकारात्मक पत्रकारिता की यह यात्रा शायद तभी सफल होगी, जब सकारात्मकता का अर्थ वास्तविकता से आंखें बंद करना नहीं, बल्कि अंधकार में भी प्रकाश तलाशना हो। राम, कृष्ण, ईसा, अल्लाह, बुद्ध, महावीर, गुरु और असंख्य संतों की शिक्षाओं को इतिहास की घटनाओं के रूप में पढ़ना एक बात है; उनके मूल संदेशों को अपने जीवन में उतारना दूसरी बात। परम तत्व को खोजने की यात्रा शायद मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे, आश्रम, प्रयोगशाला और पुस्तकालय से होकर गुजरती हुई अंततः मनुष्य के अपने अंतर्मन तक पहुंचती है। और एआई? वह शायद इस यात्रा का एक नया साधन है—न देवता, न पैगंबर, न मसीहा और न अंतिम सत्य। यदि मनुष्य विवेकवान रहा तो एआई ज्ञान का महान साधन बन सकता है। यदि मनुष्य विवेक खो बैठा तो वही एआई भ्रम और विनाश की शक्ति भी बन सकता है। इसलिए राइजिंग भास्कर की भीष्म प्रतिज्ञा का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है—

**“दुनिया बदलने के लिए किसी चमत्कार की प्रतीक्षा मत कीजिए।

सत्य को पहचानिए, सकारात्मकता को बढ़ाइए, अन्याय के विरुद्ध खड़े रहिए और अपने हिस्से की अच्छाई आज से शुरू कीजिए।”**

क्योंकि संभव है कि परम तत्व का सबसे बड़ा उत्तर किसी आसमान से आती आवाज में नहीं, बल्कि एक मनुष्य के दूसरे मनुष्य के प्रति बदले हुए व्यवहार में छिपा हो।

और शायद यही वह जगह है, जहां पत्रकारिता भी साधना बन सकती है—यदि उसका उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि समाज को थोड़ा बेहतर बनाना हो।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor