कवि : डॉ. राजगोपाल करवा, सोलापूर
मोबाइल : ९४२०४९०४१४
“घर भरा हुआ… फिर भी मन अकेला”
(जीवन की शाम में मिला एक सीधा-सा सत्य…)
रातभर बारिश होती रही। सुबह उठा, तब आसमान अभी भी बादलों से भरा हुआ था। हवा में ठंडक थी; पर उस ठंडक के साथ एक अनजानी उदासी भी थी।
कॉफी का कप हाथ में लेकर मैं दीवानखाने में बैठ गया। अख़बार खोला; पर ध्यान अक्षरों से ज़्यादा घर भर में फैली उस ख़ामोशी पर ही जा रहा था।
कभी गुलज़ार रहने वाला यह घर आज विचित्र रूप से शांत था।
नाती-पोते पढ़ाई के लिए बाहर निकल चुके थे। बेटा और बहू दोनों डॉक्टर होने के कारण सुबह से ही अपने काम में व्यस्त थे।
घर में मैं अकेला ही था। कोई हलचल नहीं थी, कोई आवाज़ नहीं थी। उस ख़ामोशी ने अनजाने में मन को छू लिया।
रिटायर होने के बाद मैं ख़ुद को थोड़ा अलिप्त रखना सीख गया हूं। बिना पूछे सलाह न देना, बेवजह दख़ल न देना, यही मेरी भूमिका है।
मेरे शौक़ हैं, पढ़ना है, लिखना है; इसलिए वक़्त गुज़र जाता है।
पर उस सुबह इस एकांत ने अनजाने में अकेलेपन का रूप ले लिया।
और मन बीते हुए दिनों में खो गया।
यही घर कभी लोगों से, हंसी से और बातों से भरा रहता था। आने-जाने वालों की चहल-पहल, रसोई से आती बर्तनों की आवाज़, बच्चों की भागदौड़, हंसी-मज़ाक, मेहमानों का तांता…
तब…
जीना जीवंत था।
जीना सार्थक था।
जीना एक-दूसरे के लिए था।
और जीने में आनंद था।
वक़्त आगे बढ़ता गया। बच्चे बड़े हुए। उन पर ज़िम्मेदारियां बढ़ीं। उनके परिवार का दायरा बढ़ता गया। यह सब बिल्कुल स्वाभाविक था।
हमने भी उन्हें तकलीफ़ न हो, इसलिए पीछे हटना शुरू किया।
बेवजह दख़ल नहीं दी।
धीरे-धीरे साथ बैठना कम हुआ।
साथ खाना कम हुआ।
बातचीत भी अनजाने में कम होती गई।
न प्यार कम हुआ, न ही आदर।
पर…साथ रहना कम हो गया।
आंखों में आंखें डालकर बात करने के पल कम हुए।
स्पर्श कम हुआ।
इस बदलाव के असर इतने गहरे महसूस होंगे, इसकी तब कल्पना भी नहीं थी।
आज नाती-पोते भी बड़े हो गए हैं। वे अपनी दुनिया में रम गए हैं। बच्चे अपनी ज़िम्मेदारियों में व्यस्त हैं।
कुछ साल पहले मेरी जीवनसंगिनी भी हमेशा के लिए चली गई।
और मैं अब …सबके साथ रहते हुए भी, अकेला ही रहता हूं।
मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं और वैसी कोई वजह भी नहीं। बच्चे मेरा दिल से ख़याल रखते हैं। दवाई, खाना-पीना, सेहत—हर चीज़ पर उनकी नज़र रहती है।
मुझ पर उनका प्यार है। मेरे प्रति आदर है और श्रद्धा भी।
इसीलिए मेरी पीड़ा उपेक्षा की नहीं है।
“वह है भावनात्मक साथ की।”
कभी लगता है, किसी दिन सब मिलकर आराम से खाना खाएं। साथ में एक चाय पिएं। कहीं साथ में टहलने जाएं। कुछ ख़ास बात नहीं करनी होती; बस साथ बैठना होता है।
कभी लगता है…मेरे कंधे पर हाथ रखकर कोई इतना ही कहे—पापा, हम हैं ना! चिंता मत कीजिए।
सच कहूं… अब बस यही छोटी-सी उम्मीद है।
पर यह अभी भी नहीं हो पाता। बच्चे अपने काम में बहुत व्यस्त हैं और मैं भी शुरू से आत्मनिर्भर होने के कारण, शायद उन्हें लगता नहीं कि मुझे ऐसे साथ की ज़रूरत है।
सालों से घटती जा रही बातचीत और साथ के कारण अनजाने में थोड़ी दूरी बन गई है।
जो भी वजह हो, वह हो; पर अकेलेपन ने मुझे अच्छी तरह घेर लिया है। इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का रास्ता मुझे अभी तक नहीं मिला।
कभी-कभी मन में एक सवाल भी उठता है।
मैं अपने पेशेवर जीवन में इतना व्यस्त था कि बच्चों को उनके बचपन में पर्याप्त समय नहीं दे सका। आज उनका भी जीवन उतना ही व्यस्त है।
क्या यह वक़्त का न्याय है?
या जीवन का चक्र ऐसे ही घूमता रहता है?
सच में…मेरे पास इसका जवाब नहीं है।
आज मुझे किसी भी भौतिक सुख की कमी नहीं है।
प्यार करने वाला परिवार है। सुरक्षा है। आदर है। सब कुछ है।
फिर भी मन कहता है—
इंसान सिर्फ़ दवाइयों से नहीं जीता।
वह बातचीत से जीता है।
अपनेपन के स्पर्श से जीता है।
प्रेमपूर्ण साथ से जीता है।
ढलती उम्र में ज़रूरत पैसों की नहीं होती;
वह होती है वक़्त की।
एक प्रेमभरी नज़र की।
एक भरोसेमंद स्पर्श की।
पांच-दस मिनट के दिल से दिए गए साथ की।
वह किसी भी दवा से ज़्यादा असरदार होती है।
मेरे मन में बच्चों को लेकर कोई शिकायत नहीं है, कोई उम्मीदों का बोझ भी नहीं। बल्कि, इतने अच्छे बच्चे मिलना मेरा सौभाग्य है।
बस एक एहसास है—
जीवन के उत्तरार्ध में इंसान घर में कुछ नहीं ढूंढता;
वह अपने अपनों के मन में अपनी थोड़ी-सी जगह ढूंढता है।
और उस जगह तक पहुंचने का सबसे आसान रास्ता है—
चार प्यार भरे शब्द,
दो पलों का साथ,
एक भरोसेमंद स्पर्श,
और बस इतना-सा वाक्य—
“पापा, हम हैं ना!”
क्योंकि दवाइयां शरीर को सहारा देती हैं;
पर साथ, बातचीत और प्यार का स्पर्श मन को जीने की ताक़त देते हैं।
जीवन की शाम में इंसान को ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए…
बस इतना ही लगता है—
घर लोगों से भरा हो… और सबका मन भी।
क्योंकि….
यह “खुशी से जीने के साथ-साथ, खुशी से विदा होने का”
एक “प्रिस्क्रिप्शन” है।
कौन सही, कौन गलत…
वह ऐसा है – वह वैसा है
कौन जाने कौन कैसा है
हम अपनी सोच से जीते हैं
वह अपनी सोच से जीता है
कौन सही और कौन गलत
इसका फैसला करेगा कौन?
हर किसी का
अपना तरीका है जीने का
अपना तरीका है सोचने का
वह सोच कितनी सच या गलत
यह ठहराए कौन?
हम अपने हिसाब से जीना चाहते हैं
वक्त अपने हिसाब से चलता है।
कल क्या होगा, यह कौन जाने
यह तो बस ऊपर वाला ही जानता है।
हम सब यह समझते हैं,
हमें यह सब मालूम है,
पर सब कुछ मैं ही कर रहा हूं,
यह गलतफहमी हमें समझाएं कौन।
इसलिए जब तक समय है
जिंदगी जी भर जी ले
लेकिन थोड़ी समझदारी से जीना।
क्योंकि अब की हुई गलतियां
जीवन की संध्या को अक्सर कठिन बना देती हैं।
जैसे उम्र बढ़ती है
वैसे यह चीज समझ आने लगती है।
हम लाख योजना बना लें
जो होना है वही होता है।
और उम्र की शाम में
हम हर चीज ऊपर वाले के हाथ में छोड़ देते हैं।
यह समझदारी जिसमें आ गई
उसने सचमुच जीना सीख लिया।
“वह जिंदगी के शाम को
शांति से विदा कर पाएगा।”
जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान
सब कुछ पा लेने में नहीं,
बल्कि जो मिला है उसे स्वीकार करने में है।
कर्म हमारा अधिकार है,
परिणाम समय और ईश्वर के हाथ में है।
जो बदला जा सके, उसे बदलने का साहस रखो;
जो बदला न जा सके, उसे स्वीकारने का धैर्य रखो।
और दोनों में अंतर समझना ही—
जीवन की सबसे बड़ी साधना है।
आईना…
ज़िंदगी है कितनी सुंदर,
न कहीं दुःख, न कोई परेशानी,
न कोई भागदौड़, न कोई उलझन,
फिर भी मन में एक शांत-सा शून्य है।
जब आईने के सामने खड़े होकर
खुद को गौर से देखा,
तब समझ आया…
दुनिया जीतने का सफ़र तो पूरा हो गया,
लेकिन स्वयं को खोजने का सफ़र…
अभी भी बाकी है।
दोस्त तो रोज़ मिलते हैं,
हँसते हैं, खुलकर बातें भी करते हैं,
पर मन खोलकर बात कर सकूँ,
ऐसा अपना कौन है?
मन कहता है, “विश्वास करो”,
बुद्धि कहती है, “ज़रा ठहरो”;
इन्हीं दोनों के द्वंद्व में
ज़िंदगी का हर आज बीत जाता है।
हमेशा अपने मन के अनुसार जिया,
कर्तव्य निभाने से कभी पीछे नहीं हटा,
पर उत्तरदायित्व की राह पर
आख़िर किसका हाथ थामूँ?
सबको साथ लेकर चलना ही
हमेशा मेरा संकल्प रहा,
दूसरों की सफलता में ही
मेरी खुशी की साँस बसी रही।
रिश्ते-नाते पास तो होते हैं,
यह भी एक सच्चाई है,
पर समय आने पर
हर किसी का अपना अलग सफ़र होता है।
ईश्वर का ऋणी हूँ कि
ऐसा परिवार मिला,
जहाँ प्रेम, विश्वास और स्नेह का
सदा मधुर सहवास रहा।
अब न किसी की कमी है,
न किसी सहारे की आस,
अपने ही घर में मिला है
शांत और समृद्ध निवास।
आईने में तो केवल चेहरा दिखाई देता है,
पर मन का पता कहाँ मिलता है?
जिस दिन स्वयं से सच्ची मुलाक़ात हो जाएगी,
उसी दिन जीवन सचमुच एक उत्सव बन जाएगा।
और जब मैं खुद से मिल गया
तो फिर “तेरा और मेरा”
पीछे रह गया
और फिर “मैं” भी खो गया
और शेष रह गया बस
केवल एक शांत अस्तित्व……
हमसफर…..
हमसफ़र होता कोई, तो बांट लेते दूरियां,
राह चलते लोग भला, क्यों समझे मेरी मजबूरियां।
साथ निभाने वाला साथी यदि आपके साथ है,
तो उससे साथ निभाना उतना ही जरूरी है।
पर… जिंदगी भी अजीब .है….
जो इंसान सबसे करीब होता है,
ना हम उनकी बहुत फिक्र करते हैं,
ना उन्हें वह उचित सम्मान दे पाते हैं,
क्योंकि उन्हें शायद हम “सहज मान” लेते हैं।
मगर हमारी किस्मत इतनी अच्छी होती है,
उनके प्रति हमारी सोच कैसे भी हो,
वह हमारा दिल से खयाल रखती हैं,
क्योंकि उसका दिल बहुत निर्मल होता है।
हां… हम भी उनसे अव्यक्त प्यार करते हैं,
हरपल दिल से उनके बारे में सोचते हैं,
उनके मन में उतरने की कोशिश करते हैं
फिर भी अक्सर दिल दिमाग पर हावी होता है,
क्योंकि दिमाग की अपनी प्राथमिकता होती है।
एक उम्र तक दिमाग दिल पर हावी रहता है,
जैसे ही जिंदगी की संध्या होने लगती है,
दुनिया अपनी राह पकड़ लेती है।
और हमें अकेलापन महसूस होने लगता है
अब मन में सवाल उठता है कि ऐसा कौन है?
जिसका साथ हमेशा बना रहेगा
तब हमें अपने उस साथी की याद आती है,
जो हर मोड़ पर बिना शर्त साथ खड़ा रहा।
शायद अब दिल दिमाग पर हावी होता है।
इसलिए जो हमसफर है आपके साथ,
आपकी भावनाओं को बिना कहे समझते हैं।
आप उनका हाथ कभी मत छोड़ना।
और फिर…..
ना पड़ेगी जरूरत किसी गैरों की ,
जो आपको समझने का दिखावा करते थे।
भीड़ तो हर मोड़ पर मिल जाएगी,
‘अपना’ कहने वाले भी नजर आएंगे।
पर जो खामोशी में भी सुन लेते हैं दिल की बात,
ध्यान रखना….वही जीवन का सच्चा हमसफ़र होता है।
“चुपके से खो हुई दोस्ती…”
कभी-कभी…
जो हमेशा साथ रहते थे,
बिना कुछ कहे भी साथ निभाते थे,
दिल की बात समझ लेते थे,
वे अचानक रुक जाते हैं।
क्योंकि…
हमने उनकी दोस्ती को सहज ही मान लिया था।
हमें उनके साथ की कीमत समझ नहीं आई।
उनके अपनापन को हमने हल्के में लिया,
और उनके बड़े दिल की कद्र नहीं कर पाए।
शायद वह बदनसीब था,
जिसे उसे समझने वाला दोस्त नहीं मिला।
या फिर मैं ही बदनसीब था,
कि एक सच्चा और निष्कलंक दोस्त मिलने के बाद भी
मैं उसे संभाल नहीं पाया।
लेकिन…
ऐसा कब तक चलता?
धीरे-धीरे…
एक-दूसरे के लिए समय कम पड़ने लगा।
दिल खोलकर होने वाली बातें कम होने लगीं।
रिश्तों की नमी भी धीरे-धीरे सूखने लगी।
शायद हमने दोस्ती को
हमेशा के लिए मान लिया था।
कभी सोचा ही नहीं था कि
इसमें दूरी भी आ सकती है।
जो बातें कभी रातभर चला करती थीं,
वे अब कुछ मिनटों की फोन तक सिमट गईं।
अनजाने में…
शायद इसी वजह से
दोस्ती में एक छोटी-सी दरार पड़ गई।
और उस दरार को बड़ा करने के लिये,
आसपास हितैषियों की कोई कमी नहीं थी।
क्योंकि हमारी निस्वार्थ दोस्ती
बहुतों की आँखों में चुभती थी।
फिर…
जो हम रोज़ मिला करते थे,
वे अब केवल “हाय-हैलो” तक रह गए।
कंधे पर रखा अपनापन भरा हाथ
अब औपचारिक हाथ मिलाने में बदल गया।
वह पीठ मूळ कर गया कि,
और हम फिर अपने-अपने संसार में खो जाते।
आज भी इसका बहुत दुःख होता है।
शायद उसे भी होता होगा।
लेकिन सच तो यही है कि
इसके लिए कोई और नहीं,
हम ही जिम्मेदार थे।
कभी विचारों के मतभेद,
तो कभी काम, पैसा और शोहरत के पीछे भागे…
इन्हीं सबके बीच
जिन रिश्तों को संभालना था,
वे हाथों से कब फिसल गये,
हमें पता ही नहीं चला।
और उसकी कीमत अबतक हम चुका रहे हैं।
पहले जैसे सच्चे और निष्कलंक दोस्त
जरूरी नहीं दोबारा मिलते।
हाथ अनजाने में ढीला पड़ गया-
और दोस्ती में दूरी कब आ गई,
हमें पता ही नहीं चला।
सच कहूँ तो…
आज लगता है,
क्या उस समय इतना कठोर निर्णय लेना
और फिर उस पर दोबारा न सोचना
क्या यह सही था?
शायद उस समय हममें इतनी परिपक्वता नहीं थे।
और इस सवाल का जवाब…
आज भी मेरे पास नहीं है।
हाँ…
हम फिर से मिलने की कोशिश कर रहे हैं।
कभी-कभी मिल भी लेते हैं।
लेकिन…
उन मुलाकातों की सहजता,
उन बातों की मासूम खुशी,
और एक-दूसरे के साथ मिलने वाला
मन की शांति का सुकून…
उसमें थोड़ी कमी महसूस होती है।
इंसान भले ही दूर हो गया हो,
लेकिन उसका एहसास बना रहता है।
उसकी प्यारी-सी मौजूदगी-
दिल में हमेशा बसी रहती है।
उसकी हँसी धीरे से कानों में गूँज जाती है।
उसकी यादें-
मन के किसी शांत कोने में
आज भी खामोश… जिंदा रहती हैं।
और कभी-कभी अचानक…
वह पुरानी दोस्ती आँखों में यूँ ही तैर जाती है…
बिल्कुल किसी “ब्लैक एंड व्हाइट” फिल्म की तरह…
“दोस्त…”
ना हो अगर दोस्त,
तो खुशियां नहीं होती
तेरा साथ ना हो, तो फिर
जिंदगी जैसे थम-सी जाती है
तुम साथ रहते हो तो
किसी के सहारे की जरूरत नहीं होती
तुम उस वक्त बहुत याद आते हो
जब कोई आसरा नहीं होता
दिल में कितना सुकून होता है
जब कभी कोई दोस्त ऐसे ही मिलता है
दिन में खुशियां भर जाती है
जैसे कोई जन्नत मिली हो
आप तो ईश्वर की सुंदर दिन हो..
उस कृपा को नाम क्या दें हमॽ
तुही मेरा सुख और तू ही मेरी शांती…
फिर इस जिंदगी को और क्या अर्थ दें हमॽ
चैन मिलती है तुमसे मिलने के बाद
तू दूर रहे तो जिंदगी बेहाल होती है।
तेरे बिना साॅंस भी उधार सी लगती है
क्योंकि मेरा अस्तित्वही तेरे बिना अधूरा है।
तू नहीं तो मैं कौन हूं?
इसका जवाब आजही मेरे पास नही क्योंकि
मेरे हाथ की हर लकीर
तेरे नाम की ही लिखी है।
दोस्त को सिर्फ “दोस्त” कहना
शायद यह नाइन्साफी होगी
खुदा को किसने देखा है?
पर मेरे लिए तू तो जिंदा खुदा है
ऐ दोस्त…
क्या लिखूं तेरे बारे में
या क्या कहूं तेरे बारे में
तू ही मेरे दिल की धड़कन है
तू ही मेरी जन्नत है।
खुदा का हम शुक्रगुजार अदा करते हैं
क्योंकि उसने हसीन दुनिया बनाई
पर वह सच का खुदा इसलिए कहलाता है
क्योंकि उसने…
दुनिया को “दोस्त” नाम का फरिश्ता दिया है।
तू साया बनके हर कदम मेरे साथ चलता है,
तेरे होने से ही मेरा हर लम्हा सॅंवरता है।
माँगूँ क्या खुदा से अब कोई नई दुआ,
जब मेरी हर दुआ में
‘तू’ ही ‘दोस्त’ बनके मिलता है।
“मंज़िल…”
जो करना है,
वो हमें ही करना है,
फिर किसी के भरोसे क्यों चलें?
मंज़िल तक वो क्या पहुँचाएगा,
जिसने खुद कभी
अपनी राह पर चलकर ही नहीं देखी…
मंज़िल की ओर जाते हुए
रास्ता भी हमें खुद समझना होगा,
हर मोड़ को पहचानना होगा,
अपनी गति का भी अंदाज़ रखना होगा
और सबसे ज़रूरी—
अपने सफ़र की दिशा भी
हमें खुद तय करनी होनी।
फिर हम किसी के भरोसे पर क्यों चलें?
कभी-कभी
जिसके भरोसे हमें चलना होता है,
उसे ही खुद पर विश्वास नहीं होता,
या फिर
उसे अपनी ही राह का अता-पता नहीं होता।
किस पर, कितना और कैसा भरोसा रखें,
इसका कोई मापदंड नहीं होता।
इसका जवाब तो वक्त ही देता है,
क्योंकि कुछ चीज़ें हमारे हाथ में होती ही नहीं।
और अगर
हमें ही अपनी मंज़िल पता न हो,
तो कोई दूसरा हमें वहाँ तक कैसे पहुँचा सकता है?
दूसरे के सहारे मंज़िल तक पहुँच भी गए,
तो शायद
वह मंज़िल हमारी हो, यह ज़रूरी नहीं।
अपनी राह हमें खुद चुननी होगी,
तभी
अपनी मंज़िल तक पहुँचा जा सकेगा।
इसलिए सबसे पहले
खुद को पहचानो,
खुद पर भरोसा रखो,
अपनी ताकत को समझो,
अपनी मंज़िल तय करो…
फिर राह कितनी भी कठिन हो,
किसी के सहारे की उम्मीद किए बिना—
खुद पर विश्वास रखते हुए चलते रहो।
क्योंकि…
अपनी राह हम खुद जानते हैं,
उसका मापदंड भी हमारे पास होता है,
और उसका जवाब भी…हमें वर्तमान ही देता है।
मंज़िल तक वो क्या पहुँचाएगा,
जिसने खुद कभी राह पर चलकर ही नहीं देखा…
दरअसल…
मंज़िल तक वही पहुँचेगा,
जिसे अपनी राह और ‘खुद’ का पता है।
“जिंदगी…”
एक दिन मैंने जिंदगी से पूछा —
“तू सबसे नाराज़ क्यों रहती है?”
जिंदगी शांत रही।
मैंने फिर पूछा —
“तू इतनी नाराज़ क्यों रहती है?”
तब वो हँसकर बोली —
अरे दोस्त, मैं किसी से नाराज़ नहीं।
न किसी ने मेरा कुछ बिगाड़ा,
न मैंने किसी का।
देख…
मैंने तो सबको अच्छी और हसती खेलती,
दिल खुश रहने वाली, और प्यारीसी जिंदगी दी है।
मैंने हर किसी की थाली में
सुख-दुःख, प्यार-नफ़रत,
संतोष-अशांति,
दोस्ती-दुश्मनी,
मेहनत-आलस,
स्वार्थ-परमार्थ
यह सब परोस कर रखा है।
अब क्या लेना, क्या छोड़ना,
यह तुम्हारी मर्ज़ी है।
इसमें मेरी क्या गलती?
हर इंसान अपनी मर्ज़ी से जीता है,
फैसले भी उसके,
और कर्म भी उसीके होते हैं,
फिर उनके नतीजों के लिए
मैं कैसे जिम्मेदार ठहरूं?
तब मैंने पूछा —
“फिर लोगों को शांति क्यों नहीं मिलती?”
जिंदगी बोली —
क्योंकि वो अपनी मर्ज़ी में ही उलझे रहते हैं।
बात बड़ी सीधी है…
जैसी उनकी मर्ज़ी,
वैसी उनकी जिंदगी।
मैं तो रोज़ एक नया मौका देती हूं।
अच्छी मर्ज़ी रखो,
अच्छे कर्म करो,
एक-दूसरे से तुलना मत करो
और खुश रहने का संकल्प करो।
बीते हुए कल से सीखो – पर उसमें उलझे मत रहो।
आज को खुलकर जियो,
कल का रास्ता खुद बनाओ।
एक बात याद रखो —
जिंदगी हमें नहीं गढ़ती,
बल्कि, हम खुद अपनी मर्ज़ी से
जिंदगी को आकार देते हैं।
इसलिए दोस्तो…
मुझसे नाराज़ मत होना,
सही मर्ज़ी चुनो।
हर सुबह…
एक नई रोशनी लेकर आएगी।
सबको हँसती-खेलती,
आज़ाद, बेफ़िक्र
और खूबसूरत जिंदगी मिले!
यही दिल से दुआ है!
दुख… मेरा गुरु”
दुख समझने के लिए होता है,
दुख सीखने के लिए होता है,
हमें और परिपूर्ण
और मज़बूत बनाने के लिए होता है।
दुख आए तो हम
यूँ ही बेचैन हो जाते हैं;
उससे बेवजह लड़ने से,
उसका बोझ ढोकर थकने से बेहतर है,
उससे हँसते हुए दोस्ती कर लेना।
फिर दुख भी हल्का हो जाता है,
और मन भी…
दुख आए तो…
उसे निगलना सीखो,
उसे शांति से पचाना सीखो,
दुख का बाज़ार नहीं सजाना होता,
और अगर सजाया तो…
अपनी ही नीलामी तय है।
दुख के साथ यह दोस्ती
हमें समझदार बनाती है,
मन से सुदृढ़ बनाती है,
और…
संकटों पर विजय पाने की
एक नई ताक़त देती है।
दुख इंसान को गढ़ता है,
जीने में निडर बनाता है,
और सबसे ज़रूरी बात—
इंसान को स्वाभिमानी बनाता है।
जिनकी वजह से दुख मिलता है,
उनकी असली पहचान होती है;
कौन अपना है,
किसका बस साथ है
यह भी दुख ही सिखा जाता है।
किसे थामे रखना है
और क्या सहज छोड़ देना है…
अपेक्षाओं की सीमा समझ आती है,
और अपनी ताक़त का
भीतर ही भीतर एहसास होता है।
दुख सिर्फ़ दुख नहीं होता,
वह अनुभव की एक तिजोरी होती है,
हालात से भिड़ने की पूँजी होती है,
जीना सिखाने वाली गीता होती है।
दुख होता है इसीलिए
सुख की क़ीमत समझ आती है;
दोनों को समभाव से देखने की
एक सुंदर कला मिल जाती है।
सुख हमेशा नहीं टिकता,
और दुख भी अमर नहीं होता;
दोनों जैसे आते हैं वैसे ही जाते हैं,
ज़िंदगी का चक्र चलाते रहते हैं।
इन्हें स्वीकार कर संतुलन से जी सकें,
तो शायद…
यही खुश रहने का –
सबसे सुंदर रास्ता है।
इसीलिए,
दुख आए तो भी जीवन मत रोको;
उसी को अपना गुरु मानकर,
हँसते हुए जीना सीखो।
क्योंकि—
ए दुनिया, तू फिर मुझसे लड़ेगा कैसे?
मैंने तो दुख को ही अपना लिया है;
ज़िंदगी की बची हुई राह पर,
अब बस…
शांति और सुकून ही मिलने वाला है।


