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Saturday, August 29, 2026, 9:40 am

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शुगर ड्रिंक्स से पेट के कैंसर का खतरा ढाई गुना ज्यादा! मीठे पेय सिर्फ डायबिटीज-हार्ट डिजीज नहीं, पेट के लिए भी बढ़ा सकते हैं जोखिम


30 साल तक 1.12 लाख लोगों पर हुई रिसर्च में सामने आया चौंकाने वाला संबंध, महिलाओं में जोखिम करीब 3 गुना; विशेषज्ञों ने लेबल देखकर ही पेय चुनने की दी सलाह

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

गर्मी हो या थकान, ठंडा मीठा पेय, पैकेज्ड जूस, फ्लेवर्ड कॉफी या कोई सॉफ्ट ड्रिंक आज की जीवनशैली का हिस्सा बन चुके हैं। कई लोग इन्हें सामान्य पेय समझकर नियमित रूप से सेवन करते हैं। लेकिन एक अध्ययन में मीठे पेय पदार्थों को लेकर ऐसी जानकारी सामने आई है, जो इनके लगातार सेवन को लेकर चिंता बढ़ाती है। अध्ययन के मुताबिक, शुगर ड्रिंक्स का अधिक सेवन पेट के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम से जुड़ा पाया गया है।

करीब 1.12 लाख लोगों पर लगभग 30 वर्षों तक नजर रखकर किए गए शोध में मीठे पेय और पेट के कैंसर के बीच संबंध का अध्ययन किया गया। इसमें महिलाओं में यह जोखिम लगभग तीन गुना, जबकि पुरुषों में करीब दो गुना बताया गया। हालांकि, किसी अध्ययन में पाया गया संबंध यह साबित नहीं करता कि केवल मीठा पेय पीने से ही कैंसर होता है। कैंसर का जोखिम कई अन्य कारणों पर भी निर्भर करता है।

30 साल तक 1.12 लाख लोगों पर नजर, सामने आए पेट के कैंसर के 278 मामले

शोध में शामिल करीब 1.12 लाख लोगों (68,311 महिलाएं और 42,973 पुरुष) पर 30 से अधिक वर्षों तक नजर रखी गई। इस लंबी अवधि के दौरान पेट के कैंसर के 278 मामले सामने आए। अध्ययन में मीठे पेय के सेवन और कैंसर के मामलों के बीच संबंध का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि अधिक मात्रा में शुगर ड्रिंक का सेवन करने वालों में पेट के कैंसर का जोखिम बढ़ा हुआ पाया गया। महिलाओं में यह संबंध पुरुषों की तुलना में अधिक मजबूत बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं में जोखिम करीब तीन गुना, जबकि पुरुषों में लगभग दो गुना पाया गया। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पेट का कैंसर कई बार शुरुआती चरण में स्पष्ट लक्षण नहीं देता। ऐसे में खान-पान और जीवनशैली की आदतों पर ध्यान देना कैंसर से बचाव की व्यापक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

सिर्फ डायबिटीज और हार्ट डिजीज तक सीमित नहीं है मीठे पेय का खतरा

आमतौर पर ज्यादा चीनी वाले पेय पदार्थों को मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोग जैसी समस्याओं से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन लगातार अधिक चीनी का सेवन शरीर में कई तरह के चयापचय संबंधी बदलावों से जुड़ा हो सकता है। मीठे पेय पदार्थों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनमें कैलोरी काफी हो सकती है, लेकिन पेट भरने का एहसास अपेक्षाकृत कम होता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति दिनभर में अपनी जरूरत से अधिक कैलोरी ले सकता है। लंबे समय तक ऐसी आदत वजन बढ़ने और शरीर में चयापचय संबंधी गड़बड़ियों का कारण बन सकती है। मोटापा और कई अन्य स्वास्थ्य स्थितियां अलग-अलग प्रकार के कैंसर के जोखिम से जुड़ी हुई हैं। इसलिए मीठे पेय को केवल ‘एक ड्रिंक’ मानकर नजरअंदाज करना सही नहीं है।

महिलाओं में करीब 3 गुना जोखिम क्यों? यह सवाल अभी महत्वपूर्ण

अध्ययन में महिलाओं में मीठे पेय और पेट के कैंसर के बीच संबंध पुरुषों की तुलना में अधिक बताया गया है। यह अंतर स्वास्थ्य विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण विषय हो सकता है। हालांकि केवल इस आंकड़े के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि महिलाओं में मीठे पेय सीधे तीन गुना कैंसर का कारण बनते हैं। इसके पीछे हार्मोन, शरीर की संरचना, खान-पान, वजन, शारीरिक गतिविधि, अन्य जीवनशैली कारक या अध्ययन में शामिल लोगों की अलग-अलग विशेषताएं भूमिका निभा सकती हैं। इसलिए इस तरह के आंकड़ों को समझते समय ‘जोखिम से संबंध’ और ‘सीधा कारण’ के बीच अंतर समझना जरूरी है।

किड्स ड्रिंक्स में छिपी चीनी भी चिंता का विषय

बच्चों और किशोरों द्वारा पसंद किए जाने वाले कई पेय पदार्थों में मौजूद चीनी की मात्रा भी दिखाई गई है। उदाहरण के तौर पर स्पोर्ट्स ड्रिंक, फ्लेवर्ड कॉफी, आइस्ड टी, चॉकलेट मिल्क और फ्लेवर्ड योगर्ट जैसे उत्पादों में काफी मात्रा में चीनी हो सकती है।
रिपोर्ट में कुछ पेय पदार्थों की एक सर्विंग में लगभग 32 से 50 ग्राम या उससे अधिक चीनी होने का उल्लेख है। कुछ उत्पादों में यह मात्रा करीब 8 से 13 छोटी चम्मच चीनी के बराबर बताई गई है। यही कारण है कि किसी पेय की बोतल या पैकेट देखकर केवल उसका नाम या स्वाद ही नहीं, बल्कि उसका Nutrition Facts/पोषण लेबल पढ़ना जरूरी है।

लेबल पर ‘शुगर’ शब्द नहीं लिखा तो भी सावधान

कई बार उपभोक्ता यह मान लेते हैं कि यदि पैकेट पर सीधे ‘Sugar’ शब्द प्रमुखता से नहीं लिखा है तो उसमें चीनी नहीं होगी। ऐसा जरूरी नहीं है। ऐसे कई नाम है जिनसे पता चल सकता है कि उत्पाद में मीठा करने वाले पदार्थ मौजूद हैं। इनमें सुक्रोज, हाई-फ्रक्टोज कॉर्न सिरप, माल्टोज, डेक्सट्रोज, ग्लूकोज सिरप और ब्राउन शुगर जैसे नाम शामिल हो सकते हैं। इसलिए पैकेज्ड ड्रिंक या खाद्य पदार्थ खरीदते समय केवल सामने लिखे विज्ञापन पर भरोसा करने के बजाय पीछे दिए गए Ingredients और Nutrition Information को पढ़ना अधिक उपयोगी है।

फलों का जूस भी हमेशा ‘हेल्दी ड्रिंक’ नहीं

लोग अक्सर पैकेज्ड फ्रूट ड्रिंक और वास्तविक फल के बीच अंतर नहीं करते। किसी उत्पाद पर फल की तस्वीर लगी होने का मतलब यह नहीं कि उसमें ताजे फल के बराबर पोषण मौजूद है। कुछ फ्रूट ड्रिंक्स में प्राकृतिक फल के अलावा अतिरिक्त चीनी भी हो सकती है। वहीं पूरे फल में फाइबर मौजूद होता है, जो जूस में कम या बिल्कुल नहीं रह सकता। इसलिए नियमित रूप से मीठे पैकेज्ड पेय लेने के बजाय पानी, बिना अतिरिक्त चीनी वाले पेय और पूरे फलों को प्राथमिकता देना बेहतर विकल्प हो सकता है।

‘जीरो शुगर’ या ‘शुगर-फ्री’ लिखे उत्पादों को भी समझकर खरीदें

आज बाजार में ‘जीरो शुगर’, ‘नो एडेड शुगर’ और ‘शुगर-फ्री’ जैसे दावे करने वाले अनेक उत्पाद उपलब्ध हैं। लेकिन उपभोक्ताओं को इन शब्दों का अर्थ समझना चाहिए। किसी उत्पाद में सामान्य चीनी कम होने का मतलब यह नहीं कि वह हर व्यक्ति के लिए स्वतः स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है। उसमें अन्य स्वीटनर, सोडियम या दूसरे घटक हो सकते हैं। इसलिए पैकेट पर लिखे प्रचारात्मक दावों के बजाय पूरी सामग्री सूची और पोषण संबंधी जानकारी देखना अधिक समझदारी है।

बच्चों में आदत बनना सबसे बड़ी चुनौती

मीठे पेय पदार्थों का नियमित सेवन बच्चों और किशोरों में खास चिंता का विषय हो सकता है। छोटी उम्र में अगर हर दिन सॉफ्ट ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, फ्लेवर्ड मिल्क या अन्य मीठे पेय लेने की आदत बन जाती है तो भविष्य में इसे बदलना मुश्किल हो सकता है।
माता-पिता बच्चों को मीठे पेय की जगह सामान्य पानी, दूध या बिना अतिरिक्त चीनी वाले विकल्पों की आदत डाल सकते हैं। जन्मदिन, पार्टी या विशेष अवसर पर कभी-कभार सेवन और रोजाना सेवन में भी अंतर समझना जरूरी है।
क्या पूरी तरह छोड़ना जरूरी है? किसी एक अध्ययन के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि हर व्यक्ति को किसी खास पेय को पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। लेकिन नियमित रूप से अधिक चीनी वाले पेय पीना कम करना निश्चित रूप से स्वास्थ्य के लिहाज से एक समझदारी भरा कदम हो सकता है। विशेषज्ञों की सामान्य सलाह यही रहती है कि व्यक्ति अपने कुल आहार, वजन, शारीरिक गतिविधि और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों को ध्यान में रखकर खान-पान की आदतें बनाए। यदि कोई व्यक्ति रोज कई बार मीठे पेय पीता है तो सबसे पहले उनकी संख्या और मात्रा कम करना एक व्यावहारिक शुरुआत हो सकती है।

पेट के कैंसर से बचाव के लिए सिर्फ ड्रिंक नहीं, पूरी जीवनशैली देखें

पेट के कैंसर का जोखिम केवल किसी एक खाद्य पदार्थ या पेय से निर्धारित नहीं होता। इसके पीछे उम्र, आनुवंशिक कारक, संक्रमण, खान-पान, धूम्रपान, शराब, मोटापा और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारक भी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए मीठे पेय कम करने के साथ संतुलित आहार, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ वजन बनाए रखना और तंबाकू जैसे जोखिम कारकों से दूरी बनाना महत्वपूर्ण है। मीठे पेय स्वाद में आकर्षक जरूर होते हैं, लेकिन उनका नियमित और अधिक सेवन स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बन सकता है। जिस अध्ययन में करीब 1.12 लाख लोगों पर 30 वर्षों तक नजर रखी गई, उसमें शुगर ड्रिंक्स और पेट के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम के बीच संबंध सामने आया है। खासतौर पर महिलाओं में करीब तीन गुना और पुरुषों में करीब दो गुना जोखिम का उल्लेख किया गया है। हालांकि इन आंकड़ों को कारण-परिणाम का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—प्यास बुझाने के लिए मीठे पेय को रोजमर्रा की आदत बनाने के बजाय पानी और कम चीनी वाले विकल्पों को प्राथमिकता देना बेहतर है।

स्वास्थ्य मंत्र: पैकेट की खूबसूरत तस्वीर नहीं, उसके पीछे लिखा लेबल पढ़िए—क्योंकि एक पेय में छिपी चीनी आपकी रोज की डाइट का बड़ा हिस्सा हो सकती है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor