23 प्रजातियों की गणना में सामने आई वन्यजीव विविधता, नीलगाय सबसे अधिक; लंगूर दूसरे स्थान पर
जोधपुर। राजस्थान के जंगलों में वन्यजीवों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वर्ष 2026 में वन विभाग की ओर से की गई वन्यजीव गणना में राज्य में कुल 2 लाख 73 हजार 221 वन्यजीव दर्ज किए गए हैं। गणना के दौरान 23 प्रकार की वन्यजीव प्रजातियों को शामिल किया गया। आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्षों की तुलना में वन्यजीवों की संख्या में वृद्धि हुई है, जो प्रदेश के वन क्षेत्रों में वन्यजीव विविधता और प्राकृतिक आवास की स्थिति की ओर संकेत करती है।
वन्यजीव गणना के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2024 में 2 लाख 53 हजार 713, वर्ष 2025 में 2 लाख 71 हजार 813 और वर्ष 2026 में 2 लाख 73 हजार 221 वन्यजीव दर्ज किए गए। यानी तीन वर्षों में वन्यजीवों की संख्या में करीब 19 हजार से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। वर्ष 2025 की तुलना में भी 2026 में वन्यजीवों की संख्या बढ़ी है।
23 प्रजातियों की हुई गणना
वन्यजीव गणना 2026 में राज्य की विभिन्न वन्यजीव प्रजातियों को शामिल किया गया। इनमें नीलगाय, सियार, जंगली सूअर, इंडियन ग्रे नेवला, नीलगाय, चीतल, स्पॉटेड डियर, लंगूर, जंगली बिल्ली, खरगोश, भारतीय लोमड़ी, स्लॉथ बीयर, ब्लैकबक, चिंकारा, गोल्डन जैकाल, साही, सांभर, तेंदुआ, गीदड़, मगरमच्छ, मगर, भेड़िया, और अन्य वन्यजीव शामिल रहे।
वन विभाग हर साल वाटरहोल के आधार पर वन्यजीवों की गणना करता है। इस दौरान जंगलों में मौजूद जलस्रोतों और उनके आसपास वन्यजीवों की गतिविधियों का अवलोकन किया जाता है। इस बार भी अलग-अलग क्षेत्रों में वन्यजीवों की मौजूदगी के आधार पर आंकड़े तैयार किए गए।
नीलगाय सबसे अधिक, लंगूर दूसरे स्थान पर
2026 की गणना में नीलगाय सबसे अधिक संख्या में दर्ज की गई। आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में करीब 66,355 नीलगाय दर्ज हुईं। इसके बाद लंगूर करीब 55,533, चिंकारा 32,761, जंगली सूअर 23,811, चीतल 23,435 और काला हिरण 20,177 की संख्या दर्ज की गई। इन प्रमुख प्रजातियों की संख्या को देखें तो राजस्थान के अलग-अलग वन क्षेत्रों में शाकाहारी वन्यजीवों की बड़ी आबादी मौजूद है। चिंकारा और काला हिरण जैसे वन्यजीव राजस्थान के शुष्क और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों की प्राकृतिक पहचान से भी जुड़े हुए हैं।
प्राकृतिक आवास बढ़ाना बड़ी चुनौती
वन्यजीवों की संख्या में बढ़ोतरी के साथ उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वन्यजीवों के लिए जंगल, घासभूमि, जलस्रोत और आसपास के प्राकृतिक क्षेत्र महत्वपूर्ण आवास उपलब्ध कराते हैं। यदि इन क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों का दबाव बढ़ता है तो वन्यजीवों के सामने भोजन, पानी और सुरक्षित आवास की समस्या पैदा हो सकती है। गणना से सामने आए आंकड़े बताते हैं कि वन्यजीवों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इनके संरक्षण के लिए जंगलों और उनके आसपास के प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखना जरूरी है। वन विभाग की ओर से जलस्रोतों के संरक्षण और वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की निगरानी को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
तेंदुओं की संख्या भी बढ़ी
राजस्थान में तेंदुओं की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई है। वाटरहोल गणना में पिछले तीन सालों के आंकड़ों की तुलना में तेंदुओं की संख्या बढ़ने की बात सामने आई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में करीब 925 तेंदुए दर्ज किए गए थे, जबकि इसके बाद संख्या में वृद्धि हुई। तेंदुआ राजस्थान के कई वन क्षेत्रों में पाया जाता है और बदलते प्राकृतिक वातावरण में इसकी मौजूदगी वन्यजीव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वन विभाग के लिए तेंदुए जैसे मांसाहारी वन्यजीवों के संरक्षण के साथ उनके प्राकृतिक आवास और शिकार-आधार को सुरक्षित रखना भी आवश्यक है।
अगले वर्षों में संरक्षण पर रहेगा जोर
वन्यजीव गणना से प्राप्त आंकड़े वन विभाग के लिए संरक्षण और प्रबंधन की योजनाएं तैयार करने में उपयोगी होते हैं। किस क्षेत्र में कौन-सी प्रजाति अधिक है और किन क्षेत्रों में संख्या में बदलाव हुआ है, इसके आधार पर वन्यजीव संरक्षण की रणनीति बनाई जा सकती है। राजस्थान जैसे विशाल और विविध भौगोलिक क्षेत्र वाले राज्य में वन्यजीव संरक्षण के लिए जंगलों के साथ-साथ घासभूमि, जलस्रोत और वन क्षेत्रों से जुड़े प्राकृतिक आवासों का संरक्षण जरूरी है। 2026 की गणना में 2.73 लाख से अधिक वन्यजीवों का दर्ज होना प्रदेश की वन्यजीव विविधता की तस्वीर प्रस्तुत करता है। आने वाले वर्षों में इन प्रजातियों की संख्या और उनके प्राकृतिक आवास में होने वाले बदलावों पर निगरानी वन्यजीव संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।