केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने 30 मई 2025 के आदेश में संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया था कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के चार महीने के भीतर विभागीय कार्यवाही पूरी कर अंतिम निर्णय पारित किया जाए। अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि निर्धारित समय में विभागीय कार्यवाही पूरी नहीं होती और अंतिम आदेश पारित नहीं किया जाता, तो जांच अथवा विभागीय कार्यवाही समाप्त मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में अनुशासनात्मक प्राधिकारी को आगे कार्यवाही जारी रखने का अधिकार नहीं रहेगा।
राजस्थान सरकार हाईकोर्ट जाती है तो क्या होगा? विभागीय जांच (Disciplinary Proceedings) को समय-सीमा के भीतर पूरा करने और तय समय में ऐसा न होने पर जांच के स्वतः समाप्त (Lapse) हो जाने के कानूनी सिद्धांत पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) के कई ऐतिहासिक और मार्गदर्शक फैसले (Precedents) मौजूद हैं। यदि राजस्थान सरकार इस मामले को हाईकोर्ट लेकर जाती है, तो पंकज चौधरी का पक्ष इन चुनिंदा नजीरों के आधार पर बेहद मजबूत रहेगा
दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
राजस्थान कैडर के आईपीएस अधिकारी पंकज कुमार चौधरी से संबंधित विभागीय कार्यवाही में देरी का मामला केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), जयपुर पीठ के समक्ष पहुंचा। अधिकरण ने 8 अक्टूबर 2026 को पारित आदेश में अवमानना याचिका को बंद कर दिया। अधिकरण ने कहा कि विभागीय कार्यवाही निर्धारित समय में पूरी नहीं होने और अंतिम आदेश पारित नहीं किए जाने की स्थिति में क्या परिणाम होंगे, यह उसके पूर्व आदेश में ही स्पष्ट किया जा चुका था। इसी आधार पर अधिकरण ने अवमानना संबंधी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने का कोई कारण नहीं पाया।
यह मामला विभागीय जांच को लंबे समय तक लंबित रखने, न्यायिक आदेश के अनुपालन और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ा है। अधिकरण के आदेश के अनुसार, संबंधित विभागीय आरोप-पत्र वर्ष 2018 में मामूली दंड के लिए जारी किया गया था, लेकिन लगभग सात वर्ष तक कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद पंकज कुमार चौधरी ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण में मूल आवेदन दायर किया था। अधिकरण ने 30 मई 2025 को इस मामले में विभागीय कार्यवाही पूरी करने और अंतिम आदेश पारित करने के लिए चार महीने की समय-सीमा निर्धारित की थी।
2018 में जारी हुआ था आरोप-पत्र
अधिकरण के आदेश में दर्ज तथ्यों के अनुसार, पंकज कुमार चौधरी से संबंधित विभागीय आरोप-पत्र वर्ष 2018 में जारी किया गया था। यह मामला मामूली दंड से संबंधित था। इसके बावजूद लंबे समय तक विभागीय कार्यवाही का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका। विभागीय जांच के लंबे समय तक लंबित रहने का मुद्दा अधिकरण के सामने आने पर इस बात को रेखांकित किया गया कि आरोप-पत्र जारी होने के लगभग सात वर्ष बाद भी कार्यवाही पूरी नहीं हुई थी। इसी पृष्ठभूमि में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने मूल आवेदन संख्या OA/266/2025 में 30 मई 2025 को आदेश पारित किया। अधिकरण ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे विभागीय कार्यवाही पूरी करें और निर्धारित अवधि के भीतर अंतिम आदेश जारी करें। इस आदेश में केवल कार्यवाही पूरी करने का निर्देश ही नहीं दिया गया था, बल्कि समय-सीमा का पालन नहीं होने की स्थिति में होने वाले परिणाम भी स्पष्ट कर दिए गए थे।
चार महीने में अंतिम निर्णय देने का निर्देश
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने 30 मई 2025 के आदेश में संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया था कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के चार महीने के भीतर विभागीय कार्यवाही पूरी कर अंतिम निर्णय पारित किया जाए। अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि निर्धारित समय में विभागीय कार्यवाही पूरी नहीं होती और अंतिम आदेश पारित नहीं किया जाता, तो जांच अथवा विभागीय कार्यवाही समाप्त मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में अनुशासनात्मक प्राधिकारी को आगे कार्यवाही जारी रखने का अधिकार नहीं रहेगा। इस आदेश का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह था कि अधिकरण ने संबंधित आवेदक को भी विभागीय कार्यवाही में भाग लेने और सहयोग करने का निर्देश दिया था। इस प्रकार आदेश में दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां निर्धारित की गई थीं। एक ओर संबंधित अधिकारियों को चार महीने के भीतर कार्यवाही पूरी करनी थी, वहीं दूसरी ओर आवेदक से भी कार्यवाही में भाग लेने और सहयोग करने की अपेक्षा की गई थी।
समय-सीमा की गणना को लेकर वकील ने रखा पक्ष
अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान आवेदक की ओर से अधिवक्ता अनुपम अग्रवाल ने अधिकरण के समक्ष पक्ष रखा। आदेश के अनुसार, अधिवक्ता ने बताया कि 30 मई 2025 के आदेश की प्रति 2 जून 2025 को प्राप्त हुई थी। इसी आधार पर चार महीने की समय-सीमा निर्धारित होने का उल्लेख किया गया। अधिकरण ने अपने आदेश में पूर्व निर्देश के दोनों हिस्सों को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। पहला, विभागीय कार्यवाही पूरी कर अंतिम आदेश चार महीने के भीतर पारित करना था। दूसरा, निर्धारित समय में ऐसा नहीं होने पर विभागीय जांच समाप्त हो जानी थी और अनुशासनात्मक प्राधिकारी आगे कार्यवाही करने का अधिकार खो देता। इस प्रावधान का महत्व इसलिए भी था, क्योंकि विभागीय कार्यवाही को समय पर पूरा करने के निर्देश के साथ ही समय-सीमा का उल्लंघन होने पर उसके परिणाम भी पहले से तय कर दिए गए थे।
राजस्थान सरकार ने अपने जवाब में क्या बताया?
अवमानना याचिका में प्रतिवादी संख्या दो के रूप में राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास की ओर से दाखिल जवाब का भी उल्लेख किया गया है। आदेश के अनुसार, मुख्य सचिव की ओर से प्रस्तुत जवाब के पैराग्राफ चार में बताया गया कि सक्षम प्राधिकारी ने आवेदक के विरुद्ध आंशिक रूप से सिद्ध आरोपों की जांच के बाद निंदा (Censure) का दंड देने का प्रारंभिक निर्णय लिया था। इस प्रस्तावित दंड के संबंध में 7 मई 2025 को पत्र के माध्यम से संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को मामला भेजा गया था। इसके बाद यूपीएससी ने 1 सितंबर 2025 को अपनी सलाह दी। आदेश में दर्ज विवरण के मुताबिक, इसके बाद आवेदक को प्रस्तावित दंड के संबंध में अपना पक्ष रखने और अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के लिए पत्र जारी किया गया। जवाब में कहा गया कि आवेदक की ओर से कोई अभ्यावेदन प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके बाद 17 दिसंबर 2025 को आवेदक के विरुद्ध निंदा का दंडादेश जारी किया गया। यह विवरण राजस्थान सरकार की ओर से प्रस्तुत जवाब का हिस्सा है। इसे अधिकरण के समक्ष रखे गए सरकारी पक्ष के रूप में समझा जाना चाहिए।
निंदा का दंडादेश और चार महीने की समय-सीमा का सवाल
मामले का एक प्रमुख कानूनी पहलू यह है कि अधिकरण के 30 मई 2025 के आदेश में विभागीय कार्यवाही और अंतिम आदेश के लिए चार महीने की समय-सीमा निर्धारित की गई थी। वहीं, सरकार की ओर से प्रस्तुत जवाब में बताया गया कि अंतिम दंडादेश 17 दिसंबर 2025 को जारी किया गया। इस प्रकार सरकारी जवाब में उल्लिखित दंडादेश की तारीख और पूर्व आदेश में तय समय-सीमा के बीच का अंतर मामले का महत्वपूर्ण तथ्य है। हालांकि, अवमानना याचिका बंद करते समय अधिकरण ने यह नहीं कहा कि विभागीय कार्यवाही समय पर पूरी कर ली गई थी। अधिकरण ने इस बात पर ध्यान दिया कि समय-सीमा का पालन नहीं होने की स्थिति में होने वाले परिणाम उसके पहले आदेश में पहले ही निर्धारित किए जा चुके थे। अधिकरण के अनुसार, यदि निर्धारित अवधि के भीतर कार्यवाही पूरी नहीं होती और अंतिम आदेश पारित नहीं किया जाता, तो जांच समाप्त होने तथा अनुशासनात्मक प्राधिकारी के आगे कार्यवाही करने का अधिकार समाप्त होने का प्रावधान लागू होता है। यही कारण था कि अधिकरण ने अवमानना के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने की आवश्यकता नहीं समझी।
सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए अधिकारी
अधिकरण के आदेश में यह भी उल्लेख है कि पीठ के 18 सितंबर 2026 के निर्देश पर राजस्थान सरकार के गृह विभाग (ग्रुप-12) में उप सचिव गोविंद प्रसाद जयपुर स्थित सचिवालय से व्यक्तिगत रूप से अधिकरण के समक्ष उपस्थित हुए। वे मामले में अधिकरण की सहायता के लिए उपस्थित हुए थे। इससे स्पष्ट होता है कि मामले की सुनवाई के दौरान अधिकरण ने संबंधित विभाग से जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया था। आदेश में इस उपस्थिति को सुनवाई की कार्यवाही के हिस्से के रूप में दर्ज किया गया है।
अवमानना याचिका क्यों बंद हुई?
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने अपने 8 अक्टूबर 2026 के आदेश में कहा कि विभागीय कार्यवाही पूरी नहीं होने और निर्धारित अवधि में अंतिम आदेश पारित नहीं किए जाने के परिणाम 30 मई 2025 के मूल आदेश में स्पष्ट रूप से निर्धारित किए जा चुके थे। अधिकरण ने कहा कि जब मूल आदेश में ही यह व्यवस्था कर दी गई थी कि समय-सीमा के भीतर कार्यवाही पूरी नहीं होने पर जांच समाप्त हो जाएगी और अनुशासनात्मक प्राधिकारी आगे कार्यवाही करने का अधिकार खो देगा, तो इस मामले में अवमानना संबंधी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने का कोई कारण नहीं है। इसी आधार पर अवमानना याचिका बंद कर दी गई। अधिकरण ने पहले जारी किए गए नोटिस भी समाप्त कर दिए और मामले में कोई लागत नहीं लगाई। इस आदेश पर अधिकरण की सदस्य (प्रशासनिक) लोक रंजन और सदस्य (न्यायिक) रंजना शाही के हस्ताक्षर हैं।
प्रशासनिक जवाबदेही के लिहाज से क्यों महत्वपूर्ण है मामला?
यह मामला प्रशासनिक व्यवस्था में विभागीय जांच समय पर पूरी करने और न्यायिक आदेशों में निर्धारित समय-सीमा का पालन करने के महत्व को सामने लाता है। विभागीय कार्यवाही किसी कर्मचारी या अधिकारी के विरुद्ध आरोपों की जांच की प्रक्रिया होती है। ऐसी कार्यवाही लंबे समय तक लंबित रहने पर संबंधित अधिकारी की सेवा संबंधी स्थिति और प्रशासनिक निर्णय प्रभावित हो सकते हैं। इस मामले में अधिकरण ने केवल कार्यवाही पूरी करने का निर्देश नहीं दिया था, बल्कि समय-सीमा के उल्लंघन के परिणाम भी स्पष्ट कर दिए थे। इस दृष्टि से आदेश का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि निर्धारित समय के भीतर निर्णय नहीं होने पर विभागीय जांच जारी रखने के अधिकार पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, इस मामले में अवमानना याचिका बंद किए जाने को सरकार की पूरी कार्यवाही पर न्यायिक स्वीकृति या विभागीय दंडादेश की वैधता पर अंतिम निर्णय के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। उपलब्ध आदेश में अधिकरण ने मुख्य रूप से यह स्पष्ट किया कि पूर्व आदेश में निर्धारित परिणामों के रहते अवमानना संबंधी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने की आवश्यकता नहीं है।
पंकज कुमार चौधरी से संबंधित यह मामला विभागीय जांच में देरी और न्यायिक आदेशों के अनुपालन के प्रश्न को सामने लाता है। वर्ष 2018 में जारी आरोप-पत्र से संबंधित कार्यवाही लगभग सात वर्ष तक लंबित रहने के बाद अधिकरण ने 30 मई 2025 को चार महीने में अंतिम निर्णय देने का निर्देश दिया था। समय-सीमा का पालन नहीं होने की स्थिति में जांच समाप्त होने और अनुशासनात्मक प्राधिकारी के अधिकार खत्म होने की व्यवस्था भी उसी आदेश में स्पष्ट की गई थी। राजस्थान सरकार की ओर से दाखिल जवाब में 17 दिसंबर 2025 को निंदा का दंडादेश जारी किए जाने का उल्लेख किया गया। इसके बाद अवमानना याचिका पर सुनवाई हुई और 8 अक्टूबर 2026 को अधिकरण ने इसे बंद कर दिया। इस प्रकार, आदेश का केंद्रीय संदेश यह है कि विभागीय कार्यवाही के मामलों में समय-सीमा का पालन महत्वपूर्ण है और न्यायिक आदेश में समय-सीमा के उल्लंघन के परिणाम स्पष्ट रूप से निर्धारित किए गए हों, तो उनका कानूनी महत्व भी बना रहता है।
यदि राजस्थान सरकार हाईकोर्ट जाती है तो क्या होगा? समझिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों से
विभागीय जांच (Disciplinary Proceedings) को समय-सीमा के भीतर पूरा करने और तय समय में ऐसा न होने पर जांच के स्वतः समाप्त (Lapse) हो जाने के कानूनी सिद्धांत पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) के कई ऐतिहासिक और मार्गदर्शक फैसले (Precedents) मौजूद हैं। यदि राजस्थान सरकार इस मामले को हाईकोर्ट लेकर जाती है, तो पंकज चौधरी का पक्ष इन चुनिंदा नजीरों के आधार पर बेहद मजबूत रहेगा :
- प्रेम नाथ बाली बनाम गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी (2016)
अदालत का फैसला: इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट गाइडलाइन दी थी कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ चल रही विभागीय जांच को हर हाल में 6 महीने के भीतर और बहुत असाधारण परिस्थितियों में अधिकतम 9 महीने के भीतर पूरा कर लिया जाना चाहिए। इस केस में महत्व: पंकज चौधरी का चार्जशीट मामला 2018 (लगभग 7-8 साल पुराना) का था। सुप्रीम कोर्ट के इस सिद्धांत के अनुसार, इतने लंबे समय तक जांच को खींचना नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों के खिलाफ है।
- स्टेट ऑफ पंजाब बनाम चमन लाल गोयल (1995)
अदालत का फैसला: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि यदि विभागीय जांच पूरी करने में अत्यधिक और बिना किसी ठोस कारण के देरी (Inordinate Delay) होती है, तो कर्मचारी को मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में देरी के आधार पर ही पूरी जांच प्रक्रिया को रद्द (Quash) किया जा सकता है। इस केस में महत्व: कैट ने अपने 30 मई 2025 के आदेश में चमन लाल गोयल केस के इसी सिद्धांत को आधार बनाकर सरकार को 4 महीने की अंतिम समय-सीमा दी थी।
- सिंह राम बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य (राष्ट्रीय स्तर के न्यायिक सिद्धांत)
अदालत का फैसला: जब भी कोई अदालत अपने आदेश में ‘परम्पटरी क्लॉज’ (Peremptory Clause – जैसे: “यदि तय समय में कार्य नहीं हुआ तो यह स्वतः समाप्त माना जाएगा”) जोड़ देती है, तो वह समय-सीमा समाप्त होते ही संबंधित अथॉरिटी का क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) कानूनी रूप से पूरी तरह समाप्त हो जाता है। अवधि बीतने के बाद अथॉरिटी द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय ‘शून्य’ (Void) माना जाएगा। इस केस में महत्व: चूंकि कैट के आदेश में साफ लिखा था कि “Disciplinary authority would cease to have jurisdiction to proceed”, इसलिए 4 महीने की अवधि बीतते ही राजस्थान सरकार का दंड देने का अधिकार कानूनी रूप से समाप्त हो चुका था। दिसंबर 2025 में दिया गया ‘सेंसर’ का आदेश इस नजीर के तहत टिक नहीं सकता।
- भारत संघ बनाम ए.के. सिंघानिया (UPSC सलाह के संदर्भ में)
अदालत का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं जैसे कि संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) से सलाह लेना या फाइल का एक टेबल से दूसरे टेबल पर घूमना, अदालत द्वारा तय की गई अनिवार्य समय-सीमा (Statutory/Judicial Deadline) को लांघने का वैध बहाना नहीं हो सकतीं। यदि समय कम पड़ रहा था, तो सरकार को अवधि समाप्त होने से पहले अदालत से ‘एक्सटेंशन’ (समय विस्तार) मांगना चाहिए था।
पंकज चौधरी का पक्ष मजबूत
इन सभी स्थापित कानूनी नजीरों के प्रकाश में, कैट जयपुर बेंच का यह निष्कर्ष पूरी तरह वैधानिक है। यदि सरकार हाईकोर्ट में रिट पिटीशन लगाती भी है, तो सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों के कारण हाईकोर्ट के लिए कैट के ‘Self-operative’ आदेश को पलटना और सरकार को ‘स्टे’ देना लगभग नामुमकिन होगा। ऐसे मामलों में राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के आदेश पर स्टे (Stay – अंतरिम रोक) देने की कानूनी संभावना काफी कमजोर (Very Low) होती है। कानूनी और न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार, जब कैट (CAT) अपने किसी पुराने आदेश में “स्वतः समाप्त” होने की शर्त (Self-Operative / Peremptory Clause) लगा देता है, तो उच्च न्यायालयों का रुख आमतौर पर बहुत सख्त होता है। इस मामले में सरकार को स्टे मिलने की संभावना कम क्यों है, इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- ‘परम्पटरी ऑर्डर’ (Peremptory Order) का स्थापित कानून
सुप्रीम कोर्ट के कई स्थापित फैसलों के अनुसार, यदि किसी कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि “तय समय में काम न होने पर कार्यवाही स्वतः ही समाप्त हो जाएगी”, तो वह समय सीमा (Deadline) बीतते ही विभाग का अधिकार कानूनी रूप से खत्म हो जाता है। हाईकोर्ट ऐसे मामलों में आसानी से स्टे नहीं देता क्योंकि समय बीतने के बाद वह अनुशासनात्मक जांच (Enquiry) कानूनी रूप से ‘मृत’ (Dead) हो चुकी होती है, और किसी मृत कानूनी कार्यवाही को अंतरिम आदेश (Stay) के जरिए दोबारा जीवित नहीं किया जा सकता।
- सरकार की अपनी लापरवाही (Laches and Delay)
समय विस्तार (Extension) न मांगना: सरकार को अक्टूबर 2025 में समय-सीमा खत्म होने से पहले ही कैट (CAT) के पास जाकर समय बढ़ाने की गुहार लगानी चाहिए थी। सरकार ने ऐसा नहीं किया। देरी से आदेश जारी करना: सरकार ने समय-सीमा (अक्टूबर 2025) बीत जाने के बाद दिसंबर 2025 में दंड (Censure) का आदेश जारी किया। कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करने के बाद राहत मांगने आने वाले पक्ष को हाईकोर्ट आसानी से स्टे का लाभ नहीं देता।
- ‘अवमानना याचिका’ बंद होने का तकनीकी पहलू
कैट ने सरकार को किसी नई सजा या अवमानना का दोषी नहीं माना है, बल्कि सिर्फ अपनी पुरानी शर्त के प्रभावी होने की पुष्टि करते हुए केस को बंद (Close) किया है। चूंकि यह कोई दंडात्मक आदेश नहीं है, इसलिए इसके खिलाफ हाईकोर्ट में “इरेपेरेबल लॉस” (ऐसा नुकसान जिसकी भरपाई न हो सके) साबित करना सरकार के लिए बेहद मुश्किल होगा। स्टे पाने के लिए तीन शर्तें जरूरी होती हैं—प्रथम दृष्टया मामला (Prima facie case), सुविधा का संतुलन (Balance of convenience), और अपूरणीय क्षति (Irreparable loss)। इस मामले में सरकार के पक्ष में ये तीनों शर्तें फिट नहीं बैठतीं।

