आइडिया एवं क्यूरेटर : केबी व्यास, दुबई
वर्ड्स ऑफ इंटरव्यू : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
प्रजेंट : दिलीप कुमार पुरोहित. राइजिंग भास्कर
“आप बोलिए, बात मैं पूरी करूँगा!”
(जिंगल बजता है।)
“इनके आगे बात बढ़ाना मुश्किल है,
चुप रहना भी इन्हें खटकना मुमकिन है!”
टर्रटर्र सिंह:
रोकिए! दूसरी पंक्ति में लय नहीं है।
के बी व्यास:
अभी आपका स्वागत भी नहीं हुआ!
टर्रटर्र सिंह:
ग़लती स्वागत के बाद ग़लती बनेगी क्या?
के बी व्यास:
नमस्कार सा! राम-राम सा! खम्मा घणी सा! आज हमारे मेहमान समय से पहले पहुँचे और दरवाज़े पर लिखे “धक्का दीजिए” पर आपत्ति दर्ज कर दी।
टर्रटर्र सिंह:
लिखना चाहिए—“आवश्यकतानुसार नियंत्रित दबाव डालिए।” हर धक्का उचित नहीं होता।
के बी व्यास:
दरवाज़ा खुल गया था?
टर्रटर्र सिंह:
चौकीदार ने पीछे से खींच लिया।
के बी व्यास:
यानी आपकी समीक्षा चलती रही, काम किसी और ने कर दिया!
के बी व्यास:
आपकी सबसे बड़ी विशेषता?
टर्रटर्र सिंह:
मैं किसी बात को बिना परखे स्वीकार नहीं करता।
के बी व्यास:
और अपनी बात?
टर्रटर्र सिंह:
वह परखकर ही निकलती है।
के बी व्यास:
कौन परखता है?
टर्रटर्र सिंह:
मैं।
के बी व्यास:
माल भी आपका, जाँच भी आपकी, गुणवत्ता का प्रमाणपत्र भी आपका!
टर्रटर्र सिंह:
इससे समय बचता है।
के बी व्यास:
आपका। बाक़ी लोगों का उसी प्रमाणपत्र पर बहस में जाता है।
के बी व्यास:
सुना है, चाय की दुकान पर आपका उधार बंद है?
टर्रटर्र सिंह:
विचारों का मतभेद है। दुकानदार ने पूछा—“चाय कैसी है?” मैंने ईमानदारी से बता दिया।
के बी व्यास:
क्या?
टर्रटर्र सिंह:
पत्ती अधिक, दूध कम, अदरक असंतुलित, कप अनुपयुक्त।
के बी व्यास:
चाय पी ली?
टर्रटर्र सिंह:
दो कप। विस्तार से जाँच ज़रूरी थी।
के बी व्यास:
पैसे?
टर्रटर्र सिंह:
मैंने कहा—“मेरी समीक्षा का शुल्क काट लो।”
के बी व्यास:
उसने क्या किया?
टर्रटर्र सिंह:
बोर्ड लगा दिया—“यहाँ चाय बिकती है, बहस का भुगतान स्वीकार नहीं।”
के बी व्यास:
घर बनवाते समय भी सलाह देते रहे?
टर्रटर्र सिंह:
पड़ोसी मकान बनवा रहा था। मैंने मिस्त्री से कहा—“यह दीवार टेढ़ी लग रही है।”
के बी व्यास:
थी?
टर्रटर्र सिंह:
उसने धागा लगाकर दिखाई। सीधी थी।
के बी व्यास:
फिर?
टर्रटर्र सिंह:
मैंने कहा—“धागा ही टेढ़ा हुआ तो?”
के बी व्यास:
आप संतुष्ट कैसे होते?
टर्रटर्र सिंह:
मुझे निरीक्षण की ज़िम्मेदारी मिलती।
के बी व्यास:
मिली?
टर्रटर्र सिंह:
पड़ोसी ने कहा—“आप अपने घर से देखिए। दूर से बेहतर दिखाई देगा।”
के बी व्यास:
मकान पूरा हुआ?
टर्रटर्र सिंह:
हाँ। खिड़की मेरी तरफ़ नहीं रखी।
के बी व्यास:
अस्पताल में भी टोकते हैं?
टर्रटर्र सिंह:
डॉक्टर ने कहा—“गहरी साँस लीजिए।” मैंने पूछा—“गहराई की कोई सीमा?”
के बी व्यास:
फिर?
टर्रटर्र सिंह:
बोले—“मुँह खोलिए।” मैंने पूछा—“बोलने के लिए या जाँच के लिए?”
के बी व्यास:
जवाब?
टर्रटर्र सिंह:
कहा—“जाँच के लिए। बोलने का नमूना पर्याप्त मिल चुका है।”
के बी व्यास:
दवा दी?
टर्रटर्र सिंह:
आराम करने को कहा।
के बी व्यास:
आपको?
टर्रटर्र सिंह:
लिखा तो मेरे पर्चे पर था, लेकिन चेहरा अपना पकड़ रखा था।
के बी व्यास:
आप परिवार के यात्रा आयोजक भी हैं?
टर्रटर्र सिंह:
पिछले रविवार सब घूमने जाना चाहते थे। मैंने योजना की कमियाँ बताईं।
के बी व्यास:
जैसे?
टर्रटर्र सिंह:
पहाड़ पर चढ़ाई, समुद्र पर नमी, पार्क में भीड़, संग्रहालय में सन्नाटा।
के बी व्यास:
आप कहाँ जाना चाहते थे?
टर्रटर्र सिंह:
पहले सभी विकल्पों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए।
के बी व्यास:
कहाँ गए फिर?
टर्रटर्र सिंह:
सब घूमने गए। मुझे घर की सुरक्षा दे गए।
के बी व्यास:
आपत्ति नहीं की?
टर्रटर्र सिंह:
की। उन्होंने कहा—“लौटकर सुनेंगे।”
के बी व्यास:
लौटे?
टर्रटर्र सिंह:
हाँ। तस्वीरें दिखाई। जगह नहीं बताई।
के बी व्यास:
किसी आयोजन में कोई ज़िम्मेदारी ली है?
टर्रटर्र सिंह:
मोहल्ले के समारोह में स्वागत समिति देखी।
के बी व्यास:
क्या किया?
टर्रटर्र सिंह:
स्वागत-पट्ट पर ग्यारह सुधार सुझाए। कुर्सियों की दिशा बदली। गुलदस्ते पर आपत्ति की।
के बी व्यास:
मेहमानों का स्वागत?
टर्रटर्र सिंह:
उसी बीच वे भीतर चले गए।
के बी व्यास:
फिर आपको क्या काम मिला?
टर्रटर्र सिंह:
खाली डिब्बे गिनने का।
के बी व्यास:
गिने?
टर्रटर्र सिंह:
पहले स्पष्ट किया कि खाली से उनका आशय पूर्णतः खाली है या उपयोग के बाद खाली।
के बी व्यास:
इतने में?
टर्रटर्र सिंह:
सफ़ाई वाला उठाकर ले गया।
के बी व्यास:
आपकी आपत्तियों का कोई रिकॉर्ड है?
टर्रटर्र सिंह:
डायरी रखता हूँ—“आज की त्रुटियाँ।”
के बी व्यास:
कितने पन्ने भरे?
टर्रटर्र सिंह:
तीन डायरियाँ।
के बी व्यास:
“आज मैंने क्या सुधारा” वाली भी है?
टर्रटर्र सिंह:
ख़रीदनी है।
के बी व्यास:
अभी तक क्यों नहीं ख़रीदी?
टर्रटर्र सिंह:
बाज़ार की किसी डायरी की गुणवत्ता ठीक नहीं।
के बी व्यास:
अच्छा! आपकी प्रगति को स्टेशनरी उद्योग ने रोक रखा है।
⸻
के बी व्यास:
बच्चे आपके पास बैठते हैं?
टर्रटर्र सिंह:
पहले बैठते थे। भतीजी कहानी सुनाती थी। मैं उच्चारण ठीक करता था।
के बी व्यास:
अब नहीं सुनाती?
टर्रटर्र सिंह:
कहती है—“चाचाजी, आपको कहानी सुनाऊँ तो पात्र पहुँचने से पहले व्याकरण पहुँच जाता है।”
के बी व्यास:
उसने कुछ बनाया हो तो सराहते हैं?
टर्रटर्र सिंह:
एक चित्र लाई थी। पेड़ बैंगनी बनाया था। मैंने समझाया कि पेड़ हरा होता है।
के बी व्यास:
उसने क्या कहा?
टर्रटर्र सिंह:
“यह मेरे सपने का पेड़ है। आपके मोहल्ले का नहीं।”
के बी व्यास:
फिर?
टर्रटर्र सिंह:
चित्र वापस ले गई। उस दिन पहली बार लगा, शायद मेरा सही होना किसी की ख़ुशी के काम नहीं आया।
के बी व्यास:
बाद में उससे बात की?
टर्रटर्र सिंह:
हाँ। कहा—“अपना बैंगनी पेड़ फिर दिखाओ।” उसने पूछा—“इस बार देखोगे या जाँचोगे?”
के बी व्यास:
आपने क्या किया?
टर्रटर्र सिंह:
देखा। उसमें पीला झूला था। नीली चिड़िया थी। पहले तो पेड़ के रंग पर ही अटक गया था।
के बी व्यास:
चित्र अच्छा लगा?
टर्रटर्र सिंह:
बहुत। उसने मुझे दिया भी। अब मेरी मेज़ पर है।
के बी व्यास:
कोई सुधार सुझाया?
टर्रटर्र सिंह:
मन में आया था। फिर सोचा, आज मेज़ पर चित्र रहने दूँ, अपनी विशेषज्ञता नहीं।
के बी व्यास:
तो अब टोकना छोड़ देंगे?
टर्रटर्र सिंह:
सब छोड़ना भी उचित नहीं। कोई सचमुच ग़लती करे तो बताना चाहिए।
के बी व्यास:
ज़रूर। मगर पहले समझना भी चाहिए कि उसे मदद चाहिए या आपकी स्वीकृति।
टर्रटर्र सिंह:
मैं पूछ लिया करूँगा—“एक सुझाव दूँ?”
के बी व्यास:
और सामने वाला मना करे?
टर्रटर्र सिंह:
तो… पानी पी लूँगा।
के बी व्यास:
आपके घर बड़ा घड़ा रखवाना पड़ेगा सा!
के बी व्यास:
समय समाप्त। अब विदा—
टर्रटर्र सिंह:
एक सुझाव दूँ?
के बी व्यास:
नहीं।
(कुछ क्षण शांति।)
टर्रटर्र सिंह:
पानी मिलेगा?
के बी व्यास:
दो गिलास लाइए! आज बदलाव दिखाई दे रहा है।
टर्रटर्र सिंह:
लेकिन गिलास इतना भरा क्यों है?
के बी व्यास:
आपत्ति पी जाइए सा, पानी थोड़ा छोड़ दीजिए!
(ठहाकों के बीच जिंगल बजता है और कार्यक्रम समाप्त होता है )
