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Sunday, October 25, 2026, 10:06 am

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Lifestyle

ऑन द स्पॉट एफ.एम. 102.4 पर 13वां इंटरव्यू टर्रटर्र सिंह टोकाटाकी का केबी व्यास के साथ


आइडिया एवं क्यूरेटर : केबी व्यास, दुबई

वर्ड्स ऑफ इंटरव्यू : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

प्रजेंट : दिलीप कुमार पुरोहित. राइजिंग भास्कर

“आप बोलिए, बात मैं पूरी करूँगा!”

(जिंगल बजता है।)

“इनके आगे बात बढ़ाना मुश्किल है,

चुप रहना भी इन्हें खटकना मुमकिन है!”

टर्रटर्र सिंह:

रोकिए! दूसरी पंक्ति में लय नहीं है।

के बी व्यास:

अभी आपका स्वागत भी नहीं हुआ!

टर्रटर्र सिंह:

ग़लती स्वागत के बाद ग़लती बनेगी क्या?

के बी व्यास:

नमस्कार सा! राम-राम सा! खम्मा घणी सा! आज हमारे मेहमान समय से पहले पहुँचे और दरवाज़े पर लिखे “धक्का दीजिए” पर आपत्ति दर्ज कर दी।

टर्रटर्र सिंह:

लिखना चाहिए—“आवश्यकतानुसार नियंत्रित दबाव डालिए।” हर धक्का उचित नहीं होता।

के बी व्यास:

दरवाज़ा खुल गया था?

टर्रटर्र सिंह:

चौकीदार ने पीछे से खींच लिया।

के बी व्यास:

यानी आपकी समीक्षा चलती रही, काम किसी और ने कर दिया!

के बी व्यास:

आपकी सबसे बड़ी विशेषता?

टर्रटर्र सिंह:

मैं किसी बात को बिना परखे स्वीकार नहीं करता।

के बी व्यास:

और अपनी बात?

टर्रटर्र सिंह:

वह परखकर ही निकलती है।

के बी व्यास:

कौन परखता है?

टर्रटर्र सिंह:

मैं।

के बी व्यास:

माल भी आपका, जाँच भी आपकी, गुणवत्ता का प्रमाणपत्र भी आपका!

टर्रटर्र सिंह:

इससे समय बचता है।

के बी व्यास:

आपका। बाक़ी लोगों का उसी प्रमाणपत्र पर बहस में जाता है।

के बी व्यास:

सुना है, चाय की दुकान पर आपका उधार बंद है?

टर्रटर्र सिंह:

विचारों का मतभेद है। दुकानदार ने पूछा—“चाय कैसी है?” मैंने ईमानदारी से बता दिया।

के बी व्यास:

क्या?

टर्रटर्र सिंह:

पत्ती अधिक, दूध कम, अदरक असंतुलित, कप अनुपयुक्त।

के बी व्यास:

चाय पी ली?

टर्रटर्र सिंह:

दो कप। विस्तार से जाँच ज़रूरी थी।

के बी व्यास:

पैसे?

टर्रटर्र सिंह:

मैंने कहा—“मेरी समीक्षा का शुल्क काट लो।”

के बी व्यास:

उसने क्या किया?

टर्रटर्र सिंह:

बोर्ड लगा दिया—“यहाँ चाय बिकती है, बहस का भुगतान स्वीकार नहीं।”

के बी व्यास:

घर बनवाते समय भी सलाह देते रहे?

टर्रटर्र सिंह:

पड़ोसी मकान बनवा रहा था। मैंने मिस्त्री से कहा—“यह दीवार टेढ़ी लग रही है।”

के बी व्यास:

थी?

टर्रटर्र सिंह:

उसने धागा लगाकर दिखाई। सीधी थी।

के बी व्यास:

फिर?

टर्रटर्र सिंह:

मैंने कहा—“धागा ही टेढ़ा हुआ तो?”

के बी व्यास:

आप संतुष्ट कैसे होते?

टर्रटर्र सिंह:

मुझे निरीक्षण की ज़िम्मेदारी मिलती।

के बी व्यास:

मिली?

टर्रटर्र सिंह:

पड़ोसी ने कहा—“आप अपने घर से देखिए। दूर से बेहतर दिखाई देगा।”

के बी व्यास:

मकान पूरा हुआ?

टर्रटर्र सिंह:

हाँ। खिड़की मेरी तरफ़ नहीं रखी।

के बी व्यास:

अस्पताल में भी टोकते हैं?

टर्रटर्र सिंह:

डॉक्टर ने कहा—“गहरी साँस लीजिए।” मैंने पूछा—“गहराई की कोई सीमा?”

के बी व्यास:

फिर?

टर्रटर्र सिंह:

बोले—“मुँह खोलिए।” मैंने पूछा—“बोलने के लिए या जाँच के लिए?”

के बी व्यास:

जवाब?

टर्रटर्र सिंह:

कहा—“जाँच के लिए। बोलने का नमूना पर्याप्त मिल चुका है।”

के बी व्यास:

दवा दी?

टर्रटर्र सिंह:

आराम करने को कहा।

के बी व्यास:

आपको?

टर्रटर्र सिंह:

लिखा तो मेरे पर्चे पर था, लेकिन चेहरा अपना पकड़ रखा था।

के बी व्यास:

आप परिवार के यात्रा आयोजक भी हैं?

टर्रटर्र सिंह:

पिछले रविवार सब घूमने जाना चाहते थे। मैंने योजना की कमियाँ बताईं।

के बी व्यास:

जैसे?

टर्रटर्र सिंह:

पहाड़ पर चढ़ाई, समुद्र पर नमी, पार्क में भीड़, संग्रहालय में सन्नाटा।

के बी व्यास:

आप कहाँ जाना चाहते थे?

टर्रटर्र सिंह:

पहले सभी विकल्पों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए।

के बी व्यास:

कहाँ गए फिर?

टर्रटर्र सिंह:

सब घूमने गए। मुझे घर की सुरक्षा दे गए।

के बी व्यास:

आपत्ति नहीं की?

टर्रटर्र सिंह:

की। उन्होंने कहा—“लौटकर सुनेंगे।”

के बी व्यास:

लौटे?

टर्रटर्र सिंह:

हाँ। तस्वीरें दिखाई। जगह नहीं बताई।

के बी व्यास:

किसी आयोजन में कोई ज़िम्मेदारी ली है?

टर्रटर्र सिंह:

मोहल्ले के समारोह में स्वागत समिति देखी।

के बी व्यास:

क्या किया?

टर्रटर्र सिंह:

स्वागत-पट्ट पर ग्यारह सुधार सुझाए। कुर्सियों की दिशा बदली। गुलदस्ते पर आपत्ति की।

के बी व्यास:

मेहमानों का स्वागत?

टर्रटर्र सिंह:

उसी बीच वे भीतर चले गए।

के बी व्यास:

फिर आपको क्या काम मिला?

टर्रटर्र सिंह:

खाली डिब्बे गिनने का।

के बी व्यास:

गिने?

टर्रटर्र सिंह:

पहले स्पष्ट किया कि खाली से उनका आशय पूर्णतः खाली है या उपयोग के बाद खाली।

के बी व्यास:

इतने में?

टर्रटर्र सिंह:

सफ़ाई वाला उठाकर ले गया।

के बी व्यास:

आपकी आपत्तियों का कोई रिकॉर्ड है?

टर्रटर्र सिंह:

डायरी रखता हूँ—“आज की त्रुटियाँ।”

के बी व्यास:

कितने पन्ने भरे?

टर्रटर्र सिंह:

तीन डायरियाँ।

के बी व्यास:

“आज मैंने क्या सुधारा” वाली भी है?

टर्रटर्र सिंह:

ख़रीदनी है।

के बी व्यास:

अभी तक क्यों नहीं ख़रीदी?

टर्रटर्र सिंह:

बाज़ार की किसी डायरी की गुणवत्ता ठीक नहीं।

के बी व्यास:

अच्छा! आपकी प्रगति को स्टेशनरी उद्योग ने रोक रखा है।

⸻

के बी व्यास:

बच्चे आपके पास बैठते हैं?

टर्रटर्र सिंह:

पहले बैठते थे। भतीजी कहानी सुनाती थी। मैं उच्चारण ठीक करता था।

के बी व्यास:

अब नहीं सुनाती?

टर्रटर्र सिंह:

कहती है—“चाचाजी, आपको कहानी सुनाऊँ तो पात्र पहुँचने से पहले व्याकरण पहुँच जाता है।”

के बी व्यास:

उसने कुछ बनाया हो तो सराहते हैं?

टर्रटर्र सिंह:

एक चित्र लाई थी। पेड़ बैंगनी बनाया था। मैंने समझाया कि पेड़ हरा होता है।

के बी व्यास:

उसने क्या कहा?

टर्रटर्र सिंह:

“यह मेरे सपने का पेड़ है। आपके मोहल्ले का नहीं।”

के बी व्यास:

फिर?

टर्रटर्र सिंह:

चित्र वापस ले गई। उस दिन पहली बार लगा, शायद मेरा सही होना किसी की ख़ुशी के काम नहीं आया।

के बी व्यास:

बाद में उससे बात की?

टर्रटर्र सिंह:

हाँ। कहा—“अपना बैंगनी पेड़ फिर दिखाओ।” उसने पूछा—“इस बार देखोगे या जाँचोगे?”

के बी व्यास:

आपने क्या किया?

टर्रटर्र सिंह:

देखा। उसमें पीला झूला था। नीली चिड़िया थी। पहले तो पेड़ के रंग पर ही अटक गया था।

के बी व्यास:

चित्र अच्छा लगा?

टर्रटर्र सिंह:

बहुत। उसने मुझे दिया भी। अब मेरी मेज़ पर है।

के बी व्यास:

कोई सुधार सुझाया?

टर्रटर्र सिंह:

मन में आया था। फिर सोचा, आज मेज़ पर चित्र रहने दूँ, अपनी विशेषज्ञता नहीं।

के बी व्यास:

तो अब टोकना छोड़ देंगे?

टर्रटर्र सिंह:

सब छोड़ना भी उचित नहीं। कोई सचमुच ग़लती करे तो बताना चाहिए।

के बी व्यास:

ज़रूर। मगर पहले समझना भी चाहिए कि उसे मदद चाहिए या आपकी स्वीकृति।

टर्रटर्र सिंह:

मैं पूछ लिया करूँगा—“एक सुझाव दूँ?”

के बी व्यास:

और सामने वाला मना करे?

टर्रटर्र सिंह:

तो… पानी पी लूँगा।

के बी व्यास:

आपके घर बड़ा घड़ा रखवाना पड़ेगा सा!

के बी व्यास:

समय समाप्त। अब विदा—

टर्रटर्र सिंह:

एक सुझाव दूँ?

के बी व्यास:

नहीं।

(कुछ क्षण शांति।)

टर्रटर्र सिंह:

पानी मिलेगा?

के बी व्यास:

दो गिलास लाइए! आज बदलाव दिखाई दे रहा है।

टर्रटर्र सिंह:

लेकिन गिलास इतना भरा क्यों है?

के बी व्यास:

आपत्ति पी जाइए सा, पानी थोड़ा छोड़ दीजिए!

(ठहाकों के बीच जिंगल बजता है और कार्यक्रम समाप्त होता है )

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor