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Monday, August 24, 2026, 1:06 am

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Lifestyle

कविता : हंसराज बारासा हँसा

कवि : हंसराज बारासा हँसा

माँ

मेरी मां आज जिन्दा नही है पर आज भी सोचता हूँ-

पता नही बचपन मे मुझे
मां ने क्या खिलाया होगा
मुझ दूध पीते बच्चे को
अपना दूध खरा पिलाया होगा

पता नही बचपन मे मुझे
सूखे या गीले मे रखा होगा
मुझ अबोध बच्चे को
बिना शिकवे गिले से रखा होगा

पता नही बासी या झूठा
ठंडा या रूखा सूखा खिलाया होगा
मुझ गरीब बच्चे
नही कभी भूखा सुलाया होगा

पता नही मेरे लिए कभी
वो खुद भूखी प्यासी रही होगी
मुझ असहाय बच्चे के प्रति
उसकी ममता अचछी खासी रही होगी

पता नही मेरी नादानियों से
खुश या कभी नाराज हुई होगी
मुझ नादान बच्चे से कभी
खफा कल ना आज हुई होगी

पता नही मेरी मां का कर्ज
जीवन मे कभी चुका सकूंगा
मै “हंसा” मरते दम तक कभी
मां को नही भूला सकूंगा

हंस राज बारासा “हंसा”
आदर्श बस्ती मंडोर
जोधपुर (राजस्थान)

जीवन क्या है?

जीवन पूरा आधा या पौना है
किसे खबर कब इसे खोना है

जीते है सभी धुन अपनी
कयामत की बाट क्या जोना है

मौत का ख्याल हमेशा हो जिसे
उसे मालूम क्या पाना खोना है

ग्रहस्थ भी तपस्या व आग है
तपकर जिससे निकलता सोना है

भाग कर इस लोक से “हंसा” फिर
भगवान की बाट क्या जोना है

मायने
कयामत=अंतिम समय

हंस राज “हंसा”
आदर्श बस्ती,मंडोर
जोधपुर (राजस्थान)

जहाँ मैं रहता हूँ…

जहाँ मैं रहता हूं घरबार भी है
घर मे दुश्वारी है तो प्यार भी है

डाट डपट है,गर बच्चें है घर मे
मां-बाप है तो उनका दुलार भी है

अलावा घर के रहता हूँ समाज मे
मुझे अपने मुल्क से प्यार भी है

रूखी सूखी कैसी भी हो घर मे
खिलाने मे अपनो की मनुहार भी है

बनके मेहमां जाता हूँ कहीं भी
खातिर है वहाँ तो सत्कार भी है

इन्सान है “हंसा” रखना ख्याल होता
यार दोस्त है तो रिश्तेदार भी है

हंस राज “हंसा”
आदर्श बस्ती, मंडोर
जोधपुर (राजस्थान)

दिल इन्सान का…

दिल इन्सान का प्यार करता है
दिमाग इसपे विचार करता है

जोखिम उठाना खेल नही खिरद का
दिल का है समुद्र पार करता है

दिल है हर जीव मे, नही है दिमाग
होने से इन्सान नफरत ओ प्यार करता है

ये सच्च है बेटा मां को तवज्जो देता
पिता फिर भी दुलार करता है

सुना है जंगो मोहब्बत सब जायज है
बन्दा दोनों मे तलवार धारदार करता है

मानो न मानो प्यार होता एक तरफा
“हंसा”एक इकरार दूजा इन्कार करता है

हंस राज “हंसा”
आदर्श बस्ती,मंडोर
जोधपुर (राजस्थान)

खुश नसीब…

जिन्दा है वालिदैन तो सलामत रहे
खुशनसीब औलाद की इबारत रहे

खुश है ,गर बच्चों से मात पिता
दुआ से घर मे उनकी बरकत रहे

तामीर की बच्चों को क्या मालूम
बुलंद इसीलिए पुरखों की इमारत रहे

बुतपरस्ती मे गुजरता नही है बचपन
जवानी मे वालिदैन की इरादत रहे

खुदा है जन्नत भी है मात पिता
“हंसा”औलाद की यही सदाकत रहे

हंस राज “हंसा”
आदर्श बस्ती,मंडोर
जोधपुर (राजस्थान)

प्रेम ही तो सब…

प्रेम ही तो सब है
सच्चा कोई करता कब है

प्रेम एक अहसास है
दिल से होता गजब है

छोटा बड़ा एक सरीखा
प्रेम मे यही अदब है

हासिल हर जीत उसको
प्रेम का अजब ढब है

प्रेम बसता दिल मे है
कहते जिसको रब है

ढूंढता मंदर मस्जिद मे
टटोले मन अपना तब है

है प्रेम एक तरफा “हंसा”
दूजी ओर जाता दब है

हंस राज “हंसा”
आदर्श बस्ती,मंडोर
जोधपुर (राजस्थान)

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor