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पाक विस्थापित: सरहदें बदलीं, दर्द नहीं

दिलीप केसानी. जोधपुर

“भारत भाग्य विधाता” जो भारत का भाग्य बनाता है, वह यहां की जनता है। इस विशाल देश की 140 करोड़ आबादी को एक डोर में बांधने वाली एक अदृश्य ताक़त है, जो जाति, धर्म, भाषा या संस्कृति से ऊपर उठकर सबको जोड़ती है। लेकिन इसी भारत मां के आँचल में एक ऐसा हिस्सा भी है जिसे ‘पाक विस्थापित’ कहा जाता है।

कहने को 1947 तक पाकिस्तान भी भारत का ही हिस्सा था। लेकिन देश बंटा, सोचें बंटी और रास्ते भी। भारत ने जहां लोकतंत्र, विकास और सह-अस्तित्व का रास्ता अपनाया, वहीं पाकिस्तान ने कट्टरता, नफ़रत और आतंकवाद की राह चुनी।

जो लोग 1947 में भारत आए, उन्हें दिल से स्वीकार किया गया, लेकिन उसके बाद भी पाकिस्तान में बचे हिंदुओं के साथ जो होता रहा, वह किसी से छिपा नहीं। वहां कभी हिंदू-मुस्लिम दंगे की कोई खबर सुनने को नहीं मिली, क्योंकि वहां के हिंदू हमेशा शांति पसंद रहे। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि वे सुखी थे। वहां आज भी मंदिर तोड़े जाते हैं, हिंदू बच्चियों को अगवा किया जाता है, जबरन धर्म परिवर्तन और लव जिहाद जैसी घटनाएं आम हैं। रिंकल कुमारी का मामला आज भी लोगों की यादों में है। वहाँ के हिंदुवो ने डर के साथ जीना सीख लिया है।

वहीं दूसरी तरफ इन्हीं हालातों से तंग आकर हम जैसे कई परिवार आज भी भारत आकर शरण ले रहे हैं। लेकिन क्या हम यहां पूरी तरह सुरक्षित और सुखी हैं? बिल्कुल नहीं।

अपना गांव, अपना देश, अपनी मिट्टी छोड़ना वैसे भी एक दर्द होता है, लेकिन हमारे लिए तो यह एक यातना थी। हम उन मुसाफ़िरों की तरह थे जिन्होंने नाव से उतरते ही अपनी ही कश्ती को जला दिया था।

हममें से किसी ने भी पाकिस्तान को खुशी से नहीं छोड़ा। हमारे पास वहां ज़मीनें, मकान, खेत-खलिहान थे। मजबूरी में उन्हें बेचना पड़ा या फिर ऐसे छोड़ना पड़ा अगर कुछ बिका भी तब भी सही कीमत नहीं मिली। जब हम वो पैसा लेकर भारत पहुंचे, तो पाकिस्तानी रुपये की गिरती क़ीमत के कारण हमें उसका भी आधा मूल्य ही मिला।

2018 में भारत सरकार ने हमें प्लॉट देने की घोषणा की थी। लेकिन आठ साल बीतने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ। हैरानी की बात यह है कि ये प्लॉट भी मुफ्त नहीं दिए जा रहे थे — सरकार इन ज़मीनों के बदले हमसे पैसे ले रही थी। फिर भी प्रोजेक्ट इतने बरसों से अधर में लटका हुआ है।

हमने अपना देश, अपने रिश्तेदार, अपनी संस्कृति पीछे छोड़ी, लेकिन इस उम्मीद के साथ कि भारत हमें वैसे ही गले लगाएगा जैसे एक माँ अपने बिछड़े बच्चों को। पर क्या ऐसा हो रहा है? कभी-कभी लगता है नहीं।

कुछ लोग, जिनके दिलों में पाकिस्तान के लिए नफ़रत भरी है, वो सीधे पाकिस्तान जाकर कुछ नहीं कर सकते, तो अपने गुस्से का निशाना हमें बनाते हैं। हमें “पाकिस्तानी” कहकर गालियां दी जाती हैं।

पाकिस्तान में हमें “काफ़िर हिंदू” कहा जाता था, हमको हिन्दुस्तान जाने की सलाह दी जाती थी और यहाँ कुछ लोग हमें गाली के साथ “पाकिस्तानी” कहते हैं और वापिस जाने तक की बात कर देते है। जब भी कोई आतंकी हमला होता है, कुछ कट्टर सोच वाले लोग उंगलियां हमारी तरफ उठा देते हैं।

हकीकत यह है कि आज तक किसी भी पाकिस्तानी हिंदू पर जासूसी का इल्ज़ाम सिद्ध नहीं हुआ, ना ही किसी बड़े अपराध में कोई विस्थापित हिंदू शामिल रहा है। इसके बावजूद भी हमें शक की निगाह से देखा जाता है।

जब तक हमारे साथ “पाकिस्तानी” का ठप्पा रहेगा, हम चाह कर भी किसी सरकारी नौकरी या पहचान का हिस्सा नहीं बन सकते।

यह भी सच है कि भारत में हर कोई हमसे नफ़रत नहीं करता—बहुत प्यार भी मिला है, बहुत अपनापन भी — लेकिन यही नफ़रत के कुछ छींटे उस सारे प्यार पर पानी फेर देते हैं।

हम सरकार से किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं करते, केवल इतनी सी अपील है कि हमें एक सम्मानजनक जीवन दिया जाए। समाज से अनुरोध है कि हमें ‘पाकिस्तानी’ कहकर अपमानित न करें। हम भारत माता की संतान हैं और हमें गर्व है कि हमने इस मिट्टी को अपनी आत्मा से अपनाया है।

हमें विश्वास है कि एक दिन भारत हमें पूरी तरह स्वीकार करेगा, हमारे अधिकार सुनिश्चित करेगा और यह देश हमारे लिए भी वैसा ही होगा जैसा हर भारतीय नागरिक के लिए है — एक सुरक्षित, समृद्ध और समान अवसरों से भरा हुआ भारत।

दिलीप केसानी

लेखक – शायर, जोधपुर

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor