जब मृत्यु का बोध जीवन का उद्देश्य बन जाए…डॉ. रविप्रकाश से विशेष बातचीत
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
मृत्यु… एक ऐसा सत्य, जिसे न कोई टाल सकता है, न टकरा सकता है। वह न अमीरी देखती है, न गरीबी; न महल पहचानती है, न फुटपाथ। वह बस आती है—समय पूछे बिना, स्थान जाने बिना। पर शायद कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो मृत्यु को देखकर भयभीत नहीं होते, बल्कि उससे जीवन का अर्थ सीख लेते हैं।
डॉ. रविप्रकाश उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक हैं। पेशे से चिकित्सक, मन से साधु, और कर्म से राष्ट्रसेवक। उन्होंने सुख-सुविधाओं से भरा जीवन देखा, फिर उसे त्यागा। उन्होंने कराहते मरीजों की पीड़ा सुनी, फिर उसे राष्ट्र निर्माण की पुकार में बदल दिया। उन्होंने मृत्यु को करीब से देखा, लेकिन उसी ने उन्हें सिखाया कि जीवन कैसे जिया जाए।
आज वे ओसियां रेडी फाउंडेशन के माध्यम से ‘लक्ष्य राष्ट्र चेतना मंदिर’ का संचालन कर रहे हैं—एक ऐसा आश्रय, जहां पीड़ित और वंचित बालकों को शिक्षा, संस्कार और भविष्य का उजाला मिल रहा है। हमने उनसे उनके जीवन, संघर्ष, सेवा और संकल्प पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत है यह विशेष और प्रेरक संवाद।
प्रश्न 1: आप अक्सर कहते हैं कि “मृत्यु शाश्वत सत्य है।” यह विचार आपके जीवन में कैसे आया?
डॉ. रविप्रकाश: चिकित्सक होने के नाते मैंने मृत्यु को बहुत करीब से देखा है। ICU में, आपातकालीन वार्ड में, सड़क दुर्घटनाओं के बाद… कई बार जीवन और मृत्यु के बीच की उस पतली रेखा को मैंने अपनी आंखों के सामने टूटते देखा। तब एहसास हुआ कि मृत्यु न किसी से पूछती है, न किसी को अवसर देती है। वह फुटपाथ पर सोने वाले को भी गले लगाती है और महलों में रहने वालों को भी।सच तो यह है कि जन्म और मृत्यु के बीच का जो कालखंड है, वही जीवन है। और हम उसे कैसे जीते हैं, यही हमारी सार्थकता तय करता है। जब यह समझ आया, तभी लगा कि केवल अपने लिए जीना जीवन नहीं है।
प्रश्न 2: एक सफल चिकित्सक से समाजसेवी बनने का निर्णय कैसे लिया?
डॉ. रविप्रकाश: एक समय था जब जीवन में हर सुविधा थी। जो चाहा, वह पल भर में उपलब्ध था। लेकिन भीतर एक खालीपन था।सुबह से शाम तक मरीजों की पीड़ा सुनता था। लोग कहते हैं कि दुख सुनते-सुनते इंसान भावशून्य हो जाता है, लेकिन मेरे साथ उल्टा हुआ। हर कराह ने मेरे भीतर की संवेदनाओं को और जीवित कर दिया। मेरा हृदय पिघलता गया।
फिर एक समय आया जब मैंने सब कुछ छोड़ दिया। टूटकर, बिखरकर, लेकिन दृढ़ निश्चय के साथ मारवाड़ की इस पावन भूमि पर लौटा। मन में केवल एक ही लक्ष्य था—वास्तविक जीवन जीना। एक फकीर की तरह, जो अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीता है।
प्रश्न 3: ‘लक्ष्य राष्ट्र चेतना मंदिर’ की स्थापना का विचार कैसे जन्मा?
डॉ. रविप्रकाश: कोरोना काल मेरे जीवन का निर्णायक मोड़ था। चारों ओर भय था, असुरक्षा थी, और मृत्यु की छाया थी। लेकिन उसी काल में मैंने देखा कि सबसे ज्यादा पीड़ित वे बच्चे थे, जिनके माता-पिता नहीं रहे या जिनका भविष्य अंधकार में डूब गया। मैंने सैकड़ों लोगों की सेवा की। उस समय जेब में कुछ नहीं था, लेकिन हृदय में संकल्प था।
तभी ‘लक्ष्य राष्ट्र चेतना मंदिर’ का विचार आया—एक ऐसा स्थान जहां इन मासूम बच्चों को केवल आश्रय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की चेतना दी जाए। आज यह मंदिर केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि सपनों का आंगन है।
प्रश्न 4: इस यात्रा में सबसे बड़ा संघर्ष क्या रहा?
डॉ. रविप्रकाश: संघर्ष तो हर कदम पर रहा। कभी बच्चों की फीस की चिंता ने रातों को जगाए रखा। कभी भोजन की व्यवस्था के लिए आंसू आए। कई बार लगा कि संसाधनों के अभाव में यह संस्थान बंद हो जाएगा। हमें जो बड़ा सहयोग मिलता है, वह भवन निर्माण या मरम्मत के लिए होता है। लेकिन रोजमर्रा के खर्च—भोजन, कपड़े, किताबें, दवाइयां—इनके लिए निरंतर सहयोग की भारी कमी रहती है। फिर भी ईश्वर की कृपा और कुछ अनमोल रिश्तों के संबल से यह यात्रा चलती रही।
प्रश्न 5: आप किन लोगों को अपनी इस यात्रा का आधार मानते हैं?
डॉ. रविप्रकाश: मैं हृदय से आभारी हूं बंटी भैया (मुंबई) और उन तमाम दानवीरों का, जो बिना नाम की चाह से सेवा करते हैं।नारायण लाल जी सोनी, एमजी भंडारी जी, सीएल जैन साहब, महावीर जी भंसाली, नवीन जी, सुरेंद्रनाथ जी, विनोद जी, डॉ. राठी साहब, शेखावत जी—इन सभी का योगदान अमूल्य है। मैं ईश्वर के बाद इनके चरणों में नतमस्तक हूं। ओसियां का यह मंदिर इन्हीं पुण्य आत्माओं के बल पर खड़ा है।
प्रश्न 6: सेवा के दौरान आपको कौन-से जीवन सबक मिले?
डॉ. रविप्रकाश: सेवा ने मुझे विनम्र बनाया। अगर एक लाख मिला, तो मैंने दो लाख का काम करके दिखाने की कोशिश की। कई बार अनुभव की कमी से चोटें भी लगीं। लोग समझ नहीं पाए, गलतफहमियां हुईं। लेकिन उन्हीं चोटों ने मुझे बड़े सबक सिखाए। सिखाया कि सेवा में धैर्य जरूरी है। सिखाया कि सच्चाई अंततः विजयी होती है। मैं हारी हुई बाजी भी जीता, क्योंकि मेरे पास बच्चों के सपनों का बल था।
प्रश्न 7: ‘ओसियां रेडी फाउंडेशन’ का दीर्घकालिक लक्ष्य क्या है?
ओसियां रेडी फाउंडेशन के माध्यम से हमारा लक्ष्य स्पष्ट है—इन पीड़ित बालकों को केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें काबिल बनाकर राष्ट्र सेवा में सौंपना। हम चाहते हैं कि ये बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, सैनिक, प्रशासक बनें। लेकिन उससे पहले ये संवेदनशील नागरिक बनें। राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं, संस्कारों से बनता है।
प्रश्न 8: व्यक्तिगत जीवन में आपने क्या खोया और क्या पाया?
डॉ. रविप्रकाश: सुख-सुविधाएं खोईं। स्थायित्व खोया। आर्थिक सुरक्षा खोई। लेकिन पाया—आत्मिक शांति। पाया—अनमोल रिश्ते। पाया—जीवन का वास्तविक अर्थ। आज भी जेब खाली है, लेकिन हृदय भरा हुआ है। बच्चों की मुस्कान मेरे लिए सबसे बड़ा धन है।
प्रश्न 9: समाज से आपकी क्या अपेक्षा है?
डॉ. रविप्रकाश: मेरा करबद्ध निवेदन है—इन बच्चों के अभिभावक बनकर आगे आएं। आपका छोटा-सा सहयोग किसी मासूम के जीवन में उजाला भर सकता है। दान केवल धन का नहीं, समय और संवेदना का भी हो सकता है। जन्म और मृत्यु के बीच के इस समय को सार्थक बनाइए। क्योंकि अंत में यही पूछा जाएगा—आपने अपने लिए क्या कमाया नहीं, बल्कि दूसरों के लिए क्या किया?
हर बच्चा राष्ट्र की पूंजी : सेवा ही सच्चा जीवन
जब हम बातचीत समाप्त करते हैं, तो उनके शब्द कानों में गूंजते हैं—“मृत्यु शाश्वत सत्य है। लेकिन जीवन एक अवसर है—राष्ट्र को समर्पित करने का।” डॉ. रविप्रकाश ने अपने जीवन को पीड़ित बालकों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। ‘लक्ष्य राष्ट्र चेतना मंदिर’ केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक विचार है—कि हर बच्चा राष्ट्र की पूंजी है। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्चा जीवन वही है, जो स्वयं से ऊपर उठकर समाज के लिए जिया जाए।
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