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राष्ट्रीय बेटी दिवस पर विशेष : मां सेवा की राह पर, बेटी संस्कारों की राह पर

8 वर्षीय चेरन्या गहलोत की सुबह बन गई सेवा, श्रद्धा और संस्कार की मिसाल; स्कूल जाने से पहले पीपल-तुलसी को जल, जलजीवों को भोजन, चींटियों के लिए आटा और गायों के लिए चारा

दिलीप कुमार पुरोहित | जोधपुर

9783414079 diliprkahai@gmail.com

बेटी केवल घर की संतान नहीं होती, वह परिवार के संस्कारों की सबसे सुंदर तस्वीर भी होती है। मां-बाप अपने बच्चों को जो कुछ सिखाते हैं, उसका असर केवल उनकी बातों में नहीं, बल्कि बच्चों की दिनचर्या और व्यवहार में दिखाई देता है। जोधपुर की 8 वर्षीय चेरन्या गहलोत इसकी एक सुंदर मिसाल हैं। चेरन्या की सुबह स्कूल की तैयारी से पहले सेवा, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति संवेदना से शुरू होती है।

चेरन्या अपनी मां मंजू गहलोत से मिले संस्कारों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना चुकी हैं। सुबह उठकर पीपल और तुलसी को जल अर्पित करना, ईश्वर की आराधना करना, जलजीवों के लिए भोजन और चुग्गा रखना, चींटियों के लिए आटा डालना तथा गायों को चारा खिलाना उनकी नियमित दिनचर्या में शामिल है। यह काम उनके लिए किसी विशेष दिन की रस्म नहीं है। यह उनकी रोज की आदत है। यही इस छोटी-सी बच्ची की कहानी को विशेष बनाता है।

स्कूल जाने से पहले सेवा की पाठशाला

आज बच्चों की सुबह अक्सर मोबाइल, टीवी, ऑनलाइन गेम और जल्दी-जल्दी स्कूल की तैयारी के बीच गुजरती है। ऐसे समय में चेरन्या की सुबह का यह क्रम अपने आप में एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है। स्कूल जाने से पहले वह प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं। पीपल और तुलसी को जल देना उनके लिए श्रद्धा का विषय है तो जलजीवों को भोजन देना, पक्षियों के लिए चुग्गा रखना, चींटियों को आटा डालना और गायों को चारा खिलाना जीवमात्र के प्रति संवेदना का परिचय है। इन छोटे-छोटे कार्यों का कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं होता। न कोई मंच है, न कोई पुरस्कार और न ही किसी से प्रशंसा पाने की अपेक्षा। चेरन्या के लिए यह उनकी सुबह का सामान्य हिस्सा है। यही सामान्य-सी लगने वाली दिनचर्या असाधारण संस्कारों की कहानी कहती है।

मां की सेवा, बेटी के संस्कार

चेरन्या की मां मंजू गहलोत स्वयं समाज सेवा से जुड़ी हुई हैं। उनका मानना है कि जरूरतमंदों और समाज के लिए कुछ करने से मन को आत्मिक शांति मिलती है। उनके लिए समाज सेवा केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने का माध्यम है। मंजू गहलोत कहती हैं कि जब वे अपनी बेटी को उन्हीं संस्कारों को अपने जीवन में उतारते हुए देखती हैं, तो उन्हें भीतर से संतोष मिलता है। मां ने बेटी को केवल यह नहीं बताया कि पूजा करनी चाहिए, बल्कि प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील होना भी सिखाया। परिणाम यह हुआ कि बेटी ने इन बातों को उपदेश की तरह नहीं लिया, बल्कि अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया। यही संस्कार की सबसे बड़ी शक्ति है—जब कोई बात बच्चे के व्यवहार में उतर जाए तो उसे बार-बार समझाने की जरूरत नहीं पड़ती।

संस्कार बोले नहीं जाते, जीए जाते हैं

मंजू गहलोत का मानना है कि बच्चों को संस्कार देने के लिए केवल उन्हें उपदेश देना पर्याप्त नहीं है। बच्चे अपने आसपास के बड़ों को देखकर सीखते हैं। मां समाज सेवा करती है तो बेटी सेवा को देखती है। मां जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना रखती है तो बेटी के भीतर भी वही भाव पैदा होता है। मां पूजा और प्रकृति के प्रति श्रद्धा रखती है तो बेटी भी उसी वातावरण में बड़ी होती है। इस तरह संस्कार किसी किताब का अध्याय नहीं, बल्कि परिवार के व्यवहार से बच्चे तक पहुंचने वाली जीवन-पद्धति बन जाते हैं। चेरन्या की कहानी इसी बात को सामने लाती है कि बच्चे को संस्कार देने का सबसे प्रभावी तरीका स्वयं संस्कारों के साथ जीवन जीना है।

शिक्षा जरूरी, लेकिन संस्कार उसके साथ

मंजू गहलोत के विचार में शिक्षा और संस्कार दोनों जीवन के लिए जरूरी हैं। उनका मानना है कि केवल शिक्षा प्राप्त कर लेना जीवन की पूर्णता नहीं है। शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान, विवेक और आत्मनिर्भरता देती है, लेकिन संस्कार उस ज्ञान के उपयोग की दिशा निर्धारित करते हैं। उनका कहना है—“बिना संस्कार के शिक्षा का कोई महत्व नहीं होता। शिक्षा और संस्कार जीवन के मूल मंत्र हैं। शिक्षा आपको कभी झुकने नहीं देगी और संस्कार आपको कभी गिरने नहीं देंगे।” यह बात आज के बदलते सामाजिक परिवेश में विशेष अर्थ रखती है। बच्चों को बेहतर स्कूल, अच्छी शिक्षा और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराना जरूरी है, लेकिन साथ ही उन्हें संवेदना, अनुशासन, सम्मान, सेवा और जिम्मेदारी का भाव देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

सोच नई, संस्कार पुराने

मंजू गहलोत की एक बात विशेष रूप से ध्यान खींचती है—“सोच भले ही नई रखो, लेकिन संस्कार पुराने ही अच्छे होते हैं।” यह वाक्य बदलते समय और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन की बात करता है। आज की पीढ़ी नई तकनीक के साथ आगे बढ़ रही है। बच्चों के सामने सीखने और आगे बढ़ने के पहले से कहीं अधिक अवसर हैं। ऐसे में नई सोच आवश्यक है। लेकिन नई सोच का अर्थ यह नहीं कि संवेदना, बड़ों का सम्मान, प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी, जीवों के प्रति दया और समाज के प्रति कर्तव्य जैसे मूल्यों को पीछे छोड़ दिया जाए। चेरन्या की दिनचर्या इसी संतुलन की छोटी लेकिन सुंदर तस्वीर है। वह आधुनिक शिक्षा ग्रहण करने वाली बच्ची है, लेकिन उसकी सुबह प्रकृति, आस्था और सेवा के पारंपरिक संस्कारों से शुरू होती है।

पीपल और तुलसी से प्रकृति तक

भारतीय परिवारों में पीपल और तुलसी का विशेष सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व रहा है। चेरन्या द्वारा इन पौधों को नियमित जल देना केवल पूजा का हिस्सा नहीं, बल्कि प्रकृति से जुड़ने की उसकी एक छोटी-सी प्रक्रिया भी है। बच्चों को प्रकृति के साथ जोड़ने की शुरुआत घर से ही हो सकती है। पौधों को पानी देना, पक्षियों के लिए दाना रखना, जल पात्र रखना, पशुओं को भोजन देना और आसपास स्वच्छता बनाए रखना—ये ऐसे छोटे कार्य हैं जिनसे बच्चों में जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है। चेरन्या की दिनचर्या में इन गतिविधियों का होना इस बात का उदाहरण है कि संस्कार तभी स्थायी बनते हैं जब वे रोजमर्रा के जीवन में शामिल हों।

जलजीवों और पक्षियों के लिए भोजन

चेरन्या की दिनचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जलजीवों और पक्षियों के लिए भोजन एवं चुग्गा देना भी है। यह कार्य जीव-जगत के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देता है। गर्मियों में पक्षियों के लिए पानी और दाना रखने से लेकर नियमित रूप से जीव-जंतुओं के प्रति दया का भाव रखना बच्चों में प्रकृति से जुड़ाव पैदा कर सकता है। चेरन्या के लिए यह कोई अभियान नहीं है। वह इसे रोज के काम की तरह करती हैं। शायद यही कारण है कि उनकी छोटी-सी पहल अधिक प्रभावशाली लगती है।

चींटियों के लिए आटा, गायों के लिए चारा

चेरन्या चींटियों के लिए आटा डालती हैं और गायों को चारा खिलाती हैं। भारतीय सामाजिक और पारिवारिक परंपराओं में जीवों को भोजन कराने की परंपरा पुरानी रही है। बच्चे जब इस तरह के कार्यों में स्वयं शामिल होते हैं तो उनके भीतर यह भाव विकसित होता है कि दुनिया केवल मनुष्यों के लिए नहीं है। हमारे आसपास रहने वाले पशु-पक्षी और छोटे-से-छोटे जीव भी प्रकृति के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। यही भावना आगे चलकर पर्यावरण संरक्षण और जीव-जगत के प्रति जिम्मेदारी की व्यापक सोच का आधार बन सकती है।

मां को बेटी पर संतोष

मंजू गहलोत के लिए चेरन्या का यह व्यवहार केवल बेटी की अच्छी आदत नहीं है। उनके लिए यह उनके दिए संस्कारों का परिणाम है। एक मां के लिए इससे बड़ी संतुष्टि शायद ही कोई हो कि बच्चा उसके बताए रास्ते को केवल सुन नहीं रहा, बल्कि उसे अपने जीवन में उतार भी रहा है। मंजू गहलोत समाज सेवा में आत्मिक शांति महसूस करती हैं। जब वह अपनी बेटी को सेवा और श्रद्धा के उन्हीं मूल्यों के साथ आगे बढ़ते देखती हैं तो उनके मन में संतोष पैदा होता है। मां-बेटी का यह संबंध केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि संस्कारों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली यात्रा जैसा है।

बेटी दिवस का वास्तविक संदेश

राष्ट्रीय बेटी दिवस के अवसर पर चेरन्या की कहानी हमें यह सोचने का अवसर देती है कि बेटियों के सम्मान का अर्थ केवल उन्हें उपहार देना या सोशल मीडिया पर शुभकामनाएं देना नहीं है। बेटी को शिक्षा देना, उसे निर्णय लेने की क्षमता देना, उसके सपनों को सम्मान देना और साथ ही जीवन के मानवीय मूल्यों से जोड़ना भी बेटी के प्रति परिवार की जिम्मेदारी है। चेरन्या अभी केवल आठ वर्ष की हैं। उनके सामने जीवन का बहुत लंबा रास्ता है। वह बड़ी होकर क्या बनेंगी, यह आज कहना संभव नहीं। लेकिन उनकी वर्तमान दिनचर्या यह जरूर बताती है कि उनके जीवन की शुरुआत सेवा, संवेदना और संस्कारों से हो रही है।

छोटी उम्र, बड़ी सीख

चेरन्या की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वह कोई बड़ा सामाजिक अभियान चला रही हैं। इसकी खूबसूरती इस बात में है कि वह अपनी छोटी उम्र में रोज के छोटे-छोटे कामों के माध्यम से एक बड़ी जीवन-दृष्टि को आत्मसात कर रही हैं। पीपल को जल देना, तुलसी की सेवा करना, ईश्वर को याद करना, जलजीवों को भोजन देना, पक्षियों को चुग्गा डालना, चींटियों के लिए आटा रखना और गायों को चारा खिलाना—ये सभी कार्य मिलकर उनकी सुबह को एक ऐसी पाठशाला बना देते हैं जिसमें किताबें कम और व्यवहार अधिक है। यही वह शिक्षा है जो घर से शुरू होती है और जीवनभर साथ चल सकती है।

एक मां से बेटी तक पहुंचती विरासत

हर पीढ़ी अगली पीढ़ी को कुछ न कुछ देती है। कोई धन देता है, कोई संपत्ति, कोई शिक्षा और कोई संस्कार। मंजू गहलोत अपनी बेटी चेरन्या को जो विरासत दे रही हैं, उसमें समाज सेवा, जीवों के प्रति दया, प्रकृति के प्रति सम्मान और ईश्वर के प्रति आस्था शामिल है। चेरन्या इस विरासत को अपने छोटे-छोटे कार्यों के माध्यम से आगे बढ़ा रही हैं। शायद यही बेटी दिवस का सबसे सुंदर संदेश है—बेटियां केवल परिवार का भविष्य नहीं होतीं, वे परिवार के वर्तमान संस्कारों की पहचान भी होती हैं। आज जब शिक्षा और आधुनिकता जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं, तब चेरन्या की कहानी याद दिलाती है कि आधुनिकता के साथ संस्कार भी चल सकते हैं। नई सोच के साथ पुरानी संवेदनाएं भी जीवित रह सकती हैं। और अंत में मंजू गहलोत की वह बात इस पूरी कहानी का सार बन जाती है—“शिक्षा आपको कभी झुकने नहीं देगी और संस्कार आपको कभी गिरने नहीं देंगे।” आठ वर्षीय चेरन्या की हर सुबह मानो इसी विचार को अपने छोटे-छोटे कर्मों के माध्यम से सच करने की कोशिश कर रही है। स्कूल की किताबें उन्हें भविष्य का ज्ञान देंगी, लेकिन घर के संस्कार उन्हें उस ज्ञान को सही दिशा में इस्तेमाल करने का विवेक देंगे। यही एक मां की सबसे बड़ी उपलब्धि और बेटी के जीवन की सबसे सुंदर शुरुआत है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor