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Tuesday, August 25, 2026, 10:48 am

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Lifestyle

प्रेम सुख या संताप…? कवयित्रियों ने शब्दों में की व्याख्या, अनूठे कार्यक्रम में 30 से अधिक महिलाओं ने वैचारिक मंथन किया

डिवाइन सोल फाउंडेशन का होटल एआर एक्सीलेंसी में कार्यक्रम आयोजित

राइजिंग भास्कर की एडिटर इन चीफ राखी पुरोहित की रिपोर्ट

डिवाइन सोल फाउंडेशन हमेशा कुछ नया करता है। महिलाओं के विचारों को मंच देने में यह फाउंडेशन अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करता रहा है। रविवार को होटल एआर एक्सीलेंसी में फाउंडेशन एक अनूठे कार्यक्रम के साथ प्रस्तुत हुआ। प्रेम सुख या संताप…? इस विषय पर चुनिंदा कवयित्रियों को काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया गया। इस विषय पर युवा कवयित्रियों ने अपनी एक से बढ़कर एक कविताएं प्रस्तुत की।

कवयित्रियों ने बताया कि प्रेम एक अनुभूति है। प्रेम में केवल वासना या दैहिक सुख ही महत्वपूर्ण नहीं होता। प्रेम मन का दर्पण है। प्रेम मीरा ने मोहन से किया। प्रेम राधा ने कृष्ण से किया। प्रेम की परंपरा सृष्टि के साथ ही चली आ रही है। प्रेम में पाना ही सबकुछ नहीं होता। प्रेम में समर्पण करना पड़ता है। ऐसे ही भावों को पिराते हुए काव्य गोष्ठी सार्थक चर्चा के साथ बढ़ती रही। कार्यक्रम संयोजक आशा पाराशर ने बताया कि कार्यक्रम की अतिथि लॉयंस क्लब की अध्यक्ष उषा गर्ग और विषय विशेषज्ञ कमांडेंट सीमा हिंगोनिया थी।

सभी प्रेम का व्यवहार करे तो दुनिया से हिंसा खत्म हो जाए : चंद्रकला गोस्वामी

इस मौके पर मनोवैज्ञानिक चंद्रकला गोस्वामी ने कहा कि प्रेम का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करना जरूरी है। प्रेम जहां होता है वहां व्यक्ति अपने आपको सुखी और आनंदित महसूस करता है। प्रेम का माहौल समाज में स्वस्थ और सार्थक अभिव्यक्ति को बढ़ाता है। प्रेम केवल दैहिक पोषण नहीं है। यह जीवन को आनंदित करने वाला मुद्दा है। प्रेम को हमें समाज में सकारात्मक रूप से लेना होगा। दुनिया में अगर सभी प्रेम से रहने लग जाए तो हिंसा स्वत: ही खत्म हो जाए।

प्रेम सुख और संताप परिस्थितियों पर निर्भर : सीमा हिंगोनिया

इस मौके पर विषय विशेषज्ञ कमांडेंट सीमा हिंगोनिया ने कहा कि प्रेम सुख या संताप अच्छा विषय चुना गया है। दरअसल प्रेम सुख और संताप दोनों हो सकता है। बस परिस्थितियां ही उसे तय करती है। प्रेम केवल आनंद को जन्म देता है। मगर जब प्रेम में अति हो जाती है या प्रेम में अपेक्षा अधिक होती है और उसमें पूर्ति नहीं हो पाती तो संताप का रूप ले लेती है। सबकुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस मौके पर अधिवक्ता और योग विशेषज्ञ संजय कपूर ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

जब प्रेम मीरा करती है तो मोहन और जब राधा करती है तो कान्हा बन जाता है : राखी 

इस मौके पर राखी पुरोहित ने भी एक सार्थक रचना पढ़ी। इस रचना में बताया कि प्रेम जीवन की अनुभूति है। प्रेम में समर्पण ही सबकुछ होता है। प्रेम में पाना ही सबकुछ नहीं होता। प्रेम आपसी समझ और प्रेम आत्मिक अनुभूति होती है। प्रेम में दो आत्माओं का मिलन परमात्मा के मिलन की अनुभूति देता है। राखी ने कहा कि जब प्रेम मीरा करती है तो प्रेम मोहन बन जाता है और जब प्रेम राधा करती है तो प्रेम कान्हा बन जाता है।

निधि श्रीमाली, निशा व्यास व गीतिका जैन की रचनाएं श्रेष्ठ घोषित

सह संयोजक ऋचा शरद अग्रवाल ने रचनाकारों को कार्यक्रम की रूपरेखा से अवगत करवाया। कार्यक्रम निर्णायक डाॅ. रेणुका श्रीवास्तव ने क्रमशः निधि श्रीमाली, निशा व्यास, गीतिका जैन की रचनाओं को श्रेष्ठ घोषित किया। अतिथि एवं विषय विशेषज्ञ ने विषय पर अपने अनुभव साझा कर लाभान्वित किया। कार्यक्रम में आने वाले रचनाकार अनुपमा माहेश्वरी, साधना अग्रवाल, मीनू मेहता, वीना अचतानी, रीतिका मनवानी, डा.वर्षा चौहान, स्नेह लता कुम्भट, सुरभि खींची, नीलम व्यास ,शुभ लक्ष्मी व्यास, विनी सोनी, राखी पुरोहित, सुलेखा भंसाली,एवं जयपुर से फाउडंर रमेश शर्मा ने भी अभिव्यक्ति में भाग लिया।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor