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Thursday, July 9, 2026, 11:30 am

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आत्मशुद्धि, मोक्ष की प्राप्ति और पुण्य संचय के लिए महंत श्रीधर गिरि ने किया कुंभ में कल्पवास

जोधपुर लौटने पर भक्तों ने किया महंत का स्वागत, संत बोले-कल्पवास कठोर अनुष्ठान

पंकज जांगिड़ की विशेष रिपोर्ट. जोधपुर 

कल्पवास का महत्व अनंत है। यह मौका भाग्यशालियों को मिलता है। महाकुंभ में कल्पवास करना हर संत-श्रद्धालु का सपना होता है। इसके लिए व्रती काे कठोर व्रत का पालन करना पड़ता है। जीवन में ऐसे मौके मिलना दुश्कर होता है। मगर रातानाडा ओल्ड कैंपस के सामने स्थित श्री पीपलेश्वर महादेव मंदिर के महंत श्रीधर गिरि महाराज के जीवन में यह अनंत खुशी और गौरव का मौका आया जब उन्होंने पिछले दिनों प्रयागराज महाकुंभ में कल्पवास की साधना की और प्रयागराज में स्नान किया।

महंत श्रीधर गिरि अपने शिष्यों के साथ पिछले दिनों प्रयागराज प्रवास पर थे। वहां उन्होंने कठोर साधना की और अनंत पुण्य का अर्जन किया। महाराज ने बताया कि कल्पवास का अर्थ एक विशेष धार्मिक साधना और तपस्या से है, जो माघ मास में प्रयागराज (इलाहाबाद) के संगम तट पर की जाती है। यह परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है और इसका उल्लेख वेदों व पुराणों में मिलता है।

कल्पवासी एक महीने तक संगम तट पर अनुष्ठान करते हैं

महंत श्रीधर गिरि ने बताया कि कल्पवास का अर्थ है कल्प + वास यानी ‘कल्प’ का अर्थ एक दीर्घकालिक समय अवधि (युग) और ‘वास’ का अर्थ निवास या रहना होता है। अथार्त संगम तट पर एक निश्चित समय तक साधना, तपस्या और आत्मशुद्धि के लिए निवास करना। कल्पवासी पूरे माघ मास (लगभग एक महीना) तक गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर रहकर व्रत, ध्यान, जप-तप, दान और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है

महंत ने बताया कि कल्पवास के व्रती को ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है। उसे बिस्तर का त्याग करना पड़ता है। भूमि पर शयन करना पड़ता है। कल्पवास के दौरान साधक पूर्णतया ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और सादा भोजन ग्रहण करते हैं। भूमि पर शयन करने के साथ ही भजन-कीर्तन, संत-सत्संग में भाग लेते हैं। कल्पवास का पालन करने वालों को “कल्पवासी” कहा जाता है। इसे मुख्य रूप से माघ मेले के दौरान संगम पर किया जाता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु हर वर्ष एकत्र होते हैं। इसका उद्देश्य आत्मशुद्धि, मोक्ष की प्राप्ति और पुण्य संचय करना होता है।

कल्पवास से पापों का नाश होता है

महंत ने बताया कि धार्मिक मान्यता है कि माघ मास में संगम में स्नान और कल्पवास करने से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। इसे एक प्रकार का आत्मसंयम और आध्यात्मिक यात्रा भी माना जाता है।

संत के लौटने पर उमड़े साधक-भक्त  

कुंभ कल्पवास और कुंभ स्नान कर लौटने पर महंत श्रीधरगिरी महाराज व भक्तों का भव्य स्वागत हुआ। रातानाडा, ओल्ड कैंपस के सामने स्थित श्री पीपलेश्वर महादेव मंदिर के महंत श्रीधरगिरी महाराज कुंभ कल्पवास व्यतीत कर बुधवार को जोधपुर लौटे। मंदिर समिति सदस्य शशिकांत तिवाड़ी के नेतृत्व में 40 भक्तों का एक समूह बस द्वारा 14 फरवरी को कुंभ स्नान के लिए रवाना हुआ और महंत श्रीधरगिरी महाराज के साथ जोधपुर लौटने पर मंदिर समिति सदस्यों, क्षेत्रवासियों और भक्तों ने भव्य स्वागत किया और महाराज से आशीर्वाद व गंगाजली पात्र प्राप्त किया।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor