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राइजिंग भास्कर स्थापना दिवस स्टोरी 19…राव जोधा ने दिया दुनिया को जोधपुर का नायाब तोहफा

12 मई जोधपुर के 567वें स्थापना दिवस पर विशेष

लेखक : राजेंद्रसिंह लीलिया

जोधपुर के संस्थापक राव जोधा न केवल यौद्धा थे, बल्कि सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियों को समझने की दूरदृष्टि रखने वाले शासक थे। उन्होंने मध्ययुगीन प्रतिरक्षा प्रणाली और सामरिक दृष्टि से मंडोर को राजधानी के रूप में असुरक्षित माना और चिड़ियानाथ जी की टूंक पर 12 मई, 1459 को एक सुदृढ़ किले का शिलान्यास किया व नई राजधानी के रूप में जोधपुर शहर बसाया।

मारवाड़ के शासक राव रणमल के पुत्र राव जोधा का जन्म 28 मार्च, 1415 भादवा बदी 8, विक्रम संवत् 1472 में हुआ। राव जोधा जोधपुर के प्रथम प्रतापी शासक थे। राव जोधा का जीवन कठिनाईयों, चुनौतियों और संघर्ष की एक अनूठी गाथा है। मारवाड़ में सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की जिसके कारण उनके वंशज निरन्तर शासन करते रहे।

राव जोधा से ही जोधपुर की ऐतिहासिक शौर्य यात्रा प्रारंभ होती है। राव जोधा ने युद्ध-कौशल व कूटनीतिक राजनीति अपने पिता राव रणमल से सीखी थी। राव रणमल अपने पिता राव चूडा के देहान्त के बाद 1423 ई. में मेवाड़ महाराणा लाखा की सेवा में मेवाड़ चले गये। उन्होंने अपनी बहन हंसा बाई का विवाह लाखा के साथ कर देने के बाद मेवाड़ की राजनीति में राव रणमल का महत्व बढ़ गया। लाखा की मृत्यु के बाद उनका अल्पवयस्क पुत्र मोकल गद्दी पर बैठा तथा मेवाड़ राज्य का सारा प्रबन्ध राव रणमल देखने लगे। महाराणा मोकल की हत्या के बाद अल्पवयस्क कुंभा मेवाड़ की गद्दी पर आसीन हुए। राव रणमल के बढ़ते सैन्य व राजनीतिक प्रभाव से मेवाड़ में दरबारी षड़यंत्र में 1428 में राव रणमल की हत्या कर दी गई। राव रणमल के पुत्र राव जोधा इन विषम परिस्थितियों में अपने विश्वस्त सात सौ साथियों के साथ मेवाड़ से मारवाड़ के लिए रवाना हो गये। रावत चूंडा के नेतृत्व में मेवाड़ की सेना ने राव जोधा का पीछा किया। कपासन के पास पहली मुठभेड़ में भीषण संघर्ष में राव जोधा के दो सौ सहयोगी मारे गये। इसके बाद सोमेश्वर के घाटे तक पहुँचते-पहुँचते चितरोड़ी, सतखम्भा, कनवज व केलवा में भी दोनों में संघर्ष हुआ। सोमेश्वर पहुँचने तक राव जोधा के ढ़ाई सौ योद्धा ही बचे। स्वामीभक्त राठौड़ योद्धाओं ने राव जोधा को सकुशल सुरक्षित मण्डोर पहुँचाने के लिए सात योद्धाओं के साथ रवाना किया। राव जोधा तो सकुशल पहुँच गये लेकिन मण्डोर भी सुरक्षित नहीं होने से जांगल की तरफ निकल गये जहाँ काहुनी गांव को अपना ठिकाना बनाया।

चित्तौड़ की सेना ने सोमेश्वर के बाद मण्डोर पर अधिकार करके चौकड़ी, मेड़ता, सोजत में भी अपनी सैन्य चौकियां स्थापित कर दीं। काहुनी में राव जोधा को ढूढ़ने पर वह जंगल में चले गये। काफी संघर्ष के दौर से गुजरते हुए राव जोधा इधर-उधर अपने ठिकाने बदलते रहे। पिता राव रणमल की हत्या के समय मारवाड़ की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त थी। जैतारण पर सिंधल राठौड़ों का अधिकार, सिवाना पर जैतमालोत शासन, खेड़ पर राव मल्लीनाथ के वंशजों व नागौर पर खानजादा वंश का अधिकार था। इस पर राव जोधा ने धीरे-धीरे अपनी सैन्य ताकत बढ़ायी। गागरोन के शासक चाचिगदेव चौहान की पुत्री से बरजांग के विवाह से उनको मदद भी मिली। सेतरावा रावत लूणा ने भी सहयोग किया। राव जोधा का आत्मविश्वास बढ़ता गया और सही मौका देखकर मण्डोर पर आक्रमण कर पुनः अधिकार कर लिया। साथ ही अन्य मेवाड़ी कब्जे की चौकियां चौकड़ी, कोसाना पर कब्जा किया व मेवाड़ी सेना को भगाकर सोजत के पास धनला में परास्त किया। लगातार 15 वर्षों के संघर्ष के बाद राव जोधा ने मारवाड़ को मेवाड़ से मुक्त कराकर 1453 में मण्डोर पर पुनः आधिपत्य स्थापित किया।

1458 में मण्डोर के किले में राव जोधा का शास्त्रानुसार राज्याभिषेक हुआ। राव जोधा ने अपने पुत्र दूदा को भेज कर जैतारण पर कब्जा करवाया, छापर द्रोणमुख पर आधिपत्य भी महत्वपूर्ण था। राव जोधा के अनुज कांधल लोदी वंश के प्रमुख सामन्त सारंग खाँ से युद्ध में मारे गये। राव जोधा ने उसे मार कर बदला लिया। इसके बाद मारवाड़ की सीमाऐं हिसार तक जा पहुँची। उत्तरी भारत के प्रमुख राजाओं में राव जोधा की गिनती होने लगी। राव जोधा के पुत्र बीका द्वारा बीकानेर की स्थापना व राव दूदा व वरसिंग द्वारा मेड़ता की स्थापना प्रमुख घटनाऐं रही। मण्डोर के बाद राव जोधा ने मेड़ता, फलोदी, पोकरण, सिवाना, पाली, सोजत, नाडोल, जैतारण, शिव, डीडवाना, गोडवाड़ का कुछ हिस्सा व नागौर पर अधिकार कर लिया। उत्तरी भारत की ओर विजय अभियान को पठानों ने रोक दिया।

राव जोधा ने राजनीतिक दृष्टि व कूटनीति के तहत मेवाड़ से रिश्ते सुधारने की नीति के तहत राणा कुम्भा से राजनीतिक सहयोग स्थापित करने के लिए अपनी पुत्री श्रृंगारदे का विवाह राणा कुम्भा के पुत्र रणमल के साथ किया। मारवाड़-मेवाड़ सम्बन्ध पुनः बेहतर बने। इसके बाद सोजत को सीमा निर्धारण का बिन्दु बनाया। राणा कुम्भा के उत्तराधिकारी उदा ने उन्हें अजमेर व सांभर पुनः सौंप दिए ताकि पठानों के विरुद्ध संघर्ष में राव जोधा का सहयोग मिल सके।

राव जोधा के 14 पुत्र सातल, सूजा, नींबा, दूदा, वरसिंग, बीका, बीदा, जोगा, शिवराज, करमसी, रायमल, बनवीर, जोगा व सावंतसी थे। उन्होंने मारवाड़ का विशाल साम्राज्य सुरक्षा व व्यवस्था के लिए अपने स्वजनों को सौंपा। उन्होंने सोजत अपने बड़े भाई को, मेड़ता पुत्र वीरसिंह, छापर द्रोणमुख अपने पुत्र बीका को, बीकाजी ने जांगल प्रदेश को जीतकर 1488 में बीकानेर में किले की स्थापना कर बीकानेर शहर बसाया। मध्ययुगीन राजस्थान में राव जोधा का उत्कर्ष उनकी उपलब्धियों का प्रमाण है। 50 वर्ष के कालखण्ड तक शासन करने के बाद 73 वर्ष की आयु में वि.सं. 1545 की वैशाख सुदी पांचम, 16 अप्रेल, 1488 ई. को स्वर्गवास हुआ।

राव जोधा द्वारा स्थापित मेहरानगढ़ दुर्ग आज भी अपने अन्दर वर्षों के इतिहास को समाए हुए महाराजा गजसिंह जी के मुख्य संरक्षण में मेहरानगढ़ म्युजियम ट्रस्ट के माध्यम से इतिहास, कला, संस्कृति व हेरिटेज को बढ़ावा देने का उल्लेखनीय कार्य निरंतर कर रहा है।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor