Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 7:52 am

Thursday, July 9, 2026, 7:52 am

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

कूड़े में डालने जैसी है भारत की शिक्षा नीति: क्या शिक्षक बनना ‘विश्व गुरु’ भारत में सबसे कठिन कार्य है?

ये आलेख पढ़ने के बाद देश के युवाओं को कोर्ट में याचिका लगानी चाहिए और आजादी के बाद की सभी सरकारों को आरोपी बनाना चाहिए जो 77-78 साल में यूथ को योग्यता के बल पर शिक्षक बनने का अधिकार नहीं देता. अगर आपकी जेब में लाख दो लाख रूपये नहीं है तो आपकी योग्यता का कोई मूल्य नहीं… धिक्कार है ऐसी शिक्षा नीति को. इसे कूड़ेदान में फेंक दो और लूटते रहो वाह वाही. करोड़ों युवाओं जाग जाओ बहिष्कार करो ऐसी शिक्षा नीति का… क्या मेरे शब्दों को सार्थकता की सौरभ मिलेगी. बस युवाओं के जागने भर की देरी है… जागो… जागो… तुम्हें जागना ही होगा….

डी के पुरोहित. नई दिल्ली

भारत को “विश्व गुरु” की संज्ञा दी जाती है—नालंदा, तक्षशिला, और विक्रमशिला जैसे ज्ञान केंद्रों की परंपरा से संपन्न यह राष्ट्र शिक्षा को मोक्ष का माध्यम मानता आया है। लेकिन यह विडंबना ही है कि आज़ादी के बाद से लेकर आज तक भारत की शिक्षा नीति ऐसी उलझनों और विसंगतियों में फंसी हुई है कि एक गरीब मगर योग्य विद्यार्थी के लिए शिक्षक बन पाना सपना ही रह गया है। भारत में एक आईएएस बनना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन शिक्षक बनने की राह इतनी जटिल, महंगी और मानसिक रूप से थकाऊ बना दी गई है कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

1. शिक्षा नीति: गरीब की पहुँच से बाहर

शिक्षा का अधिकार भारतीय संविधान द्वारा मूल अधिकार के रूप में दिया गया है, लेकिन शिक्षक बनने की राह उस गरीब छात्र के लिए निराशाजनक है जो देश की सेवा करना चाहता है। बीएड (बैचलर ऑफ एजुकेशन) करने के लिए न केवल शैक्षणिक योग्यता बल्कि हजारों–लाखों रुपये की फीस चाहिए होती है। बीएड की फीस आज के समय में ₹70,000 से ₹2,00,000 तक है—जो एक किसान, मजदूर या निम्न वर्गीय परिवार के लिए असंभव है। यह कैसी नीति है जो ज्ञान के पुजारियों से पहले धन का बलिदान मांगती है?

2. शिक्षा संस्थानों में निजीकरण और लूटतंत्र

बीएड जैसे पाठ्यक्रमों को निजी कॉलेजों ने पूरी तरह मुनाफे का अड्डा बना दिया है। सरकार की ढीली नीतियाँ और मान्यता देने की ढीली प्रक्रिया ने हजारों ऐसे कॉलेजों को खुलने का मौका दिया जो सिर्फ फीस वसूलने और डिग्री बाँटने के अड्डे बन चुके हैं। पढ़ाई, प्रशिक्षण, मूल्यांकन—सब कुछ मात्र दिखावा बन गया है।

क्या सरकार यह नहीं जानती कि एक शिक्षक को प्रशिक्षित करने में केवल क्लासरूम नहीं, एक समर्पित माहौल और आदर्श मूल्य चाहिए? फिर क्यों इस कार्य को निजी संस्थानों के हवाले कर शिक्षा का बाजारीकरण कर दिया गया है?

3. शिक्षक भर्ती: अराजक और अपारदर्शी व्यवस्था

यदि कोई छात्र किसी तरह बीएड कर भी लेता है तो उसके बाद की राह और भी कठिन है। शिक्षक बनने के लिए उसे प्रतियोगी परीक्षा देनी पड़ती है—टीईटी, सीटीईटी, एसटीईटी, रिट, यूपीटीईटी, बिहार शिक्षक परीक्षा, आदि की भूलभुलैया। हर राज्य की अपनी प्रक्रिया, अपने नियम, अलग सिलेबस और वर्षों तक खिंचती भर्ती प्रक्रिया।

भर्ती में देरी, अनियमितता, कोर्ट केस, घोटाले और पेपर लीक जैसी घटनाएं प्रतिभाशाली उम्मीदवारों का मनोबल तोड़ देती हैं। हजारों बीएड डिग्रीधारी बेरोजगार घूमते हैं क्योंकि या तो भर्ती निकलती नहीं, या पेपर लीक हो जाता है, या नियुक्ति पर वर्षों तक न्यायालय में फैसला लंबित रहता है।

4. प्रतिभा का अपमान और आर्थिक अन्याय

एक गरीब मेधावी छात्र जिसे शिक्षक बनकर ज्ञान का प्रकाश फैलाना है, उसे सबसे पहले फीस के लिए कर्ज लेना पड़ता है। फिर बीएड के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में चयन की अनिश्चितता और वर्षों का इंतजार—इस बीच उसकी आर्थिक स्थिति जर्जर हो जाती है। क्या यही है प्रतिभा का सम्मान? क्या यही है सामाजिक न्याय?

भारत जैसे देश में जहाँ करोड़ों बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आवश्यकता है, वहाँ योग्य शिक्षक बनने की प्रक्रिया को इतना कठिन और खर्चीला बना देना राष्ट्रीय अपराध जैसा है।

5. सरकारें क्यों खामोश हैं?

आज़ादी के बाद से अब तक किसी भी सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को जनता के लिए सुलभ और न्यायसंगत नहीं बनाया। कांग्रेस शासन हो या भाजपा की वर्तमान सरकार—शिक्षा नीति केवल घोषणाओं और दस्तावेज़ों तक सीमित रही है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शिक्षक को “राष्ट्र निर्माता” कहने भर से कुछ नहीं होता, जब तक शिक्षक बनने की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी, सस्ती और निष्पक्ष नहीं बनाया जाता।

मोदी सरकार, जो “न्यू इंडिया” और “डिजिटल भारत” की बात करती है, उसने भी शिक्षा को तकनीकी और डिजिटल माध्यमों में तो ढाला, मगर शिक्षक निर्माण की प्रक्रिया में कोई ठोस सुधार नहीं किया। NEP-2020 के तहत “इंटीग्रेटेड B.Ed.” जैसे कदम सिर्फ कागजों पर हैं, ज़मीनी हकीकत आज भी वही है—भ्रष्टाचार, महंगी फीस, भर्ती में अनिश्चितता और अभाव।

6. आईएएस vs शिक्षक: तुलना जो आंखें खोल दे

UPSC—एक परीक्षा, देशव्यापी होती है जबकि हर राज्य में अलग TET/भर्ती होती है. UPSC में सामान्य फीस के आलावा आप में मादा हो तो आप अफसर बन सकते हो मगर शिक्षक बनने के लिए बी एड करने के लिए एक दो लाख रूपये होने ही चाहिए फिर भी शिक्षक बनने की गारंटी नहीं. UPSC भर्ती हर साल निकलती है जबकि शिक्षक भर्ती कोई तय नहीं.यह कैसी शिक्षा नीति है जहाँ एक प्रशासनिक अधिकारी बनना आसान है लेकिन एक शिक्षक बनने के लिए आपको आर्थिक, मानसिक, सामाजिक हर स्तर पर संघर्ष करना पड़ता है?

7. क्या यही है ‘विश्व गुरु’ भारत का सपना?

भारत को अगर सच में “विश्व गुरु” बनना है तो सबसे पहले शिक्षक निर्माण की नीति को आम आदमी के अनुकूल बनाना होगा। सिर्फ IIT या IIM से निकले प्रोफेसर ही ‘योग्य’ नहीं होते—गाँव का वह बच्चा भी योग्य है जो संसाधनों के बिना भी 80% अंक लाता है। क्या उसे शिक्षक बनने का अवसर नहीं मिलना चाहिए?

8. समाधान की ओर—क्या होना चाहिए?

(1) B.Ed को निशुल्क या सब्सिडी के अंतर्गत लाना:
सरकारी संस्थानों में मुफ्त B.Ed शिक्षा दी जानी चाहिए। निजी संस्थानों की फीस पर नियंत्रण लगे।

(2) शिक्षक भर्ती एकीकृत और वार्षिक हो:
UPSC की तरह एक अखिल भारतीय शिक्षक भर्ती परीक्षा (AITRE) का गठन हो, जो हर साल समय पर परीक्षा आयोजित करे।

(3) बेरोजगार B.Ed डिग्रीधारियों के लिए छात्रवृत्ति योजना:
जब तक भर्ती न हो, ऐसे उम्मीदवारों को न्यूनतम भत्ता और स्कूलों में इंटर्नशिप दी जाए।

(4) शिक्षा का विकेंद्रीकरण नहीं, समन्वय जरूरी:
हर राज्य की अपनी प्रक्रिया एक बाधा बन चुकी है। एक समान राष्ट्रीय प्रणाली समय की आवश्यकता है।

(5) प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार:
सिर्फ डिग्री नहीं, मूल्य आधारित और व्यवहारिक शिक्षक प्रशिक्षण अनिवार्य हो। 

शिक्षा व्यवस्था का पुनर्जन्म जरूरी है

यदि भारत को सच में “ज्ञान का प्रकाश स्तंभ” बनना है, तो सबसे पहले उस दीपक को संवारना होगा जो समाज को प्रकाशित करता है—शिक्षक। आज की शिक्षा नीति एक अन्याय की गाथा है जिसमें प्रतिभाएं कुचल दी जाती हैं, केवल इसलिए क्योंकि उनके पास पैसे नहीं हैं। यह न केवल असमानता को बढ़ावा देता है बल्कि भारत के भविष्य को अंधकार की ओर धकेलता है।

अब समय है जब सरकारें अपनी नीतियों की समीक्षा करें और शिक्षा को केवल भाषणों का विषय नहीं, कार्यवाही का केंद्र बनाएं। भारत को विश्व गुरु तब ही कहला सकता है जब शिक्षक बनना केवल सपना नहीं, सहज और सुलभ अवसर बने।

शिक्षक बनने की वर्तमान बाधाएं

बीएड की ऊँची फीस

निजी कॉलेजों की लूट

भर्ती में देरी और भ्रष्टाचार

बार-बार बदलते नियम

राज्यवार असंगत प्रक्रियाएँ

बेरोजगारी और मानसिक तनाव

जनता से अपील:

अगर आप एक न्यायपूर्ण भारत देखना चाहते हैं तो शिक्षक निर्माण प्रणाली में सुधार के लिए आवाज़ उठाएँ। जब शिक्षक सम्मानित होंगे, तभी राष्ट्र प्रबुद्ध होगा।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor