समीक्षा : प्रमोद कुमार शर्मा. बीकानेर
अभी हाल ही में साहित्य कला चेतना परिवार की ओर से ऑनलाइन लेखक से मिलिए कार्यक्रम प्रसारित किया गया ।इस कार्यक्रम में केंद्रीय साहित्य अकादमी दिल्ली से सम्मानित कवि कहानीकार रामस्वरूप किसान को शामिल किया गया ।
इस कार्यक्रम में किसान ने ऑनलाइन तमाम श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर दिए और अपनी बात भी कही।कुछ कविताएं और दोहे भी उन्होंने प्रस्तुत किए।
पूरा कार्यक्रम सुनते हुए एक बात अच्छी तरह से समझ में आ गई कि, किसान के पास वाकई अब नया कुछ कहने के लिए नहीं है ।वे हर बार वहीं दो चार पुरानी बातें दोहराते रहते हैं जिनमें कि पसीना मेहनत ,फसल ,पढ़ना,काट छांट करना आदि।उनका यह कहना गले नहीं उतरा कि कला गांव में ही पैदा होती है ,शहरों में नहीं।”
मैं समझता हूं कि कला का जमीनों की तरह बटवारा नहीं किया जा सकता कि यहां पर ज्यादा फसल होगी यहां पर कम फसल होगी ,वहां पर ज्यादा।कला दुनिया के किसी भी कोने में प्रस्फुटित हो सकती है ।किसी के भी हृदय में प्रकट हो सकती है ।जहां तक हमारे भारतीय शहरों का सवाल है यहां पर कला की उपासना होती है । समकालीन भारत के बड़े बड़े लेखक शहरों में ही रहते आए हैं।अज्ञेय,निर्मल वर्मा, राजेन्द्र यादव,मोहन राकेश,कमलेश्वर, मुक्ति बोध,सफदर हाशमी, मकबूल फिदा हुसैन, बिस्मिल्लाह खां,बिरजू महाराज अमिताभ बच्चन ,ओम् थानवी आदि सैंकड़ों नाम।
शहरों के भीतर एक महीने में कम से कम 30 कार्यक्रम कला संस्कृति और साहित्य को लेकर आयोजित किए जाते हैं ।यह तमाम शहर देश की संस्कृतिक एकता को बचाए हुए हैं ।यह कला शहरों में भी विकसित होती है और कुछ गांवों में।और फिर गांव भी आज गांव कहां रह गए। गांव तो शहर बन गए हैं ।वहां पर पक्के मकान ,दुकान, श्मशान बन रहे हैं। वहां पर कैफै हाउस बन रहे हैं। गांवों में सड़क किनारे भोजनालय (होटल)खुल रहे हैं ।
वहां पर ठंडा गरम मिलने लगा है। वहां पर उच्च स्कूल, पोलीहाउस,आधुनिक फार्म ,ऐसी सब मिलने लगा है। वहां पर कपड़े मिलने लगे हैं ।वहां पर क्या नहीं है। बोलेरो आ गई है। स्कॉर्पियो आ गई है ।और हेलीकॉप्टर में बारात आने लगी है ।फिर भी आप कह रहे हैं कि गांव ही कला के केन्द्र है तो मतलब साफ है रामसरूप किसान गांव में रहते है, इसलिए कला भी उनकी बगल वाली चारपाई पर ही लेटी रहनी चाहिए है।ख़ैर …
दूसरी बात उन्होंने स्वाध्याय को लेकर कही कि लेखक को पढ़ने वाला होना चाहिए ।उन्होंने अपना उदाहरण देते हुए बताया कि वे दुनिया के महत्वपूर्ण ढाई सौ लेखकों को पढ़ चुके हैं ।और यह पढ़ने का काम उन्होंने 40 साल की अवस्था में आने से पहले 20 साल में कर लिया था ।यानी 20 साल तक उन्होंने लिखने की तैयारी की । फिर चालीस में लिखना शुरू किया।
मैं समझता हूं कि दुनिया भर में पता नहीं करोड़ों पाठक है लेकिन क्या वह सब लेखक बन पाते है ।पढ़ना लेखक होने की कसौटी नहीं है।समृद्ध होने की , संस्कारित होने की कसौटी हैं।
कबीर ने कभी नहीं पढा। कबीर ने कहा -“मसी कागद छूयो नहीं… लेकिन आत्मा जब कहने लगती है तो मौलिक सृजन होता है।कबीर मौलिक हैं।जो लोग वर्क आउट करके लेखक बनते हैं वे दस बारह बरस तक ही चल पाते हैं।
पूरे प्रोग्राम में किसान सोनी के कानों में फुसफुसाते रहे कि प्रशंसा ही प्रशंसा हो रही है ।आलोचना नहीं। तो आलोचना मैं कर रहा हूं।
मेरी समझ में नहीं आ रहा कि अपने मैक ओवर काल में उन्होंने दुनिया के बड़े बड़े लेखक तो पढ़ डाले पर गांव गली,आस पास के गांव कस्बों में रहने वाले लेखकों से कुछ नहीं सीखा।न उन्हें करणीदान बारहठ याद आए।न उन्हें ओझा जी,कागद जी,जनक जी,आदि का नाम ही याद नहीं आया।
मैं कहता हूं कि इस प्रक्रिया में किसान को एक सांचा और ढांचा मिल गया है।जिसे वे सर्वोपरि मानते हैं।
पर एक बड़े लेखक के स्वभाव का निर्माण किन मनोवैज्ञानिक चीजों से होता है यह भी वे स्पष्ट न कर सके। उन्हें अपनी अभ्यास स्थली सरस्वती साहित्य परिषद भी याद नहीं आई।
अंत में कहना चाहूंगा कि कोई नरेश सक्सेना किसी युवती को लाख ट्रेनिंग देकर भी महादेवी वर्मा नहीं बना सकते।
मीरा बनाई नहीं जाती।वे होती हैं।
अंत में एक बात कहना चाहूंगा कि जो श्रोता जुड़े उन्होंने किसान के साहित्य पर कोई प्रश्न नहीं किया -कोई बहस नहीं की।
एक नीरस और ठंडा कार्यक्रम।




