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Sunday, October 18, 2026, 9:44 am

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निजी स्कूलों का हर साल किताबें बदलना अनुचित है? पिछले दिनों पीएम मोदी से पूछे सवाल पर उनका मत- किताबें बदलना परेशानी जरूर पर हमें भविष्य गढ़ना भी है, प्राइवेट स्कूलों की दृरदृष्टि पर उठे सवाल बेमानी

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक विपक्षी कार्यकर्ता ने सवाल किया था कि प्राइवेट स्कूल हर साल किताबें बदलकर लूट मचा रहे हैं। जबकि मेडिकल जैसी किताबें भी हर साल नहीं बदलती? पीएम मोदी ने राइजिंग भास्कर को अपनी भावनाएं भिजवाई उसका लब्बोलुआब यह है कि ज्ञान की दुनिया ही स्थिर नहीं है तो पाठ्यपुस्तकें स्थिर कैसे हो सकती है? हम इस विषय में देश भर के पाठकों की राय आमंत्रित कर रहे हैं- आप diliprakhai@gmail.com पर अपने विचार भेज सकते हैं। अपना नाम, पद, और अनुभव लिखते हुए स्पष्ट अपनी राय भेजें, उन्हे हम राइजिंग भास्कर में स्थान देंगे।  

विशेष संवाददाता. नई दिल्ली

पिछले दिनों एक विपक्षी कार्यकर्ता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल किया कि “प्राइवेट स्कूल हर साल 7वीं–8वीं की किताबें क्यों बदलते हैं?” उसका तर्क था कि जब मेडिकल जैसे कठिन और वैज्ञानिक विषयों की किताबें हर साल नहीं बदलतीं, तो प्राइवेट स्कूलों में यह परंपरा क्यों? पर यह सवाल एक गंभीर भूल को जन्म देता है: शिक्षा का उद्देश्य केवल रटा-रटाया ज्ञान नहीं, बल्कि बदलते समाज के अनुरूप समझ पैदा करना है। जब देश-दुनिया तेजी से बदल रही हो, विज्ञान, तकनीक, राजनीति, भूगोल और समाजशास्त्र हर साल नई परतें खोलते हों, तो क्या शिक्षा वही पुरानी परिपाटी दोहराए?

इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी का रुख अत्यंत प्रासंगिक और दूरदृष्टिपूर्ण रहा है। उन्होंने पिछले दिनों राइजिंग भास्कर को अपनी भावनाएं भिजवाते हुए कहा कि बार-बार शिक्षा में डायनैमिक और अपडेटेड कंटेंट पर जोर दिया जाना जरूरी है। और यही बात प्राइवेट स्कूलों की सक्रिय भूमिका को सही ठहराती है।

1. किताब बदलना नहीं, संदर्भ बदलना जरूरी है

आज का समय सूचनाओं का है। हर दिन टेक्नोलॉजी में बदलाव, नीतियों में परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उलटफेर और राष्ट्रीय घटनाओं का असर हमारी सोच पर पड़ता है। जब समाज का ढांचा रोज बदल रहा है, तो शिक्षा प्रणाली में स्थिरता के नाम पर बच्चों को पीछे रखना एक प्रकार का बौद्धिक अन्याय होगा।

उदाहरण के तौर पर—
अगर सामान्य ज्ञान की किताब में लिखा हो कि राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार ने 50 जिले बना दिए और बाद में भजनलाल शर्मा सरकार ने इन्हें घटा दिया, तो उस किताब का अपडेट होना अनिवार्य है। अगर यह जानकारी बच्चों तक नहीं पहुंचती, तो उनकी जानकारी अधूरी और भ्रमित करने वाली होगी। कुछ शिक्षाविदों का कहना है कि बदली हुई जानकारी बाल सभा या प्रार्थना सभा में अलग से दी जा सकती है, मगर किताब में तो वही पुरानी जानकारी होगी और उससे बच्चा भ्रमित होगा। फिर सवाल होगा कि किताब के अनुसार बच्चा पुराना उत्तर दे या नया? इसलिए किताबों में परिवर्तन होना जरूरी है।

2. हर विषय में परिवर्तन की गुंजाइश
हिंदी और सामाजिक विज्ञान में क्यों जरूरी हैं बदलाव?

हिंदी साहित्य या सामाजिक विज्ञान कोई ठहरा हुआ जल नहीं है।

  • साहित्य में नई विधाएं, लेखन शैली, युवा कवियों और लेखकों की कृतियां जुड़ती रहती हैं।
  • सामाजिक विज्ञान (इतिहास, राजनीति, भूगोल) में राजनीतिक नीतियों, राज्य सीमाओं, जनसंख्या के आंकड़े, योजनाएं और घटनाएं निरंतर बदलती रहती हैं।
गणित और विज्ञान में क्यों होते हैं अपडेट्स?

भले ही गणित के मूल सूत्र नहीं बदलते, लेकिन

  • उदाहरणों और टेक्नोलॉजिकल संदर्भ में बदलाव जरूरी होता है।
  • जैसे मोबाइल एप्स, सॉफ्टवेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आदि के उदाहरण नए पाठों में जोड़े जाते हैं।
  • इससे बच्चे सैद्धांतिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ पाते हैं।
3. प्राइवेट स्कूलों की जवाबदेही और गुणवत्ता का मानक

आज भारत में शिक्षा की रीढ़ प्राइवेट स्कूल हैं।

  • ये स्कूल सिर्फ शिक्षा नहीं देते, बल्कि चरित्र निर्माण, तकनीकी दक्षता, व्यक्तित्व विकास और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा की तैयारी कराते हैं।
  • अगर वे हर साल किताबें अपडेट कर रहे हैं तो यह उनकी जागरूकता, नीतिगत प्रतिबद्धता और प्रतिस्पर्धात्मक गुणवत्ता का प्रतीक है।

इसलिए किताबों का अद्यतन एक अनावश्यक खर्च नहीं बल्कि भविष्य में निवेश है।

4. डिजिटल युग में किताबें भी डिजिटल सोच से चलें

आज भारत डिजिटल इंडिया की राह पर है। प्रधानमंत्री मोदी ने बार-बार यह बताया है कि नवाचार और अपडेट रहना ही भारत को विश्वगुरु बनाएगा।

  • 5G, AI, मशीन लर्निंग, स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे विषय स्कूलों के पाठ्यक्रम में आ रहे हैं।
  • ऐसे में अगर किताबें पुरानी सोच पर अटकी रहें, तो बच्चा कब और कैसे वैश्विक प्रतियोगिता में शामिल होगा?
5. गरीब और होनहार बच्चों के लिए हैं विकल्प – RTE जैसी योजनाएं

यह तर्क भी बेमानी है कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई महंगी है और किताबें बदलने से गरीब बच्चे पढ़ नहीं पाते।

  • सरकार ने RTE (Right to Education) के तहत 25% सीटें गरीब और पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए सुरक्षित रखी हैं।
  • वे बच्चे बिना फीस और किताबों के खर्च के अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

इसलिए यदि किताबों में बदलाव हो भी रहे हैं, तो वह गरीब विद्यार्थियों पर आर्थिक बोझ नहीं डालते।

6. किताबों के बदलाव का फायदा – बच्चा बनेगा “वर्ल्ड रेडी”

जब कोई बच्चा अपडेटेड किताबों से पढ़ाई करता है, तो उसे

  • ताजा जानकारी मिलती है
  • उसका विश्लेषणात्मक और तार्किक सोच विकसित होता है
  • वह किसी भी प्रतियोगी परीक्षा या जीवन की चुनौतियों के लिए सक्षम और सशक्त बनता है।

इसमें दोष नहीं, बल्कि सराहना की जरूरत है।

7. क्या मेडिकल की किताबें सच में नहीं बदलतीं?

कार्यकर्ता का तर्क था कि मेडिकल की किताबें हर साल नहीं बदलतीं। यह आंशिक सत्य है।

  • मेडिकल की मूल रचना स्थायी हो सकती है, लेकिन
  • हर साल उसमें नए शोध, नए रोग, नई दवाइयों और आधुनिक सर्जरी के तरीके जोड़े जाते हैं।
  • किताबें नहीं तो कम से कम सप्लीमेंट और जर्नल अपडेट्स जरूर आते हैं।

फिर 7वीं-8वीं के बच्चों को पुरानी जानकारी देकर उन्हें कैसे आधुनिक बनायेंगे?

8. प्रधानमंत्री मोदी का दृष्टिकोण – नई शिक्षा नीति से स्पष्ट

2020 में लाई गई नई शिक्षा नीति (NEP) में प्रधानमंत्री मोदी की सोच साफ झलकती है।

  • शिक्षा केवल डिग्री के लिए नहीं, बल्कि व्यावसायिक, तकनीकी, भावनात्मक और सांस्कृतिक विकास के लिए होनी चाहिए।
  • उन्होंने कहा था, “बच्चों को सिर्फ किताबें रटाने नहीं, बल्कि सोचने और निर्णय लेने लायक बनाना है।”

यह विचार किताबों में परिवर्तन के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क है।

9. निजी संस्थान = प्रतिस्पर्धा + प्रगति

सरकारी और निजी स्कूलों में यही अंतर है:

  • जहां सरकारी स्कूलों में किताबें 10 साल तक वही रहती हैं,
  • वहीं प्राइवेट स्कूल हर साल बदलते संदर्भों को समाहित करते हैं।

इससे शिक्षा में एक स्पर्धात्मक गुणवत्ता बनी रहती है, जो छात्रों को समर्थ नागरिक और वैश्विक पेशेवर बनाती है।

10. किताबें बदलना नहीं, सोच बदलना जरूरी है

वर्तमान विवाद में यह समझना जरूरी है कि

  • किताबों का बदलना व्यावसायिक नहीं, बल्कि शैक्षिक और वैचारिक दायित्व है।
  • प्राइवेट स्कूल केवल मुनाफा नहीं, बल्कि दृष्टि और प्रतिबद्धता से काम कर रहे हैं।
  • और प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना सही है कि

“शिक्षा वही नहीं है जो हमें मिलती है, शिक्षा वो है जो हमें आगे बढ़ाती है।”

इसलिए जो लोग किताबें बदलने का विरोध करते हैं, उन्हें खुद की सोच बदलनी चाहिए। देश को 21वीं सदी में ज्ञान और प्रतिस्पर्धा से जीतना है, न कि पुरानी किताबों की धूल से।

प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में…

“हम नई पीढ़ी को पुरानी सोच नहीं दे सकते। बदलते भारत को नई किताबें चाहिए, नया पाठ चाहिए, और नई उड़ान चाहिए।”

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor