-आइडिया बिकता है, बेचने वाला चाहिए…समाज में कोठारी जैसे लोग आगे आएं तो जोधपुर भी आत्मनिर्भर बन सकता है और स्वच्छ और सुंदर के साथ विकसित शहर की श्रेणी में आ सकता है…
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
जोधपुर शहर की गलियों में एक ऐसा नाम है, जो न केवल अपनी अलग सोच के लिए पहचाना जाता है, बल्कि अपने काम से समाज सेवा की परिभाषा ही बदल रहा है — केवलचंद कोठारी। उन्हें लोग प्यार से “कचरे से सोना बनाने वाला” कहते हैं। उनका एक डायलॉग आज शहर में प्रसिद्ध हो चुका है:
“कूड़ा बनाना बंद करना सीखो।”
केवलचंद कोठारी के कार्यों को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी भी बेकार समझी जाने वाली वस्तु को उपयोगी बनाया जा सकता है, यदि सोच सकारात्मक हो। पुराने बाथ टब को वे फोल्डिंग ठाणे में बदल देते हैं, जींस की पुरानी पैंट से बैग बनाते हैं, और पुराने कपड़ों से रस्सियां, जो गौशालाओं में इस्तेमाल होती हैं। उनके इन कार्यों से न सिर्फ संसाधनों का पुनः उपयोग होता है बल्कि पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।
(अनुपयोगी कपड़ों से बनाई रस्सी जो गौ शालाओं में काम आती है।)
तालाब गोद लो, गांव में रोजगार दो
कोठारी की सोच सिर्फ वस्तुओं के पुनः उपयोग तक सीमित नहीं है। वे मानते हैं कि तालाबों को गोद लेकर, उसमें से निकली मिट्टी को खेतों में डालकर और पाल पर पौधे लगाकर गांवों में रोजगार की व्यवस्था की जा सकती है। यदि तालाब के भीतर एक कुआं खोद दिया जाए और खाद संग्रह की व्यवस्था की जाए तो गांव के कम से कम दस परिवारों को एक माह का रोजगार मिल सकता है।
समाज को दिशा देने वाली योजनाएं
उनका मानना है कि जैन समाज को एक संगठित संस्था बनाकर प्रत्येक भाई का 1.5 लाख रुपए का बीमा करवाना चाहिए, जिससे समाज को आपातकालीन मदद मिल सके। साथ ही, गोशालाओं के प्रबंधन को भी एक नया नजरिया देने का सुझाव वे देते हैं। उनका प्रस्ताव है कि गोशालाएं 100 से 500 टिफिन शहर में बांटें और बदले में नागरिक रोटियां, सब्जी के छिलके, बचे हुए भोजन उन टिफिनों में जमा करें। एक लोडिंग टैक्सी रोज घर-घर जाकर यह सामान एकत्र करे, जिससे न केवल गायों को पोषण मिलेगा, बल्कि कचरा भी कम होगा। खाने से कुपोषण भी कम होगा।
स्कूलों में सहयोग बैंक और खाली प्लॉट की हरियाली
केवलचंद कोठारी बच्चों को भी समाज सेवा से जोड़ना चाहते हैं। वे स्कूलों में सहयोग बैंक की स्थापना की वकालत करते हैं, जहां बच्चे अपनी पुरानी रबड़, पेंसिल, किताबें, बैग, जूते और कपड़े जमा करें। फिर स्कूल टैक्सी चालक उन जरूरतमंदों तक यह सामान पहुंचाएं।
खाली पड़े प्लॉटों को भी वे बर्बाद नहीं होने देना चाहते। उनका प्रस्ताव है कि 200 लीटर के प्लास्टिक ड्रमों में मिट्टी भरकर पांच फीट की दूरी पर पौधे लगाए जाएं और बूंद–बूंद सिंचाई की व्यवस्था की जाए। इससे पर्यावरण को भी संजीवनी मिलेगी और भूमि का सदुपयोग होगा।
फल–तरबूज के छिलकों से गौसेवा और रोजगार
जोधपुर में प्रतिदिन 60 टन आम और 100 टन तरबूज बिकते हैं। कोठारी के अनुसार, इससे लगभग 48 टन छिलके निकलते हैं। एक गाय को यदि 10 किलो छिलका खिला दिया जाए तो 4,800 गायों को भोजन मिल सकता है। साथ ही, यदि एक टैक्सी का किराया 1000 रुपए भी माना जाए तो 480 टैक्सियों को रोज रोजगार, 480 व्यक्तियों को आजीविका, और निगम का 48 टन वेस्ट कम हो सकता है। ये आंकड़े सिर्फ अनुमान नहीं हैं, बल्कि व्यवहार में लाने योग्य योजनाएं हैं।
अस्पतालों व गोशालाओं में मशीनों-उपकरणों का पुनरुद्धार
अस्पतालों व गौशालाओं में पुराने एसी, वॉशिंग मशीन, ट्रॉली, फ्रीज आदि अक्सर बजट के अभाव में कबाड़ हो जाते हैं। कोठारी उन्हें सस्ते दामों में भामाशाहों के सहयोग से रिपेयर करवाते हैं और उन्हें उपयोगी बनाते हैं। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग हो पाता है। कई बार कबाड़ से जुगाड़ कर उपकरण बनाते हैं जो गौशालाओं में काम आते हैं।
केवलचंद कोठारी की सोच, दृष्टि और कार्यशैली न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह समाज को नई दिशा देने वाली है। वे साबित करते हैं कि यदि इच्छा शक्ति हो, तो कचरा भी सोने में बदला जा सकता है। जोधपुर जैसे शहर को ऐसे कर्मयोगियों पर गर्व है, जो हर दिन चुपचाप समाज को बदलने की मुहिम में जुटे हैं।
और अंत में कोठारी का कथन : जब मैं 7/8 साल का था। मेरी माताजी घर में बची हुई दवाइयों को पीछे बाड़े में गड्ढा खुदवा कर अंदर डलवाती थीं। मैने सोचा हजारों रुपए की दवाइयां गड्ढे में डाल दी तो जरूरतमंदों को फ्री दवाई मिल सकती थी। हम चाहते हैं कि भामाशाह अपने पैसे को अपने आसपास के तालाब, सरकारी स्कूलों, सरकारी अस्पतालों में अच्छा उपयोग करें तो सब समस्याएं खत्म हो सकती है। ये काम अपनी निगरानी में कर सकते हैं।






