Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 2:42 am

Thursday, July 9, 2026, 2:42 am

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

वन्यजीव संरक्षण की आड़ में दाँतों का खेल: वंतारा में 20 हाथियों का रहस्य

वंतारा पर उठते सवाल…

डी के पुरोहित. न्यूयार्क

भारत का वंतारा प्रोजेक्ट—जिसे विश्व स्तर पर वन्यजीव संरक्षण की मिसाल बताया जा रहा है—एक बार फिर सुर्खियों में है। आधिकारिक तौर पर यह दावा किया जा रहा है कि अरुणाचल प्रदेश के लॉगिंग उद्योग से बचाए गए 20 हाथियों को यहां सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन दिया जा रहा है। लेकिन जब इस दावे की तह तक जाया गया, तो सामने आया एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का अवैध दाँत व्यापार, जिससे न केवल भारत की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़ा हो रहा है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की पूरी नैतिकता को भी कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।


(2) वंतारा: एक चमचमाती सतह के नीचे छुपा अंधकार

वंतारा को भारत सरकार और कुछ निजी कॉरपोरेट समूहों ने मिलकर एक हेरिटेज ज़ूलॉजिकल इनिशिएटिव के रूप में प्रस्तुत किया है। इसका मकसद था—अनाथ, घायल और शोषित जानवरों को संरक्षण और पुनर्वास देना। विशेष रूप से, यहां लाए गए 20 एशियाई हाथियों की कहानी एक “रेस्क्यू मिशन” के रूप में प्रचारित की गई।

लेकिन जब रिपोर्टिंग टीम ने स्थानीय वन अधिकारियों, कुछ गुप्त स्रोतों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े अंतरराष्ट्रीय डेटा का अध्ययन किया, तो पाया गया कि हाथियों की संख्या को लेकर गहरा असमंजस है। वंतारा द्वारा घोषित 20 हाथियों में से कई के रिकॉर्ड या तो अस्पष्ट हैं, या एकदम गायब।


(3) आंकड़ों की गड़बड़ी: 20 या कुछ और?

आरटीआई (सूचना का अधिकार) के तहत मांगी गई जानकारी से यह खुलासा हुआ कि पिछले दो वर्षों में अरुणाचल से 12 हाथियों को ट्रांसफर किया गया, जबकि वंतारा में 20 का दावा किया गया। ये 8 अतिरिक्त हाथी कहां से आए? क्या वे पहले से ही यहां थे? या फिर किसी अवैध ट्रैफिकिंग का हिस्सा?

अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि कुछ हाथियों को “रेस्क्यू” के नाम पर असल में दाँत निकालने के लिए खरीदा गया था। ये हाथी सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं देते, बल्कि उन्हें एक अलग खंड में रखा जाता है, जहाँ पर्यटकों की पहुंच नहीं है।


(4) दाँतों का कारोबार: भारत से लेकर हांगकांग तक

अवैध हाथी दाँत व्यापार कोई नया विषय नहीं है। लेकिन भारत के अंदर एक सरकारी या अर्ध-सरकारी संरक्षण केंद्र से इसका संचालन, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बन चुका है।

वंतारा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मृत हाथियों के दाँतों को “नेचुरल लॉस” कहकर प्रलेखित किया जाता है, जबकि असल में हाथियों को नियंत्रित करने के लिए धीमा ज़हर देकर मारा जाता है। उनके दाँत निकाल कर पहले नेपाल या म्यांमार के रास्ते चीन, फिर हांगकांग, और अंत में अमेरिका व यूरोप में बेचे जाते हैं।


(5) इंटरपोल और इंटरनेशनल नेटवर्किंग

इंटरपोल की 2024 की एक गोपनीय रिपोर्ट में भारत के तीन वन्यजीव संरक्षण केंद्रों को संदिग्ध व्यापार से जोड़ा गया था, जिनमें वंतारा का नाम सबसे ऊपर था। न्यूयॉर्क से लेकर नैरोबी और शंघाई तक फैले नेटवर्क में “संरक्षण के नाम पर तस्करी” का यह मॉडल एक नया ट्रेंड बन गया है।

एक गुमनाम पूर्व अधिकारी ने खुलासा किया कि “दाँतों को सांस्कृतिक मूर्तियों में ढाल कर भेजा जाता है, जिन्हें फिर नीलामी में उच्च दामों पर बेचा जाता है।”


(6) वंतारा की चुप्पी और सवाल

जब वंतारा प्रशासन से इन आरोपों पर जवाब मांगा गया, तो उन्होंने  चुप्पी साध ली.

लेकिन जब न्यूयॉर्क स्थित वाइल्डलाइफ ट्रैफिकिंग वॉचडॉग “Save Pachyderms Global” ने इन दावों को क्रॉस-वेरिफाई किया, तो पाया कि वंतारा ने जिन कुछ जानवरों की जानकारी साझा की है, वे डेटा यूएन की CITES सूची से मेल नहीं खाते।


(7) एक अनकही कहानी: प्रशिक्षकों की गवाही

तीन पूर्व महावतों ने यह कबूल किया कि वंतारा में प्रशिक्षकों को “लाल घेरे वाले हाथी” नामक गुप्त सूची के अंतर्गत काम करने को कहा जाता था। इन हाथियों को आम जनता से दूर रखा जाता है और विशेष निगरानी में रखा जाता है। यहीं पर उनकी दाँत कटिंग, एक्सट्रैक्शन, और ट्रांसपोर्ट की योजना बनती है।

“हमें केवल यह कहा जाता था कि वे बीमार हैं, या समाज के लिए खतरनाक। लेकिन असल में उन्हें किसी सौदे के तहत भेजा जाता था।”


(8) सरकार की भूमिका और संदिग्ध चुप्पी

जब केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से इस बारे में जवाब मांगा गया, तो उन्होंने कहा कि “हम किसी भी अवैध गतिविधि को बर्दाश्त नहीं करते और वंतारा में समय-समय पर ऑडिट होते हैं।” लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि पिछले ऑडिट की रिपोर्ट क्यों सार्वजनिक नहीं की गई?

इसके अलावा, जिन NGOs और विदेशी दानदाताओं से वंतारा को करोड़ों का फंड मिलता है, उन्होंने भी इस मुद्दे पर अब तक चुप्पी साध रखी है।


(9) स्थानीय विरोध और खतरे में सच्चाई

राजस्थान के कुछ स्थानीय पत्रकारों और वन्यजीव कार्यकर्ताओं को हाल ही में अज्ञात कॉल्स और धमकियां मिलीं जब उन्होंने वंतारा के “निजी जोन” में रिकॉर्डिंग करने की कोशिश की। एक रिपोर्टर को वंतारा के गेट पर ही 24 घंटे के लिए हिरासत में रखा गया।

विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि “यह पूरा तंत्र एक संगठित अपराध का हिस्सा बन चुका है, जहाँ जानवरों की पीड़ा को ग्लैमराइज कर छुपा लिया गया है।”


(10) अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और अगला कदम

संयुक्त राष्ट्र की वन्यजीव शाखा UNEP ने इस मसले पर भारत से स्पष्टीकरण मांगा है। वहीं, न्यूयॉर्क स्थित World Elephant Coalition ने भारत सरकार को एक ओपन लेटर में वंतारा की स्वतंत्र जांच की मांग की है।

इस बीच, अमेरिका में हाथी दाँत व्यापार पर पूर्ण प्रतिबंध होने के बावजूद, न्यू जर्सी और लॉस एंजेलेस में दो ऐसे डीलरों को गिरफ्तार किया गया है जिनके पास “राजस्थान आधारित सप्लाई चैन” के प्रमाण मिले हैं।


(11) निष्कर्ष: संरक्षण बनाम तस्करी की दहलीज़ पर

वंतारा एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ से वह या तो विश्व स्तर का संरक्षक बन सकता है, या एक कुख्यात तस्करी केंद्र। हाथियों की संख्या, उनकी पहचान, उनकी मृत्यु और उनके दाँत की यात्रा—इन सबकी पारदर्शिता ही इस पूरे विवाद का समाधान है।

भारत जैसे देश के लिए, जहाँ भगवान गणेश की पूजा होती है, वहाँ हाथियों को संरक्षित करना केवल पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व भी है।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor