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Thursday, July 9, 2026, 7:48 am

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क्या बदलेगा भारत का लोकतंत्र? मोदी सरकार कर रही है प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष चुनाव पर विचार

कपिल भटनागर. नई दिल्ली

भारत के लोकतंत्र की परंपरागत प्रणाली में बड़ा बदलाव हो सकता है। मोदी सरकार अब एक ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रही है जो भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को एक नया मोड़ दे सकता है। यह प्रस्ताव है – प्रधानमंत्री का प्रत्यक्ष चुनाव। वर्तमान में देश में प्रधानमंत्री का चयन संसद के माध्यम से होता है, जहां बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन अपने नेता को चुनता है और वह नेता प्रधानमंत्री बनता है। लेकिन अब सरकार यह जानने के लिए लोगों की राय लेना चाहती है कि क्या देश इस प्रणाली से संतुष्ट है, या प्रत्यक्ष प्रणाली को अपनाने के पक्ष में है।


वर्तमान प्रणाली की स्थिति

भारत में संसदीय प्रणाली के तहत लोकसभा चुनाव होते हैं। जनता अपने-अपने क्षेत्र से सांसद चुनती है। इन सांसदों के बहुमत के आधार पर सरकार बनती है और उस दल का या गठबंधन का नेता प्रधानमंत्री बनता है। यह एक परोक्ष प्रणाली है, जिसमें जनता सीधे प्रधानमंत्री को नहीं चुनती।

वर्तमान में यही प्रणाली ब्रिटेन आदि अनेक देशों में भी प्रचलित है। वहीं अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों में राष्ट्रपति या शीर्ष कार्यकारी पद पर आसीन व्यक्ति का चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से होता है। यानी जनता सीधे उस व्यक्ति को चुनती है जो उनके देश का सर्वोच्च नेता बनेगा।


मोदी सरकार की मंशा क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अब एक बड़ा विचार-विमर्श शुरू करने जा रही है। सूत्रों के अनुसार, सरकार अगले छह महीने तक देशभर में जनता से राय लेगी कि क्या प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे जनता द्वारा होना चाहिए। यह राय ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से ली जाएगी, ताकि देश के हर तबके की आवाज सुनी जा सके।

सरकार का मानना है कि जब देश के कई नागरिक अपने नेता को सीधे चुनना चाहते हैं, तो यह विचार भी लोकतंत्र के विस्तार का हिस्सा हो सकता है। यदि लोगों की राय इस दिशा में जाती है, तो सरकार अगला कदम उठाएगी।


राय जानने की प्रक्रिया

रायशुमारी का यह अभियान भारत के हर राज्य, हर भाषा और हर समुदाय को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाएगा। यह छह महीनों तक चलेगा, जिसमें निम्नलिखित माध्यमों से जानकारी ली जाएगी:

  • डिजिटल पोर्टल्स और मोबाइल एप
  • ग्राम पंचायत और शहरी वार्ड सभाओं में वोटिंग
  • रेडियो, टीवी और सोशल मीडिया पर पोल्स
  • यूनिवर्सिटीज़ और कॉलेजों में युवाओं की राय

सरकार का कहना है कि केवल एक सीमित समूह नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।


कमेटी का गठन

रायशुमारी की समाप्ति के बाद मोदी सरकार एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन करेगी, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल होंगे:

  • पूर्व न्यायमूर्ति (सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज)
  • वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी (आईएएस)
  • संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ
  • पत्रकार और मीडिया प्रतिनिधि
  • शिक्षाविद और यूनिवर्सिटी के कुलपति
  • सफल उद्यमी और औद्योगिक संगठन प्रतिनिधि
  • पूर्व सांसद और विभिन्न दलों के नेता

यह कमेटी छह महीनों के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी जिसमें यह विश्लेषण होगा कि प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष चुनाव की क्या संवैधानिक, सामाजिक और प्रशासनिक बाधाएं हैं, और क्या इसे लागू करना भारत के लोकतंत्र के लिए लाभकारी होगा।


संविधान संशोधन की तैयारी

यदि कमेटी की रिपोर्ट सकारात्मक रही और सरकार को यह विचार संविधान के अनुरूप लगा, तो अगला कदम होगा – संविधान में संशोधन। प्रधानमंत्री का प्रत्यक्ष चुनाव कराने के लिए संविधान के अनुच्छेदों में बदलाव करना होगा.

इसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी, और फिर आधे से अधिक राज्यों की विधानसभाओं से भी इस संशोधन की पुष्टि होनी होगी। यह एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनसमर्थन साथ हो, तो यह असंभव नहीं है।


संभावित बदलाव

यदि यह योजना लागू होती है, तो अगला लोकसभा चुनाव एक बिल्कुल नई प्रणाली पर आधारित हो सकता है, जिसमें:

  • नागरिक सीधे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को वोट देंगे।
  • राजनीतिक दल प्रधानमंत्री पद के लिए अपना-अपना उम्मीदवार घोषित करेंगे।
  • संसदीय और प्रधानमंत्री चुनाव अलग-अलग हो सकते हैं, जिससे द्वैध मतदान की स्थिति बन सकती है।

इससे चुनावों की प्रकृति, राजनीतिक दलों की रणनीति और भारतीय लोकतंत्र की परिभाषा में गहरा बदलाव आएगा।


पक्ष में तर्क

  1. सीधी जवाबदेही: यदि जनता सीधे प्रधानमंत्री को चुनती है, तो उसकी जवाबदेही भी सीधे जनता के प्रति होगी, न कि सांसदों के प्रति।
  2. नेतृत्व में स्पष्टता: चुनाव से पहले ही स्पष्ट होगा कि कौन प्रधानमंत्री बनेगा, जिससे राजनीतिक अस्थिरता की संभावना कम होगी।
  3. विकास और नीतिगत निर्णयों में तेजी: स्थिर और सीधे निर्वाचित नेतृत्व नीतिगत निर्णयों को जल्दी और प्रभावी तरीके से लागू कर सकता है।
  4. लोकतंत्र का विस्तार: जनता को सर्वोच्च नेतृत्व के चयन का अधिकार देना लोकतंत्र की भावना को मजबूत करता है।

विपक्ष में तर्क

  1. संघवाद को खतरा: भारत जैसे विविधताओं वाले देश में एक व्यक्ति को इतनी शक्ति देना राज्यों के संघीय अधिकारों को कमजोर कर सकता है।
  2. लोकतंत्र में असंतुलन: प्रत्यक्ष चुनाव में एक ही व्यक्ति की छवि निर्णायक बन सकती है, जिससे संस्थागत ढांचे की भूमिका सीमित हो सकती है।
  3. चुनावी खर्च में वृद्धि: राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री पद के चुनाव में प्रचार और खर्च बहुत अधिक होगा, जिससे राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल सकता है।
  4. राजनीतिक ध्रुवीकरण: सीधा चुनाव प्रचार अधिक आक्रामक और विभाजनकारी हो सकता है, जिससे समाज में ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

इस प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। कुछ दलों ने इस पहल को जनभागीदारी की दिशा में अच्छा कदम बताया है, तो कुछ ने इसे “लोकतंत्र के केंद्रीयकरण” की कोशिश कहा है।

कांग्रेस पार्टी ने कहा, “भारत की संसद आधारित प्रणाली में कार्यपालिका को जवाबदेह बनाना जरूरी है। प्रत्यक्ष प्रणाली से यह संतुलन बिगड़ सकता है।”

बीजेपी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यह प्रस्ताव जनता की मांग और समय की आवश्यकता है। जनता को अपने नेता को चुनने का अधिकार देना चाहिए।


विशेषज्ञों की राय

संवैधानिक विशेषज्ञ मानते है, “भारत का संविधान एक संतुलित व्यवस्था है। प्रत्यक्ष प्रणाली आकर्षक जरूर लगती है, लेकिन इसके दुष्परिणाम भी हो सकते हैं, जैसे तानाशाही प्रवृत्तियों को बढ़ावा।”

वरिष्ठ पत्रकार नवनीत गुर्जर कहते हैं, “यह प्रयोग यदि हो भी गया, तो इसकी निगरानी और पारदर्शिता बेहद जरूरी होगी। वरना यह लोकतंत्र को खोखला कर सकता है।”


लोकतंत्र और चुनावी ढांचा बदल जायेगा

मोदी सरकार का यह प्रस्ताव निश्चित ही भारत के लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। यदि इसे लागू किया जाता है, तो यह देश के चुनावी और राजनीतिक ढांचे को पूरी तरह बदल सकता है। लेकिन इससे पहले एक गहन और संतुलित बहस की आवश्यकता है, जिसमें हर पक्ष को सुना जाए, और हर नागरिक को अपने विचार रखने का अवसर मिले।

अगले कुछ महीने इस दिशा में निर्णायक होंगे – क्या भारत विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र से सबसे प्रत्यक्ष लोकतंत्र बनने की ओर कदम बढ़ाएगा?


 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor