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Thursday, July 9, 2026, 6:38 am

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अरुण ऋषि स्वर्गीय से राइजिंग भास्कर का विशेष इंटरव्यू : बिना दवा, बिना डॉक्टर – स्वस्थ जीवन का स्वर्गीय विज्ञान

अरुण ऋषि की सोच पर भारत चले तो प्रतिदिन स्वास्थ्य सेवाओं पर 10 हजार करोड़ रूपये खर्च होने से बच सकते हैं. कैसे…

राखी पुरोहित, एडिटर इन चीफ, राइजिंग भास्कर

जब देश में स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिदिन 10,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो रहे हों, और लोग बीमा, मेडिकल लोन व अस्पताल की कतारों में अपनी जिंदगी गंवा रहे हों, तब मध्य प्रदेश के उज्जैन से एक आवाज उठती है – “बिना मेडिसिन सर्वे भवन्तु सुखिनः…”। इस आवाज के पीछे हैं 72 वर्षीय अरुण ऋषि “स्वर्गीय”, जो न सिर्फ अपनी सादगी, बल्कि वैज्ञानिक वैकल्पिक जीवनशैली के कारण देशभर के डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और उद्योगपतियों के बीच बहस और जिज्ञासा का विषय बने हुए हैं।

एक अजीब नाम… “स्वर्गीय”?

जी हां, वह अपने नाम के आगे “स्वर्गीय” लगाते हैं। जब हमने पूछा, “आप जीवित हैं, तो यह ‘स्वर्गीय’ क्यों?”, मुस्कराते हुए जवाब आया, “जो भारत में रहता है वह भारतीय, जो स्वर्ग में रहता है वह स्वर्गीय… मैं स्वर्ग में जीता हूं, इस धरती पर, क्योंकि मैं बीमार नहीं होता, मैं दवा नहीं खाता, मेरा शरीर और मन दोनों हल्के और प्रसन्न हैं।”

शायद पहली बार इस ‘स्वर्गीय’ शब्द को इतनी गहराई से और इतनी बेबाकी से किसी ने जीकर दिखाया है।

पढ़ाई में ‘फेल’, जीवन में ‘टॉप’ – एक साक्षात्कार

(राखी पुरोहित): अरुण जी, आपने खुद को बीएससी फेल बताया, लेकिन आप देश के नामी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों को ‘हेल्थ मैनेजमेंट विदाउट मेडिसिन’ सिखाते हैं। यह कैसे संभव हुआ?

अरुण ऋषि स्वर्गीय: डिग्री मेरे पास नहीं, पर अनुभव और आत्मज्ञान है। शरीर को समझना किसी एमबीबीएस कोर्स से कहीं ज्यादा गहरा विज्ञान है। मैंने खुद को 40 वर्षों से ‘प्रयोगशाला’ बना रखा है। न कोई टूथब्रश, न चाय, कॉफी, साबुन, शैम्पू, न कोई सौंदर्य प्रसाधन… मैंने शरीर को उसकी प्राकृतिक दशा में जीने दिया, और बदले में शरीर ने मुझे बीमारी से मुक्त रखा।

डॉक्टरों को जब खुद सवाल सुनकर शर्म आई

एम्स, दिल्ली में “सेल्फ मैनेजमेंट” पर एक व्याख्यान के दौरान, अरुण ऋषि ने डॉक्टरों से सीधा सवाल पूछा: “क्या आप स्वयं स्वस्थ हैं?” डॉक्टरों की निगाहें नीचे झुक गईं। उन्होंने फिर पूछा – “जब आप खुद ही स्वस्थ नहीं हैं, तो मरीजों को कैसे स्वस्थ कर सकते हैं?”

उनके सवाल मजाक लग सकते हैं, पर जब उन्हें सुनते-सुनते मन ठहरता है, तो उनका हर तर्क तार्किक और वैज्ञानिक लगता है।

ताली और नमाज़ – एक साथ

अरुण ऋषि के हर व्याख्यान में तालियों की गूंज होती है – 15 सेकंड की ताली,  शरीर में एक्यूप्रेशर का काम करता हैं. एक्यूप्रेशर रोगों को भागने का उपाय बताते हैं। वह नमाज़ की मुद्राओं को भी शरीर की श्रेष्ठ कसरत बताते हैं। उनका पसंदीदा शेर:

“जिस दिन ताली और नमाज़ एक साथ होगी अता,
बस वही होगा जन्नत का सही पता।”

45 वर्षों से शून्य मेडिकल खर्च!

अरुण ऋषि दावा करते हैं कि उन्हें 45 वर्षों में न बुखार हुआ, न सिर दर्द, न कोई जोड़ों का दर्द, न कब्जियत। उन्होंने कभी दवा नहीं ली। और यह सब किसी पहाड़ या आश्रम में नहीं, बल्कि शहरी जीवन जीते हुए संभव हुआ।

वह कहते हैं कि कब्ज, जोड़ दर्द, प्रोस्टेट, डायबिटीज़ जैसी बीमारियाँ आधुनिक जीवनशैली की देन हैं। जो व्यक्ति रोज़ थोड़ा समय नंगे पैर पत्थर पर चले, जो भोजन को भावना से खाए, जो मल-मूत्र विसर्जन को प्राकृतिक मुद्रा में करे, वह कभी बीमार नहीं होगा।

स्वामी नहीं, प्रयोगकर्ता

अरुण ऋषि किसी पंथ या संप्रदाय से नहीं जुड़ते। वह किसी आश्रम में नहीं रहते। उन्होंने न कोई गुरु धारण किया, न किसी चमत्कार का सहारा लिया। वह कहते हैं, “मैं एक प्रयोगकर्ता हूं। मैं कहता हूं, पहले खुद प्रयोग करो, फिर विश्वास करो।”

वे अपने ट्रस्ट ‘आयुष्मान भव’ के तहत, हर महीने 18 दिन देश के विभिन्न उद्योगों, संस्थानों, कॉलेजों में जाकर अल्प मानधन पर व्याख्यान देते हैं।

दिल्ली से दुबई तक

उनकी कार्यशालाएं दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, चेन्नई से होती हुई दुबई के ली मेरिडियन होटल तक पहुंचीं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्होंने बिना दवा स्वास्थ्य के मंत्र सिखाए, और वहां की प्रतिक्रियाएं अवाक करने वाली थीं.

प्रधानमंत्री से मुलाकात की प्रतीक्षा

अरुण ऋषि पिछले पांच वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की कोशिश कर रहे हैं। वह कहते हैं –

“अगर मेरी बात सुनी जाए, तो भारत का मेडिकल बजट 70-80% कम किया जा सकता है।
पर क्या भारत में प्रधानमंत्री से मिलना इतना कठिन है?”

उन्होंने एक ढाई मिनट का वीडियो बनाकर देशवासियों और सरकार से संवाद की कोशिश की है।

एक दवा निराली – 15 सेकंड की ताली

हमारी भूलें और उनका समाधान

अरुण ऋषि का मानना है कि हमारी बीमारियों का कारण पश्चिमी जीवनशैली की नकल है। उन्होंने कहा

“पश्चिम हमारे योग, ध्यान, आयुर्वेद और स्वाभाविक जीवनशैली को सीखकर आगे बढ़ रहा है,
और हम अपने ज्ञान को छोड़ कर, पिज्जा, बर्गर, पेप्सी के पीछे भाग रहे हैं।”

वे आगे कहते हैं –

“किसी जानवर को पेट भर जाने के बाद कुछ नहीं चाहिए,
लेकिन हम इंसान भरे पेट के बाद भी चार गुलाब जामुन निगल लेते हैं।
यही कारण है कि हम बीमार हैं। जो भूख से कम खाता है, वो स्वस्थ रहता है।”

भोजन और भजन में फर्क नहीं

उनका यह कथन विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है –

“भजन करते वक्त अगर आप बात करेंगे तो उसका फल नहीं मिलेगा,
वैसे ही भोजन करते वक्त टीवी या मोबाइल देखेंगे तो उसका पाचन नहीं होगा।
शरीर चेतना है, वह भाव से चलता है, भावना से नहीं, तो विकार जमा होंगे।”

पुनर्जागरण का सवेरा

कोरोना काल के अनुभव ने उन्हें यह कहने पर मजबूर किया –“कोरोना हमें चेतावनी देकर गया है कि हम अपनी जीवनशैली पर पुनर्विचार करें। अब समय आ गया है कि भारत अपने आध्यात्मिक और जीवन-वैज्ञानिक ज्ञान को फिर से अपनाए, तभी ‘सवेरा’ असली होगा – भारत के पुनर्जागरण का सवेरा।” यह पूरी प्रक्रिया प्रकृति की और वापसी की है एवं प्राकृतिक रूप से जीने की है। आप ईश्वर की हवा को मत बिगाडो ईश्वर भी आपकी हवा को नहीं बिगाड़ेगा।

क्या यह आंदोलन बन सकता है?

अरुण ऋषि स्वर्गीय कोई बाबा नहीं, कोई राजनेता नहीं, कोई डॉक्टर भी नहीं – वे एक प्रयोगकर्ता हैं, जो अपने शरीर को ही प्रमाण बना कर हमें जागृत कर रहे हैं। उनका संदेश स्पष्ट है –
दवा छोड़ो नहीं, पर दवा पर निर्भर मत रहो। जीवन की व्यवस्था को समझो,
स्वस्थ रहना तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

संपर्क सूत्र:
नाम: अरुण ऋषि स्वर्गीय
मोबाइल: +91 94253 32266
वेबसाइट: www.arunrishi.in
फेसबुक: फेसबुक प्रोफाइल

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor