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Thursday, July 9, 2026, 1:53 am

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“दिमाग़ की जवानी लौटाएगी एम्स जोधपुर की ‘सीक्रेट पिल’: क्या बुढ़ापे को मात दे पाएगी विज्ञान की ये नई क्रांति?”

60 साल की उम्र के बाद अक्सर आदमी की सोचने, निर्णय लेने और नई बातें याद रखने की शक्ति घटने लगती है। मेडिकल साइंस इसे Cognitive Decline कहता है। लेकिन अगर आपसे कहा जाए कि एक दिन ऐसी गोली आएगी जिसे सिर्फ 30 दिन तक खाकर 10 दिन तक आपका दिमाग़ फिर से 30 साल के युवा जैसा काम करेगा — तो क्या आप यकीन करेंगे?-जी हां, मेडिकल साइंस अब इसे सच करने जा रहा है। प्रस्तुत है ये रिपोर्ट-

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

जब शरीर थक जाता है, तो मन कभी हार नहीं मानता। पर जब मन थक जाए, तो शरीर भी साथ छोड़ देता है।”

इसी विचारधारा पर आधारित है एम्स जोधपुर में चल रही वह शोध परियोजना जो इंसानी मस्तिष्क को फिर से ‘जवान’ बना देने का सपना देख रही है।

60 साल की उम्र के बाद अक्सर आदमी की सोचने, निर्णय लेने और नई बातें याद रखने की शक्ति घटने लगती है। मेडिकल साइंस इसे Cognitive Decline कहता है। लेकिन अगर आपसे कहा जाए कि एक दिन ऐसी गोली आएगी जिसे सिर्फ 30 दिन तक खाकर 10 दिन तक आपका दिमाग़ फिर से 30 साल के युवा जैसा काम करेगा — तो क्या आप यकीन करेंगे?

एम्स जोधपुर के एक सीनियर न्यूरोसाइंटिस्ट ने राइजिंग भास्कर को गोपनीयता की शर्त पर बताया कि ऐसी क्रांतिकारी दवा पर रिसर्च चल रही है, जो मस्तिष्क की उम्र को पलट देगी।

रिसर्च की जड़ें: बुढ़ापे के खिलाफ विज्ञान का युद्ध

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और डिफेन्स बायो-इंजीनियरिंग रिसर्च यूनिट की साझेदारी में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट का नाम है: Project REVIVE
इसका उद्देश्य है:

  • 60 साल के बाद दिमागी कोशिकाओं (Neurons) के कमजोर पड़ने की प्रक्रिया को धीमा करना।
  • मस्तिष्क में Neurotransmitters की गति और घनत्व को 30 वर्ष के मानक तक लाना।
  • याददाश्त, एकाग्रता और सोचने की रफ्तार को ‘रीबूट’ करना।

शोधकर्ताओं का कहना है कि एक खास बायो-मॉलिक्यूल, जो जापानी मशरूम और हिमालयी जड़ी-बूटियों से निकाला गया है, उसमें मस्तिष्क के “मेमोरी सेंटर” को सक्रिय करने की क्षमता देखी गई है।

30 दिन की गोली – 10 दिन का युवा दिमाग?

एम्स के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि यदि यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा, तो इस गोली को 60 वर्ष से ऊपर के लोगों पर प्रयोग के तौर पर दिया जाएगा।

  • यह गोली 30 दिनों तक नियमित खाई जाएगी।
  • इसके बाद, व्यक्ति को कम से कम 10 दिनों तक ऐसा अनुभव होगा जैसे उसकी सोच, मेमोरी, निर्णय लेने की क्षमता और संज्ञानात्मक गति 30-40 वर्ष की उम्र के समान है।

क्या यह परमानेंट होगा?
नहीं, अभी इस गोली का प्रभाव केवल 10 से 12 दिन तक ही देखा गया है। वैज्ञानिक इसे ‘Cognitive Booster Capsule’ कह रहे हैं।

साइड इफेक्ट्स: चमत्कार की कीमत?

हर चमत्कारी आविष्कार के पीछे एक स्याह पक्ष होता है — साइड इफेक्ट्स।
शोधकर्ताओं के अनुसार, अब तक की लैब टेस्टिंग में निम्नलिखित साइड इफेक्ट सामने आए हैं:

  • अत्यधिक उत्तेजना (Hyperactivity)
  • नींद की कमी
  • पुरानी यादों के अचानक उभरने से भावनात्मक अस्थिरता
  • कुछ मामलों में माइग्रेन या सर दर्द

रिसर्च टीम फिलहाल इन प्रभावों को कम करने के लिए एक Anti-Rebound Formula विकसित कर रही है। रिसर्च का दूसरा चरण इसी पर केंद्रित होगा।

गोपनीयता की परतें: क्यों छुपाया जा रहा है ये रिसर्च?

एम्स प्रशासन ने इस शोध को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया है। वजहें:

  1. मनोवैज्ञानिक दुरुपयोग: यदि आम जनता को दवा मिल गई, तो इसका दुरुपयोग हो सकता है – जैसे परीक्षा की तैयारी में, व्यापारिक निर्णयों में या स्पाई एजेंसियों द्वारा।
  2. बाजार की अराजकता: यदि दवा की सूचना लीक हो गई, तो फार्मा कंपनियों में पेटेंट की लड़ाई शुरू हो सकती है।
  3. सामाजिक असमानता: अमीर लोग इसका फायदा उठा सकेंगे, गरीब वंचित रहेंगे। समाज में “न्यूरो-एलीट” बन सकते हैं।

एम्स की रिसर्च टीम ने इस रिसर्च को “Classified under Tier-2 Biocognitive Security” घोषित कर रखा है, जिसमें केवल सरकार और शोध टीम को जानकारी दी जा रही है।

पर्दे के पीछे 24 शोधकर्ता 

इस शोध का नेतृत्व 24 शोधकर्ता  कर रहे हैं. जिनमे 5 मनोवैज्ञानिक, 7 न्यूरोसाइंटिस्ट, 4 जीन विशेषज्ञ और 8 फार्मास्युटिकल इंजीनियर शामिल हैं।

विदेशी विशेषज्ञ भी हैरान

इस खबर के बाद हावर्ड मेडिकल स्कूल के न्यूरोसाइंस प्रोफेसर  भी हैरान हो रहे हैं

“यदि भारत यह दवा बना लेता है तो यह इंसानी मस्तिष्क के विकास का वह पड़ाव होगा जहां उम्र कोई सीमा नहीं रहेगी। यह दवा Silicon Valley और CIA जैसी संस्थाओं के लिए Game-Changer होगी।”

पर साथ ही उन्होंने आगाह भी किया —

“Such power must come with immense ethical responsibility. Else, it can be misused for manipulation, addiction, and psychological warfare.”

फील्ड ट्रायल: जोधपुर में ही होंगे प्रयोग

रिपोर्ट के मुताबिक, जोधपुर शहर को ही पहले ट्रायल ज़ोन के तौर पर चिन्हित किया गया है।
100 स्वेच्छिक वरिष्ठ नागरिकों को इस दवा का डबल-ब्लाइंड ट्रायल दिया जाएगा। इनमें शिक्षाविद, सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी, आर्मी अफसर और बुजुर्ग कलाकार शामिल होंगे।

एम्स की टीम प्रत्येक प्रतिभागी के मस्तिष्क की EEG रिपोर्ट, MRI स्कैन और न्यूरोलॉजिकल प्रतिक्रिया 90 दिनों तक मॉनिटर करेगी।

भविष्य की कल्पना: जब दिमाग बूढ़ा न हो

कल्पना कीजिए, एक ऐसा समय जब—

  • 80 साल का वैज्ञानिक नए विचारों की खोज कर रहा हो।
  • बुज़ुर्ग माता-पिता अपने पोते-पोतियों को नए स्टार्टअप आइडिया दे रहे हों।
  • सेवानिवृत्त अफसर देश के प्रशासनिक रिफॉर्म्स में सलाह दे रहे हों।

यह विज्ञान का वह भविष्य होगा जहां “बुढ़ापा” केवल शरीर की अवस्था होगी, दिमाग नहीं।

सरकार की भूमिका: साथ या साज़िश?

कुछ सूत्रों का कहना है कि भारत सरकार की गोपनीय सुरक्षा एजेंसी RAW और DRDO भी इस रिसर्च में प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। इन संस्थाओं की दिलचस्पी दवा के उस पहलू में है, जो युद्ध के समय जवानों की निर्णय क्षमता को बढ़ा सके।

कहीं यह दवा केवल आम नागरिकों के लिए नहीं, बल्कि रणनीतिक उद्देश्यों के लिए विकसित तो नहीं की जा रही?

आम जनता की प्रतिक्रिया: आशा और शंका
  • महेश व्यास (66) गोगा महाराज “अगर यह सच है तो मैं पहला व्यक्ति बनूंगा जो इसे आज़माएगा।”
  • प्रिया  (35), स्कूल टीचर: “मुझे डर है कि ऐसे लोग भी इसका इस्तेमाल करेंगे जिन्हें नहीं करना चाहिए — जैसे अपराधी या राजनेता।”
विज्ञान का वरदान या भविष्य की अनैतिकता?

एम्स जोधपुर की यह रिसर्च एक अभूतपूर्व कदम है जो मानवीय मस्तिष्क की सीमाओं को लांघने की तैयारी कर रही है। परंतु यह प्रश्न अनुत्तरित है:

क्या हम उस जिम्मेदारी के योग्य हैं जो इतनी शक्ति के साथ आती है? या यह गोली आने वाली पीढ़ियों को ‘कृत्रिम बुद्धिजीवी’ बना देगी जिनके पास सोचने की ताकत तो होगी, पर विवेक नहीं?

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor