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मिलिए श्वेता देवड़ा से… “जुस्तजू सक्षमता की: एक मां, एक मिशन और हजारों उम्मीदें”

ऑटिज्म पीड़ित बेटे को सिर्फ जीना नहीं, दुनिया से लड़ना भी सिखा रही है श्वेता देवड़ा…श्वेता के परिवार में अब एक नहीं 23 बच्चे हैं, सभी में हौसलों और आत्मविश्वास का भाव भरा जा रहा है…।
-निराशा तब होती है जब राजनीति और विभागीय उदासीनता अच्छे कार्यों को भी सहयोग नहीं करती, श्वेता टूटी नहीं बोलीं- समाज कल्याण विभाग आगे ना आए शरीर में जब तक जान है विशेष आवश्यकता वाले बच्चों का कल्याण करती रहेंगी…।

मटकी चौराहा जोधपुर से राखी पुरोहित की विशेष रिपोर्ट

8302316074, rakhipurohit066@gmail.com

“मैं अपने ऑटिज्म पीड़ित बेटे को सिर्फ जीना नहीं, दुनिया से लड़ना भी सिखा रही हूं।” – ये शब्द जब श्वेता देवड़ा के होंठों से फिसले, तो उनके पीछे वर्षों का संघर्ष, ठोकरें और एक न थमने वाला मातृत्व का संकल्प साफ़ झलक रहा था।

श्वेता, एक साधारण महिला नहीं हैं। जोधपुर की इस जुझारू मां ने अपने बेटे निपेंद्र के लिए वह किया है, जो न सिर्फ एक मिसाल है, बल्कि हजारों माता-पिता के लिए राह भी बन गया है। उनके पति शैलेन्द्र देवड़ा पंजाब नेशनल बैंक में मैनेजर हैं, पर श्वेता की असली नौकरी है– एक विशेष आवश्यकता वाले बच्चे की मां होना।

जब संघर्ष ने दस्तक दी

श्वेता का संघर्ष तब शुरू हुआ, जब उन्हें यह एहसास हुआ कि उनका बेटा निपेंद्र, जो अब 14 साल का है, बचपन से सामान्य विकास की राह पर नहीं चल रहा। न वह समय पर चीज़ें पकड़ता, न चलने या बोलने की समय सीमा में फिट बैठता। रिश्तेदारों ने कहा– “अरे लड़का है, धीरे-धीरे सीख जाएगा”, लेकिन मां का दिल जानता था कि कुछ तो असामान्य है।

पति की ग्रामीण पोस्टिंग और परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी के बीच एक दिन, जब अस्पताल में भीड़ देख निपेंद्र चीखने लगा, तब डॉक्टर ने पहली बार कहा – “यह ADHD हो सकता है। मानसिक रोग विशेषज्ञ से मिलिए।” मगर श्वेता ने अनदेखी की, शायद इस उम्मीद में कि सब ठीक हो जाएगा।

एक अनुभव जो बदल गया दृष्टिकोण

समाज की संवेदनहीनता का सबसे तीखा अनुभव उन्हें तब हुआ जब एक दिन निपेंद्र पार्क में टहलते हुए गलती से एक स्कूटर को टच कर बैठा और उस पर सवार डॉक्टर और उसका बेटा गिर पड़े। चोट किसी को नहीं आई, मगर शब्दों की मार ने श्वेता को लहूलुहान कर दिया। डॉक्टर ने ताना मारा – “तुम्हारा बेटा ही नहीं, तुम भी पागल हो। अगर पागल है तो इसे घर में बांधकर रखो।”

उस दिन श्वेता टूट तो गईं, मगर बिखरी नहीं। उन्होंने खुद से वादा किया – “मैं निपेंद्र को उसके हाल पर नहीं छोड़ूंगी।”

श्वेता बनींस्ट्राइवकी शक्ति

2019 में श्वेता ने ‘श्री स्ट्राइव फाउंडेशन’ नाम से एक एनजीओ शुरू किया। उद्देश्य था – “सक्षमता की राह” पर ऑटिज्म और अन्य विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ना।

आज यह एनजीओ 23 विशेष बच्चों की ज़िम्मेदारी संभाले हुए है। न केवल बच्चों को थैरेपी दी जाती है, बल्कि उनके अभिभावकों को भी खेल-खेल में मानसिक रूप से सशक्त किया जाता है। शाम के सत्र में सामान्य बच्चों को भी बुलाया जाता है ताकि दोनों वर्गों के बीच सामंजस्य और समावेश की भावना विकसित हो।

इस सकारात्मक माहौल में बच्चे कला, क्राफ्ट और अन्य रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ते हैं। उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और अभिभावकों की आंखों में उम्मीद की लौ फिर से जल उठती है।

हर दिन बदलाव की कोशिश

श्वेता की दिनचर्या अब एनजीओ के बच्चों के इर्द-गिर्द घूमती है। उनके पास अब प्रशिक्षित स्टाफ है जो बच्चों के साथ वक्त बिताता है। हर महीने इस एनजीओ का खर्च 35 हजार रुपए तक पहुंचता है, जो श्वेता और उनके पति स्वयं वहन करते हैं।

श्वेता बताती हैं, “राजस्थान में एक ऑटिज्म पीड़ित बच्चे की थैरेपी पर महीने में 15 से 20 हजार रुपए का खर्च आता है। मेट्रो सिटीज़ में यह खर्च 50-60 हजार तक पहुंच जाता है। एक घंटे की थैरेपी के लिए 1000 रुपए तक देने होते हैं।” मगर स्ट्राइव फाउंडेशन में यह सब कुछ बेहद कम लागत में और पूरे समर्पण के साथ होता है।

प्रशासन से संघर्ष, सिस्टम से निराशा

श्वेता ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को प्रत्येक जिले में विशेष बच्चों और उनकी माताओं के लिए ट्रेनिंग सेंटर खोलने का प्रस्ताव भेजा था। उन्होंने जोधपुर में सेंटर के लिए भी प्रस्ताव दिया था। समाज कल्याण विभाग में फाइल अटक गई। गहलोत ने रुचि तो दिखाई, मगर विभागीय उदासीनता के चलते बात आगे नहीं बढ़ी।

सरकार बदली, मगर फाइल वहीं अटकी रही। अब भाजपा की भजनलाल सरकार है। सचिवालय से जवाब मिला – “समाज कल्याण विभाग से संपर्क कीजिए।”

थक चुकी श्वेता अब कहती हैं, “सेवा कार्य सरकार या विभागों के रहमोकरम पर नहीं होते। जब तक जान में जान है, मैं अपने और समाज के विशेष बच्चों के लिए खड़ी रहूंगी।”

छोटी सी बहन, बड़ा सा दिल

श्वेता की साढ़े चार साल की बेटी देवना देवड़ा पूरी तरह स्वस्थ है। वह अपने भइया निपेंद्र का ख्याल ऐसे रखती है जैसे मां की छोटी सी परछाई हो। जब राइजिंग भास्कर की एडिटर इन चीफ राखी पुरोहित उनसे मिलने पहुंचीं, तो निपेंद्र ने मुस्कराते हुए हाथ मिलाया। जब राखी ने निपेंद्र को अपनी पेन दी, तो उसके चेहरे पर जो चमक आई, वो किसी भी पुरस्कार से कहीं ज़्यादा कीमती थी।

एक प्रेरणा, एक समर्पण

श्वेता देवड़ा ने बीए, एलएलबी, बीएड और स्पेशल एजुकेशन का डिप्लोमा कनाडा यूनिवर्सिटी से किया है। अधिकतर शिक्षा जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय से हुई। अपने एनजीओ के बारे में वह कहती हैं कि इस राह में रवि गुंठे (टेप्से एंड हेप्सन कॉलेज के पूर्व डायरेक्टर) ने उन्हें गाइड किया और उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

आंकड़ों की ज़ुबानी हकीकत

शार्क के एक सर्वे के मुताबिक, 2020 में हर 54 में से एक बच्चा ऑटिज्म पीड़ित था। 2024 में यह आंकड़ा 34 में एक हो गया है। 2030 तक ये संख्या और भी भयावह हो सकती है – 14 में से एक बच्चा। ये आंकड़े सरकार और समाज दोनों के लिए चेतावनी हैं।

समर्पण की स्याही से लिखा गया एक मिशन

राइजिंग भास्कर यह लेख श्वेता देवड़ा के बेटे निपेंद्र और देश के उन हजारों विशेष बच्चों को समर्पित करता है जिनके माता-पिता हौसलों से हार नहीं मानते। यह सिर्फ एक मां की कहानी नहीं है, यह उस पूरी संवेदनशीलता का आईना है, जो समाज में नज़रअंदाज़ कर दी जाती है।

श्वेता ने सिर्फ एक बेटे के लिए लड़ाई नहीं लड़ी – उन्होंने समाज को सिखाया कि “प्यार, समझदारी और समर्पण से विशेषता को भी सक्षमता में बदला जा सकता है।” हम सबको अब इतना ही तय करना है — क्या हम इस सक्षमता की राह में उनके साथ खड़े होंगे?

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor