राइजिंग भास्कर की एडिटर इन चीफ राखी पुरोहित का एक दार्शनिक और आध्यात्मिक विमर्श
“संसार है एक नदिया…” इन शब्दों में जीवन का अनादिकालीन रहस्य समाया हुआ है। जैसे कोई संत, किसी पर्वत शिखर पर बैठा समाधि से उठते ही अचानक कह दे – “जीवन को मत समझो, उसे बस बहने दो…”। हम सभी, चाहें किसी भी पंथ, जाति, धर्म या विचारधारा के हों, एक ही धारा में बहते हैं। इस नदिया में जन्म हमारी पहली छलांग है और मृत्यु अंतिम ठहराव। और इस बहाव के दो किनारे हैं – दुख और सुख।
यह आलेख उसी प्रवाह, उसी बहाव, उसी परमतत्व की स्तुति है, जिसने यह संसार रचा और हमें उसमें बहने के लिए भेजा।
जीवन – एक धारा, एक प्रवाह
कभी आपने नदी को ध्यान से देखा है? वह रुकती नहीं। किसी शिला से टकराती है, तो गाती है। किसी गड्ढे में गिरती है, तो फुहार बन जाती है। कभी बादलों से मिलती है, कभी समंदर में खो जाती है। वह जानती है कि रुकना मृत्यु है और बहना जीवन।
हम भी उसी तरह हैं। बचपन में मां की गोद, किशोरावस्था में सपनों का पहाड़, और युवावस्था में संघर्षों का समंदर – सब कुछ एक सतत प्रवाह है। हम चलते हैं, टूटते हैं, जुड़ते हैं, मगर रुकते नहीं। जीवन की सबसे बड़ी जीत यही है – वह चलता रहता है, चाहे आंसुओं में या मुस्कानों में।
दुख और सुख – दो किनारे, एक ही धारा
यहां एक गूढ़ सत्य छिपा है। दुख और सुख अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही धारा के दो विपरीत किनारे हैं। वे परस्पर जुड़े हुए हैं, जैसे रात और दिन, जैसे छाया और प्रकाश।
जैसे नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचने के लिए हमें धारा पार करनी होती है, वैसे ही सुख पाने के लिए दुख सहना पड़ता है। और दुख का अनुभव ही हमें सुख का मूल्य समझाता है।
“जिसने जीवन में दुख नहीं सहा, उसने ईश्वर की कृपा की मिठास भी नहीं चखी।”
ध्यान से देखिए – कोई भी महान आत्मा बिना संघर्ष के महान नहीं बनी। बुद्ध को ज्ञान तब मिला जब उन्होंने दुख को समझा। महावीर को निर्वाण तब मिला जब उन्होंने संसार के मोह को त्यागा। और कृष्ण ने भी गीता में यही कहा – “सुख-दुखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।”
हम कौन हैं?
हम बहते धारे हैं।
मगर क्या कभी इस प्रश्न पर ध्यान दिया है कि “धारा बहती है तो बहाने वाला कौन है?”
वो कौन शक्ति है जो जीवन की नदी को गति दे रही है? क्या वह महज ‘प्रकृति’ है या कोई और, जो देखता है मगर दिखाई नहीं देता?
आध्यात्मिक दर्शन कहता है कि यह शक्ति “परमतत्व”, “ब्रह्म”, “ईश्वर”, या “सर्वव्यापक चेतना” है।
वह परमतत्व न दृश्य है, न अदृश्य। वह अनुभव है। जैसे किसी मधुर संगीत को आंखों से नहीं देखा जा सकता, मगर आत्मा से महसूस किया जा सकता है – उसी प्रकार यह परमतत्व हर कण में विद्यमान है। वही हमें चलाता है, बहाता है, गिराता है, उठाता है। हम जो कुछ हैं, उसी की प्रेरणा से हैं।
यह संसार – उसकी कृति, उसकी लीला
कभी आकाश को देखा है? या फूल को सूंघा है? किसी बच्चे की हँसी को सुना है या किसी योगी की आंखों में शांति देखी है? ये सब उसी एक परमतत्व की रचनाएं हैं।
यह संसार उसका रंगमंच है। हम सभी पात्र हैं – कोई राजा, कोई भिखारी, कोई मां, कोई योद्धा, कोई संन्यासी।
जन्म एक प्रवेश है और मृत्यु एक प्रस्थान। बीच का समय अभिनय है। अच्छा अभिनय वही करता है, जो भूमिका को निभाता है, उससे चिपकता नहीं।
परमतत्व ने हमें इस मंच पर भेजा है किसी उद्देश्य से – अनुभव करने, सीखने और अंततः वापस लौट जाने के लिए।
तो बहें कैसे?
जब हम जानते हैं कि हम बहते धारे हैं, तो प्रश्न उठता है – “क्या हम इस धारा को नियंत्रित कर सकते हैं?”
उत्तर है – नहीं।
लेकिन हम उसमें सहज हो सकते हैं।
जैसे कोई कुशल तैराक नदी की लहरों को रोकता नहीं, बल्कि उनके साथ बहता है, वैसे ही हमें जीवन की परिस्थितियों में बहाव के साथ समरस होना सीखना चाहिए।
सहजता ही साधना है।
जब दुख आए – उसे अनुभव करें।
जब सुख आए – उसे भी जाने दें।
क्योंकि दोनों ही स्थायी नहीं हैं।
स्थायी है सिर्फ वह – जो तुम्हें देख रहा है, तुम्हारे भीतर बैठा है – “साक्षी भाव”।
धारा की दिशा नहीं, दृष्टि बदलें
बहुत बार हम जीवन में इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि हमारी दिशा क्या है? हम कहां जा रहे हैं? क्या सही कर रहे हैं?
परमतत्व हमें यह सिखाता है कि दिशा से अधिक महत्वपूर्ण है दृष्टि।
यदि आपकी दृष्टि शुद्ध है, कर्म निष्कलंक है, तो धारा स्वयं तुम्हें वहां ले जाएगी जहां तुम्हें जाना है।
“कोई लक्ष्य नहीं है जीवन में, सिवाय इस समझ के कि यह सब कुछ अस्थायी है – और यही सबसे बड़ी स्थायित्व है।”
शुक्रिया, उस अनदेखे – अद्भुत के लिए
अब इस आलेख की सबसे महत्वपूर्ण बात – कृतज्ञता।
यह संसार जितना जटिल है, उतना ही सुंदर भी है।
हमारी आंखें जो देखती हैं, कान जो सुनते हैं, मन जो सोचता है – वह सब कुछ किसी अदृश्य परोपकारी ऊर्जा की देन है।
उस शक्ति का हम हर सांस में ऋणी हैं।
कभी खुले आसमान के नीचे बैठकर मौन रहिए, और उस परमतत्व से बस एक बार कहिए – “शुक्रिया।”
उसने हमें बहने के लिए एक सुंदर नदी दी, दुख-सुख के किनारे दिए, अनुभवों के पत्थर दिए, रिश्तों के तट दिए, और सबसे बढ़कर, खुद को खोजने का अवसर दिया।
धारा को समझो, उससे लड़ो मत
इस संसार को समझने की सबसे सुंदर कला है – स्वीकृति।
हम नहीं जानते अगला मोड़ हमें कहां ले जाएगा, कौनसे पत्थर हमें गिराएंगे, किन लहरों से हम डरेंगे।
मगर यह निश्चित है कि यह नदिया हमें कहीं न कहीं एक विराट महासागर में समाहित कर देगी – जहां हम स्वयं को, उस परमतत्व को, और इस नाटक को पूरी तरह समझ जाएंगे।
इसलिए, चलिए बहें – शांति से, प्रेम से, गहराई से।
क्योंकि हम धारे हैं। दुख-सुख हमारे किनारे हैं। और जो बीच में है – वही जीवन है।
परमतत्व को प्रणाम।
आपने यह संसार रचा, हमें बहने दिया, और सबसे बड़ी बात – हमें चेतना दी कि हम जान सकें, हम कौन हैं।
इस बहती नदिया में, आप ही तो हमारी नैया हैं।
आपका ही मैं अंश हूं, आपकी ही मैं धारा हूं।
आपके चरणों में मेरा नमन।




