Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 3:24 am

Thursday, July 9, 2026, 3:24 am

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

सीपियां मन के समंदर की : जीवन की विसंगतियों और विडंबनाओं का सजीव चित्रण

समीक्षा : नीलम व्यास ‘स्वयंसिद्धा’

डॉ. उषा माहेश्वरी पुंगलिया का नया कविता संग्रह पढ़ने का सौभाग्य मिला। उनकी लगभग पंद्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें कहानी संग्रह, बाल कविता संग्रह, उपन्यास भी शामिल है। मूलतः आप कथाकार हैं मग़र कविता संग्रह भी बहुत उत्तम लिखे हैं।
यह कविता संग्रह नई लघुकविता शैली में लिखा गया है। इसमें कवयित्री ने जीवन की विसंगतियों और विडंबनाओं का सशक्त चित्रण किया गया है। जीवन में सपनों को पाने की ललक और आकाश को छूने की ही नहीं अपितु उसे बांहो में समेटने की प्रगाढ़ लालसा भी कविताओं में सहज ही प्रकट हुई है।

उनकी कविताओं को गागर में सागर भरने वाली कहा जा सकता है, जिसमें जीवन के यथार्थ की अनुभूति को शब्दों की लड़ियों में पिरोकर सुंदर माला के रुप में प्रस्तुत किया गया है। कवयित्री कर्मशील, सृजनशील रही है और भाग्य को बड़ा ही विचित्र रूप में पाती है। ‘भाग्य’ कविता में उनके भावों की सशक्त बानगी देखिए कि –
भाग्य उलझाए रहता /जीवन के हर पल को /सुलझाने की कोशिश करें तो/बिखेर देता /तिनकों की तरह। कवयित्री ने जीवन भर भाग्य की इस आंख मिचौली को देखा है, सहा है और हर संघर्ष को जीवटता से पार भी किया है। अकेले पन के भाव को अंधेरा अकेला है नामक कविता में इस तरह गहरे भाव बोध के साथ प्रस्तुत किया है कि पाठक सोचने को विवश हो उठते है।प्यार का अहसास ऐसा ही होता कि फूल समझकर छुआ जिसको, चुभे कितने कांटे?एक सपने की खातिर मर मिटे पर अंत में प्रेम में त्याग कर समझौते भी करने पड़ते है, सामने वाले की खुशी के लिए आंखों में आंसू लिए मुस्कराना भी पड़ता है –
‘चुभे कितने कांटें ‘-इस कविता में सच्चे प्रेम की ऐसी परिभाषा मिली है जिसमें त्याग को महत्व दिया है ना कि निजी सुख व स्वार्थ को, आज के कलियुगी परिवेश में ऐसे पावन भाव बमुश्किल ही देखने को मिलते हैं। मां की ममता की छांव नामक कविता में मां को गंगा, सरस्वती और दुनिया माना है, बच्चों की पहली गुरु ही मां को माना है। जिंदगी को चार दिनों का मेला नामक कविता में इस तरह से परिभाषित किया है –
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं/जो बेनाम रह जाते हैं /हंसाते रुलाते हैं /मन को भरमाते हैं /जीवन को चार दिनों का मेला बना देते हैं।

जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण

जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए, अपने सब कर्तव्य निभाते हुए भी कभी कभी मन आहत हो जाता है तब, जब लोग मन को ठेस पहुंचा चल देते है। ‘उपहार ‘-कविता में देखिएगा यही भाव प्रकट हुए हैं –
हरे जख्मों पर वो /नमक छिड़क कर /मुस्कुरा दिए / कौन जाने? किसने किसको /दर्द भरे उपहार दिए?
समाज में लोगों के जीवन के दुखों को देखकर वे यही कहती है कि – हम क्यों उम्मीद करें /यहां कोई किसी का नहीं /रिश्ते -नाते भ्रम ही हैं /संसार दुःखों का घर हैं /तो क्यों उम्मीद करें किसी से? सबके साथ साथ चलते हुए भी खुद को सशक्त बना कर आगे बढ़ते रहना, बिना किसी उम्मीद के, जीवन का मूलमंत्र सिद्ध किया है।
कवयित्री ने समाज और रिश्तों की कड़वी सच्चाई को भी प्रस्तुत किया है। कवयित्री दर्द को भी जीवन का प्रमुख हिस्सा मानती है – ये दर्द ही -नामक कविता में -ये दर्द ही हैं /जो जीना सिखाते हैं /अभाव ही है /जो संघर्ष करना सिखाते हैं /जन्म से मरण तक /समय का फासला /नापते हुए। कवयित्री ने प्रकृति के प्रति दायित्व बोध और जुड़ाव को भी सशक्त अभिव्यक्ति दी है, उनके भाव पूर्ण शब्दों की बानगी देखिएगा –
‘प्रकृति के बीच ‘-कविता में -पतझड़ के बाद आई /बसंती हवाओं के साथ बतियायें /जीवन संगीत सुने /प्रकृति का /आओ चले उपवन की सैर करें।

जीवन के हर भाव को शब्दों में पिरोया

कवयित्री नें जीवन के हर भाव को शब्दों में पिरोया है और आग्रह किया है – ‘बात सिर्फ इतनी सी है’-
आप मेरे अपने है/बस.. मुझे समझने की कोशिश करे/मेरी नादानियों को भूल जाइए/हाथ मिलाइये/मान जाइये/और मुस्कराइये। प्रेम में मान मनुहार चलती रहती है इसलिए अहंकार को छोड़ कर सरल भाव से जीना चाहिए। कवयित्री जीवन के हर मोड़ पर मुस्कराने का संदेश देती है। कवयित्री नें अध्यात्म को भी महत्व दिया है, ‘गीता का ज्ञान’ नामक कविता में – गीता का ज्ञान समझाता है /फल की इच्छा मत करो / निष्काम कर्म करते जाओ/सुख दुख के भ्रम में दुनिया लगेगी बोझ एक दिन/मुक्ति मार्ग ढूंढोंगे तुम /तो अभी मुक्त हो जाओ। कम शब्दों में जीवन के गूढ अर्थ को प्रकट करके आधुनिक परिवेश में समाज में बढ़ती भौतिक साधनों के प्रति लालसा को, कड़ी प्रतिस्पर्धा की अति को नियंत्रित करने का संदेश दिया है। आज के आधुनिक जीवन में उन्नति की दौड़ में भागता इंसान भीड़ के बीच भी अकेलापन महसूस करता है-‘अपनों में अपने की तलाश’-इसमें यही भाव निहितार्थ है- कर्म की जमीं पर खेती करते -करते हम /अपनों से बहुत दूर हो गये /अपनों में ही अपने को तलाश कर रहे हैं/हकीकत की दुनिया में /गुमनाम से हैं।

जीवन के सभी रंग कविता संग्रह में समाहित

कुल मिलाकर जीवन के सभी रंग इस कविता संग्रह में प्रकट हुए है जो कम शब्दों में गहन अर्थ बोध का चमत्कार सहज ही, सरल शैली में प्रकट करतें हैं। यहाँ शब्दों का क्लिष्ट रुप नहीं है, अर्थ गांभीर्य है, जो हमें बहुत कुछ सोचने पर विवश कर देते हैं। जीवन का समग्र अनुभव इन कविताओं में झलकता है। कही सुख दुख के खट्टे मीठे अनुभवों के सतरंगी चित्र हैं, कही सपनों की इंद्रधनुषी चादर है, कुछ सपनें अपूर्ण भी रह जाते हैं जिसकी टीस भी हम कविताओं को पढ़ते समय महसूस करतें हैं। इन कविताओं में जीवन के
संघर्ष के सहते हुए भी कवयित्री आशावादी भाव प्रकट करते हुये सदा मुस्कुराते रहने की बात कहती है। जैसे जैसे हम कविताओं को पढ़ते जाते हैं जीवन की परिभाषा नवीन अर्थ व संदर्भ में प्रकट होती है, हम इनकी भाव धाराओं में बहते जाते है, गहरी संवेदनाओं की अनुभूति करते हुए एक ऐसे मनोरम संसार की कल्पना में डूब जाते है जहां सच्चा प्रेम है, विश्वास है, आदर्श जीवन मूल्य है, सतत कर्म शील रहने का भाव है, एकांत साधना करते रहने की सीख है और निष्काम कर्म करने का गूढ संदेश भी मिला है। कविता शिल्प व शब्द विधान की दृष्टि से भी उन्नत है. सहज प्रवाह शीलता, बिम्ब व प्रतीकों का सूक्ष्म प्रयोग, निरंतरता, सरल भावाभिव्यक्ति का सौंदर्य प्रकट होता है। शब्दों की बुनावट ऐसी हुई है कि हम बहुत ही आराम से पूरा कविता संग्रह एक साथ पढ़ सकते है।कवयित्री नें जीवन का, अनुभवों का, आत्म अभिव्यक्ति का, मन की टीस का, जीवन दर्शन का, सहज चिंतन शैली का ऐसा मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है जो सटीक है, सुंदर है, गहन यथार्थ बोध के साथ सीख प्रद भी है।कवयित्री के मन के समंदर में ऐसी अनगिनत अनमोल सीपियां हैं जो जीवन के भोगे हुये यथार्थ को, कड़वी मीठी अनुभूतियों को समेटे हुये हैं। यह शीर्षक भी काव्यात्मक रंग लिए हुए है, जो हमें कविताओं को पढ़ने को विवश करता है। मैं डॉ. उषा माहेश्वरी पूंगलिया को इस अनमोल कविता संग्रह के सुंदर लेखन की हार्दिक बधाई देती हूं। आशा है वे इसी तरह सशक्त लेखनी का हस्ताक्षर बन कर साहित्य के क्षेत्र में नाम रोशन करती रहेंगी।
वे स्वस्थ रहे, श्रेष्ठ लिखती रहे, यही मेरी प्रार्थना हैं।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor